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नोबल पुरस्कार की राजनीति

नोबल पुरस्कार की राजनीति

By शैलेंद्र चौहान

यह संभवत: सन 2005 की बात है, एक शाम मैं सहारा समय समाचार चैनल देख रहा था तो एक समाचार प्रसारित हुआ कि कैलाश सत्यार्थी का नाम नोबल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित हुआ है। मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ। मैं तब मध्य प्रदेश के धार जिले में था। वहां से मैंने इस बात की पुष्टि करनी चाही। उन दिनों

सहारा समय के विदिशा के पत्रकार बृजेन्द्र पांडे हुआ करते थे, वहीं से यह समाचार लगा था। बृजेंद्र पांडे, मेरे और कैलाश के सहपाठी थे सन 1967 -69 में विदिशा के हायर सेकण्डरी स्कूल में। बाद को कैलाश ने इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन ले लिया, मैंने और बृजेंद्र ने बीएससी में। मैंने उन्हें फोन लगाया और इस बाबत उनसे पूछा। उन्होंने बताया कि कई लोगों ने कैलाश का नाम प्रस्तावित किया था। नोबल पुरस्कार लिए, तब उन्हें नामांकित नहीं किया गया था। आज जब मैं बेटी से मिलने वैंकूवर पहुंचा तो उसने बताया कि आपके मित्र कैलाश सत्यार्थी अंकल को ‘पीस’ नोबल पुरस्कार मिला है। कुछ महीने पहले मैं, मेरी पत्नी तथा बेटी कैलाश के अलवर जिले के आश्रम गए थे। वहां उनकी पत्नी तथा बेटी भी थी। आज यह समाचार सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ। मलाला युसुफजई के साथ सम्मिलित रूप से उन्हें 2014 का शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ कार्य करने तथा सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए दिया गया है। कैलाश बंधुआ मजदूरी एवं बाल श्रम के विरुद्ध भारतीय अभियान में 1990 के दशक से ही सक्रिय रहे हैं, आंदोलन करते रहे हैं। कहा जाता है कि उनके द्वारा संचालित संगठन ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ ने लगभग 80 हजार बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है और उनके पुनर्वास एवं शिक्षा की व्यवस्था में सहायता की है। कैलाश सत्यार्थी पिछले दो दशकों से वे बालश्रम के खिलाफ भी आवाज उठा रहे हैं और इस आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं। हायर सेकंडरी तक कैलाश एक मेधावी छात्र थे। इंजीनियरिंग में प्रवेश के बाद उनका ढर्रा बदलने लगा। वह आर्य समाजी तो थे ही फिर लोहियावादी भी हो गए। जाति-पांति में कैलाश का विश्वास नहीं था। एक दिन विदिशा के नीमताल चौराहे पर कैलाश ने दलित अछूतों से भोजन बनवाया और बिना किसी की परवाह किये बीच चौराहे पर बैठ दलित बंधुओं के साथ हम लोगों ने भोजन किया। आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो उन्होंने समाजवादी दल के प्रत्याशी का दल बल के साथ प्रचार किया था। चुनाव के परिणाम आने के बाद कैलाश मुझे भोपाल के विधायक निवास ले गए और वहां तब निर्वाचित विधायक रघु ठाकुर से भेंट कराई थी। आर्य समाज तो उनका प्रथम प्रेम था जिसके चलते वह स्वामी अग्निवेश के संपर्क में आए और बंधुआ मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए। यही उनकी इस क्षेत्र में पहली पाठशाला थी। बंधुआ बाल श्रमिकों को मुक्त कराना उनकी प्राथमिकता बन गई और पैशन भी।

नोबेल की राजनीति विचित्र है। गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार देने से इंकार करते हुए उन पर रंगभेदी होने का आरोप भी लगा दिया गया और विडंबना देखिये कि गांधी नाम का उपयोग करने के लिए कैलाश सत्यार्थी को यह पुरस्कार दे दिया गया। पिछले कुछ समय में जिन लोगों को शान्ति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है, उसने तो नोबेल की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। बराक ओबामा, अल-गोर, हेनरी किसिंगर जैसे को क्या सोचकर नोबेल का शान्ति पुरस्कार दिया गया, इस पर अनुसंधान की आवश्यकता पड़ेगी! इससे जुड़ी इनामी रकम और दूसरी सुविधाओं की वजह से इन पुरस्कार के लिए लॉबिंग पहले से कहीं ज्यादा होने लगी है। कुल मिलाकर, इस बार कैलाश सत्यार्थी को जो नोबेल शान्ति पुरस्कार मिला है और अतीत में जिन शान्तिदूतों को यह पुरस्कार दिया जाता रहा है, वह नोबेल पुरस्कार के पीछे काम करने वाली पूरी राजनीति का चेहरा साफ कर देता है। शेख हसीना के हवाले से कहा गया था कि नार्वे की टेलीनॉर कंपनी ने यूनुस के लिए लॉबिंग की और भारी भरकम धनराशि क्लिंटन फाउंडेशन को दान में दी, जिसके कारण उन्हें वर्ष 2006 में नोबल पुरस्कार मिल सका।

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कैलाश को ये सम्मान मिलने के साथ ही कई सवाल भी उठने लगे हैं। अमेरिका की मशहूर मैग्जीन फोब्र्स में काम करनेवाली महिला पत्रकार मेघा बाहरी ने कैलाश सत्यार्थी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। मेघा ने अपने पुराने अनुभवों को याद करते हुए उन पर आरोप लगाया है। मेघा ने कैलाश के एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन पर गलत तरीके से फंड जुटाने का आरोप लगाया है। मेघा ने उन्हें नोबल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल खड़ा किया है। मेघा बाहरी ने लिखा है कि कैलाश सत्यार्थी को मिला यह पुरस्कार नोबेल योग्य नहीं है। मेघा ने उनकी संस्था ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में कैलाश सत्यार्थी के एक सहयोगी ने यूपी के एक गांव में बाल मजदूरी को लेकर जो दावे किए थे वो झूठे निकले। उन्होंने लिखा है कि ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ज्यादा से ज्यादा विदेशी फंड हासिल करने लिए बाल मजदूरी के झूठे आंकड़े देती है। अपने लेख में उन्होंने सत्यार्थी पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में फोब्र्स के लिए भारत में बाल श्रम के उपयोग पर एक आर्टिकल लिखते वक्त मैं बचपन बचाओ आंदोलन से मिली। संस्था से जुड़े व्यक्ति ने उन्हें बताया कि उत्तर प्रदेश का कार्पेट बेल्ट जहां गांव के हर घर के बच्चे दूसरे देशों को भेजे जाने वाले कालीन को बनाने में लगे हैं। जब मेघा से उस जगह को दिखाने की बात कही तो वो शख्स उन्हें घुमाता रहा। वो मेघा को यूपी के एक गांव में लेकर गया। मेघा ने अपने लेख में लिखा है कि मुझे उस गांव में कोई बच्चा काम करता नहीं दिखा। जब मैंने उससे सवाल किए तो वो मुझे एक घर के पास लेकर गया जहां कालीन का काम कर रहे लोगों के पास दो बच्चे बैठे थे। दोनों बच्चों में खास बात यह थी कि वे स्कूल ड्रेस में थे। मेघा आगे बताती हैं कि मैं वहां से खुद ही निकल पड़ी और कई जगहों को देखा। मेघा ने 2008 की इस पूरी घटना का जिक्र किया है और इसके पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए लिखा है कि जितने बच्चों को आप बचाते हुए दिखाते हैं विदेशों से उतना ही बड़ा चंदा आपको मिलता है। भारत में ज्यादातर एनजीओ को लेकर तमाम सवालात उठ रहे हैं, उन्हें हो रही विदेशी फंडिंग और उसके पीछे की मंशा पर चिंता जताई जा रही है। भारत के एक एनजीओ संचालक को नोबेल मिला है और इसे बैलेंस करने के लिए पाकिस्तान की एक बच्ची के साथ उसे बांट दिया गया है। इस नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग से इतना कन्फर्म है कि इसे दुनिया के प्रभावशाली मुल्कों, खासकर अमेरिका का संरक्षण-समर्थन हासिल है। यह अकारण नहीं है। क्या अजीब इत्तेफाक है कि भारत में पिछले तीन-चार साल में एनजीओ का जबर्दस्त उभार देखा जा रहा है। एक-एक प्रोजेक्ट पर दुनिया के बड़े-बड़े दिमागों और इवेंट मैनेजरों द्वारा मंथन किया जाता है। मिलते-जुलते नजारे दुनिया के कुछ अन्य देशों में दिखा देते हैं, जिससे लगता है कि हो न हो, इन सारे इवेंट्स की प्लानिंग और फंडिंग करने वाले लोग कॉमन हैं।

ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार ‘भारत में बाल यौन उत्पीडऩ घरों, स्कूलों तथा आवासीय देखभाल केंद्रो में आम बात है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा कानूनी और नीतिगत सुधार सुझाने के लिए गठित की गई समिति ने पाया कि बाल सुरक्षा नीतियां ‘स्पष्ट रूप से उन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं जिनका उन्होंने बीड़ा उठाया था।’ भारत में बाल यौन उत्पीडऩ से निपटने की प्रणाली और सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम बच्चों को यौन उत्पीडऩ से बचाने में अपर्याप्त हैं। अनेक बच्चों को दोबारा दुव्र्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है। उसका कारण है पीड़ादायक चिकित्सीय जांच और पुलिस और अन्य अधिकारी जो या तो उनकी बात सुनना नहीं चाहते या फिर उन पर विश्वास नहीं करते। सरकारी तंत्र बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पीडि़तों के साथ व्यवहार के मामलों को रोक पाने में विफल रहा है। यूं तो स्कूलों को बच्चों का वर्तमान व भविष्य गढऩे का केन्द्र माना जाता है। लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीडऩ की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारारिक प्रताडऩा, यौन शोषण, दुव्र्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं। सस्ते श्रमिक, बंधुआ मजदूर, बच्चों एवं महिलाओं की तस्करी और उन पर किये जाने वाले जुल्म बढ़ रहे हैं। दिल्ली में छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से घरों में काम करने वाले बच्चों को लाया जाता है और उनके साथ लगातार अन्याय किया जाता है। दिल्ली की हाल ही की घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। विकलांग बच्चों में उनके जीवन के जन्म पहले दिन से बहिष्कार शुरू हो जाता है। सरकारी मान्यता के अभाव में, उन्हे अपने अस्तित्व और संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक सेवाओं और कानूनी सुरक्षा से काट दिए जाता है। उनकी उपेक्षा ही भेदभाव बढ़ाती है। द स्टेट ऑफ द वल्र्डस चिल्ड्रन’ स 2013: चिल्ड्रन विथ डिसेबिलिटी कहती है कि विकलांग बच्चों को स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने या स्कूल जाने की कम से कम संभावना होती है। वे हिंसा, उत्पीडऩ, शोषण और उपेक्षा के सबसे बड़ी कमजोरी के बीच होते है, खासकर जब अगर उन्हें छिपाया जाता है या संस्थानों में डाला जाता हैं कई सामाजिक कलंक के कारण या उन्हें उठाने की खर्च के कारण। वे दुनिया में सबसे उपेक्षित लोगों के बीच में है। गरीबी में रहने वाले बच्चों को अपने स्थानीय स्कूल या क्लिनिक में कम से कम भाग लेने की संभावना होती है, लेकिन जो गरीबी में रहते हैं और विकलांग भी हैं उन लोगों में ऐसा कर पाने की संभावना कम होती है। भारत में बच्चों के लिए हजारों एनजीओ काम कर रहे हैं, फिर भी हर लाल-बत्ती पर बच्चे भीख मांगते हैं, हर खान-खदान-ढाबे-फैक्टरी में बच्चे काम करते हैं, हजारों बच्चे गायब कर दिये जाते हैं, अनगिनत की हत्याएं कर दी जाती हैं।

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