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महाराष्ट्र, हरियाणा में बीजेपी का विजय रथ

महाराष्ट्र, हरियाणा में बीजेपी का विजय रथ

देश के दो अहम राज्य हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के साथ कुल 17 राज्यों की 52 सीटों पर भी 21 अक्टूबर को उपचुनाव हुए थे, जिसके नतीजे 24 अक्टूबर को घोषित किए गए हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों ही प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन पिछले चुनाव के मुकाबले गिरा है और पार्टी को कई सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। महाराष्ट्र में भाजपा को पिछले चुनाव की तुलना में काफी ज्यादा सीटों का नुकसान हुआ है, जबकि हरियाणा में पार्टी पूर्ण बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई। ना सिर्फ इन दो प्रदेशों बल्कि यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को निराशा हाथ लगी है और उसकी सीटों की संख्या कम हुई  है। हालांकि पार्टी दोनों राज्यों में सरकार बना ही लेगी लेकिन इन चुनावों के नतीजों ने पार्टी के लिए खतरे की घंटी तो बजा ही दी है। लगातार चुनाव की तैयारियों में लगी रहने वाली भाजपा के लिए यह नतीजे ना सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि यह नतीजें उसे अपनी रणनीतियों में बदलाव करने को मजबूर करने वाले हैं।

लोकसभा चुनाव 2019 में भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में दोबारा वापसी के पांच महीने के अंदर ही पार्टी को हरियाणा और महाराष्ट्र की जनता ने आइना दिखा दिया है। नतीजतन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें भी घट गयी और वोट शेयर भी।

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने हरियाणा में सभी दस सीटें जीती थीं और उसे लोकसभा चुनाव में 58 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन(एनडीए) ने 41 सीटें जीती थीं और उसे 50.8 प्रतिशत वोट मिले थे। लोकसभा चुनाव के पांच महीने बाद ही हरियाणा और महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी की न सिर्फ सीटें कम हुई हैं बल्कि उसका वोट प्रतिशत भी गिरा है।

हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीटें जीतने वाली बीजेपी को विधानसभा चुनाव में 36.49 प्रतिशत वोट मिले हैं जो लोकसभा चुनाव में मिले वोटों से 22 प्रतिशत कम है। इतना ही नहीं हरियाणा में बीजेपी को पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में 07 सीटों का नुकसान हुआ है। वहीं महाराष्ट्र की बात करें तो विधानसभा चुनाव में एनडीए (बीजेपी+शिवसेना) को 42.1 प्रतिशत वोट मिले हैं। जो लोकसभा चुनाव में मिले वोटों से 8.7 प्रतिशत कम है। विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें भी पिछले चुनाव के मुकाबले 17 सीटें कम हुई हैं।

जानकारों की माने तो वोट प्रतिशत का गिरना बीजेपी के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। मोदी सरकार-2 के कार्यकाल के पांच महीनो के अंदर ही हुए दो राज्यों के विधानसभा चुनाव में सीटें कम होना और वोट प्रतिशत गिरना पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। इतना ही नहीं बीजेपी को पीएम मोदी के गृह राज्य कहे जाने वाले गुजरात में भी झटका लगा है। गुजरात में 06 विधानसभा क्षेत्रो में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने 03 सीटें जीत कर बीजेपी को भविष्य के संकेत दे दिए हैं।

गौरतलब है कि इस वर्ष के अंत तक अभी झारखंड में भी विधानसभा चुनाव होने हैं जहां बीजेपी की ही सरकार है। वहीं अगले वर्ष के शुरू में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं।

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दरअसल महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम भाजपा को आईना दिखाने वाले हैं कि जिस रूप में राष्ट्रवाद, धारा 370 और भावनात्मक मुद्दों की जो राजनीति की जा रही है, उसे जनता अब समझ रही है और मुद्दाविहीन राजनीति को देश की जनता ने नकारना शुरू कर दिया है।

साथ ही इस जनादेश ने इस धारणा को भी खारिज कर दिया है कि दल-बदल करवाकर, विपक्षी दलों में सेंध लगाकर, मीडिया को खरीदकर, ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल करके बड़ी जीत हासिल की जा सकती है। साथ ही यह परिणाम बताते हैं कि विपक्ष को राजनीति में खत्म नहीं किया जा सकता है। उनकी अपनी जगह है।

भाजपा  के लिए एक सबक यह भी है कि सिर्फ उग्र राष्ट्रवाद की आग से ही चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं। जीएसटी और नोटबंदी ने छोटे और मझौले उद्यमियों, किसानों, मजदूरों और गरीब लोगों की कमर तोड़ दी है। बेरोजगारी की समस्या देश में लगातार बनी हुई है। लेकिन सरकार की इस ज्वलंत मुद्दे को लेकर कोई गंभीरता नहीं है। उसे इन समस्याओं का सामना करना होगा।

विधानसभा चुनाव आम तौर स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, लेकिन भाजपा ने जानबूझकर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीयता, अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान को कड़ा जवाब देने जैसे तमाम मुद्दों का सहारा लिया। ये मुद्दे काम कर सकते थे लेकिन स्थानीय समस्याएं बड़ी बन गईं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि विदर्भ (महाराष्ट्र) में किसानों की बदहाली, मानेसर (हरियाणा) में ऑटोमोबाइल सेक्टर की समस्याएं, रोजगार के घटते अवसर और दोनों राज्यों के प्रभुत्वशाली वर्गों यानी जाटों और मराठों की अनदेखी वास्तविक समस्याएं थीं। बीजेपी को अब यह देखना होगा कि इन समस्याओं का समाधान कैसे हो?

कांग्रेस के लिए सबक

राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव परिणाम कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष के लिए भी कोई ठोस संकेत नहीं दे रहे हैं। हरियाणा में कांग्रेस का प्रदर्शन जहां बेहतर रहा है तो वहीं महाराष्ट्र में उसका प्रदर्शन निराशाजनक ही कहा जाएगा। चुनाव परिणाम से यह साफ जाहिर है कि महाराष्ट्र में शरद पवार और हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की मेहनत के बावजूद विपक्ष जितना कमजोर और दिशाहीन है उतना इससे पहले कभी नहीं था। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात नहीं है।

उनके लिए सिर्फ इतनी खुशी की बात है कि विपक्ष के समाप्त हो जाने जैसी बात के बीच जब चुनाव परिणाम आए हैं वह उनमें आशा का संचार कर सकते हैं। लेकिन जैसे दोनों राज्यों में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस रही है तो उसके लिए जनता ने अलग संदेश दिया है।

इस चुनाव में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने चुनावों से पर्याप्त दूरी बना रखी थी। इसके बावजूद प्रदर्शन संतोषजनक रहा है। मतलब साफ है कि गांधी नेहरू परिवार ही सबकुछ नहीं है। पार्टी को क्षेत्रीय क्षत्रपों पर भरोसा करना होगा और उन्हें उभरने का मौका देना होगा।

साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भी गांधी परिवार से अलग विकल्प पर विचार किया जा सकता है। इस परिणाम से साफ जाहिर है कि जनता एक मजबूत विपक्ष की तलाश कर रही है। अगर कांग्रेस के पास एक मजबूत नेतृत्व होता और वह जनता से जुड़े मुद्दे चुनकर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में उतरती तो परिणाम कुछ और होते। इन दोनों में राज्यों में यह माहौल नहीं बनता कि कांग्रेस कमजोर विकल्प है।

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इंडिया टुडे ग्रुप के आई चौक डॉट इन पर मृगांक शेखर लिखते हैं की काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती। उनका कहना है की ‘राष्ट्रवाद मुद्दा है, लेकिन उसकी भी सीमा है: ये तो कतई नहीं कहा जा सकता कि लोगों ने बीजेपी के राष्ट्रवाद के मुद्दे को खारिज कर दिया है। कम से कम नतीजों से तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता। हां, नतीजे ही ये भी बता रहे हैं कि राष्ट्रवाद, धारा 370 या पाकिस्तान जैसे मुद्दे चुनावी थाली का जायका बढ़ा सकते हैं, लेकिन उसमें मूल तत्व बेहद जरूरी हैं और उन्हें नजरअंदाज करने का खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा – ये तय है।

तोड़-फोड़ में चांस 50-50 ही है: चुनावों के समय बीजेपी दूसरे दलों के नेताओं को बड़ी तेजी से तोड़ कर लाती रही है और बदले में उन्हें ओहदे भी गिफ्ट करती रही है – लेकिन ये हर जगह नहीं चलता। सतारा का नतीजा सबसे बड़ा उदाहरण है। वैसे महाराष्ट्र में ऐसे 19 उम्मीदवार चुनाव हार गये हैं।

ये डबल रोल हानिकारक तो नहीं: अमित शाह अब भी बीजेपी अध्यक्ष हैं, लेकिन गृह मंत्री होने के चलते उनके हिस्से के 24 घंटे का एक बड़ा भाग सरकारी कामकाज में देना पड़ता है। कहने को तो जे.पी. नड्डा कार्यकारी अध्यक्ष बनाये गये हैं – लेकिन बड़े फैसले तो वो ले नहीं सकते। वैसे भी अमित शाह के लिए कोई छोटा फैसला भी नहीं होता। कहीं ये डबल रोल बीजेपी को भारी तो नहीं पडऩे लगा है?’

इन चुनाव परिणामो ने यह तो साफ कर ही दिया है की भाजपा के लिए आगे की राह सुगम नहीं है। वह जितना जल्दी अपने को संभाल  लेगी और अपने मूल कैडर  पर ध्यांन देगी, उतनी ही जल्दी अपना भविष्य सुधार  लेगी।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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