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अब क्षेत्रीय दलों पर लटकती तलवार फिर बही मोदी बयार

अब क्षेत्रीय दलों पर लटकती तलवार फिर बही मोदी बयार

By नीलाभ कृष्ण

हर कोई मान कर चल रहा था कि भाजपा के पक्ष में अभूतपूर्व लहर है। प्रधानमंत्री मोदी का जादू मतदाताओं के सर चढ़कर बोल रहा है। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ अपने चरम पर है। इसमें किसी को तनिक संशय भी नहीं था इसीलिए नतीजे भाजपा के पक्ष में होने पर किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ। एक नये तरह का राजनीतिक कौतूहल हरियाणा में भी देखने को मिला। वहां 2009 के चुनाव में भाजपा को कुल चार सीटें मिली थी। उसकी चुनावी राजनीति किसी मजबूत क्षेत्रीय दल के साथ गठबंधन करके ही चलती थी। वहां भी उसका अपने बलबूते सत्ता में पहुंचना वहां की राजनीति में नया इतिहास लिखने जैसा ही है, जिसकी उम्मीद अभी तक हरियाणा के भाजपाइयों को भी नहीं थी।

भाजपा की चुनावी सफलता किसी परीकथा से कम नहीं है। अब देश की राजनीति के कई मायने बदल जायेंगे, क्योंकि इससे पहले महाराष्ट्र में भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वर्ष 1995 में था। तब उसे 65 सीटें शिवसेना के साथ गठबंधन में रहते हुए मिली थीं। उसके मतों का प्रतिशत विधानसभा चुनावों में 13 से 17 फीसदी के बीच मंडराता रहा है। अब पार्टी का मत प्रतिशत बढऩे के साथ ही सीटें भी दोगुनी हो गई है। इसी तरह हरियाणा में भी उसका आधार शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहा है। वर्ष 2009 के चुनाव में उसका वोट प्रतिशत तकरीबन नौ फीसदी रहा। उसका राजनीतिक उत्थान केवल 2014 के लोकसभा चुनावों में ही हुआ, जिसमें उसने दस में से सात सीटें जीतीं। पार्टी कुछ वैसे ही करिश्मे की उम्मीद इस विधानसभा चुनाव में भी लगाए बैठी थी।

मोदी लहर पर सवार भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना और हरियाणा में हरियाणा जनहित कांग्रेस से गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव भी लड़ा। भाजपा के इस अप्रत्याशित उभार के लिए कांग्रेस की अकर्मण्यता और जनमानस में उसके खिलाफ उपजा आक्रोश अहम कारक है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे हैं किंतु राज्य की राजनीति पर पार्टी की पकड़ ढीली होती चली गई। वे जनभावनाओं को समझने में नाकाम रहे। महाराष्ट्र, जहां कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की सरकार पिछले पंद्रह वर्षों से सत्ता में थी वहां कुशासन के कारण जबर्दस्त सरकार विरोधी लहर थी। इसका इजहार लोकसभा चुनावों में ही हो चुका था, किंतु गठबंधन की सरकार ने इससे भी कोई सबक नहीं सीखा। जहां राकांपा के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के लगे आरोपों ने सरकार की छवि को धूमिल किया, वहीं मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की छवि कमजोर मुख्यमंत्री की रही, जिससे पार्टी का और भी बंटाधार हुआ। जहां तक सहयोगी राकांपा के मंत्रियों का सवाल है तो उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। शिवसेना और एमएनएस की मराठी अस्मिता की राजनीति भी कारगर होती नहीं दिखी। मराठी युवाओं को ‘मराठी मानुष’ की जगह नौकरियां और तीव्र गति से औद्योगिक विकास की आकांक्षा ने ज्यादा प्रेरित किया है।

हरियाणा में मुख्यमंत्री हुड्डा अपनों के ही बिछाये जाल से निकल नहीं पाये। भू-माफियाओं की सरकार होने का आरोप का भूत चुनाव में उनका पीछा करता रहा। मनमाने ढंग से टिकट वितरण और पार्टी के प्रभावशाली नेताओं के ऐन चुनाव से पहले पाला बदलकर मैदान में उतरने के कारण भी कांग्रेस की जमकर फजीहत हुई है, जिसकी राजनीतिक काट ढूंढने में पार्टी नाकाम रही।

क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय लोकदल ओमप्रकाश चौटाला की गिरफ्तारी को भुनाने में लगा रहा, तो हरियाणा जनहित कांग्रेस अपने राजनीतिक अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रही थी। पहचान की राजनीति की हिमायती बसपा भी यहां सर्वजन को साथ लाने में नाकाम रही, तो अन्य छोटे-छोटे दल वोटकटवा की भूमिका में ही रहे। इन्हीं राजनीतिक हालातों ने दोनों राज्यों में भाजपा के सपनों को पर लगा दिए, क्योंकि मतदाताओं के बदलते रुख को मोदी और अमित शाह ने पहले ही आंक लिया था और अकेले चुनाव में जाने का फैसला कर लिया था। चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री का यह कहना कि गठबंधन की राजनीति का दौर अब खत्म हो चुका है, उनकी इसी रणनीति का ही हिस्सा था।

”हम सबका सम्मान रखेंगे’’ – प्रकाश जावड़ेकर

08-11-2014

केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता नीलाभ कृष्ण से बातचीत के अंश:

विधानसभा चुनावों के नतीजे पर आपका क्या कहना है?
महाराष्ट्र के चुनाव में एक बहुत बड़ा राजनीतिक बदलाव आया है और यह बदलाव देश की भलाई के लिए है। महाराष्ट्र के लोगों ने ‘राष्ट्र के साथ महाराष्ट्र’ के नारे को वोट दिया। उन्होंने मोदी जी के नेतृत्व में आस्था दिखाई और जैसे केंद्र में सरकार अच्छा काम कर रही है, वैसे ही काम करने वाली सरकार और तरक्की के लिए उन्होंने वोट किया। पहले लोग जात-पांत के आधार पर, पैसों के लालच में वोट डालते थे, लेकिन इस बार मतदाताओं ने वोट डाला है तरक्की के लिए, प्रामाणिक नेतृत्व के लिए और सुशासन
के लिए। इसीलिए पहली बार महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी अपने बलबुते पर न सिर्फ 100 का आंकड़ा पार किया है, बलिक सबसे बड़े दल के रूप में भी उभरी है। हम चुनाव में अकेले जाने का निर्णय अगर थोड़ा पहले करते तो हमें पूर्ण बहुमत मिलता, लेकिन जो भी हुआ है वो जनता का आशीर्वाद है। अब भाजपा क सरकार महाराष्ट्र में बनेगी। शिवसेना पहले से ही हमारी सहयोगी रही है, इसीलिए अब शिवसेना को तय करना है कि आज जो परिस्थिति है, जिसमें दोनों के पास एक-तिहाई और दो-तिहाई बहुमत है, उनको स्वीकार है कि नहीं। फिर भी, हम सबका सम्मान रखेंगे। सरकार चलाने के लिए हमारे पास बहुमत है, परन्तु हम महाराष्ट्र को अच्छा बनाने के लिए सबका समर्थन लेंगे।

ऐसा लगा रहा है कि जैसे-जैसे भाजपा की शक्ति बढ़ रही है, वैसे-वैसे पार्टी गठबंधन की राजनीति से अलग हो रही है। इसमें कितनी सच्चाई है?
नहीं, नहीं, बिलकुल नहीं। यह कोई सवाल ही नहीं है। हम सबको साथ लेकर ही चलना चाहते है। नरेंद्र मोदी जी ने पहले ही कहा है कि सरकार चलाने के लिए हमारे लिए पर्याप्त बहुमत है, लेकिन देश चलाने के लिए सबका सहयोग जरूर लेंगे।

आपको लगता है कि भारत में गठबंधनयुग का अंत हो रहा है?
नहीं, ऐसा नहीं है। यह इतना जल्दी कहना ठीक नहीं है। हर राज्य की अपनी प्रवृति होती है। लेकिन एक बात अच्छी हो रही है कि भारतीय जनता पार्टी तगड़े रूप में सामने आ रही है और साथ ही साथ कांग्रेस का खात्मा भी हो रहा है।

क्षेत्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी
देश में जब से मोदी बयार बहने लगी है उससे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का ही सफाया नहीं हो रहा है, बल्कि क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के लिए भी अपना अस्तित्व बचाये रखना मुश्किल हो रहा है। हरियाणा एवं महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों से एक बार फिर यह संकेत उभरकर आ रहा है। इन चुनावों में जहां हरियाणा में क्षेत्रीय दल इनेलोद को तगड़ा झटका लगा है, वहीं महाराष्ट्र में एनसीपी को भारी नुकसान हुआ है। जबकि कठिन संघर्ष कर किसी तरह शिवसेना अपनी पुरानी हैसियत पर आ पाई। इन नतीजों के चलते यह साफ होने लगा है कि आने वाले समय में अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों को मोदी लहर से और नुकसान हो सकता है। विगत मई में जब आम चुनावों के नतीजे आए थे और उसमें कई क्षेत्रीय दलों का सफाया हो गया था। उत्तर प्रदेश में बसपा, तमिलनाडु में डीएमके खाता नहीं खोल पाए थे। बिहार में जदयू और उत्तर प्रदेश में सपा मुश्किल से अपनी कुछ सीटें बचा पाई थीं। बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर में ‘एकला चलो रे’ के नारे के साथ भाजपा वहां की राजनीति में भूचाल लाने की तैयारी में है। गत 9 अगस्त को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि ‘देश में एक भी राज्य ऐसा नहीं होना चाहिए, जहां भाजपा एक बड़ी ताकत न हो… हमें भाजपा को हर ग्राम पंचायत, जिला परिषद और नगर निगम में एक प्रभावी ताकत बनाना होगा।’

शाह का संदेश साफ था कि भाजपा एक राष्ट्रव्यापी ताकत के रूप में उभरना चाहती है और इसके लिए उसे कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के साथ ही अपने सहयोगी दलों के समर्थक-वर्ग में भी अगर घुसपैठ करना पड़े तो वह इससे पीछे नहीं हटेगी।

महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के नतीजे देश के राजनीतिक परिदृश्य में नरेंद्र मोदी के लहर का एक और प्रमाण है और गांधी परिवार के लिए खतरे की तेज घंटी। दोनों राज्यों में सत्तारूढ़ कांग्रेस की पराजय यह बताती है कि उसका जनाधार तेजी से खिसक कर भाजपा के साथ जुड़ रहा है। भारतीय राजनीति का यह एक बड़ा और सुखद बदलाव है। खुद को असहाय महसूस कर रहे लोगों के लिए मोदी एक प्रेरणास्रोत बनकर उभरे हैं। लोग यह महसूस कर रहे थे कि देश में कुछ हो नहीं रहा है और वे पारंपरिक राजनीति से ऊब चुके थे। मोदी ने इसी माहौल में भारतीय राजनीति में अपने कदम बढ़ाए हैं। उन्हें एक के बाद एक सफलताएं भी मिल रही हैं। कुल मिलाकर भारतीय राजनीति के नये समीकरण स्वत: बनते जा रहे हैं।

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