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मोदी के युवा राष्ट्र के निर्माण का सपना…डगर आसान नहीं

मोदी के युवा राष्ट्र के निर्माण का सपना…डगर आसान नहीं

By श्रीप्रकाश शर्मा

नरेन्द्र मोदी ने भारत के तीव्र विकास के लिए तीन आवश्यक तत्वों के रूप में डेमोग्राफिक डिविडेंड, डिमांड और डेमोक्रेसी की उपस्थिति की बात कही है। कहते हैं कि किसी देश की युवा शक्ति उस राष्ट्र का छुपा हुआ अस्त्र होता है और उस अस्त्र की अथाह ऊर्जा का दोहन तभी संभव है जब युवा शिक्षित हो, प्रशिक्षित हो और सबसे अधिक उन ऊर्जावान युवाओं के हाथों में रोजगार हो…

ईसा पूर्व छठी सदी के काल की बात है – उस समय चीन के महान दार्शनिक, रणनीतिकार तथा सेनानायक स्वन वू की एक पुस्तक ‘आर्ट ऑफ वार’ (युद्ध की कला) काफी प्रसिद्द हुई थी। यह पुस्तक पूरी दुनिया में सैन्य विज्ञान की सबसे पहली मानक पुस्तक मानी जाती है। कहते हैं कि इस पुस्तक में किसी सन्दर्भ में एक प्रश्न पूछा जाता है कि इस दुनिया में किसी देश पर विजय प्राप्त करने के लिए सेना, रसद और कमांडर में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि भोजन के बिना भी सेना कुछ समय के लिए लड़ सकती है। देश सेना के अभाव में भी कुछ समय के लिए महफूज रह सकता है किन्तु यदि किसी देश में सेना की मौजदूगी के साथ पर्याप्त भोजन रहने के बावजूद यदि सेना का कोई कमांडर नहीं हो तो देश क्षण मात्र के लिए भी स्वतंत्र तथा निर्भय नहीं रह सकता है। अर्थात किसी देश की सेना की महत्ता सर्वज्ञ है लेकिन उससे भी अधिक महात्म्य उस सेना की ताकत को समझ कर सही दिशा में गाइड करने वाले लीडरशिप क्वालिटी की है। इस सच से हम कदापि इनकार नहीं कर सकते हैं कि नेतृत्व किसी राष्ट्र के विकास की आधारशीला होती है और इसके अभाव में राष्ट्र में अराजकता तथा उहापोह का माहौल राज करता है। भारतीय राजनीति के  स्वातंत्र्योत्तरकाल में इतिहास के पन्ने ऐसे कई कालजयी विभूतियों के कीर्ति-गाथाओं से भरे पड़े हैं, जिन्होंने अपने करिश्माई नेतृत्व के फलस्वरूप देश की दशा और दिशा में सकारात्मक परिवर्तन लाये हैं। लेकिन इन सभी कीर्तियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ऐतिहासिक नेतृत्व ने पहली बार हिंदुस्तान के युवाओं की ताकत पहचानते हुए विकास का जो रोडमैप तैयार किया है उसमें राष्ट्र की विविध सामाजिक-पारिवारिक तथा आर्थिक समस्याओं के निदान के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर इसके एक विकसित तथा प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में उभरने के बीज छुपे हुए हैं। एक विजनरी राजनेता के रूप में विगत सप्ताह संयुक्त राज्य अमेरिका के मेनहट्टन शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वॉयर गार्डन में अप्रवासी भारतियों को संबोधित करते हुए अपने पांच-दिवसीय दौरे पर जब उन्होंने देश के युवा शक्ति का राष्ट्र के विकास के लिए आह्वान किया तो उनकी नजर में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का रास्ता बिलकुल साफ-साफ नजर आ रहा था। किन्तु सच पूछिये तो भारत के जिस युवा शक्ति को भारत की तकदीर के रूप में महामंडित किया जा रहा है, उस सपने को हासिल कर पाने की राह बिलकुल आसान नहीं है।

भारत में सामाजिक वैज्ञानिकों की मानें तो यह कहा जाता है कि भारत में वर्तमान में सम्पूर्ण आबादी का प्राय: 50 प्रतिशत हिस्सा 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं का है जबकि 65 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं का है। आशय यह है कि पूरी दुनिया की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा ढोते हुए जिसमें तकरीबन विश्व का हर छठा व्यक्ति भारतीय है तो यह अनुमान और भी सत्य के काफी करीब हो उठता है कि आनेवाले निकट के दशकों में एक भारतीय की औसत आयु 29 वर्ष की होगी जो कि क्रांतिकारी विचारों तथा नवोन्मेषी कंसेप्ट से लबरेज होंगी। यहां पर यह बात गौर करने लायक है कि तब तक चीन के एक व्यक्ति की औसत आयु 37 वर्ष और जापान के लिए यही उम्र 48 वर्ष की होगी। अर्थात हमारे निकटतम प्रतिद्वंद्वी देश हमसे अधिक बुजुर्ग और शारीरिक और मानसिक रूप से काफी कमजोर हो चुके होंगे।

नरेन्द्र मोदी ने भारत के तीव्र विकास के लिए तीन आवश्यक तत्वों के रूप में डेमोग्राफिक डिविडेंड, डिमांड और डेमोक्रेसी की उपस्थिति की बात कही है। कहते हैं कि किसी देश की युवा शक्ति उस राष्ट्र का छुपा हुआ अस्त्र होता है और उस अस्त्र की अथाह ऊर्जा का दोहन तभी संभव है जब युवा शिक्षित हो, प्रशिक्षित हो और सबसे अधिक उन ऊर्जावान युवाओं के हाथों में रोजगार हो या फिर किसी न किसी उत्पादक कार्यों में वे अपने योगदान दे रहे हों। युवाशक्ति में शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसरों का सृजन किये बिना हमारे लिए तथाकथित डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनानंकीय लाभांश) को हासिल करना केवल सैद्धांतिक दर्शन है। हालांकि इस दिशा में मोदी सरकार के द्वारा कई ऐतिहासिक कदम उठाये गये हैं जिसमें युवाओं के कौशल विकास या स्किल डेवलपमेंट की प्रायोरिटी लेवल पर देश में संभावना तलाशी जा रही है। ‘मेड इन इंडिया’ के नारों से जिस देश में उत्पादन के लेबल को पढ़े जाने की दशकों की परंपरा चली आ रही थी, आज उसी देश में उसे बदल कर ‘मेक इन इंडिया’ बनाये जाने की पूरी तैयारी हो रही है। विश्व के राष्ट्रों को अपने देश में सभी क्षेत्रों में उत्पादन के लिए आमंत्रित किये जाने के लिए एक विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधाओं का प्लेटफार्म विकसित करने की योजना तैयार की जा रही है। इस प्रकार अति आवश्यक निवेश और उत्पादन बढ़ाकर हम जहां एक तरफ देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि कर पायेंगे वहीं इसके साथ ही हम बेरोजगारी की गंभीर समस्या का त्वरित समाधान ढूंढ पायेंगे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि इन सभी लुभावने तथा आदर्श विकास के व्यूहरचना को आखिर कैसे सफल बनाया जा सकता है जबकि सूचना क्रांति के तथाकथित करिश्माई भारत जैसे राष्ट्र में आज भी पुरुष साक्षरता 75 प्रतिशत और स्त्री साक्षरता 51 प्रतिशत से अधिक नहीं है। भारत सरीखे प्रजातान्त्रिक राष्ट्र में जहां आज भी देश का लगभग एक तिहाई हिसा अशिक्षित हो तो हमें इस दिशा में काफी कठोर तथा त्वरित निर्णय लेने की अनिवार्यता है। इतना ही नहीं शिक्षा की प्रकृति तथा गुणवत्ता पर भी हमें काफी संजीदगी से सोचने की दरकार है। जिस प्रकार हमारे देश के स्कूल कॉलेज प्रत्येक वर्ष किसी उत्पादक मशीन की तरह लाखों की संख्या में ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट गढ़ रही है और जो कि उसी वर्ष किसी एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज ऑफिस के सामने रोजगार पाने के लिए एक अंतहीन पंक्ति में खड़े हो जाते हैं तो हमें इस प्रकार के हालात पर एक गहरे आत्मचिंतन की आवश्यकता है। एक छात्र के स्कूली तथा कॉलेज की सम्पूर्ण तथा आंशिक अनुदानित शिक्षा पर सरकार के द्वारा खर्च की गयी विशाल धनराशि की सार्थकता तब बौनी और अर्थहीन हो जाती है जब वह छात्र अपने स्वरोजगार के लिए किसी उद्यम की स्थापना के बजाय सरकार से रोजगार प्राप्त करने पर निर्भर हो जाते हैं। इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि रोजगार आपूर्ति और रोजगार सृजन सरकार की जिम्मेदारियों में शुमार नहीं होता है – लेकिन उसी वक्त हमें यह भी सोचने की आवश्यकता है कि आखिर उस शिक्षा की उपादेयता क्या रह जाती है जो कि ऐसे सपने साकार करने के उद्देश्य से पूरे किये जाते हैं, जिसमें ‘कम्फर्ट जोन’ में रहकर अपनी जीविका उपार्जित करना हो? क्षिप्रता से बदलते राष्ट्रीय परिदृश्य में जबकि ग्लोबलाइजेशन की तीव्र लहर दुनिया के सभी देशों में अपनी दस्तक दे रही है तो हमें अपने युवा श्रम बल की गुणवत्ता को रीओरिएंट करने की सख्त आवश्यकता है। सार्वजनकि क्षेत्र में सामाजिक कल्याण के लिए रोजगार का सृजन और नियमन भारत सरीखे अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकाल में कभी भी माकूल नहीं समझा जाता है। बढ़ते वार्षिक राजकोषीय घाटे के कारण देश में विदेशी ऋण की मात्रा में निरतंर इजाफा होता जा रहा है जो कई दृष्टि से अर्थव्यवस्था को घुन की तरह खाता जा रहा है। आर्थिक अनुदान की परंपरागत व्यवस्था में देश के संसाधानों के दुरूपयोग को रोकने के लिए एक विस्तृत सोच की आवश्यकता है। अर्थशास्त्रियों की मानें तो वर्तमान भारत के द्वारा जिन समस्याओं का सामना किया जा रहा है उनकी जड़ें वित्तीय संकट में स्थित हैं और इस सवाल पर हमारी चुप्पी एक महत्वपूर्ण सन्देश की तरफ इशारा करता है। प्रश्न यह उठता है कि आखिर विश्व के विकसित राष्ट्रों के विकास के मुकाबले अपने को सामथ्र्यवान करने के लिए हमारे लिए वित्त प्रबंधन का माकूल रास्ता क्या है?

08-11-2014

आज हमारे देश को आवश्यकता है- लोहे के समान मांसपेशियों और वज्र के समान स्नायुओं की। हम बहुत दिनों तक रो चुके, अब और रोने की आवश्यकता नहीं, अब अपने पैरों पर खड़े होओ एवं मनुष्य बनो।

08-11-2014
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी के बाद से देश की समस्याओं के समाधान के लिए ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप’ को प्राथमिकता के तौर पर वित्तीय प्रबंधन का एक स्थायी समाधान माना जा रहा है। निस्संदेह इस प्रयास से अव्वल तो तीव्र आर्थिक विकास के लिए आवश्यक औद्योगीकरण की प्रक्रिया को गति मिलेगी और साथ ही अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रों में उत्पादन में वृद्धि होगी। किन्तु इसके लिए अतिरिक्त आधारिक संरचना की सुविधाओं के विकास की कमी शीघ्रता से दूर करना हमारी प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए।

सामाजिक वैज्ञानिकों की मानें तो यह कथन बार-बार दुहराया जाता है कि भारत मौजूदा दौर में जनसंख्या विस्फोट की दौर से गुजर रहा है। लेकिन ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की बातें करें तो जनसंख्या हमेशा ही बोझ नहीं होता है बल्कि यह किसी राष्ट्र के लिए एसेट (परिसंपत्ति) का काम करती है। सच पूछिये तो 1990 के दशक के बाद से जिस प्रकार भारत में उदारीकरण, वैश्वीकरण तथा निजीकरण के आईने में सुधार होने शुरू हुए हैं ऐसी दशा में जनसंख्या बोझ नहीं विकास का इंजन कहलाता है। यही कारण है कि डेमोग्राफिक डिविडेंड सरीखे अवधारणा का विकास किया गया है। लेकिन जनसंख्या से तथाकथित डेमोग्राफिक डिविडेंड के रूप में अपेक्षित लाभ उठाने की राह आसान नहीं है। इस दिशा में एक नियोजित कार्यक्रम के तहत मानव संसाधन में भारी निवेश की जरुरत है। एशिया के एक मात्र विकसित राष्ट्र जापान का उदाहरण हमारी बंद आंखें खोलने के लिए पर्याप्त है। प्राकृतिक संसाधनों के अभाव के बावजूद इस देश ने केवल मानव संसाधन के बल पर अपने देश का ऐसा विकास किया है जिसके बारे में अन्य देश केवल कल्पना ही कर सकता है। 1945 के अगस्त महीने में जापान पर जो एटम बम गिराया गया तो जापान के दो शहर नागासाकी और हिरोशिमा पूरी तराह नष्ट हो गये थे। किन्तु केवल अपने उत्कृष्ट मानव संसाधन के कारण आज वह इन दो नगरों को फिर से इस तरह से बसाया है जिन्हें देखकर यह मुश्किल से यकीं होता है कि ये दो नगर वही नगर हैं जो सात दशक पूर्व पूरी तरह से नेस्तनाबूद हो गये थे। लिहाजा आज हमें इसी तरह के मानव संसाधन को विकसित करने की जरुरत है। इसके लिए शिक्षा व्यवस्था में बड़े पैमाने पर सुधार की जरुरत है।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के प्रैक्टिकल तथा स्किल डेवलपमेंट पक्ष में ओवरहौलिंग की जरूरत है। ‘जैक ऑफ ऑल ट्रेड्स एंड मास्टर ऑफ वन’ का फार्मूला हमारी आकस्मिक आवश्यकता है। आशय यह है कि विशिष्टीकरण (स्पेशलाइजेशन) को डेवेलप करके हम बड़ी शीघ्रता से उत्पादन, रोजगार तथा ग्रोथ रेट बढ़ा सकते हैं। स्किल डेवलपमेंट के लिए ट्रेनिंग को अनिवार्य विषय के रूप में एलीमेंट्री क्लासेज से शुरू करनी होगी। ‘कैच देम यंग’ के सिद्दांत पर छात्रों के टैलेंट को आइडेंटिफाई करके उन्हें उसी विधा में प्रशिक्षित करने की जरुरत है। सभी विषयों में प्रैक्टिकल क्लासेज तथा डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्सेज शुरू किया जाना चाहिए।
जहां तक संभव हो वोकेशनल एजुकेशन सरीखे वैकल्पिक शिक्षा के माध्यम से शिक्षित युवा वर्ग को स्वरोजगार की स्थापना के लिए काबिल बनाये जाने की जरूरत है। उद्यमिता के विकास के लिए सरकार के द्वारा सस्ते ब्याज दर पर पूंजी की उपलब्धता इस दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बच्चों की प्रतिभा, इंटरेस्ट तथा इन्क्लिनेशन अर्थात रुझान को संजीदिगी से पढऩे की जरुरत है। लिटरेचर में इंटरेस्ट रखने वाले छात्र को महज इस बात के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई में घसीटते रहना कि वह देश का इंजीनियर बन जायेगा, महज संसाधन की बर्र्बादी है। बन्दर, हाथी, मेढक तथा कुत्ते के समूह में हर एक से किसी पेड़ पर तेजी से चढ़ जाने की उम्मीद करने की सोच को बदलने की जरुरत है। हाथी को बन्दर और बंदर को हाथी बनाये जाने के खेल का शीघ्र पटाक्षेप होना चाहिए तभी विकास की सच्ची कहानी के युग का आगाज संभव हो पायेगा।

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