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भारतीय सांस्कृतिक धरोहर ज्योतिपर्व दीपावली

भारतीय सांस्कृतिक धरोहर ज्योतिपर्व दीपावली

दीप+अवली=दीपावली,दीपावली का पर्व अन्धकार से भटकते मानव समाज को प्रकाश दान कर सन्मार्ग पर लाने की भावना का द्योतक है, दीपावली के दिन दीपो को प्रज्वलित कर इसी भावना को दर्शाते है। भारत के सम्पूर्ण त्यौहारो में दीपावली का विशेष स्थान है। प्रत्येक घरो में कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (करवा चौथ)से आरम्भ हो कर कार्तिक शुल्क पक्ष की षष्टी (छठ महोत्सव) तक दीपावली का त्यौहार मनाने की परम्परा है, कृष्ण पक्ष की अमावस्या को प्रत्येक घर में दीपों को प्रज्वलित कर दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है अमा की अन्धकारमयी रात्रि असंख्य दीपों की उज्जवल ज्योति से जगमगा उठती है इसीलिए इस को ज्योतिपर्व अर्थात दीपावली कहा गया है। अविभाजित भारत में यह त्यौहार कश्मीर से कन्याकुमारी और सिन्ध-बलोचिस्तान से रंगून (बर्मा) तक बड़े धूमधाम तथा उत्साह से मनाया ही जाता रहा है। वर्तमान में यह त्यौहार भारत में सर्वत्र मनाया जाता है वरन विदेशों में भी जावा, सुमात्रा, बाली, इण्डोनेशिया, मारीशिस, थाइलेंड, फिजी, सूरीनाम आदि देशों में भी बड़ी धूमधाम तथा उत्साह से मनाया जाता है, यह त्यौहार हमारे जीने की कामना की अभिव्यक्ति का पर्व है। अमृतत्व की कामना करते समय मृत्यु का स्मरण करने की इस विलक्षण परम्परा में रात्रि को दीपदान किया जाता है। सदैव प्राप्त असीमता की अमरत्व की विस्मृति ही मृत्यु है। ज्ञानदीप के प्रकाश से इस विस्मृति के अन्धकार का विनाश ही मृृत्यु पर विजय है-‘मृत्योर्मा अमृतम गमय’-मृत्यु पर विजय पा कर अमृत की प्राप्ति का, पुरूषार्थ की चरम उपलब्धि का प्रेरणा स्त्रोत अग्नि ही है इसीलिए अग्नि प्रज्वलित कर दीपदान किया जाता है तब हमारा अन्त:करण  प्रफुल्लित हो उठता है और मन झूमने लगता है तब अन्त:करण से स्वयं अवाज निकलती है-”तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योंर्मामृतम् गमय’’ -यही हमारी संस्कृति ही विशेषता है। अन्धकार के द्वारा प्रकाश के इस स्वागत में ही सम्भवत: दीपमालावों के इस उत्सव क ा बीज छिपा है। इस अमावस्या के दिन/रात्री दीपमालाओं के लिए सबसे पवित्र और प्रांजल रात्रि है और पृथ्वी पर एक नया आकाश बन जाता है- दीपालोकित आकाश प्रकाश अन्धकार रूपी राक्षको का नाश कर देता है जो भी अपावन है कलुषित है तमयुक्त है दुष्ट है अमंगलकारी है उसे अपनी तीक्ष्ण ज्वालाओं से विनिष्ट कर देता है। इसकी ज्वालाएं श्रेष्ट अविनाशी तथा राक्षसों के बल वीर्य को नष्ट करने में समर्थ है-

‘यातुधानस्य रक्षसों बल विरूज वीर्यम’

यह ज्योति क्या है? अग्नि ज्योति है ज्योति अग्नि है, इन्द्र ज्योति है ज्योति इन्द्र है, ज्योति सूर्य है सूर्य ज्योति हैं-

अग्निर ज्योतिर ज्योतिर अग्नि:

इन्द्रो ज्योतिर ज्योतिर इन्द्र:

सूर्या ज्योतिर ज्योतिर सूर्य:

ज्योति आश्वतता और दिव्यता की प्रतीक है, यह सत्य रूप हैं सर्वत्र गमनशील है-”ज्येष्ठेमियों भानुमि ऋषूणा प्रयेति परिवीतो विभावा।’’ इसने जो प्रकाशित नहीं था उसे प्रकाशित किया -अर्य रोचदय अरूचो रूचान:। अपनी ज्योति से उषाओं को भी ज्योतित किया -अर्य वासद व्यूतेन पूर्वी :। इस ज्योति का दृष्टा मनुष्य है वह अपने तप और ज्ञान से अन्त: चक्षुओ के द्वार खोलता है और इस दिव्य तेज साक्षात्कार  करता है चक्षुर नो धेहि चक्षुर विरण्ये तनुम्य:। सचे दवि च पश्येम।। हमारे नेत्रो को प्रकाश दो ताकि हम इस जगत को समष्टि तथा व्यक्तिगत रूप से देख सके। वह अन्धकार से प्रकाश की और तथा मृत्यु से अमृत की और ले जाने की प्रार्थना करता हैं-

-‘तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योंर्मामृतम् गमय’

ज्योति जो सत्य है नित्य है केवल सत्य को ही स्वीकार करती है ज्योतिपर्व पर ज्योति का आहवान है- सत्य को असत्य से अलग कर मेरे राज्य के अधिपति हो-

ऋतेन राजन्ननृत विचित्रचन्नम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि।। ऋ 10/124/5

दीपावली को आनंद एवं उल्लास का पर्व भी कहा गया है। इस त्यौहार पर अपने निवास के चारों ओर शत-शत दीयों की मालाएं कतारे सजाने की परंपरा बहुत प्राचीन है इस परंपरा का आरंभ कब से हुआ यह कहना असंभव है ज्यों-ज्यों समय बीतता गया अनेक महत्वपूर्ण घटनाएं दीपावली से जुड़ती गई फलत: पुराणों में भी इस त्यौहार के संबंध में के आख्यान मिलते हैं। स्कन्द पुराण पद्य पुराण तथा भविष्य पुराण में इस त्यौहार का वर्णन मिलता है परंतु इसके संबंध में मान्यताएं भिन्न-भिन्न हैं। कहीं महाराज पृथु द्वारा पृथ्वी का दोहन करके दीनहीन प्रजा को धन-धान्य से संपन्न कराने का उल्लेख है तो किसी में देव दानवों द्वारा समुद्र मंथन किये जाने से भगवती लक्ष्मी जी के प्राकटय होने का उल्लेख है तो कही वामनावतार द्वारा (भगवान वामन द्वारा) बलि का गर्व हरण करके उसके बंदी गृह में पड़ी लक्ष्मी जी के उद्धार की घटना इसी पर्व के साथ जुड़ी हुई है तो कहीं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध करके अनेक राजाओं और सोलह हजार राजकन्याओं को उसके बंदी गृह से मुक्त करने का उल्लेख भी मिलता है। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों द्वारा युधिष्ठिर का राजतिलक भी इसी दिन किए जाने का उल्लेख है। भगवान राम द्वारा रावण वध के बाद चौदह वर्ष का वनवास व्यतीत करने के बाद अयोध्या में कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हुआ और प्रजा ने अयोध्या को दीपमालाओं से सजा कर भगवान राम का अभिनंदन करने का उल्लेख है और यही जनश्रुति सबसे अधिक प्रचलित है। एक जनश्रुति के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य के विजयोपलक्ष्य में प्रजा ने इसी दिन दीपमाला जलाकर सम्राट विक्रमादित्य का अभिनंदन किया था। ये सभी घटनाएं सभी भारतीयों को सुख एवं प्रसन्नता प्रदान करने वाली है।

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इनमें से किसी एक घटना विशेष को दीपावीली मनाने का कारण निश्चित करना अन्य घटनाओं के महत्व को कम करना होगा। हमारे इतिहास की उपर्युक्त प्रत्येक घटना दीपोत्सव का कारण बनने के लिए पर्याप्त है। दीपोत्सव की यह परंपरा जब भी आरंभ हुई हमारे इतिहास के पृष्ठों में अंकित इन सभी अध्यायों ने हमें आनंदित किया है। उपर्युक्त इन घटनाओं के अतिरिक्त ज्योतिष शास्त्र में भी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या का महत्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तुला राशि में स्थित सूर्य नीच भाव का माना जाता है ऐसी स्थिति में हमें सूर्य का तेज बहुत कम लाभ प्राप्त होता है तथा उसके विकृत परिणाम सामने आते है अत: सूर्य के तेज को कम होने और अमावस्य होने चंद्रमा का तेज नहीं होता अत: इस अभाव की पूर्ति के लिए अग्नि का आहवान कर उसे प्रज्जवलित किया जाता है दीपावली मनाने का एक कारण यह भी है। वर्तमान दीपावली इन सब घटनाओं को अपने अन्दर में संजोय हम भारतीयों को एक जीवित महाराष्ट्रीय पर्व के रूप में प्रतिवर्ष हमारे सामने आती है।

23दीपावली हमारा अति प्राचीन पर्व तो है परंतु इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी जाति, धर्म, वर्ग या प्रांत विशेष का उत्सव न होकर सर्वदेशीय तथा सर्वजातीय है। जैन संप्रदाय के ‘कल्पसूत्र’ नामक ग्रंथ के अनुसार आज से अढ़ाई हजार वर्ष पूर्व श्री महावीर स्वामी ने अपनी दैहिक लीला समाप्त की थी उनकी स्मृति में जैन समाज दीपोत्सव करता है। महर्षि वात्सायन ने अपने ग्रंथ कामसूत्र में इस पर्व को ‘यक्षरात्रि’ का नाम दिया है। उस समय यह ‘महिमान्य’ उत्सव के रूप में मनाया जाता था। सम्राट हर्षवर्धन के समय दीपावली कई दिनों तक चलती थी उन्होंने इसका उल्लेख अपने नाटक नागानंद में दीप प्रतीपदुत्सव- का नाम दिया है, दसवी शताब्दी में सोमदेव सूर्य ने अपने ग्रंथ में इस पर्व का नाम ‘यशस्तिलकचम्पू’ दिया है। ग्यारहवी सदी में भारत भ्रमण आएं मुसलमान पर्यटक अलबरूनी ने भी लिखा है कि दीपावली त्यौहार यहां के लोग बड़े चाव, उमंग, उत्साह से मनाते है। घर-घर में दीपमालाएं होती है इस दिन लोग नए-नए कपड़े पहनते हैं अपने घरों को सजाते हैं। इसी प्रकार पंद्रहवीं शताब्दी में भारत में दीपावली उत्सव मनाए जाने का वर्णन किया है।

मुगल सम्राट अकबर के समय दीपावली का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता था, मुस्लिम इतिहासकार अबुल फजल ने अपने ‘आईने अकबर’ में दीपावली के त्यौहार का वर्णन किया है उन्होंने इस त्यौहार को दिपाली नाम दिया है तथा इस त्यौहार की तुलना मुस्लिम त्यौहार शबरात के समान की है। हिन्दी साहित्यकारों एवं कवियों सूरदास, तुलसीदास आदि ने भी अपनी रचनाओं में दीपावली का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाए जाने का वर्णन किया है। आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने दीपावली के दिन शरीर का त्याग किया था इसलिए आर्यसमाजी भी स्वामी दयानंद की पुण्य स्मृति में दीपावली का त्यौहार मनाते है। भारत के महान मुनीश्री स्वामी रामतीर्थ ने गंगाजी में पदमासन लगाकर चिर समाधि इसी दिन दीपावली के दिन ली थी।

 

दीपावली बहुत हंसी-खुशी का त्यौहार है। सभी लोग एक दूसरे के घर जाकर मिलते है, बधाईयां देते है। घर, मकान की सफाई करवाते हैं, घर सजाते है। अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट पकवान बनाते है, रात को दीप आदि जलाकर लक्ष्मी जी का स्वागत करते है। रात्रि को पूजा की जाती है। दीए जलाकर लक्ष्मी का आहवान करते हैं। श्री लक्ष्मी जी की विशेष पूजा की जाती है। लक्ष्मी जी भारतीय संस्कृति का एक अनूठा अभिप्राय है। मंगल कलश से प्रस्फुटित पथ पर आसीन दोनों पाश्र्वों में एक-एक दिग्गज से अभिषेक कराती लक्ष्मी जी की मूर्ति भारतीय जनमानस में समायी हुई है। स्त्री, बालक, वृद्ध, युवा सभी आनंद विभोर हो वरदायिनी मां लक्ष्मी की उपासना करते हैं और उससे अपने प्रदीपालोकित गृह में पधारने की प्रार्थना करते है।

दीपावली के दिन लक्ष्मी-पूजन के अतिरिक्त व्यापारी लोग अपने बही-खाते बनाते है। भारतीय अर्थप्रणाली के अनुसार नया आर्थिक वर्ष दीपावली से आरंभ होता है इस दिन गत वर्ष का आय-व्यय का समस्त लेखा-जोखा, हानि-लाभ आदि का गंभीरतापूर्वक निरीक्षण करते है और भविष्य के लिए महत्वपूर्ण निर्णय भी लेता है। दीपावली पर होने वाले स्वच्छता संपादन, भवन सज्जा, लक्ष्मी पूजन नए बही खातों का प्रचनल दीपामाला आदि भारतीय संस्कृति के मूल स्तंभ है और ये त्यौहार मनाने की परंपरा में भारतीय संस्कृति जीवंत है।

श्रीकृष्ण मुदगिल

 

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