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सुख की रौशनी की तलाश

सुख की रौशनी की तलाश

मानव जीवन के बारे में काफी संजीदगी से सोचें तो एक कड़वा सच जो हमारे सामने अपने संपूर्ण स्वरूप में आ खड़ा होता है वो यह है कि इस दुनिया में दु:ख सर्वविदित और कालजयी सत्य है और हर व्यक्ति को इसका किसी-न-किसी रूप में जीवन के आखिरी सांस तक सामना करना ही होता है। इस कायनात का कोई भी व्यक्ति दु:ख और विपत्ति के स्याह सच और डरावने भय से भाग नहीं सकता है, पलायन नहीं कर सकता है। आशय यही है कि इस नश्वर संसार में दु:ख मानव के जन्म के साथ ही एक अपरिहार्य और अभिन्न अंग के रूप में विकसित होता है और जो उसके साथ ताउम्र चलता रहता है।

लेकिन दुर्भाग्यवश सनातन से ही जीवन के दु:ख और समस्याओं के प्रति मानव की सोच का मनोविज्ञान और प्रतिक्रिया काफी जटिल और चिंताजनक रही है। कदाचित इस सत्य को झुठलाना आसान नहीं होगा कि हम सभी अपने जीवन के वैसे ‘कम्फर्ट जोन’ में रहने के आदी होते हैं जो किसी शीशमहल के भोग और विलास से लबरेज जीवन की स्वप्निल दुनिया से कम नहीं होती है। यही कारण है कि जीवन के तमाम दु:ख और परेशानियों की अनचाही स्थिति में हम घबरा उठते हैं, अपना धैर्य खो बैठते हैं, हम मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाते हैं और सबसे अधिक जानलेवा चिंता और तनाव के शिकार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में चिंता को अवसाद में परिणित होते देर नहीं लगती और दु:ख में घिरा शख्स खुद को शापित और बदनसीब महसूस करने लगता हैं। उसे दुनिया में सब कुछ मिथ्या और बेकार प्रतीत होने लगता है। सच पूछिए तो जीवन में अनिवार्य रूप से समय-समय पर आनेवाली विभिन्न प्रकार की समस्याओं के बारे में इस प्रकार की नकारात्मक सोच और अव्यावहारिक दर्शन बेहद ही चिंताजनक स्थिति है जो कई अहम प्रश्नों को  एक साथ जन्म दे जाता है।

दु:ख और परेशानियों से घिरे जीवन के परिप्रेक्ष्य में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि यदि मानव जीवन में दु:ख एक अनिवार्य और अभिन्न अंग के रूप में कार्य करता है तो फिर इससे निजात का दोषरहित रास्ता क्या है? दुख भरे जीवन और कठिन परिस्थितियों का आखिर किस प्रकार सामना किया जाये कि संसार पथ पर जीवन की गाड़ी बिना किसी अवरोध के निरंतर चलती रहे?

मानव जीवन को एक बार और गंभीरता से पढऩे की कोशिश करें तो यह समझते देर नहीं लगती है कि जीवन केवल दुखों की कहानी नहीं है। जीवन को यदि एक प्रवाहित सरिता मानें तो यह समझते देर नहीं लगती है कि सुख-दु:ख इसके दो किनारों के रूप में सदा इसके साथ चलते रहते हैं। लेकिन जिस प्रकार किसी नदी के दोनों किनारे साथ-साथ चलते हुए भी एक-दूसरे से कभी मिलते नहीं हैं, उसी प्रकार मानव-जीवन में सुख-दु:ख की कहानी और प्रकृति भी कभी एक-दूसरे से मेल नहीं खाती है। किसी गाड़ी के पहिये की तरह सुख और दु:ख का चक्र निरंतर चलता रहता है। गाड़ी के पहिये का जो हिस्सा कभी नीचे रहता है वह दु:ख की घड़ी को दर्शाता है जबकि गाड़ी के पहिये का वही हिस्सा जब ऊपर आ जाता है तो जीवन खुशियों से रौशन हो जाता है, खुशियों के इन्द्रधनुष से जीवन सराबोर हो उठता है। गाड़ी के पहिये के इस प्रकार निरंतर चलते रहने में जीवन का एक दर्शन यह भी परिलक्षित होता है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है – न तो सुख और न ही दु:ख। सुख के बाद दु:ख और दु:ख के बाद सुख की कहानी में एक सुखद और संतुलित जीवन का युगांतकारी गुरु-मंत्र छुपा होता है।

दु:ख की बदली से घिरे जीवन में एक निश्चित समय के अंतराल के बाद जब सुख की बहारें दस्तक देती हैं तो जीवन में खुशियों का इन्द्रधनुष खिल उठता है। लेकिन खुशियों की इस सप्तरंगी इन्द्रधनुष की बहारें भी मन मयूर को सदा के लिए खुश नहीं कर पाती हैं। दु:ख की घटा के छाने के साथ आंखें नम हो जाती हैं और फिर सुख के दिनों की आस की शुरूआत हो जाती है। जीवन में सुख-दु:ख के इस प्रकार से बारी-बारी से आने-जाने के क्रम में ही जीवन जीने की कला और सफलता का रहस्य छुपा होता है।

इससे एक सच यह भी परिलक्षित होता है कि जीवन में जब दु:ख की घड़ी आ जाये तो इससे हलकान होने की जरुरत नहीं है। हमें दु:ख के इन लम्हों का यह समझकर हिम्मत और धैर्य के साथ मुकाबला करना चाहिए कि सुरंग चाहे कितनी लंबी क्यों न हो कहीं-न-कहीं इसके मुहाने पर सुख की रौशनी अपनी बांहें फैलाए हमारा बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही होती है। क्योंकि कहा जाता है कि परिवर्तन इस दुनिया की सबसे स्थायी चीज है। इसका आशय यह भी है कि यदि जीवन समस्याओं से बेजार हो तो कष्ट की इस घड़ी में हमें कभी भी धैर्य का दामन नहीं छोडऩी चाहिए। ऐसी विकट परिस्थति में हिम्मत हारने से और अधीर होने से समस्या और भी गंभीर हो जाती है। समस्याओं के आने पर जब हम धैर्य खो बैठते हैं या फिर हम खुद को कमजोर मानते हुए थक-हार कर बैठ जाते हैं तो समस्याएं अपने स्वरूप से कई गुना अधिक बड़े   रूप में दिखाई देती  हैं और जो हमें पूरी तरह से जकड़ लेती हैं जिससे बाहर आने की कोई राह शेष नहीं बची रह जाती है।

विश्व इतिहास साक्षी है कि इस धरती पर जिन महापरूषों ने भी जन्म लिए और जिन दिव्य मानवों का यहां पर अवतार हुआ, वे भी मानव जीवन के सांसारिक सुख-दु:ख के अनिवार्य चक्र से छुटकारा नही पा सके थे। उन्हें भी जीवन के गंभीर झंझावातों और संघर्षों का सामना करना पड़ा था। वे भी घोर और विकट परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना करते हुए जीवन की राह में आगे बढ़ पाए थे। राजप्रासाद में जन्म लिए मर्यादापुरुषोत्तम भगवान रामचंद्रजी का संपूर्ण जीवन घोर कठिनाईयों और संघर्षों से भरा हुआ था। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और जीवन के तमाम कष्टों का सहज रूप से सामना करते हुए एक आदर्श पुत्र, एक आदर्श भ्राता, एक आदर्श पति और पुरुषों में सर्वोत्तम कहलाये।

मैथिली सीता माता की अग्निपरीक्षा केवल इस सत्य को प्रमाणित करता है कि जीवन स्वप्न सरीखा नहीं होता है। जीवन एक कठिन परीक्षा है और इसे सफलतापूर्वक और शांतिपूर्वक जीने के लिए हममें दुखों और मुसीबतों से लडऩे की अविश्वसनीय हिम्मत और धैर्य होनी चाहिए। मुरली मनोहर मनमोहन कृष्ण जीवन के बेशुमार परेशानियों का सामना करते हुए जीवन के गूढ़ तत्व और मर्म को समझ पाए, पाप और पुण्य को समझ पाए, पुनर्जन्म से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति की राहें लोगों को दिखा पाए, जीवन और मृत्यु के अनबुझ समीकरण को सुलझा पाये और लोककल्याणार्थ दुनिया को अमृतमयी उपदेश दे पाए।

इस दुनिया में हर इंसान को अपने जीवन का क्रॉस अर्थात जीवन की कठिनाईयों के दर्द का भार खुद उठाना होता है। जीवन जीने के क्रम में दु:ख-दर्द को मौन रहकर झेल जाना ही दुनिया का दस्तूर है। कहते हैं कि एक तितली के जन्म में मानव जीवन को व्यावहारिक रूप से जीने के लिए अमूल्य सूत्र छुपा होता है। किसी अंडे से एक वयस्क और उडऩे वाली तितली बनने की घटना में उसे असह्य दर्द का सामना करना होता है जो एक कुदरती और बायोलॉजिकल घटना है और जो हमें यह सीखा जाता है कि जन्म एक शाश्वत पीड़ा है, जीवन अंतत: एक अपरिहार्य, ताउम्र और स्थायी दर्द है, जिससे मुक्ति संभव नहीं है। लिहाजा हमें इस सत्य को आत्मसात कर लेना चाहिए कि जीवन जीने के क्रम में जो कुछ भी घट रहा है, वे सभी स्वाभाविक हैं, शाश्वत हैं तथा उन्हें टालना बिल्कुल संभव नहीं है।

घने बादलों में तेज बिजली की चमक हमें यह सिखाने के लिए पर्याप्त है कि दु:ख की रातें कितनी ही काली और डरावनी क्यों न हो, उसमें भी कहीं-न-कहीं रौशनी की गुंजाईश बची रहती है। प्रत्येक सुरंग का अंत प्रकाश में होता है। वर्षा के बाद आकाश में मौजूद जल की बूंदों से जब सूरज की रौशनी गुजरती है तो खूबसूरती और खुशियों का इन्द्रधनुष खिलखिला उठता है। तो फिर जीवन में कभी समस्याओं के घुप्प अंधेरों  में पाकर खुद को कोसने की बजाय इनका धैर्य और हिम्मत से सामना क्यों न किया जाये, सुख के दिनों के आगमन की सब्र के साथ प्रतीक्षा क्यों न की जाए और सबसे अधिक मन को निराश और  हताश करने की बजाय मन को समझाने, और मन ही मन मुस्कुराने की राह क्यों न तलाश की जाए?

श्रीप्रकाश शर्मा

(लेखक जवाहर नवोदय विद्यालय में प्राचार्य हैं)

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