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एक और राष्ट्रीय आपदा की ओर सुनसान राहों पर हर गांव

एक और राष्ट्रीय आपदा की ओर सुनसान राहों पर हर गांव

By उदयेश रवि

वे शहर में रहते हैं और उन्हें अपने गांव की चिंता है। बिसनु काका कहते हैं मेरे बेटे जैसा कोई दूजा नहीं जो परदेस में रहके भी इतनी चिंता करता है। अगर कोई उनके बेटे शिवनाथ जी पर किसी तरह की टीका-टिप्पणी कर दे तो बवाल खड़ा हो जाए। तिसपर भी कि वे एक आईएएस हैं और फिलहाल मिनिस्टर के खासमखास हैं। खैर, काका के ऐसे हजारों बेटे इस महानगर में हैं जिन्हें चिंता तो बहुत हुई मगर अपने, गांव, कस्बे, शहरों के लिए किया क्या? क्या वे शहर की तकनीक सीखकर गांव गए या जाकर वहां के लोगों की बेहतरी के लिए कोशिशें कीं? क्या उन्होंने गांव के लोगों को रोजी-रोटी के लिए शहर जाने से रोकने का कोई पुख्ता और विश्वसनीय कदम उठाया?

आज महानगरों की सबसे बड़ी चिंता है तेजी से बढ़ती हुई आबादी। यह महानगरों की जन-सुविधाओं में अवरोध पैदा करता है। विकास के लिए चयनित मॉडल को भी लील जाता है। गंदगी, अशिष्टता, अपराध, जन-सुविधाओं के तय मानदंडों का उल्लंघन जैसे अनुचित व्यवहार महानगरों को स्मार्ट सिटी बनने में बाधा उत्पन्न करती है। साथ ही जन संसाधनों में अप्रत्याशित कमी भी पैदा करता है। यह स्थिति भारत की ही नहीं लगभग विश्व के सभी देशों की है।

हम दलील भले ही दे लें कि देश हमारा है और हम कहीं भी आ-जा सकते हैं चाहे वो धनोपार्जन के लिए हों या मौजमस्ती के लिए। एक हद तक वे सही भी हैं किंतु आबादी का खतरनाक तरीके से एक से दूसरी जगह पलायन दोनों क्षेत्रों के लिए बुरा है। यह आनेवाले दिनों के लिए अप्रत्याशित बड़े खतरे का एक संकेत है। यह खतरा प्रवासी लोगों के मूल स्थान पर इस तरह कि वहां आबादी का असंतुलन पैदा हो रहा है जिससे कामगार मजदूर, प्रशिक्षित प्रबंधकों यानी काबिल लोगों की कमी हो रही है जिससे प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। इससे बचेखुचे खेती जैसे मुख्य कार्य भी लगभग उच्छेद हो जाएंगे। लोगों यानी विरोध करनेवालों की कमी से अपराध बढ़ेंगे और इनमें जमीन संबंधी विवाद सर्वाधिक पैदा होंगे। इसके लिए एक जुमला कि ‘निर्बल को सभी झपटते हैं’ लागू होगा।

जम्मू-कश्मीर में सन 1990 के दरम्यान वहां के पंडितों पर पहले हमले हुए और जब ये सभी वहां से भाग गए तो अलगाववादियों ने जनमत संग्रह के लिए आवाज तेज करा दी। यह सच है कि वहां जनमत संग्रह करा दिए जाएं तो बहुत बुरा होगा। यहां किसी लोभ या स्वेच्छा से कश्मीर छोडऩेवाले लोग तो नहीं थे अपितु जबर्दस्ती उन्हें प्रवासी होने को विवश करने के बाद की स्थिति अब सबको समझ में आने लगी है।

हालिया इराक, अफगानिस्तान, यूक्रेन, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, सीरिया, गाजा जैसे देशों के रक्तरंजित हालात को देखते हुए भारत को भी वक्त रहते इस पर सोचना चाहिए।

पलायन की यह प्रक्रिया भारत के कई राज्यों से महानगरों में हो रही है, विशेषकर दिल्ली में। इसे अगर देखना-परखना हो तो रेलगाडिय़ों में आनेवाली-जानेवाली भीड़ पर गौर करें। इसे ध्यान में रखकर बिहार, उत्तर प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, नागालैंड, उड़ीसा जैसे प्रदेशों में अब कौमवार सही-सही जनगणना कराए जाएं तो अल्पसंख्यकों की परिभाषा बदल जाएगी। मुस्लिम परिवारों को छोड़कर अन्य परिवारों में लगभग बूढ़े लोग ही हर घर में मिलेंगे। जो परिवार कभी बाहुबली हुआ करते थे उनकी छतों पर अब वीरानी फैली होती है जिसका उपयोग वहां बसने वाले लोग बच्चों को डराने के लिए करते हैं।

कुछ महीनों पहले असम के पश्चिम बंगाल से लगे कुछ जिलों में जातीय हिंसा हुई जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए। यह हिंसा वहां के आदिवासियों और बांग्लादेश से आए मुसलमानों के बीच हुई। इस मामले को हवा देने में एक बांग्लादेशी मूल के विवादास्पद भारतीय सांसद का भी हाथ था। इसके मूल में भी यही आव्रजन या माइग्रेशन था जिसकी आनेवाली भयावहता पर कहां गौर किया जाता है?

कमोबेस यही स्थिति पूरे देश की है। केरल के लोगों को डॉलर ज्यादा पसंद है इसलिए वे कमाने के लिए विदेश जाना पसंद करते हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, सीमांत, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य प्रदेश के अधिकतम लोग अपने सूबे में ही रहकर जीवन-यापन करना पसंद करते हैं। राजस्थान, हरियाणा जैसे करीबी राज्यों से दिल्ली में रोजी-रोटी के लिए पलायन करनेवालों की संख्या भी कम नहीं है। पंजाब और हिमाचल से भी लोग दिल्ली कमाने के लिए आते रहे हैं। इसमें मजदूर से लेकर उच्च वर्ग के लोग भी शामिल हैं।

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ये तीन तरीके के लोग हैं। पहले वो जिनकी क्षमता का सही उपयोग गांव, कस्बे या छोटे शहर में नहीं हो पाया तो वे महानगरों की ओर कूच कर गए और दूसरे वे जो महानगर की लकदक को देखकर अपनी जमीन छोड़कर आ गए। तीसरे वो लोग भी हैं जो मजबूर होकर गांव छोड़कर प्रस्थान कर गए। चाहे उस मजबूरी के पीछे नक्सली व किसी अन्य तरह की हिंसा का डर हो या सास-बहू की सदियों पुरानी समर से उपजी कलह से विरक्ति या फिर अपने बुरे अतीत से छुटकारा पाने की मजबूरी भी महानगरों की ओर लोगों को जाने को विवश कर रही है। पढ़ाई के लिए अपनी जन्मभूमि से पलायन करना कहीं फैशन तो कहीं मजबूरी है जो अलग विषय है।

सरकार ऐसी समस्याओं का निदान करके जोखिम उठाना नहीं चाहती। सिर्फ आंकड़ों में उलझाए रखना चाहती है। उन्हें डर है कि यह मुद्दा सामाजिक से अधिक राजनीतिक हो सकता है।

विशेषज्ञों की मानें तो पिछले 10 वर्षों में यह पलायन गांव की आबादी का 42 प्रतिशत हो गया, जबकि 2020 तक इसके 78 प्रतिशत से अधिक हो जाने की उम्मीद है और इसका मुख्य कारक महानगरों के लोगों का रहन-सहन और सुख-सुविधाओं के प्रति आकर्षण होगा।

विशेषकर गांवों से किसानों एवं उनके बच्चों का महानगरों की ओर पलायन का कारण कृषि कार्य में कम मुनाफा होना है। सिंचाई के लिए बिहार जैसे अन्य प्रांतों में नहर जैसे संसाधनों को बढ़ावा नहीं मिलने से किसानों में निराशा है। असम के धुबरी, ग्वालपारा एवं अन्य जिले में लोग जमीन की उत्तरोत्तर कम हो रही उर्वराशक्ति को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं। सरकार इस पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। सर्वाधिक तालाबों वाले पश्चिम बंगाल में ताल-तलैये अब खुदाई के अभाव में भरते जा रहे हैं। यहां भी खेती दम तोड़ती नजर आती है। मछली पालन ने भी इसी वजह से पालकों को निराश किया। झारखंड में नक्सलवाद से लोग परेशान हैं। इनकी सबसे बड़ी समस्या उन्हें लेवी देना और मजदूरों का नक्सलवादी बनना है जिससे किसानों में भय है। वहां की अधिकतर खेती लायक भूमि नक्सलवादियों के कारण विवादित है जिस पर खेती नहीं की जाती है। यहां भी सरकार का रवैया ढुलमुल है। रोजगार का कोई सही साधन नहीं होने से इन राज्यों से पलायन जारी है।

आखिर कुछ भी हो एक बड़ी संख्या में लोगों का एक से दूसरी जगह पलायन बड़ी समस्या तो है ही इस मानव-बाढ़ से होने वाली दिक्कतों में राष्ट्रीय आपदा की दस्तक है। इससे निजात पाने में राज्यों और केंद्र की सरकार को मिलकर राज्यों में ही बड़े पैमानों पर नौकरियां सृजित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए बिजली, पानी, सफाई, नागरिक सुविधाओं जैसे यातायात एवं कानून व्यवस्था को जनहित को ध्यान में रखते हुए तैयार करना चाहिए ताकि लोग अपने छोटे शहर को महानगरों की तुलना में बेकार नहीं समझ सकें।

बेशक भारत के कुछ प्रांतों ने ऐसे मॉडल निर्मित किए हैं जिनमें गुजरात, महाराष्ट्र, पूर्व का आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान तथा कुछ हद तक हरियाणा हैं जिन्होंने आईटी सिटी तथा उद्योग नगरों के नाम पर माइग्रेशन रोकने का काम किया है। दूसरे राज्यों को इनसे सबक लेना चाहिए।

उपरोक्त राज्यों ने सबसे पहले अपनी सड़कें, परिवहन और कानून व्यवस्था सुधारीं। फिर उद्योगों के लिए कानून को लचीला एवं आकर्षक बनाया साथ ही बड़े घरानों को आमंत्रित किया। हां, कानून में तब्दीली करते समय उद्योगपतियों, मजदूरों एवं पर्यावरण को ध्यान में रखा गया मगर अपराध को काबू में रखने में कोई कोताही नहीं की गई। वजह यही थी कि वहां उद्योगों ने नई नौकरियों को सृजित किया और माइग्रेशन रोका।

हर हाथ को अगर रोजगार मिल जाए तो मुमकिन है कि अपराध, प्रदेश प्रवास या पलायन जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। जब तक यह समस्या बड़ी नहीं समझी जाएगी और इसके वैकल्पिक निदान पर अमल नहीं किया जाएगा तब तक विकास के लिए प्रति व्यक्ति आय (पीसीआई) को बढ़ता हुआ आंका जाना बेमानी होगी और गरीबी कम करने के प्रयासों में पूर्णत: सफलता नहीं पाई जा सकती है।

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