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अब राजनीति राष्ट्रनीति की

अब राजनीति राष्ट्रनीति की

By सुधीर गहलोत

भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की अमेरिका में गिरफ्तारी से उपजे राजनीतिक तनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका-यात्रा से दोनों देशों के रिश्तों में एक बार फिर विश्वास पैदा हुआ है। इसके पहले नरेन्द्र मोदी ने भूटान, नेपाल और जापान की यात्रा कर भारतीय पक्ष और हितों को ध्यान में रखते हुए इनके साथ आपसी रिश्तों को एक नई ऊंचाई दे चुके हैं। उन्होंने न सिर्फ भारत को आर्थिक रूप से मजबूती लाने के प्रयास किए, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान का भी उन देशों में प्रचार-प्रसार किया।

विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत एक अनूठा देश इसलिए है, क्योंकि यहां के नागरिक शक्ति के सबसे बड़े केन्द्र हैं। एक लंबे समय के बाद भारत की जनता ने पिछले लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी पर अपनी आस्था और विश्वास को प्रकट कर एक बहुत बड़ा संकेत दिया है। पिछले दशक में यूपीए सरकार ने देश के मनोबल को जैसे तोड़ ही डाला था। हर तरफ हताशा का माहौल था, निवेश थम गया था, किसान आत्महत्या कर रहे थे और जनता किंकत्र्तव्यविमूढ़़ बनी हुई थी। लोकसभा चुनावों के परिणामों से स्पष्ट हो गया कि देश को जिस बेहतर नेतृत्व की तलाश थी, वो नरेन्द्र मोदी के रूप में मिल गया। गांधीजी के आदर्शों से अनुप्रेरित कांग्रेस आज अपनी राह भटक गई है। आज उसके पास नेतृत्व का घोर अभाव है। सोनिया गांधी के बार-बार के प्रयासों के बावजूद भी राहुल गांधी के नेतृत्व को लोगों ने नकार दिया। मोदी के आने के बाद अब गठबंधन की राजनीति का भी धीरे-धीरे अंत होता जा रहा है। केन्द्र से लेकर राज्यों तक फैली वंशवाद की राजनीति पर मोदी विराम लगाने का प्रयास कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने अगर किसी विषय पर अपनी समस्त उर्जा को केन्द्रित किया तो वह है देश को सशक्त बनाना। ‘स्वच्छ भारत और सशक्त भारत’ बनाने के लिए मोदी कहीं भी अपना सिर झुकाने के तैयार हैं। परिवार से लेकर समाज तक संस्कार लाना, समाज के अंतिम व्यक्ति के साथ खड़ा होना एवं देश में सामाजिक समरसता को और मजबूत करना उनका प्राथमिक लक्ष्य है। स्वयं मोदी ने ये सब बातें अलग-अलग मौकों पर देश से लेकर विदेश में कही है। अभी-अभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने भी नरेन्द्र मोदी सरकार के कामकाज की भरपूर सराहना की। बहुत लंबे समय बाद संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व एक साथ खड़े होकर, सबको साथ लेकर देश को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी की अग्रिपरीक्षा होने वाली है।

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से जब मोदी ने शौचालय और स्वच्छता की बात कही थी, तो राजनीतिक पंडितों ने इसका मजाक उड़ाते हुए कहा था कि इस मौके पर कहने के लिए उनके पास कुछ बेहतर होना चाहिए था। इन पंडितों के अनुसार कोई बड़े आर्थिक सुधार या विदेश नीति का इशारा मोदी को देना चाहिए था। शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाने से लेकर इराक और सीरिया में फंसे भारतीय लोगों को निकालने के लिए खुफिया विभाग के प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को वहां भेजना नेहरुयुग से इतर कार्य-पद्धति की ओर इशारा करता है। पिछले 60 सालों से मंथर गति से चलने वाली भारतीय विदेश नीति में यह एक बड़ा मोड़ है। बराबरी की बात करते हुए अपने हितों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना, नरेन्द्र मोदी की स्पष्ट नीति में शामिल है। इसकी झलक उन्होंने अपनी जापान और अमेरिका यात्रा में दिया भी। हालांकि मोदी ने विदेश नीति के लिए कोई स्पष्ट टीम नहीं बना रखी है, लेकिन अहम मसलों पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से लेकर खुफिया विभाग के अधिकारियों के राय को शामिल किया जाना बहुत कुछ कहता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 5 दिवसीय अमेरिका यात्रा की प्रतीक्षा हर किसी को थी। अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा से लेकर वहां रहने वाला भारतीय समुदाय नरेन्द्र मोदी के स्वागत में पलक-पावड़े बिछाए बैठा रहा। मैडिसन स्क्वॉयर में जिस तरह से उनका भव्य स्वागत किया गया, वह अभूतपूर्व था। एक समय हिंदू राष्ट्रवादी होने के कारण 2002 के गुजरात दंगों में भूमिका के आधार पर अमेरिका ने मोदी को वीसा देने से मना कर किया था। वही अमेरिका मोदी की भारी जीत के बाद उन्हें अपने यहां सबसे पहले आमंत्रित करने वाले देशों में से एक था। हाथों में नरेन्द्र मोदी तस्वीर लिए हर-हर मोदी का नारा न्यूयॉर्क से लेकर वाशिंगटन डीसी तक गुंजा और साथ ही हुई भारत-अमेरिका की दोस्ती के नए युग की शुरुआत।

जटिल बातों को अलंकारों की थाली में सजाकर उसे सरल शब्दों में कहने में मोदी को महारत हासिल है। मोदी….मोदी… की हिस्ट्रीयाई गुंज सिर्फ भारत के चुनावी रैलियों में ही नहीं सुनी गई, जिसके कारण मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पिछले तीस सालों के रिकॉर्ड को ध्वस्त करते हुए राजनीतिक विश्लेषकों के इस मान्यता को खत्म कर दिया कि भारत में गठबंधन के बिना अब सराकरें बननी असंभव हैं, बल्कि न्यूयॉर्क और मैनहट्टन की सड़कें भी उस नारे से गुंजयमान रहीं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में उन्होंने लगभग 200 विश्वनेताओं के सामने हिंदी में भाषण के जरिए न सिर्फ भारत के पक्ष को सरल शब्दों में रखा, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान स्थिति की आलोचना करते हुए उसमें सुधार की आवश्यकता भी बता दी। प्राय: खाली रहने वाली संयुक्त राष्ट्र की विजिटर्स गैलरी, मोदी के भाषण शुरु होने से पहले आधे से अधिक भर चुकी थी, बावजूद इसके सैकड़ों लोग बाहर इंतजार करते रहे। सुरक्षा करणों से उन्हें अंदर नहीं आने दिया था। लेकिन ‘अमेरिका लव्स मोदी’ की तख्ती लिए बाहर खड़े लोगों ने मोदी की झलक पाने के लिए लंबा इंतजार किया। यह मोदी के प्रति उनकी दीवानगी थी। इस तरह की दीवानगी, खासकर किसी नेता के प्रति, भारत में आज तक देखने को नहीं मिली। यह भारत में एक नई शक्ति के संचार और बदलाव की कहानी थी।

25-10-2014

नरेन्द्र मोदी ने कहा था – ”हमारे देश की सवा सौ करोड़ जनता से अगर आप पूछें कि भारत का सबसे अच्छा दोस्त कौन है, बच्चा-बच्चा कहेगा – रुस।’’ युक्रेन के मामले में रुस के साथ खड़े होकर भारत ने यह दोस्ती निभाई भी। यूपीए सरकार की नीतियों के कारण भारत का रुस और अमेरिका के साथ संबंधों में कोई विशेष गर्मी नहीं आई। हालांकि मोदी की अमेरिका पर रुस की पैनी नजर थी, लेकिन मोदी ने अपने पारंपरिक मित्र के हितों को नुकसान पहुंचाए बिना अमेरिका के व्यवसायी वर्ग सहित अमेरिकी सरकार से अपने संबंधों को मजबूत बनाने में सफल रहे। 30 सिंतबर को ओबामा-मोदी मुलाकात से पहले ह्वाईट हाउस के प्रवक्ता जॉन एरनेस्ट ने कहा था – ”यह एक ऐसी साझेदारी है, जो ह्वाईट हाउस के लिए बेहद मूल्यवान है। हम आर्थिक संबंधों को और बढ़ाने, सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने के साथ-साथ हम ऐसी साझेदारी करने का प्रयास करेंगे जो दोनों देशों के साथ-साथ विश्व के लिए भी फायदेमंद हो। इसके अलावा इराक, सीरिया और अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति सहित हम क्षेत्रीय मसलों पर भी बात करेंगे।’’

सामरिक स्तर पर संबंधों में एक नई ऊर्जा जरूर देखने को मिली, लेकिन विश्लेषकों के अनुसार, मोदी की अमेरिका यात्रा में आर्थिक दृष्टिकोण सबसे अहम था। मैडिसन स्क्वॉयर में बोलते हुए मोदी ने लोगों को भारत में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। इसके पहले नरेन्द्र मोदी भारत में ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को सफलतापूर्वक शुरू कर चुके थे। अमेरिका ने भी इस महत्व को समझा। इसी कारण उसने भारत के साथ न सिर्फ सामरिक साझेदारी को मजबूत करते हुए दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों का नवीनीकरण करते हुए अगले 10 सालों के लिए बढ़ा दिया और पिछले साल के आंकड़े के अनुसार 1.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की उपभोक्ता खर्च वाले भारत में 2023 तक 4.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होने वाले भारतीय बाजार के महत्व को भी खूब समझा। भारत अमेरिका से 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर के रक्षा सौदे के तहत अपाचे और चिन्हूक मिलिट्री हेलीकॉप्टर की खरीद करना चाहता है। भारत और अमेरिका का 2013 में 63.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार हुआ, जबकि वास्तविक व्यापार लगभग 94 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था। इस व्यापार को पांच गुणा तक बढ़ाने पर दोनों देशों ने सहमति जताई है।

भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की अमेरिका में गिरफ्तारी से उपजे राजनीतिक तनाव के बाद दोनों देशों के पास आगे बढऩे की अपार संभावनाएं हैं। भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाली क्लिंटन सरकार की नीतियों के उलट बुश सरकार ने भारत-अमेरिका संबंधों को नई पहचान देने की कोशिश की थी। पाकिस्तान के प्रति अमेरिका की उदार नीति और अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर दिए जाने वाले मिलियनों डॉलर भारत के लिए एक बड़ी परेशानी का कारण रहा है। बावजूद इसके, दक्षिण एशिया में अमेरिका अपने हितों को साधने के लिए भारत को साझेदार के रूप में देखता है। टाईम पत्रिका के एडीटर इन लार्ज फरीद जकारिया को दिए गए साक्षात्कार में मोदी ने कहा था – ”विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र और विश्व के सबसे बड़े जूद मोदी ने अमेरिका के प्रति कोई दुराग्रह नहीं दिखाया, बल्कि स्वच्छ भारत के अपने अभियान में ओबामा से भागीदारी निभाने का वादा ले लिया। कुछ कदम आगे बढ़ाते हुए अमेरिका भारत के तीन शहरों – इलाहाबाद, अजमेर और विशाखापत्तनम को स्मार्ट सिटी बनाने में भारत की मदद करेगा।

रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा 27 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत करने वाली सरकार के मुखिया मोदी ने वॉल स्ट्रीट जॉर्नल में ‘ऐन इनविटेशन टू मेक इन इंडिया’ शीर्षक से एक लेख लिखकर निवेशकों को अपनी नीतियों के बारे में स्पष्ट कर दिया। इस लेख के जरिए उन्होंने आह्वान किया कि निवेशकों को सुगम और स्पष्ट रास्ता देने के लिए सरकार कितनी प्रतिबद्ध है। अमेरिका प्रवास के दौरान मोदी ने न सिर्फ आप्रवासी भारतीयों को भारत में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया, बल्कि अमेरिका के फॉर्चून 500 कंपनियों के सीईओ के साथ मुलाकात कर भारत में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। इसमें बोइंग, जेनरल इलेक्ट्रिक, गूगल, आईबीएम सहित कई ख्यातिलब्ध कंपनियों के सीईओ शामिल थे। इसके अलावा 50 से अधिक अमेरिकी लॉ-मेकर और तीन राज्यों के गवर्नरों से मुलाकात की।

मोदी की इस यात्रा को सफल बनाने में अमेरिका स्थिति भारतीय दूतावास जी-जान से जुटा रहा। 1990 के शुरुआत में भारतीय दूतावास ने कई नामी कंपनियों को ‘इंडिया इंटरेस्ट ग्रुप’ बनाने के लिए प्रोत्साहित किया था। इस समूह ने मोदी की नीतियों को लेकर अमेरिका में एक बहस छेड़ा और भारत को विश्व का सबसे तेजी से उभरता हुआ बाजार कहकर उसके साथ संबंधों को नई उंचाईयां देने के लिए माहौल तैयार किया। इसमें एशिया में चीन की बढ़ती ताकत को काउंटर कर अमेरिकी हितों को साधने के लिए भारत को आर्थिक और सामरिक रुप से मजबूत बनाने की भी वकालत थी। जापान के साथ भारत के प्रगाढ़ हुए रिश्ते इसी नजरिए से देखे जा रहे हैं। जापानी सरकार के प्रमुख शिंजे आबे ने मोदी की जापान यात्रा के दौरान ही भारत में निवेश की घोषणा कर दी थी। शिंदे ने पांच वर्षों में भारत में 35 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश करने की बात कही है।

कुछ महत्वपूर्ण बिंदू

• लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हक्कानी नेटवर्क, अलकायदा और डी-कंपनी जैसे आतंकवादी गतिविधियों वाले संगठनों के सुरक्षित स्वर्ग को नष्ट करने पर संयुक्त और मजबूत प्रयास पर सहमति। दोनों देशों ने इन संगठनों की वित्तीय नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए कदम उठाने की बात कही।
• पश्चिम एशिया में आतंकवाद के खिलाफ भारत किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगा।
• अफगानिस्तान के विकास के लिए त्रिपक्षीय साझेदारी पर सहमति।
• रक्षा सौदों को अगले 10 सालों के लिए नवीनीकृत। भारतीय और अमेरिकी कंपनियां भारत में मिलकर रक्षा उत्पादन करेंगी।
• द्विपक्षीय व्यापार को पांच गुणा करने पर सहमति।
• इंडो-यूएस इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव और इंफ्रास्ट्रक्चर कोलेबरेशन प्लेटफॉर्म की स्थापना पर जोर।
• संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन।
• अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में वॉइस एंड वोट के लिए भारत का समर्थन।
• भारत के तीन शहरों- इलाहाबाद, अजमेर और विशाखापत्तनम को स्मार्ट सिटी बनाने में अमेरिकी मदद।
• मंगल अभियान में दोनों देश एक-दूसरे की मदद करेंगे।
• वॉटर और सैनिटेशन एलायंस बनाने पर दोनों देश सहमत।

25-10-2014
हालांकि अमेरिका-भारत के व्यवसायिक रिश्तों की सूची लंबी है, लेकिन आपसी हितों की टकराहट अक्सर दोनों के संबंधों पर बर्फ की चादर फैला देती है। अमेरिकी कंपनी बोइंग भारत को सी-17 मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्रॉफ्ट और ड्रीमलाईनर जहाज निर्यात करती है। जेनरल इलेक्ट्रिक आंध्र प्रदेश में बिजली पैदा करने के लिए बड़े टरबाईन निर्यात करती है। फोर्ड कंपनी गुजरात के अपने प्लांट को चलाने और उसे एक्पोर्ट हब के रुप में विकसित करने के लिए हर साल 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करती है। बिलिनेयर हयात का भारत में होटलों की एक लंबी श्रृंखला है।

अमेरिका में लगभग 30 लाख भारतीय रहते हैं। पीयू रिसर्च सेंटर के अनुसार, इस समूह के 90 प्रतिशत से ज्यादा व्यस्कों का यहां जन्म नहीं हुआ है। उनमें ज्यादातर उच्च शिक्षित हैं और आम अमेरिकी से कई गुणा ज्यादा कमाते हैं। इन अप्रवासियों का भारत के साथ गहरा लगाव और नजदीकी जुड़ाव दोनों देशों के रिश्तों को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाता है।

विश्व में रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा खरीददार भारत है। भारत अपने 75 प्रतिशत से ज्यादा हथियारों को कभी रुस से खरीदता है। उसके बाद इजरायल, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड का नाम आता है। लेकिन मोदी की यात्रा के बाद अमेरिका ने भारत में रक्षा उपकरणों के उत्पादन में निवेश की इच्छा जताई है। भारत जैसे विकास के लिए ललायित देश के लिए यह संतोष की बात है। सन 2000 और 2011 के बीच 7.4 प्रतिशत की वार्षिक दर से विकास करने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था 2012 के बाद से 4.5 प्रतिशत पर आकर अटक गई। लेकिन केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद से ही अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास शुरू कर दिए गए। सरकार की इच्छाशक्ति देखकर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ‘चलें साथ-साथ…’ का विजन पेश किया।

मोदी ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान ट्रेड फैसिलिटेशन एग्रीमेंट और विश्व व्यापार संगठन की खामियों को दूर करने पर रजामंद हुए हैं। सिविल न्यूक्लियर एग्रीमेंट पर दोनों देशों ने आगे बढऩे पर सहमति जताई है। यह भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। साथ ही अमेरिका ने भारत को न्यूक्लियर सप्लार्स ग्रुप में शामिल करने का वादा किया। ओबामा ने कहा कि ‘मिसाईल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रीजाईम के मानकों पर भारत खरा उतरता है। इस 48 सदस्यीय न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की सदस्यता के लिए भारत योग्य है।’ मोदी ने कहा कि यह समझौता भारत के ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए जरुरी है।

मोदी सिर्फ फैशन आईकॉन ही नहीं, बल्कि मार्केटिंग गुरु भी हैं। उन्होंने अमेरिका में भारत की अपार संभावनाओं को न सिर्फ बेचा, बल्कि भारत के हर पहलू को जानने के लिए लोगों में उत्सुकता भी पैदा की। मोदी की अमेरिका यात्रा न सिर्फ वास्तविकता पर आधारित थी, बल्कि उसमें आपसी साझेदारी और महत्वाकांक्षी राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक सहयोग पर भी जोर था। उन्होंने वहां न सिर्फ आर्थिक बल्कि सांस्कृतिक चेतना भी बेची। विश्व में शांति लाने के लिए योग करने और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने के साथ-साथ नवरात्री के महत्व को सार्वजनिक मंच से उन्होंने बताया। परिणाम यह हुआ कि मोदी की ऊर्जा से प्रभावित ओबामा अपने पॉकेट में हनुमान चलीसा रखने के साथ-साथ योग पर ध्यान देने लगे हैं। मोदी अगर आर्थिक प्रयासों को इसी तरह प्राथमिकता देते रहे तो वे भारत के पुतिन साबित हो सकते हैं।

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