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महाराष्ट्र सरकार तो बन गई आगे-आगे देखिये होता है क्या?

महाराष्ट्र सरकार तो बन गई  आगे-आगे देखिये होता है क्या?

अंत भला सो भला। महाराष्ट्र में जो घटा है अभी तक तो उसके बारे यही कहा जा सकता है।

इसे जनतंत्र, जनाधार या सत्य की विजय की संज्ञा देना उतना ही ठीक होगा जितना कि किसी व्यक्ति द्वारा शीर्ष आसन लगा कर सच्चाई को देखने का प्रयास।

महाराष्ट्र की जनता ने भाजपा-शिवसेना के चुनावपूर्व गठबंधन को 288-सदस्यीय विधानसभा में 161 (भाजपा 105, मत प्रतिशत 25.75 + शिवसेना 56, मत प्रतिशत 16.41 = 161 सीटें, 42.16 मत प्रतिशत) सीटों पर विजय देकर स्पष्ट बहुमत दिया था। लगता है कि अदृश्य होकर कोई शिवसेना की तारें पीछे से खींच रहा था। शिवसेना को शायद आभास हो गया था कि क्योंकि उसके गठबंधन साथी को अपने बल पर बहुमत नहीं मिला है और शिवसेना के सहयोग के बिना भाजपा सरकार नहीं बना पायेगी, इसलिये उसने भाजपा से सौदेबाजी शुरू कर दी। उसने ऐसी मांगें आगे रख दीं जिन्हें मान लेना भाजपा के लिये संभव न था। उद्धव ठाकरे ने तो अपने पुत्र को मुख्यमंत्री बनाने की मांग रख दी। उनके सुपुत्र आदित्य ठाकरे पहली बार विधानसभा के लिये चुने गये हैं। यह भी पहली बार ही था कि ठाकरे परिवार से किसी व्यक्ति ने चुनाव लड़ा और जीता हो।

जिस दल को अपने सहयोगी दल से लगभग आधी सीटें मिली हों वह मुख्यमंत्री पद और मंत्रिमंडल में बराबर का प्रतिनिधित्व मांगे, यह सभी को अटपटा लगता है। शिव सेना ने दलील दी कि चुनाव पूर्व दोनों दलों में जो बातचीत हुई थी उसमें भाजपा ने यह माना था। यदि कुछ ऐसा समझौता हुआ था तो इसे चुनाव परिणाम निकलने के बाद ही क्यों उजागर किया गया? दोनों ही दलों द्वारा इसे गुप्त रखने का औचित्य व तर्क समझ नहीं आता। भाजपा ने तो शुरू से ही कहा कि ऐसी कोई बात हुई ही नहीं थी।

जैसी परम्परा है, उसके अनुसार राज्यपाल भगत सिंह कुशियारी ने सब से बड़े दल भाजपा के नेता को सरकार बनाने का न्योता दिया। जब देवेन्द्र फडनवीस ने देखा कि उनके गठबंधन की घटक शिवसेना की मांगों को स्वीकार करना उसके लिये संभव नहीं है, तो उन्होंने राज्यपाल को सरकार बनाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी।

उसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित किया। शिव सेना के इनकार के बाद उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस को बुलाया। ये लोग राज्यपाल से और समय मांगने लगे। हालात को देखते हुए कि कोई भी दल सरकार बनाने में असमर्थ है तो राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों के सम्मलेन में भाग लेने के लिये प्रस्थान करने से पूर्व उन्होंने राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट भेज दी कि कोई भी दल सरकार बनाने में असमर्थ है जिस कारण महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

उसके बाद गैर-भाजपा दलों में हलचल बढ गई। चुनाव परिणाम के बाद सब से बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा को सरकार बनाने से रोकने के बहाने मतदाता द्वारा तृस्कृत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) व सोनियाजी के नेत्रित्व वाली कांग्रेस दोनों ने ही घोर हिंदुत्व वाली शिव सेना से हाथ मिला कर जनादेश को उलटकर सरकार में आने के अवसर को हाथ से न निकल जाने का फैसला कर लिया। अनेक उठक-बैठकों के बाद भी जब कई दिन तक कोई अंतिम फैसला न हो सका तो अचानक शनिवार 23 नवंबर, 2019 को प्रात: 8 बजे के करीब देवेन्द्र फडनवीस को मुख्यमंत्री और मराठा शक्तिस्तंभ शरद पवार के भतीजे व राकांपा विधायक दल के नेता अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी गयी। रिपोर्टों के अनुसार अजित पवार ने अपने 54 विधायकों के भाजपा को समर्थन की सूचि प्रस्तुत की थी।

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इसी बीच उच्चतम न्यालय में उसी दिन एक याचिका दायर कर दी गई जिसमें फडनवीस सरकार की शपथ को चुनौती दी गई और तुरंत विश्वासमत की मांग की गई। न्यायलय की तीन-सदस्यीय पीठ ने रविवार को ही इस पर सुनाई की और पक्षों से कुछ कागजात पेश करने का आदेश दिया। अगले दिन ही अदालत ने प्रोटम अध्यक्ष की नियुक्ति कर सभी विधायकों के शपथग्रहण के तुरंत उपरांत मुख्यमंत्री को विश्वासमत प्राप्त करने के आदेश दे दिये।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शक्तिपरीक्षण जितनी जल्दी हो सके उतनी ही जल्दी किया जाना चाहिये। पर दु:ख की बात यह है कि इस शक्तिपरीक्षण के लिए कोई मानदंड पिछले 70 सालों में निर्धारित न हो पाये हैं। इसी कारण यह राज्यपाल के विवेक पर छोड़ दिया गया है। कोई राज्यपाल इस शक्तिपरीक्षण के लिए दो दिन का समय देते हैं तो कोई दो सप्ताह और उससे भी अधिक समय का।

अब तक एक परम्परा थी कि सदस्यों को शपथ प्रोटम अध्यक्ष देता था जिसके बाद अध्यक्ष का चुनाव भी प्रोटम अध्यक्ष ही करवाता था। उसके बाद नई विधानसभा में राज्यपाल का अभिभाषण होता था और उसके बाद विश्वास मत प्राप्त किया जाता था। पर क्या अब उच्चतम न्यायलय के आदेश के बाद पुरानी परंपरा को तिलांजली दे दी गई समझा जाये? व्यवस्थायें तो रोज बदली नहीं जाती और न बदली जानी ही चाहियें। यह तो नहीं हो सकता कि केंद्र में कोई व्यवस्था हो और प्रदेशों में कोई और; एक प्रदेश में कुछ परंपरा निभाई जाये और अन्य प्रदेशों में कोई और।

एक समाचार चैनल ने ठीक ही कहा है कि अब महाराष्ट्र में सरकार तीन परिवार प्रधान राजनितिक दलों द्वारा चलाई जायेगी क्योंकि शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और सोनिया-राहुल कांग्रेस तीनों ही परिवारवादी दल हैं। इन तीनों ही दलों में परिवार पहले और देश व राज्य बाद में का सिद्धांत चलता है।

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाराष्ट्र में जो नई सरकार बनी है उसने दलबदल का एक नया अध्याय लिख दिया है। शिवसेना ने चुनाव तो एनडीए का भाग होकर लड़े पर सरकार बनाई पूरी शिवसेना के दलबदल के साथ अन्य दो दलों की गोदी में बैठ कर। उन दलों के साथ जिनके विरुद्ध उसने चुनाव लड़ा था। स्पष्टत: ही यह नया गठबंधन सैदांतिक नहीं सत्ताप्राप्ति के लिये हुआ।

महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसने सिद्ध कर दिया है कि चुनाव पूर्व और चुनाव उपरांत के गठबन्धनों में कोई अंतर नहीं रह गया है। नई कानून व्यवस्था में व्यभिचार का अपराध तो कोई अपराध ही नहीं रहा है। दो वयस्कों के बीच मर्जी से सेक्स को व्यभिचार की परिभाषा से निकाल कर इसे मान्यता व संरक्षण दे दिया गया है। इसी प्रकार किसी भी राजनितिक दल को चुनाव पूर्व गठबंधन किसी से और चुनाव उपरान्त आंख-मटक्का किसी और से करने की खुली छूट दे दी गई है।

वैसे भी शिवसेना थी तो एनडीए का भाग पर वह इसको गालियां रोज ही देती रहती थी। जनता को तो यह समझ पाना ही मुश्किल हो गया था कि यह दल इकट्ठे हैं या एक दूसरे से अलग और विरुद्ध। एनडीए और शिवसेना का गठबंधन तो उस दंपत्ति की तरह रह गया था जो लड़ते तो दिन-रात थे पर एक दूसरे से तलाक भी नहीं लेते थे। चलो अंतत: अब तलाक तो हो गया।

यह अलग बात है कि हमारे संविधान में ‘सेकुलरिज्म’ को परिभाषित नहीं किया गया है। इस कारण हर दल व व्यक्ति को अपने आपको ‘सेकुलर’ और अपने विरोधी को ‘कम्युनल’ करार देने की पूरी छूट है। ‘सेकुलरिज्म’ हमारे संविधान का अटूट अंग है। जब कोई व्यक्ति या दल अपना दायित्व ग्रहण करने से पूर्व संविधान की कसम खाता है तो वह ‘सेकुलरिज्म’ के सिद्धांत के प्रति अपनी आस्था की भी कसम खाता है। इसलिये अब दो ‘सेकुलर’ सहयोगी धाराओं के साथ मिल जाने पर अब शिव सेना  भी ‘सेकुलर’ बन गई है उसका पीछे का इतिहास चाहे कितना भी ‘कम्यूनल’ क्यूं न रहा हो।

अब तो उंगलियां इस ओर भी उठने लगी हैं कि अजित पवार के भाजपा व फडनवीस के साथ दो-तीन दिन के राजनितिक सहवास के पीछे भी शरद पवार का ही ड्रामा था। अजित भाजपा के साथ आये तो अवश्य थे और उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली थी पर उन्होंने न अपनी पार्टी और न अपने चाचा से नाता तोड़ा था। उसी दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि उनको अपने चाचा से मिलने से कोई रोक नहीं सकता। उन्होंने एक पूर्वनियोजित कार्यक्रम के अनुसार कार्यभार संभालने से पूर्व ही पद त्याग दिया।

अजित के भाजपा के साथ आने के पीछे क्या छिपा था यह राज आज नहीं तो कल अवश्य सामने आ जायेगा। पर इतना तो तय है कि इस सारे घटनाक्रम में शरद पवार एक सफल व सशक्त एकमात्र नेता के रूप में उभर कर सामने आये हैं। अब महाराष्ट्र सरकार उनके इशारे और उनकी उंगलियों पर ही नाचेगी।

उद्धव सरकार के शपथ ग्रहण के समय अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री रूप में शपथ भी न दिलाये जाना भी एक पूर्वनियोजित चाल ही लगती है ताकि शक की सूई जो शरद पवार की ओर इशारा कर रही है वह सिद्ध न हो जाये। उद्धव ठाकरे मंत्रिमंडल द्वारा विश्वासमत प्राप्त कर लेने के बाद मंत्रीमंडल का विस्तार होगा और तब अजित का उप-मुख्यमंत्री बनना तय लगता है।

विश्वासमत प्राप्त कर लेने के बाद इस मंत्रिमंडल की सारी समस्यायें समाप्त हो जायेंगी, यह समझ बैठना गलत होगा। कांग्रेस भी उप-मुख्यमंत्री पद चाह रही है। मंत्रियों के विभागों को लेकर भी खेंचातानी की संभावनायें हैं।

सरकार बना लेना तो इश्क की शुरुआत है। आगे-आगे देखिये होता है क्या।

अम्बा चरण वशिष्ठ

 

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