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मोदी वृद्धिशील विकास पर विकास नहीं कर सकते

मोदी वृद्धिशील विकास पर विकास नहीं कर सकते

By रवि शंकर कपूर

मोदी शासन नेहरूवादी युग की कथा, सर्वोत्कृष्ट प्रतीकों से परिपूर्ण, मार्मिक बयानबाजी और राजसी चाल के बाद की स्थिति पर ध्यान दे रहा है। सरकार समथर्कों को विश्वास है कि एक असली क्रांति नजदीक ही है जो अतीत के अवशेषों को जल्दी ही दूर करेगा। हालांकि वास्विकता अलग नहीं दिख रही है, खासकर अतिसूक्ष्म निगाहों से देखने पर। उन बुद्धिजीवियों के नजरिए से भी नहीं जिन्होंने 7 रेस पहुंचने में मोदी का समर्थन किया।

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री वृद्धिशील परिवत्र्तन में विश्वास करते हैं, जबकि मौलिकता इसकी परिणाम हो सकती है। वे बड़े आर्थिकों सुधारों के बजाय सरकारी मशीनरी और फाईलों की मंजूरी में तीव्रता चाहते हैं, खासकर आधारभूत संरचनाओं, ऑयल और तेल वाली परियोजनाओं में। इसी प्रकार शासन-प्रशासन, न्यायिक और पुलिस सुधार में कुछ खास नहीं हुआ, जिससे आम आदमी का प्रतिदिन सामना होता है। यद्यपि मोदी ने इसके लिए प्रयास भी किया। उन्होंने सांसदों और विधायकों से संबंधित मामलों की तीव्र सुनवाई के लिए उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया, लेकिन इस आग्रह को न्यायालय ने ठुकरा दिया। इसके अलावा कुछ खास नहीं हुआ।

नजदीक की नजर
आर्थिक परिदृश्य में कोई प्रत्यक्ष बदलाव नहीं हुआ है। इस तरह का विचार नजदीकी मामलों पर क्रियान्वयन करना है, जो भावुक विदेशी निवेशकों और सुधारवादियों के लिए कुछ विशेष करने के बजाय अपेक्षाकृत कम विवादास्पद है। इसलिए इस सरकार ने बिना कैबिनेट की मंजूरी के मंत्रालयों को 1,000 करोड़ की परियोजनाओं को मंजूर करने की स्वीकृति दी। यह निर्धारित उच्चतम सीमा का पांच गुणा है। इस कदम की परख कुछ समय बाद ही हो सकती है। यद्यपि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी बहुत खुश नहीं हैं।

सड़क परिवहन और हाईवे मंत्री नितिन गडकरी ने 12 सितंबर को 1.5 लाख करोड़ रूपए की हाईवे प्रोजेक्ट की नियामक संबंधी रूकावटों को दूर किया और कुल 2 लाख करोड़ रूपए की महत्वपूर्ण परियोजनाओं को लॉन्च किया। इंडियन ऑटोमोबाईल्स मैन्यूफैक्चरर्स सोसायटी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा – ”हमने सारी बाधाओं को दूर कर दिया है। एक्सप्रेस हाईवे को बनाना आसान है, लेकिन पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी लेना मुश्किल है।’’

गडकरी का आशावाद उनकी दक्षता के विश्वास पर आधारित था, जिसे वे अपनी सरकार की शक्ति मानते हैं। उन्होंने कहा – ”नवाचारों के अलावा हम सरकारी तंत्र से लालफीताशाही और भ्रष्टाचार को हटाते हुए निर्णय प्रक्रिया में तेजी ला रहे हैं।’’ दक्षता में विश्वास निराधार नहीं है, खासकर जब मोदी को एक बेहतर प्रशासक के रूप में जाना जाता है।

लेकिन बाजार और अंतर्राष्ट्रीय व्यवसाय उदारवादी मोदी की तरफ सिर्फ प्रभावी प्रशासन के कारण नहीं आए हैं। न ही उन्होंने कायर कार्रवाई, जिसे शिष्ट भाषा में बदलाव के लिए समायोजन कहते हैं, और परिवत्र्तन के साथ निरंतरता (अत्यल्प) का समर्थन किया है। वे मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी के दूसरे अवतार में नहीं देखना चाहते, जो नेहरूवादी नीतियों के साथ चलते रहे। वे देश को नेहरूवाद के भूत से बाहर निकलते देखना चाहते हैं। ऐसा करने में मोदी अब तक असफल रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी असफलता संयुक्त राष्ट्र में हमास के खड़ा होना, विश्व व्यापार संगठन में व्यापार विरोधी रूख और शर्मनाक बजट है।

समर्थकों में निराशा
तत्कालीन मोदी समर्थकों में निराशा विस्फोटक रूप ले रही है। गडकरी के खुद की पीठ थपथपाने वाले बयान के कुछ दिन बाद ही वोडाफोन इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्टिन पीटर्स ने भारतीय दूरसंचार उद्योग को बकवास कह दिया। दिल्ली में द इकोनॉमिस्ट द्वारा आयोजित एक कांफ्रेंस में उन्होंने चीन और भारत की तुलना करते हुए कहा – ”पिछले साल चीन ने नेटवर्क के लिए 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश किए, जबकि हमने सिर्फ 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर।’’

उन्होंने देश में उनकी कंपनी द्वारा झेले जा रहे जांच और कष्टों को भी विस्तार से बताया। एक महीने पहले उन्होंने अग्रिम कर की व्यवस्था की मांग की थी, जो अभी तक नहीं मिली। उन्होंने कहा – ”कुछ दिन पहले ही मुझे पता चला कि इस फाईल को जो अधिकारी देख रहे थे, वे सेवानिवृत्त हो गए।’’

लंदन की फाईनांसियल टाईम्स ने खबर दी कि ”भारत और विदेश के व्यवसायियों ने मई के चुनाव में मोदी का साथ इसलिए दिया, क्योंकि दशकों पुरानी भ्रष्टाचार और अनिर्णय की क्षमता से मुक्ति देने की बात उन्होंने कही थी। कुछ लोगों को अभी भी लगता है कि वे अपनी बहुमत को जाया कर रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर लगे बिलियनों डॉलर टैक्स से संबंधित कानून और आदेश को सरकार द्वारा अभी तक समाहित नहीं करने के कारण उनके समर्थक अभी भी चकित हैं।’’ विदेशी निवेशकों की तरह आम आदमी भी अधीर हो रहा है। इसकी झलक विधानसभा उपचुनावों में मिल गई।

हालांकि यह कहना अनुचित होगा कि नेहरूवादी विरासत से अलग होने के लिए मोदी ने कुछ नहीं किया। उन्होंने श्रम कानूनों के तीन भागों में ऐसे संशोधन किए जो नेहरूवादी समाजवाद के सबसे बुरे लक्षण थे। ये हैं – फैक्टरी ऐक्ट (1948), अपरेंटिसशिप ऐक्ट (1961) और श्रम कानून। यह उल्लेखनीय है कि 1991 में उदारीकरण के बाद से श्रम कानूनों में किसी तरह का बदलाव नहीं किया गया। उदारीकरण और औद्योगिक संबंधों से संबंधित कानूनों के बीच एक बड़ी विभाजन रेखा है। प्रस्तावित लचीलापन देश में निवेश के माहौल को निश्चित रूप से सुधार करेगा।

फैक्टरी ऐक्ट 1948 में संशोधन का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को रात में कार्य करने लायक माहौल देना, उन्हें पर्याप्त सुरक्षा और परिवहन की सुविधा देने से संबंधित है। कपड़ा और वस्त्र उद्योग क्षेत्र के कुछ बड़े उद्योग इस बदलाव से निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। संशोधन में ओवरटाईम के नियमों को भी बदला गया है। अन्य प्रावधानों में सुरक्षा नियम, कैंटीन और आरामगृह की सुविधा आदि भी शामिल हैं।

हरित आतंक की समाप्ति
यूपीए सरकार के दौरान व्यवसायियों के लिए सिरदर्द बना पर्यावरण स्वीकृति के मामले में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। इसकी पहली बैठक में प्रधानमंत्री द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर पर गठित मंत्रिमंडलीय कमिटी ने सड़क और रेलवे परियोजनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिए। पर्यावरण एवं वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और रेलमंत्री सदानंद गौड़ा से कहा कि 40 हेक्टेयर तक के वन क्षेत्र से संबंधित परियोजना को स्वीकृति देने के लिए उनका मंत्रालय राज्य सरकार और पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालयों को जल्दी अधिकार देगा। इससे मध्यम स्तर की परियोजनाओं की 70-80 प्रतिशत फाईल दिल्ली तक नहीं पहुंचेगी।

विकेन्द्रीकरण के अन्य मानकों में पर्यावरण और वन मंत्रालय 20 हेक्टेयर तक में बालू खनन से संबंधित अधिकार को राज्य सरकार को सौंपेगा, जो वत्र्तमान में 5 हेक्टेयर है। वत्र्तमान में 5 हेक्टेयर से अधिक वाली परियोजनाओं को केन्द्र को भेज दिया जाता है। रेल मंत्रालय भी इस बात पर सहमति जताई है कि प्रत्येक रेल ओवरब्रिज और अंडर ब्रिज से शुल्क नहीं वसूल करेगा।

इस तरह के कदम प्रधानमंत्री द्वारा उठाए गए कदम का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उन्होंने प्रत्येक प्रमुख आधारभूत संरचनाओं से संबंधित मंत्रालय को मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए पत्र लिखा था। ‘स्वीकृति प्रक्रिया और तंत्र को सुसंगत और पारदर्शी बनाना जरूरी है। इससे पर्यावरण संबंधी, तटीय, वन्यजीव और वनों से संबंधित स्वीकृति प्रक्रिया में बाधा झेल रही कंपनियों की परियोजनाओं की समीक्षा करने में मंत्रालय (मंत्रालयों) को आसानी होगी।’

सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के अलावा मोदी ने पर्यावरण को पर्यावरणविदों से मुक्त कराने का टास्क दिया है। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के पुनर्गठन के बाद पास पहले के मुकाबले अब सीमित कार्यकत्र्ता बच गए हैं। वामपंथ से नजदीकी रखने वाले ये कार्यकत्र्ता औद्योगिकीकरण का विरोध करते हैं। सोनिया गांधी के संरक्षण में उन्होंने विकास को तबाही का कारण बताकर कई परियोजनाओं को बर्बाद कर दिया और कईयों को लंबित रखा। उन्होंने मंजूरी को रोकने के लिए राजनेताओं को बहाने भी उपलब्ध कराए। वे उद्योगपतियों को बताते रहे कि देखो, तुम्हारी फाईल को स्वीकृत करना कितना मुश्किल है। इस तरह की कठिनाई कैसे दूर कि जा सकती है, ये तो पता ही है…

स्पष्ट है कि मोदी शासन में सुधार करने, आर्थिक सुधारों में तेजी लाने, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और बड़े देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने में व्यस्त हैं। लेकिन इनके परिणाम धरातल पर दिखने अभी बाकी हैं। मोदी के समर्थकों का तर्क है कि नेहरूवादी संस्कृति की सफाई करने में अभी वक्त लगेगा। यह सही भी है। यह हरक्यूलस की कल्पित कथा है कि उसने एक ही दिन में अस्तबल की सफाई कर दी थी। मोदी मनुष्य हैं, कोई कल्पित हीरो नहीं, लेकिन उन्हें शुरूआत करने की जरूरत है और लोगों को जानना चाहिए कि उन्होंने ऐसा किया है। लेकिन दुखद बात यह है कि ऐसा नहीं हुआ।

लडऩे के लिए बाध्य
मोदी परिवत्र्तन की गति को नियंत्रित करना चाहते हैं, लेकिन समस्या यह है कि उस आदमी के प्रति असीम स्नेह के बावजूद बड़े पैमाने पर आम जनता और व्यवसायी धीमी गति के कारण अधीर हो रहे हैं।

2002 की गुजरात दंगे के बाद कई लड़ाईयों का सामना करने के बाद शायद वे कुछ थका-थका महसूस कर रहे हैं और कुछ आराम चाह रहे हैं। लेकिन थोड़ी देर के उस आराम पर भी उनकी ख्याति भारी पड़ जाती है। उन्हें आर्थिक मोर्चे, सुशासन, रक्षा और विदेश नीति से संबंधित अभी कई लड़ाईयां लडऩी हैं। लेकिन उनके लिए दुर्भाग्य की बात है कि जो उनकी प्राथमिकता है यह वह लक्जरी नहीं है जिसे वह वहन कर सकें। भले ही वे हर समय हर लड़ाई नहीं लड़ सकते। लेकिन यह उनकी नियति है कि जो वादे उन्होंने किए हैं, जो सपने दिखाए हैं, उसे पूरा करने के लिए यह लड़ाई उन्हें लडऩी है। यह उनकी प्राथमिकता है कि किसे प्राथमिकता देते हैं। नेहरूवादी आम सहमति, खासकर यूपीए सरकार की पुनर्रूद्धारित हुई, ने व्यसायिक माहौल को बेहद गंदा किया। मोदी के लिए वृद्धिशील बदलाव से आगे बढ़कर अब इतिहास की गलतियों से दामन छुड़ाने का वक्त है।

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