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शिवसेना अब न घर की रही न घाट की

शिवसेना अब न घर की रही न घाट की

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 288 सीटों में केवल 56 सीट जीतने वाली पार्टी शिवसेना का मुख्यमंत्री के पद के लिये 105 सीट जीतने वाली भाजपा से सौदेबाजी करना महंगी पड़ गयी। शिवसेना सिर्फ इस बात के भरोसे थी कि भाजपा सरकार बना कर सत्ता में आने के लिये कुछ भी करेगी, लेकिन भाजपा ने सत्ता को छोड़ कर विपक्ष में बैठना पसंद किया। शिवसेना ने सरकार बनानें के लिये एनसीपी और कांग्रेस से समर्थन मांगा जो उसे नहीं मिला। फिर  एनसीपी को अवसर मिला वो भी समर्थन का आधार पेश नहीं कर सकी। इस तरह शिवसेना की हालत वही हो गयी कि न वो घर की रही न घाट की।

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का यह कहना कि उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता और शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे को वायदा किया था कि एक दिन शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनायेंगे। वो अपनी इच्छा पूरी करने के लिये बहुमत की सीटें जीतते। शिवसेना तो मात्र 20 प्रतिशत सीटें जीतकर सरकार में मुख्यमंत्री पद के लिये जिद कर रही थी।

भाजपा के मुख्यमंत्री फडऩवीस ने पूर्व विधानसभा के कार्य काल पूरा होने से पहले ही त्यागपत्र दे दिया। सरकार बनानें के राज्यपाल के आमंत्रण पर भी शिवसेना का समर्थन नहीं मिलने के कारण तुरन्त दावा छोड़ दिया। उसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनानें का अवसर दिया पर लाख प्रयास के बाबजूद भी ठाकरे एंड कम्पनी एनसीपी और कांग्रेस का समर्थन नहीं जुटा पायी। एैसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन तो लगना ही था। राज्यपाल ने तो मात्र अन्य पार्टी का समर्थन पत्र लाने को ही कहा था। महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन को गलत बतानें वाले नेता खुद ही गलत बोल रहे हैं। राज्यपाल ने सरकार बनाये जाने का हर संभव प्रयास किया। लगभग 15 दिन का समय मिला था जिसमें साथ मिल कर चुनाव लडऩे वाली भाजपा और शिवसेना एकजुट न हो सकी। यहां तक कि एनसीपी और कांग्रेस भी मिलकर किसी अन्य पार्टी से समर्थन नहीं जुटा पायी।

राजनैतिक परिदृश्य को समझनें में शिवसेना बिल्कुल फेल हुयी। बिना कांग्रेस और एनसीपी से बात किये भाजपा से दूर हो गयी। उसनें सरकार बनाना भाजपा की मजबूरी समझ ली। वो भूल गयी कि भाजपा अध्यक्ष  अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसी भी दबाब में नहीं आते हैं। वो भूल गये कि उत्तर प्रदेश में एक पार्टी ने टिकट के लिये दबाब बनाया था। जब अधिक दबाब या ब्लेकमेल दिखनें लगा तो ठीक बीच चुनाव में उससे किनारा कर लिया। यहां तक कि एनडीए की घटक एक अन्य पार्टी के आगे भी नहीं झुके और उस पार्टी की पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल को मंत्रीमंडल में भी नहीं लिया। शिवसेना ने इन घटनाओं को याद नहीं किया और ब्लेकमेल करनें में लग गयी। आधे कार्य काल के लिये मुख्यमंत्री पद और कुछ मलाईदार विभागों के लिये अड़ी रही। भाजपा नें शिवसेना की जिद पर झुकने के बजाय सरकार बनानें का दावा छोडऩा उचित समझा।

शिवसेना के नेता ये भी भूल गये कि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा अभिनेता से नेता बने शत्रुघन सिन्हा के और पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के आगे भी नहीं झुकी थी। आज उन दोनों को घर टिका दिया। नवजोत सिंह सिद्धू का दबाब भी काम नहीं आया वे कांग्रेस में गये, मंत्री बने अब मंत्री पद भी गया। वे भी न घर के रहे न घाट के।

यही नहीं, भाजपा को समझने में तो शिवसेना ने भूल की ही है वो कांग्रेस को समझनें में भी भूल कर बैठी। शिवसेना जो विशुद्ध रूप से हिन्दू पार्टी समझी जाती है कांग्रेस उसको समर्थन कर अपना मुस्लिम वोट बैंक कभी कम नहीं होने देगी। भाजपा और शिवसेना के विचारों और उद्देश्यों की समानता लगभग एक जैसी होने के कारण प्राकृतिक रूप से सहभागी रहते। वहीं कांग्रेस के साथ विचारों और कार्यप्रणाली तथा उद्देश्यों के लिये वे उत्तरी और दक्षिणी पोल है ऐसी स्थिति में बनावटी मिलन सत्ता हथियानें के स्वार्थ के कारण स्थायी सरकार दे ही नहीं सकता। इन लोगों ने चुनाव में कांगेस को नकारा और एक समय की सबसे बड़ी पार्टी को आज सबसे छोटी पार्टी बना दिया। अब महाराष्ट्र के लोग किसी भी सूरत में कांग्रेस को सत्ता में नहीं देखना चाहते हैं इसलिये उनका गठबंधन एनसीपी के साथ मिलकर भी 100 सीटें नहीं जीत पाया। शिवसेना उसे सत्ता में भागीदार बनायेगी तो जनता का गुस्सा फूटेगा। फिर मध्यावधि चुनाव तो होंगे ही और कांग्रेस के साथ शिवसेना भी हासिये में चली जायेगी। यदि शिवसेना सुप्रीम कोर्ट जा रही है या कांग्रेस भी जाती है दोनों राष्ट्रपति शासन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से मुंहकी खाकर ही आने वाले हैं। खुद सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के मामले में राज्यपाल द्वारा फ्लोर रेस्ट के लिये दिया गया एक सप्ताह का समय घटाकर महज एक ही दिन का कर दिया था। यानि कम से कम समय ही देना उपयुक्त समझा और इसलिए भाजपा की सरकार नहीं चल पायी थी। राज्यपाल ने पूरे समय इन्तजार किया, 24 अक्टूबर को चुनाव हुये। विधानसभा गठित हो जाने के बाद भी सप्ताह से अधिक समय था जिसका उपयोग लालच की सौदेबाजी में शिवसेना नहीं कर पायी। उसके बाद फिर एक दिन का समय दिया लेकिन कांग्रेस ने अपनी शर्तों और एनसीपी के शरद पवार द्वारा राजनैतिक रोड मैप मांगने के कारण बात नहीं बन पायी। पवार ने शिवसेना को नचा दिया। खुद ये लोग एकजुट हो नहीं पाये और अब राज्यपाल को राष्ट्रपति शासन के लिये दोषी ठहरा कर आरोप लगा रहे हैं यानि उल्टा चोर कोतवाल को पकडऩा चाहता है।

मैं समझता हूं कि आज तक की इस तरह कि गठित विधानसभा जहां किसी एक पार्टी को बहुमत न मिला हो और जिम्मेदारी राज्यपाल पर एक स्थायी सरकार बनानें की आयी हो उनमें सबसे सही न्यायपूर्ण फैसला महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोसारी ने लिया है जो अपने आप में एक स्वस्थ्य राजनैतिक निर्णय की परम्परा के लिये मील का पत्थर होगा।

370 और 35ए की सफलता और अब राम मंदिर निर्माण की राह खुल जाने के कारण भाजपा का ग्राफ और ऊपर चला गया है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि अब यदि महाराष्ट्र में चुनाव हुये तो वह अकेले दम पर बहुमत में आयेगी। शिवसेना और एनसीपी अलग लड़े तो मराठा राजनीति में दोनों एक दूसरे को भारी क्षति पहुंचायेंगे। यदि इकट्ठे लड़े तो एक दूसरे को समाप्त करनें में लग जायेंगे। हर स्थिति में शिवसेना ने भाजपा की पौ बारह कर दी है।

डॉ. विजय खैरा

 

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