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सच का आइना

सच का आइना

जेएनयू एक बार फिर सुर्खियों में है, हमेशा की तरह सारी गलत वजहों से। वामियों-कौमियों की साजिश ने एक बार फिर इस महान शिक्षण-संस्थान का गला जकड़ दिया है।

हमारे समय की एक दिक्कत यह भी है कि इस ‘ट्विटर-काल’ के दौर में किसी के पास इतनी फुरसत नहीं है कि वह तथ्यों का पता लगा ले। फिर, मेहनत से तो वैसे भी आजकल सबको चिढ़ ही है। तो ‘त्वरित प्रतिक्रिया’ देने के फेर में अक्सर क्या होता है कि अर्थ का अनर्थ और खबरों का अचार बन जाता है, जो आपको परोस दिया जाता है।

आप सभी ने कुछ दिनों पहले  जेएनयू के छात्र-छात्राओं की भीड़ को वाटर-कैनन के सहारे तितर-बितर करती पुलिस को देखा होगा। दीक्षांत समारोह के दौरान छात्रों के प्रदर्शन की तस्वीरें और खबरें पा रहे होंगे। आपकी आंखों से सहानुभूति के

आंसू और दिल में दर्द का समंदर उभर रहा होगा। पर रुकिए! क्या आप मुद्दे को जानते हैं? क्या सचमुच मुद्दा वह फीस-बढ़ोतरी ही है, जिसे लेकर जेएनयू के ये बच्चे सड़कों पर उतरे हुए हैं?

यह लेखक 1997 से 2001 तक जेएनयू का छात्र था। कैंपस के गरीब छात्रों में था। क्योंकि पिता तब बिहार में प्रोफेसर थे और लालू यादव का जंगलराज पूरे उरूज पर था, पिताश्री को छह-सात महीनों पर वेतन (वह भी कभी 60 तो कभी 70 फीसदी) मिलता था। मुझे 1000 रुपये महीने मिलते थे, जिसमें से मेरा मेस बिल 600 से 750 तक जाता था, मैं 300 रुपए में कैंपस का राजा था। अस्तु, यह बात आगे करेंगे।

पहले समझिए, मुद्दा क्या है क्या आपने जेएनयू के छात्रों का घोषणापत्र देखा है? आइए, एक नजर इनके मसलों पर डालते हैं।

  • लाईट- इनके स्वयंभू जेनयूएसयू को प्रशासन द्वारा रिकग्नाइज किया जाना : यदि आपकी स्मृति क्षीण नहीं हुई हो तो याद होगा कि पिछले चुनाव के समय जेएनयूएसयू का मामला कोर्ट में चला गया था और वह विचाराधीन है। न्यायालय ने मई 2020 की तारीख दी है, तो इस बीच में भला स्वयंभू जेएनयूएसयू को कहां से मान्यता दी जाए?
  • जेएनयू मेस में ड्रेस कोड का मुद्दा : फीस बढ़ोतरी के अलावा जेएनयू के छात्र हॉस्टल मैनुअल के ड्रेस कोड में बदलाव पर भी नाराज हैं। जेएनयू की इस अनियंत्रित भीड़ ने मेस में ड्रेस-कोड को मुद्दा बनाया है, जो वाकई है ही नहीं। हमारे समय भी मैनुअल में यह लिखा होता था। फर्क सिर्फ ये है कि हमारे समय ” Appropriately dressed” लिखा होता था। अब ” Properly dressed” लिखा हुआ है। लेकिन, हू केयर्स?
  • हॉस्टल के गेट्स लगाने का मसला भी नॉन-इशू है। क्योंकि जब लाइब्रेरी सारी रात खुली रहती है तो हॉस्टल बंद करने का तुक क्या है? और हां, जो जेएनयू-हेटर्स लड़कियों के जाने-आने, कंडोम की गिनती करने और इस यूनिवर्सिटी को सेक्स और शराब का अड्डा बताने में लगे हैं, उनको बता दूं कि हमारे समय भी नियम तो खिलाफ ही थे। कोई नया नियम नहीं बना है। उस समय भी सब आंखें मूंदते थे और आप जब नरक मचाने पर आ जाते थे, तो फाइन भी हो जाता था, शिकायत भी होती थी।

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यह विषयांतर होगा, पर बता दूं कि हमारे समय एक महीने मेस-बिल जमा न करने पर रूम लॉक भी होता था। आजकल, जेएनयू के अधिकांश छात्र एक ही बार में बिल भरते हैं, जब उनको रजिस्ट्रेशन लेना होता है। लेकिन प्रशासन उनका रूम लॉक नहीं कर सकता, मेस बंद नहीं कर सकता, क्योंकि यह उनका प्रजातांत्रिक अधिकार है।

  • सिक्योरिटी-मनी को 5500 से बढ़ाकर 12000 रुपए करने के पीछे यही वजह है, ताकि मेस को बंद करने की नौबत न आए। सप्लायर को भुगतान होता रहे।
  • फी-लाईट : यानी शुल्क में बढ़ोतरी तो उनका (स्वयंभू जेएनयूएसयूनीत छात्रों का) आखिरी एजेंडा है। वह भी कितनी बढ़ गयी है फी? अभी जो मेस-बिल 2300 से 2800 रुपए महीने आता है, उसमें 1700 रुपए बढ़ेगा। महीने में तीन बार नॉन-वेज और एक दिन स्पेशल डिनर (जिसमें मुर्गे के दो आइटम, गोलगप्पे की ठेली, आइसक्रीम, तंदूर आदि सब कुछ शामिल है) के बाद ये पैसे कितने अधिक हैं? हमारे समय के लोग याद कर सकते हैं कि स्पेशल डिनर में हमें क्या मिलता था। यह तो हॉस्टल नाइट हो रही है, महीने में एक बार।
  • बिजली बिल : जहां तक बिजली बिल (वह भी एक्चुअल) देने की बात है तो एक विद्यार्थी कितनी बिजली जला लेगा एक ट्यूब लाइट और पंखे से? हां, विद्यार्थी के नाम पर पल रहे लोग चूंकि फ्रिज रखते हैं, ब्लोअर और हीटर चलाते हैं तो उनको ही दिक्कत हो रही है। यूजीसी ने जेएनयू की बिजली का बिल देना बंद कर दिया है, इन्हीं महाशयों की मेहरबानी से।

तो, कुल जमा यदि उच्चतम स्तर पर देखा जाए तो आज भी जेएनयू के औसत छात्र या छात्रा का खर्च 5000 रुपए मासिक से अधिक नहीं है। फिर इतना बवाल क्यूं?

बदले में जेएनयू और यूजीसी यहां के छात्रों को फ्रीशिप के अलावा क्या देता है वह देखिए:

  • MCM, यानी मेरिट कम मीन्स : इसकी रकम 2000 रुपए मासिक है, जो आय-प्रमाणपत्र जमा करने पर दी जाती है।
  • नेट/जेआरएफ स्कॉलरशिप : इसकी रकम आज लगभग एक अच्छे भले एक्ज्क्यूटिव के वेतन के बराबर है।
  • राजीव गांधी फेलोशिप : यह जेआरएफ के बराबर है और एससी-एसटी छात्रों के लिए है।
  • मौलाना आजाद फेलोशिप : यह मुसलमानों के लिए है। इसमें भी जेआरएफ के बराबर रकम मिलती है।
  • इसके अलावा नॉन-नेट-स्कॉलरशिप है, जो जेएनयू अपने सभी एमफिल और पीएचडी छात्रों को देता है। इसमें पीएचडी में 8000 रुपए मासिक और एमफिल में 5000 रुपए मासिक मिलते हैं। यानी, आप एडमिशन लीजिए और सरकार आपकी पढ़ाई का खर्च उठाएगी।

समस्या यह है कि स्वयंभू जेएनयूएसयू के नेतृत्व वाला छात्र-आंदोलन अब हिंसक हो चुका है। प्रदर्शनकारी छात्रों पर जिस तरह के आरोप लगे हैं उनकी एक झलक आप भी देखिए-

पहले इन्होंने डीन ‘उमेश कदम’ की एंबुलेंस रोकी। उनके छुट्टी पर जाने की स्थिति में जो वंदना मिश्र डीन का काम देख रही हैं, उनके साथ अभद्रता हुई। वह बेहोश तक हो गयीं और इन गिरोहबंद प्रदर्शनकारियों ने उनके कपड़े तक फाडऩे की कोशिश की। इसके अलावा, एक वार्डन की तीन वर्षीया बेटी को उनके घर के आगे प्रदर्शन करते हुए उठा लिया। एक वार्डन के घर के आगे इतना शोर और हंगामा किया कि उसकी छोटी बच्ची डर के मारे उल्टियां करने लगी, सो नहीं पायी, प्रोवोस्ट को धमकाया और पूरी यूनिवर्सिटी को इन्होंने बंधक बना रखा है।

यह लेखक जेएनयू की ही खदान का उत्पाद है और यह आज जो कुछ भी है, उसका श्रेय अपने अल्मा-माटेर को ही देता है। यह न तो जेएनयू को शराब और सेक्स का अड्डा मानने को तैयार है, न ही उसे दूध में धुला हुआ स्वर्ग मानता है। किसी भी संस्थान की तरह इसकी भी तमाम अच्छाई-बुराई है किंतु उपर्युक्त सारे तथ्य हैं।

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ताबूत में आखिरी कील

हे ईश्वर! उन्हें माफ करना, वे नहीं जानते कि वे कर क्या रहे हैं। यह वाक्य ईश्वर के पुत्र ईसा ने कहा था, जब उनको सूली पर टांगा जा रहा था।

यह वाक्य मुझे रह-रह कर याद आ रहा है, जब मेरे अल्मा-माटेर जेएनयू को वहां के मुट्ठी भर गुंडे सूली पर चढ़ा रहे हैं। ये लोग इस बात को कतई नहीं जानते कि वे जेएनयू के लिए कितनी बदनामी बटोर चुके हैं और वह दिन कतई दूर नहीं जब जनता खुद ही अपने हाथों में इंसाफ का तराजू उठा लेगी।

तीन साल पहले, जब कन्हैया और खालिद व रशीदा के साथ मिलकर कुछ दर्जन छात्रों ने भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाए थे, भारत को बांटने के सपनों को राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर साझा किया था, तब से आज तक यमुना  में कई हजार लीटर ‘सीवर’ गिर चुका है। अभी हॉस्टल-फी हाइक के नाम पर शुरू हुआ यह बवाल कहीं जेएनयू की छवि में आखिरी कील न हो…।

आखिर, क्या वजह है कि बीबीसी हिंदी जब अपने पेज पर जेएनयू के गुंडों के साथ पुलिस के ‘उचित सलूक’ की खबर साझा करता है, तो क्यों 90 फीसदी कमेंट इस पर खुशी जाहिर करते हैं, पुलिस को धन्यवाद देते हैं और कसर कम रह जाने की आशंका जताते हुए भरपूर पिटाई के लिए पुलिस का आह्वान करते हैं।

क्या कारण है कि मैं जब जेएनयू के एक पूर्व छात्र का लिखा हुआ साझा करता हूं, जिसमें बस जेएनयू के सकारात्मक पक्ष को दिखाया गया है, तो लेखक को तो तीखी आलोचना झेलनी ही पड़ती है, छींटे मुझ पर भी आते हैं, जबकि मेरा सार्वजनिक लेखन देखने वाला कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि मैं जेएनयू के इन गुंडों के सख्त विरोध में खड़ा हूं।

वजह सीधी सी है कि जेएनयू के अनाचार से अब लोग तंग आ चुके हैं। सब की हथेली में टिका सूचना-विस्फोट का यंत्र अब किसी भी बात को छुपा नहीं रहने देता। व्यक्ति को वैसे भी नकारात्मक चीजें अधिक भाती हैं।

Any bad news is a good news, worse is the better one.—यह पत्रकारिता का पहला पाठ पढ़ाया जाता है।

इसीलिए, जेएनयू में कंडोम वेंडिंग मशीन की खबर हिट है, हालांकि लोग यह जानते भी नहीं कि वहां बाकायदा विवाहितों का भी एक हॉस्टल महानदी है। जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग हमेशा खबरों में रहता है, लेकिन लोग यह नहीं मानना चाहते कि वहां राष्ट्रवादी छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद का अच्छा-खासा समर्थन है और परिषद के लड़के इन वामपंथी लोगों का यथासंभव विरोध भी करते हैं।

लोग इनके बकवास मुद्दों को भाव देने के मूड में नहीं हैं, इनकी धूर्तता भी जनता की समझ में आने लगी है, क्योंकि सूचना पर इनके नाजायाज मानस-पिताओं व माताओं का एकाधिकार नहीं रहा। यही वजह है कि डीएन झा से लेकर रोमिला आंटी तक के ‘कपड़े’ सरेआम उतार दिए जाते हैं और कोई इरफान-विपन किसी उपन्यासकार से अधिक भाव नहीं पाता, उनका बौद्धिक आतंक खत्म हो चुका है।

जेएनयू वाले खुद को समझते क्या हैं? क्या वे इस देश से अलग हैं, एक टापू हैं, पूरे देश में कहीं भी राममंदिर के फैसले के खिलाफ खुलेआम कुछ नहीं हुआ, पर जेएनयू के कुछ लड़के-लड़कियों ने उसकी मुखालफत कर दी। ये सारे सवाल हैं, जो आम जनता हम जैसे पूर्व छात्रों, वर्तमान पत्रकारों से पूछती है।

कन्हैया का मामला जब सुर्खियों में आया तो मुनीरका में कमरे मिलने मुश्किल हो गए, अब ये माक्र्सवादी बस इस पर आमादा हैं कि जेएनयू के लोगों को कहीं नौकरी भी न मिले, जेएनयू पर तालाबंदी हो जाए।

फिलहाल, मैं अपने शहर में अपनी जेएनयू की पहचान बेहद शर्म के साथ, संकोच के साथ बताता हूं, जो कि 10 साल पहले मेरे लिए गर्व का विषय था, बाहर तो मैं बताता भी नहीं।

व्यालोक

 

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