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युवा, देश और सोशल मीडिया

युवा, देश और सोशल मीडिया

By रोहन पाल

आज का दौर अगर सही मायने में देखें तो युवाशक्ति का दौर है। भारत में इस समय 65 प्रतिशत के करीब युवा हैं जो किसी और देश में नहीं हैं और इन युवाओं को जोडऩे का काम सोशल मीडिया कर रहा है। युवा वर्ग के लोगों में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का क्रेज दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है जिसके कारण आज सोशल नेटवर्किंग दुनिया भर में इंटरनेट पर होने वाली नंबर वन गतिविधि बन गया है। एक परिभाषा के अनुसार, ‘सोशल मीडिया को परस्पर संवाद का वेब आधारित एक ऐसा अत्यधिक गतिशील मंच कहा जा सकता है जिसके माध्यम से लोग संवाद करते हैं, आपसी जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उपयोगकर्ता जनित सामग्री को सामग्री सृजन की सहयोगात्मक प्रक्रिया के एक अंश के रूप में संशोधित करते हैं।’ सोशल नेटवर्किंग साइट्स युवाओं की जिंदगी का एक अहम अंग बन गया है। इसके माध्यम से लोग अपनी बात बिना किसी रोक-टोक के देश और दुनिया के हर कोने तक पहुंचा सकते हैं।

युवाओं के जीवन में सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। अगर इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों की माने तो भारत के शहरी इलाकों में प्रत्येक चार में से तीन व्यक्ति सोशल मीडिया का किसी न किसी रूप में प्रयोग करता है। इसी रिपोर्ट में 35 प्रमुख शहरों के आंकड़ों के आधार पर यह भी बताया गया कि 77 प्रतिशत उपयोगकर्ता सोशल मीडिया का इस्तेमाल मोबाइल से करते हैं। सोशल मीडिया तक पहुंच कायम करने में मोबाइल का बहुत बड़ा योगदान है और इसमें भी युवाओं की भूमिका प्रमुख है। भारत में 25 साल से अधिक आयु की आबादी 50 प्रतिशत  और 35 साल से कम आयु की 65 प्रतिशत है। इससे देखते हुए आंकड़े बताते हैं कि भारत में सोशल मीडिया पर प्रतिदिन करीब 30 मिनट समय लोगों द्वारा व्यतीत किया जा रहा  है। इनमें अधिकतम कालेज जाने वाले विद्यार्थी (82 प्रतिशत) और युवा (84 प्रतिशत) पीढ़ी के लोग शामिल हैं। सोशल साइट्स ने स्कूली दिनों के साथियों से मिलवाया तो आज देश-दुनिया के कोने में रहने वाले मित्र भी एक-दूसरे को फेसबुक पर ढूंढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया के द्वारा जिनसे वास्तविक जीवन में मुलाकातें भले ही न पाये पर सोशल साइट्स पर हमेशा जुड़े रहते हैं। सोशल मीडिया की सफलता इससे भी देखी जा सकती है कि परंपरागत मीडिया भी अब फेसबुक व ट्विटर जैसे माध्यमों पर न सिर्फ अपने पेज बनाकर उपस्थिति दर्ज करा रही है, बल्कि विभिन्न मुददों पर लोगों द्वारा व्यक्त की गयी राय को इस्तेमाल भी कर रही है।

भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में सोशल मीडिया ने सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं बल्कि कई सामाजिक व गैर-सरकारी संगठन भी अपने अभियानों को मजबूती दी है। सोशल मीडिया सिर्फ अपना चेहरा दिखाने का माध्यम नहीं रह गया है। जिन देशों में लोकतत्र का गला घोंटा जा रहा है वहां अपनी बात कहने के लिए लोगों ने सोशल मीडिया का लोकतंत्रीकरण भी किया है। हाल के वर्षों में अरब जगत में हुई क्रांतियों में सोशल मीडिया ने महत्पूर्ण भूमिका अदा की है।

08-11-2014

हम जो बोते हैं वो काटते हैं।
हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं।
हवा बह रही है,
वो जहाज जिनके पाल खुले हैं,
इससे टकराते हैं,
और अपनी दिशा में आगे बढ़ते हैं,
पर जिनके पाल बंधे हैं,
हवा को नहीं पकड़ पाते।
हम खुद अपना भाग्य बनाते हैं।

08-11-2014
युवाओं पर सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत ही गहन है। ये वो वर्ग है जो सबसे ज्यादा सपने देखता है और उन सपनों को पूरा करने के लिए जी-जान लगाता है। युवा और सोशल मीडिया एक दूसरे से जुड़ गए हैं। जहां एक तरफ सोशल मीडिया युवाओं के सपनों को एक नयी दिशा दे रही है वही दूसरी ओर युवा वर्ग अपने सपनों को साकार करने के लिए इस माध्यम का उपयोग कर रहे हैं। इंटरनेट से लेकर थ्री-जी मोबाइल तक युवा सोशल मीडिया के माध्यम से देश-दुनिया की सरहदों को पार कर अपने सपनों की उड़ान कर रहे हैं। ब्लॉगिंग के जरिए जहां ये युवा अपनी समझ, ज्ञान और भड़ास निकालने का काम कर रहे हैं। वहीं सोशल मीडिया साइट्स के जरिए दुनिया भर में अपनी समान मानसिकता वालों लोगों को जोड़कर सामाजिक सरोकार-दायित्व को पूरी तन्मयता से पूरी कर रहे हैं।

लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलु भी है। युवाओं को सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स का नशा सा हो गया है। सोशल वेबसाइट पर दिन में कई बार स्टेट्स अपडेट करना, घंटों तक मित्रों के साथ चैटिंग करना जैसी आदतों ने युवा पीढ़ी को काफी हद तक प्रभावित किया है। घंटों तक फेसबुक व ट्वीटर जैसी वेबसाइट्स पर समय बिताने से न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि धीरे-धीरे कुछ नया करने की रचनात्मकता भी खत्म हो रही है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से तमाम अश्लील सामग्री और भड़काऊ बातें भी लोगों तक प्रसारित की जा रही है, जोकि लोगों के मनोमस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती है और जिनकी वजह से देश में दंगा फसाद में वृदि हुई है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने लोगों को वास्तविक जीवन को भूलाकर आभासी जीवन में रहने को मजबूर कर दिया है। सोशल साइट्स की आदत के कारण युवाओं में व्यक्तिगत संवाद की दिक्कत होती है, जिससे वे सामाजिक रूप से प्रभावी संवाद नहीं कर पाते हैं। इसके परिणाम स्वरुप आज के युवा पड़ी में धैर्य की भारी कमी देखी जा सकती है। युवावस्था एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें व्यक्ति को अपने उपदेश के बारे में नहीं पता होता और उसके कारण उससे गलत संगति में पडऩे में जरा सा भी समय नहीं लगता। सोशल मीडिया के द्वारा युवाओं को पश्चिमी सभ्यता का अंधाधुंध अनुसरण करना आधुनिकता का मापदान लगने लगा है।

इससे हमारे देश के युवाओं की पूरी जीवन-शैली प्रभावित दिखलाई पड़ रही है जिसमें रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा और बोलचाल सभी समग्र रूप से शामिल हैं। मद्यपान और धूम्रपान उन्हें एक फैशन का ढंग लगने लगा है। नैतिक मूल्यों के हनन में ये कारण मुख्य रूप से है। आपसी रिश्ते-नातों में बढ़ती दूरियां और परिवारों में बिखराव की स्थिति इसके दुखदायी परिणाम हैं।

आज देश के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि युवा शक्ति का सदुपयोग कैसे करें। इसका जवाब सोशल मीडिया में ही छुपा है। अगर हमारे देश का युवा चाहे तो सोशल मीडिया के द्वारा अपने आपको एक अच्छा व्यक्ति बना सकता है। यहां वे अपनी अच्छाईयों व रचनात्मकता से रूबरू करा सकते हैं। सूचना के आदान-प्रदान, जनमत तैयार करने, विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों के लोगों को आपस में जोडऩे, भागीदार बनाने और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि नये ढंग से संपर्क करने में युवा अपना हाथ बंटा सकता है और सोशल मीडिया को एक सशक्त और बेजोड़ उपकरण के रूप में तैयार कर सकता है।

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