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कांटों भरी राह है महिला खिलाडिय़ों की

कांटों भरी राह है महिला खिलाडिय़ों की

By पूजा मेहरोत्रा

दक्षिण कोरिया के इंचीयोन मे हुए 17वें एशियन गेम्स में मुक्केबाज सरिता देवी के साथ जिस तरह से भेदभाव किया गया उसे पूरे विश्व ने देखा। लेकिन इस घटना को भूलकर सरिता रियो ओलंपिक की तैयारी मे जुट गईं हैं। वह कहती हैं – मैंने उस घटना को भुला दिया है। मुझे आगे बढऩा है और रियो मे पदक जीतने की तैयारी मे जुटना है। सरिता ने जब पोडियम पर कांस्य पदक लेने से इनकार किया, भावुक हुईं और जिस तरह रोई थीं उसे पूरे विश्व ने देखा था। पिछले दिनों एशियन गेम्स के विजेताओं के सम्मान में आयोजित एक सम्मान समारोह में देश का गौरव बढ़ाने के लिए सारे खिलाड़ी उपस्थित थे। सरिता ने बताया वो भावुक सरिता भारतीय सरिता थी जिसने हमेशा अपने देश के झंडे को ऊंचा रखा है और तीसरे नंबर पर देख कर आंसुओं पर नियंत्रण नहीं रख पाई। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जब अपनी प्रैक्टिस के लिए सरिता घर से बाहर थीं तो उनके बेटे ने उन्हें पहचाना नहीं था और उनके गोद में लेते ही रोने लग गया था। जब खिलाड़ी अपना सब कुछ दांव पर लगाता है और वह जीत भी जाता है लेकिन भेदभाव का शिकार होता है तो उसका भावुक होना लाजिमी है। 1 अक्तूबर को जब खबरिया चैनलों पर सरिता को रोता हुआ दिखाया गया तो पूरा देश सरिता के साथ था, साथ नहीं थे तो सिर्फ इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अधिकारी। यदि उन अधिकारियों ने तभी सरिता के साथ खड़े होने का दम दिखाया

होता तो आज भारत की झोली में 57 पदक होते। खिलाडिय़ों के बदौलत विदेश घूमने वाले इन अधिकारियों का खेल से कोई लेना देना नहीं होता है। यदि वे भी खिलाड़ी होते तो हम आज पदक तालिका मे आठवें नंबर पर नहीं बल्कि पहले नंबर पर होते।

सरिता पदक वितरण समारोह मे इतनी भावुक हो गईं कि उन्होंने पदक दक्षिण कोरिया की ही खिलाड़ी पार्क जीना के गले मे डाल दिया था। सरिता उस मैच की विजेता थी, यह बात वहां बैठे हर एक खेल प्रेमी और मैच का आंखों देखा हाल कह रहे कमेंटेटर भी बार- बार कह रहे थे। सरिता के साथ भेदभाव हो रहा था, लेकिन भारतीय खेल संघ का एक भी अधिकारी सरिता के लिए खड़ा नहीं था। कुछ भारतीय पत्रकारों की मदद के बाद सरिता अपनी शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन वहां भी वह सफल नहीं रहीं। खैर, किसी भारतीय महिला खिलाड़ी के साथ भेदभाव की यह कोई पहली घटना नहीं है। भारतीय खिलाड़ी इस तरह के भेदभाव के शिकार होती रही हैं। बाहर ही क्यूं उनके साथ उनके देश में उनके अपने खेल संघ के अधिकारी भेदभाव करते रहे हैं। ये बात अब किसी से छुपी भी नहीं है। आज भले ही पूरा देश मैरी कॉम की सफलता पर नाज करता हो, उन्हे बेस्ट खिलाड़ी के सम्मान से सम्मानित किया जा रहा हो, लेकिन उनका यहां तक पहुंचने का सफर भी आसान नहीं रहा है। पिछले दिनों प्रियंका चोपड़ा अभिनीत मैरी कॉम की जीवन पर आधारित फिल्म में पूरे देश ने उनके साथ घाटी घटनाओं को देखा।

हमारे खेल संघ या हमारी सरकार सिर्फ तंगहाली की बात करती है, ऐसी परिस्थिति में हमारी महिला खिलाड़ी यदि भारत को अपने बल बूते पर गोल्ड, सिल्वर और ब्रांज मेडल दे रहीं है तो वो उनका अतुलनीय प्रयास का ही फल है। यदि आप चीन को पदक तालिका में अव्वल देख कर दुखी होते हैं तो चीन सरकार जितना अपने खिलाडिय़ों पर खर्च करती है हमारी सरकार महज आधा भी खर्च करे तो हमसे आगे कोई दिखाई नहीं देगा।

पहले बात सरिता देवी की। सरिता 60 किलोग्राम वर्ग की चैंपियन रह चुकी हैं। कोरिया की जिस खिलाड़ी जीना पार्क के साथ खेले गए मैच में उनसे भेदभाव किया, उस खेल में भी वह विजेता थीं, लेकिन अम्पायरों ने सरिता के खिलाफ फैसला दिया। सरिता ने फिर भी हार नहीं मानी। उन्होंने आवाज बुलंद की। उन्होंने कहा कि वह मैच की जांच कराना चाहती हैं। इसके लिए उन्हें 500 डॉलर (30,000 रूपये) चाहिए थे। हमारा खेल संघ का एक भी अधिकारी वहां सरिता के साथ आवाज उठाने के लिए नहीं खड़ा था। सरिता की मदद के लिए कुछ पत्रकारों ने पैसे इकट्ठे किए, क्यंकी उन्हें सरिता की जीत का पूरा विश्वास था। सरिता ने जब अपने लिए आवाज उठाई वो उसके करीयर के लिए खतरा बन गया। अन्तर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ ने सरिता पर प्रतिबंध लगाने की बात कही। अपने करियर को अंधकार मे जाता देख, एक बार फिर सरिता को ही झुकना पड़ा और उन्होंने समारोह में भावनाओं में बहने और पदक स्वीकार न करने की अपनी गलती मानी और बिना शर्त माफी भी मांगी ।

दूसरी भारतीय मुक्केबाज चैंपियन मैरी कॉम ने सरिता का साथ दिया, स्वर बुलंद किया और कहा की भले ही सरिता देवी को कांस्य पदक दिया गया है, लेकिन विजेता सरिता ही हैं और वो सरिता को विजेता मानते हुए उनके साथ हैं। मैरी कॉम यह भी कहती हैं कि मै ज्यादा इस पर कुछ नहीं कहना चाहती, उन्हें सेमी फाइनल मैच जीतना चाहिए था। मुझे उनकी पीड़ा का अहसास है। मैरी ने साथ ही यही भी कहा कि मैं उम्मीद करती हूं कि जज और रेफरी प्रतियोगिताओं में निष्पक्ष रहेंगे।

08-11-2014

एशियाई खेलों में एक बार फिर महिला खिलडिय़ों ने अपना जबरदस्त प्रदर्शन किया है। भारत कुल 57 पदक जीतकर अंक तालिका में 8वें स्थान पर रहा। इन 57 पदकों में 28 पदक जीतते हुए पुरुषों को बराबर की टक्कर दी है। भारत ने कुल 11 स्वर्ण पदक जीते, जिसमें भी महिलाओं ने बराबर की टक्कर दी और 5 स्वर्ण अपने नाम किया। ये संख्या तब और बड़ी लगने लगती है जब हम ये देखते हैं कि पुरुष खिलाडिय़ों के मुकाबले महिलाओं का छोटा दल भेजा जाता है। भारत में खेलों के प्रति यूं ही ज्यादा जागरुकता नहीं दिखती, ऐसे में महिला खिलाडिय़ों के लिए चुनौती काफी बढ़ जाती है। ज्यादातर महिला खिलाड़ी छोटे शहरों और गांवों से ताल्लुक रखती हैं। जिन इलाकों में शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों तक के लिए लड़कियों को संघर्ष करना पड़ता हो वहां से खेलों में करियर बनाना किसी सपने से कम नहीं है। सबसे ज्यादा मेडल देने वाले राज्य हरियाणा में महिलाओं की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लिंग अनुपात में हरियाणा में प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 879 महिलाएं हैं। देश भर में यह आंकड़ा प्रति हजार पुरुषों पर 940 का है। भारतीय महिलाओं के पदक संघर्ष की एक ऐसी दास्तान है, जिसे सिर्फ आंकड़ों के सहारे नहीं जाना जा सकता। हरियाणा की ही बात लीजिए महिलाओं को शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत हासिल करने के लिए भी जूझना पड़ता है। 2011 के सर्वे के मुताबिक जहां राज्य में 84 फीसदी पुरुष साक्षर हो चुके हैं, वहीं केवल 56 फीसदी महिलाएं साक्षर हो पाई हैं।

एथलेटिक्स में महिलाओं की चक्का फेंक में सीमा पूनिया ने गोल्ड मेडल पर मुहर लगाई तो यकीन मानिए कोई ऐसा नहीं होगा जिसने उसे दिल से दुआ न दी हो, लेकिन जब पिछले दिनों देश लौटने के बाद सम्मानित किया जा रहा था तो सीमा आंतिल पूनीय का दर्द भी खूब छलका। सीमा बताती हैं – 2006 मे उन्हें डोप टेस्ट मे फंसा दिया गया था। टेस्ट गलत था जिसकी सजा मैं आज तक भुगत रही हूं। मैं खेल में भले ही बहुत आगे आ गईं हूं, लेकिन उस नाइंसाफी को भूलना नामुमकिन है। भावुक सीमा ने बताया कि मैं तो गांव से आई एथलीट थी, मुझे हवाई जहाज तक नहीं पता था, कैसे मालूम होता की डोपिंग क्या होती है। सीमा कहती हैं – देश के लिए बहतरीन प्रदर्शन करने के बाद न तो हरियाणा सरकार और न ही केंद्र सरकार ने ही पहचान दी है। केंद्र सरकार ने अभी तक मुझे अर्जुन सम्मान लायक नहीं समझा है, वहीं हरियाणा सरकार ने मुझे इंस्पेक्टर पद पर ही तैनात रखा है। सीमा कहती हैं कि मैं जब अपने प्रमोशन की बात करती हूं तो मेरे सामने फाइल फेंक दी जाती है।

गोल्ड मेडल जीतने वाली महिलाओं की कबड्डी टीम की सदस्या अनीता मावी भी यहां तक पहुंचने की कहानी भी रोंगटे करने वाली है। यहां तक पहुंचने के लिए अनीता ने दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा। मुश्किलों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और न ही हौंसला ही खोया। नौकरी जाने के बाद तो वे खेल मे जी जान से जुट गईं। अनीता प्रतिदिन 40 किलोमीटर फरीदाबाद से दिल्ली स्कूल आती थीं। अभी तक स्कूल से उन्हें सैलरी भी नहीं दी गई है। जब उन्होंने स्कूल से प्रैक्टिस के लिए छुट्टी मांगी तो स्कूल प्रशासन ने माना कर दिया था। मावी ने इस्तीफा दिया, लेकिन जैसे ही महिला कबड्डी टीम के गोल्ड मेडल जीतने की खबर आई फरीदाबाद शहर से 20 किलोमीटर दूर यमुना से सटे ददिसया पंचायत में उनके गांव में दीवाली में पटाखे गूंज गए और मिठाई का तांता लग गया। ये वही अनीता मावी हैं जिनका चयन 2010 मे नहीं किया गया था और वो खूब रोई थीं। अभी तक अनीता के स्कूल ने उनकी सैलरी नहीं दी है। अब शायद शर्म से ही वो उनका पैसा दे दे और सरकार उन्हें नौकरी। महिला खिलाडिय़ों के साथ भेदभाव की यह बातें यहीं खत्म नहीं होती हैं। हर खिलाड़ी ने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कई कुर्बानियां दी हैं। फिर हम देख पाते हैं कुछ पदक। इसमें सरकार और खेल एसोसिएशन का कोई सहयोग नहीं है। वे सिर्फ मौज-मस्ती के लिए जाते हैं और खिलाडिय़ों की हक की लड़ाई भी नहीं लड़ते हैं।

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