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आरोग्य का खजाना नीम

आरोग्य का खजाना नीम

नीम एक बहुत उपयोगी वृक्ष है। इसकी जड़ से लेकर फूल-पत्ती और फल तक सभी अवयव औषधीय गुणों से भरे-पूरे हैं। भारतवर्ष के गरीब लोगों के लिए यह कल्पवृक्ष है। आइये, हम इसके गुणों को देखकर उनसे लाभ उठायें।

जड़ : नीम की जड़ को पानी में उबालकर पीने से बुखार दूर होता है।

छाल : नीम की बाहरी छाल पानी में घिसकर फोड़े-फुंसियों पर लगाने से बहुत जल्दी ठीक होते हैं। बाहरी छाल को जलाकर उसकी राख में तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर लगाने से दाद तथा अन्य चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। छाल का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन उससे स्नान करने से सूखी खुजली में लाभ होता है।

छाया में सूखी छाल की राख बनाकर, कपड़े से छानकर उसमें दो गुना पीसा हुआ सेंधा नमक मिला लें। रोज इस चूर्ण से मंजन करने से पायरिया में लाभ होता है, मुंह की बदबू, मसूढ़ों तथा दांतों का दर्द दूर होता है। छाल का काढ़ा दोनों समय पीने से पुराना ज्वर भी ठीक हो जाता है।

दातौन : प्रतिदिन नीम की दातुन करने से मुंह की बदबू दूर होती है। दांत और मसूढ़े मजबूत होते हैं। पायरिया, मसूढ़ों से खून आना तथा मसूढ़ों की सूजन के उपचार के लिए इसकी दातुन बहुत उपयोगी है।

पत्तियां : चैत्र मास में नीम की कोमल नयी कोंपलों को दस-पन्द्रह दिन तक नित्य प्रात:काल चबाकर खाने से रक्त शुद्ध होता है, फोड़ा-फुंसी नहीं निकलते और मलेरिया ज्वर नहीं आता है। दिन में सूर्य-किरणों की उपस्थिति में नीम की पत्तियां ऑक्सीजन छोड़कर हवा शुद्ध करती हैं। इसलिए गर्मियों में नीम के पेड़ की छाया में सोने से शीतलता मिलती है तथा शरीर निरोग रहता है।

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नीम की पत्तियों के चूर्ण में एक ग्राम अजवायन तथा गुड़ मिलाकर कुछ दिन तक निरंतर पीने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। गाय, भैंस के बच्चों के पेट में कीड़े होने पर नीम की पत्तियों को पीसकर छाछ तथा नमक में मिलाकर चार-पांच दिन देने से कीड़े मरकर बाहर निकल जाते हैं और पेट साफ हो जाता है।

पत्तियां पानी में उबाल कर घाव धोने से घाव ठीक हो जाता है। उसके जीवाणु मरते हैं, दुर्गन्ध कम हो जाती है तथा सूजन नहीं रहती। पत्तियों के उबले पानी से स्नान करने से त्वचा की बीमारियां दूर होती हैं। नीम की पत्तियों को पीसकर फोड़े-फुंसी पर लगाने से आराम मिलता है।

नीम की पत्तियों का रस दो चम्मच, दो चम्मच शहद में मिलाकर (प्रात:काल) लेने से पीलिया-रोग में लाभ होता है। एक छोटा चम्मच नीम की पत्तियों का रस लेकर उसमें मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है। चेचक और खसरा के रोगियों को शीघ्र स्वस्थ करने के लिए नीम के पत्तों से हवा की जाती है।

पत्तियों के अन्य उपयोग : नीम की पत्तियों को संचित अनाज में मिलाकर रखने से उसमें घुन, ईली तथा खपरा आदि कीड़े नहीं लगते। गर्म और सिल्क के कपड़ों, गर्म रेशमी कालीन, कंबल, पुस्तक आदि को कसारी (कीड़ा) से बचाने के लिए इनमें नीम की पत्तियां रखनी चाहिए। नीम की सूखी पत्तियों के धुएं से मच्छर भाग जाते हैं।

नीम की पत्ती खाद पेड़-पौधों को पोषक-तत्व प्रदान करती है तथा जमीन में उपस्थित दीमक को भी समाप्त करती है। फसल को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य कीटों को भी यह मारती है।

फूल : नीम के फूल तथा निबोरियां खाने से पेट के रोग नहीं होते। फूलों को जलाकर काजल के रूप में उपयोग में लाया जाता है।

निबोरियां : निबोरी नीम का फल होता है। इससे तेल निकाला जाता है। यह भी कई प्रकार के रोगाणुओं को मार डालने में सक्षम है। आग से जले घाव पर इसका तेल लगाने से घाव बहुत शीघ्र भर जाता है। इस तेल से नीम का साबुन बनाया जाता है। यह साबुन चर्मरोग, घाव तथा फोड़े-फुंसियों के लिए बहुत लाभकारी है। तेल निकालने के बाद बची हुई खली का पौधों को बढिय़ा खुराक प्रदान करता है। दीमक और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले अन्य कीटों को भी यह मार डालता है। यह फफूंद को भी नष्ट करता है।

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नीम का मद या रस : कभी-कभी किसी पुराने नीम के वृक्ष के तने से नीम की गंध लिए एक तरल पदार्थ निकलता है, जिसे मद कहते हैं। रूई की बत्ती बनाकर उसे मद में भिंगोकर छाया में कई दिनों तक सुखाया जाता है। सूखने के बाद एक दीपक में रखकर दीपक जलाया जाता है। इसके ऊपर दूसरी मिट्टी की सिराही थोड़ी टेढ़ी-उलटी रखकर बत्ती की लौ से निकलने वाले कार्बन (धुएं) को इस सिराही में जमने दिया जाता है। बाद में इसे उलटी रखी सिराही से खुरचकर किसी डिब्बी में रख लिया जाता है। यह काजल नेत्रों में लगाने से नेत्रों की ज्योति सही रहती है। यह बहुत उपयोगी काजल है।

तना : नीम की लकड़ी में दीमक तथा घुन नहीं लगता, इसलिए इसके किवाड़ आदि लगवाने से दरवाजे, खिड़कियों में दीमक लगने का खतरा नहीं रहता।

सींक : नाक, कान छिदवाने के तीन-चार सप्ताह बाद आभूषण पहनने से पहले नीम की सींक पहनने से जख्म जल्दी ठीक होता है और जीवाणु नहीं पड़ते।

साभार: आरोग्य कल्याण अंक

 

डॉ. श्री बनवारी लालजी यादव

 

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