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नागरिकता संशोधन कानून पर विवाद क्यों?

नागरिकता संशोधन कानून पर विवाद क्यों?

नागरिकता संशोधन विधेयक को लोकसभा से दस दिसंबर को मंजूरी मिलते ही इसका खासतौर पर मुस्लिम समाज ने विरोध शुरू कर दिया। इसके बाद विपक्ष को लगा कि वह साल 2015 की तरह राज्यसभा में एक बार फिर इस विधेयक पर सरकार को हरा देगा। इसके लिए विपक्षी खेमे ने रणनीति भी बनाई। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ सरकार चला रही कांग्रेस के फ्लोर मैनेजरों ने कोशिश की और उग्र राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की पैरोकार रही शिवसेना ने लोकसभा के ठीक उलट इस बिल का राज्यसभा में विरोध किया और वोटिंग से बाहर हो गई। इसके बावजूद पूरे देश के अल्पसंख्यक समुदायों के बीच इस बिल को लेकर विरोध तेज हो गया। इस विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के अधिकार के उल्लंघन का हवाला देकर सर्वोच्च न्यायालय में कांग्रेस समेत कई पूर्व अधिकारियों,आदि ने चुनौती दी है। इस पर जो फैसला आएगा, वह भविष्य की बात है।

बहरहाल इस विधेयक पर उठे विरोध के बवंडर पर विचार से पहले जान लेते हैं कि यह विधेयक क्या है? चूंकि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस विधेयक को 13 दिसंबर को मंजूरी दे दी है, इसलिए अब इसे हम कानून ही कहेंगे। नया कानून, दरअसल नागरिकता अधिनियम 1955 के प्रावधानों में बदलाव के बाद आया है। 64 साल पुराने नागरिकता कानून में कुछ प्रावधानों को बदला गया है, इसकी वजह से नागरिकता देने के लिए तय नियमों में बदलाव हो गया है। इस विधेयक में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदुओं के साथ ही सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों के लिए बगैर वैध दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता हासिल करने का रास्ता साफ हो जाएगा। इस कानून  के बनने से पहले तक भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए देश में 11 साल निवास करने वाले लोग योग्य माने जाते थे। लेकिन नए कानून से साल 2014 तक भारत आए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के उन अल्पसंख्यक नागरिकों को भारतीय नागरिकता मिलने की राह खुल जाएगी, जिन्हें धार्मिक प्रताडऩा के चलते अपनी माटी छोडऩी पड़ी है। नागरिकता संशोधन बिल में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के शरणार्थियों के लिए निवास अवधि की बाध्यता को 11 साल से घटाकर 6 साल करने का प्रावधान है।

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वैसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इस विधेयक में भारत में रह रहे मुसलमानों को नागरिकता से अलग करने का कोई प्रावधान नहीं है, फिर भी भारत का मुस्लिम समुदाय क्यों इतना आक्रामक हो गया है? इस विधेयक के कानून बनने के दिन संयोग से शुक्रवार यानी जुम्मे की नमाज का दिन था। सरकार को इस बात की जांच करानी चाहिए कि क्या नमाज के वक्त जुटे मुस्लिम समुदाय ने इस विधेयक के विरोध की कोई ठोस रणनीति बनाई? क्योंकि इसी दिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में इतना विरोध हुआ कि पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। वैसे इसमें कोई शक नहीं कि जिन दलों ने अब तक हिंदुत्व की धारा को जातीय गणित में खंडित करके और अल्पसंख्यक वोट बैंक के भयदोहन के जरिए राजनीति की है, उन लोगों को अपनी राजनीति खंडित होती नजर आ रही है। इस सोच को अभिव्यक्ति इस संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान कांग्रेस के खेमे से होती रही। राज्यसभा में कांग्रेस के कपिल सिब्बल और दिग्गविजय सिंह ने गृहमंत्री से मुखातिब होकर स्पष्ट कहा कि इस विधेयक से देश का मुसलमान डरा हुआ है। इस कथित डर को वामपंथी बौद्धिकों और मीडिया से भरपूर अभिव्यक्ति मिली। इसका असर असम में आग के रूप में तो दिखा ही, पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंसा के तौर पर दिखा।

इस विधेयक के पास होने के बाद इन दिनों गांधी जी की बड़ी दुहाई दी जा रही है। लेकिन गांधी जी को सही संदर्भों में उल्लिखित नहीं किया जा रहा है। विधेयक विरोधियों को 26 सितंबर 1947 को दिया गांधी जी का बयान भी देख लेना चाहिए। उसमें उन्होंने कहा है, ‘पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू और सिख हर तरह से भारत आ सकते हैं। अगर वे वहां नहीं रहना चाहते हैं, उस स्थिति में उन्हें नौकरी देना और उनके जीवन को आरामदायक बनाना भारत सरकार का पहला कर्तव्य है।’ दिलचस्प यह है कि 1966 में डॉक्टर लोहिया ने पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों पर हो रहे अत्याचार पर चिंता जताई थी। और तो और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने पाकिस्तान में जबरिया धर्म परिवर्तन कराए जाने के संदर्भ में कहा था, ‘पाकिस्तान के दलित दबाव में धर्म परिवर्तन ना करें। भारत आ जाएं। यदि दलित भाइयों को वहां जबरन मुस्लिम बनाया गया है, तो हम उनका शुद्धिकरण कराएंगे।’ कानून विरोधियों से यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर क्यों गांधीजी और बाबा साहब अंबेडकर ने ये बातें कहीं।

वैसे नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जिस तरह असम समेत पूर्वोत्तर भारत में हिंसा हो रही है, उससे लगता है कि कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को मोदी विरोध का नया मौका दे दिया है। कांग्रेस शासित पंजाब और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई वाले वाम मोर्चे के शासन वाले केरल सरकार ने अपने यहां इसे लागू करने से इनकार कर दिया है। 2011 के विधानसभा चुनावों में घुसपैठियों को अलग करने का अपने चुनाव घोषणा पत्र में वादा करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे लागू करने से पहले इनकार कर चुकी हैं। इस बीच महाराष्ट्र की सरकार में कांग्रेस कोटे के मंत्री बाला साहेब थोराट भी कुछ ऐसा बयान दे चुके हैं। महाराष्ट्र सरकार की अगुआई कर रही शिवसेना की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आता तो थोराट के बयान को ही शिवसेना का भी रूख माना जा सकता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस मसले पर अगुआई करने के बाद कांग्रेस शासित दूसरे मुख्यमंत्री भी विरोध के इस दौड़ में शामिल हो गए हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी ऐसा ही संकेत दे रहे हैं। इन मुख्यमंत्रियों के विरोध के बाद एक सवाल जरूर उठता है कि क्या राज्यों को यह अधिकार है कि वे संघ सूची के मामलों को संसद द्वारा मंजूरी मिलने के बाद भी अपने यहां लागू करने से रोक सकते हैं? चूंकि नागरिकता भी संघ सूची का विषय है, लिहाजा क्या इस मसले पर संसद द्वारा बनाए कानून को राज्य लागू करने से मना कर सकते हैं और यदि वे मना करते हैं तो क्या यह संवैधानिक व्यवस्था के नाकाम होने का मामला नहीं बनता?

इस संदर्भ में चर्चा से पहले यह जानते हैं कि आखिर पूर्वोत्तर में नागरिकता संशोधन कानून का क्यों विरोध हो रहा है? दिलचस्प है कि इस विरोध में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी ना के बराबर है। विरोधी दलों के सांसदों और विधायकों को छोड़ दें तो विरोध के सुर कम-से-कम जन प्रतिनिधियों के स्तर से कम उठ रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसे समझने के लिए चार साल पहले लौटना होगा। 2015 में जब केंद्र सरकार ने इस विधेयक को संसद में पेश किया था, तब भी पूर्वोत्तर के राज्यों में खासकर नगालैंड और मणिपुर में विरोध हुआ था। लेकिन तब सरकार ने एक एहतियात बरता था। उसने पूर्वोत्तर के मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों से चर्चा करके उन्हें समझाने में कामयाब रही थी। तब सरकार ने उन्हें समझाया था कि यह विधेयक इन राज्यों की खास व्यवस्था पर असर नहीं डालेगा। वैसे भी पूर्वोत्तर के तकरीबन सभी राज्यों में संविधान की छठवीं अनुसूची की व्यस्था लागू है। जिसके तहत बाहरी लोग यहां संपत्ति नहीं खरीद सकते। जिस असम में इस विधेयक का सबसे ज्यादा विरोध दिख रहा है, वहां भी तीन जिला परिषदों में संविधान की छठवीं अनुसूची की व्यवस्था लागू है। जिन्हें स्वायत्त जिला परिषद कहा जाता है। इसी तरह त्रिपुरा के दो तिहाई हिस्से में छठी अनुसूची की व्यवस्था लागू है।

ऐसे में सवाल यह है कि आखिर पूर्वोत्तर में क्यों विरोध हो रहा है? इसकी वजह यह है कि असम के लोगों को लगता है कि इस कानून के बाद उनके इलाके में बाहरी लोगों की जनसंख्या बढ़ जाएगी। इससे उनकी नौकरियों और स्थानीय पहचान पर असर पड़ेगा। घुसपैठियों को बाहर करने के लिए अस्सी के दशक में असम में जबरदस्त छात्र आंदोलन हुआ था। इसके हिंसक होने के चलते 1984 के आम चुनावों में असम में चुनाव नहीं हुए थे। बहरहाल इसके अगले साल प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने असम के आंदोलनकारी छात्रों के साथ समझौता किया था। जिसके मुताबिक 25 मार्च 1971 के बाद असम में घुसे अप्रवासियों को बाहर करना था। लेकिन उस पर काम नहीं हो पाया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लागू किया गया। जिसके तहत सिर्फ 19 लाख लोग ही ऐसे पाए गए हैं, जो नागरिकता रजिस्टर से बाहर है। इस पर भी अभी विवाद है।

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बहरहाल नए नागरिकता कानून के बाद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की व्यवस्था बेमानी हो गई है। इससे असम समेत पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में विवाद खड़ा हो गया है। यहां के लोगों को लगने लगा है कि नए कानून से वे अपने इलाकों में अल्पसंख्यक हो जाएंगे। वैसे भी सरकारी नौकरियां कम हैं, लेकिन स्थानीय निवासियों को लगता है कि नए कानून के लागू होने के बाद अप्रवासियों को भी मौका मिलेगा और स्थानीय निवासियों के लिए मौके कम होंगे। लेकिन हकीकत यह है कि छठीं अनुसूची वाले इलाकों को नए नागरिकता कानून से दूर रखा गया है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इसे समझने को कोई तैयार नहीं है। दिलचस्प यह है कि असम में ही एक इलाका ऐसा है, जहां नए कानून का स्वागत हो रहा है। बराक घाटी के तीन जिलों कछार, करीमगंज और हलाकांडी में लोग खुश हैं। इसी इलाके में सिलचर शहर आता है। लोकसभा ने जब नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी दी तो यहां के अखबारों ने इसका स्वागत किया।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जब अनुसूचित इलाके में यह कानून लागू ही नहीं होगा तो फिर विरोध के सुर क्यों उठ रहे हैं? जानकार मानते हैं कि एनआरसी के चलते जिन दलों की राजनीति नाकाम होने की आशंका बढ़ गई है, वे ही इस विरोध के पीछे हैं। फिर ब्रह्मपुत्र घाटी के उन जिलों में इसका विरोध ज्यादा हो रहा है, जहां पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेशी नागरिकों की संख्या बढ़ी है और जहां बदरूद्दीन अजमल की यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का प्रभाव है। वैसे भी पिछले आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने असम गण परिषद और बोडोलैंड पार्टी के साथ समझौता किया था। जिसमें भारतीय जनता पार्टी जहां दस सीटों पर लड़ी थी, वहीं चार सीटों पर उसके सहयोगी दल। भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में ना सिर्फ नागरिकता संशोधन विधेयक लाने का वादा किया था, बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बराक घाटी में की गई अपनी सभाओं में इसकी घोषणा की थी। चुनाव नतीजों मे जहां भारतीय जनता पार्टी ने नौ सीटें जीतीं, जबकि उसके सहयोगियों का खाता नहीं खुला। फिर ये नागरिकता विधेयक के विरोधी भी हैं। जाहिर है कि भारतीय जनता पार्टी को असम की उस अधिसंख्य जनसंख्या का समर्थन मिला, जो नागरिकता बिल का हिमायती था। फिर भी हिंसा हो रही है तो इसकी एक बड़ी वजह यह भी मानी जा रही है कि इलाके के लोगों को गलत जानकारी दी गई और हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। ताकि राज्य सरकार के साथ ही केंद्र की सरकार भी अस्थिर हो।

एनआरसी की नाकामी ने असम की बहुसंख्य जनता को आशंकित कर दिया है। इस आशंका के बीज के बीच राजनीति करने वालों की हमेशा से चांदी रही है। अगर पूर्वोत्तर में हिंसा फैल रही है तो इसकी एक वजह यह मानी जा सकती है कि यहां के लोगों को दोबारा भरोसा में नहीं लिया गया। जिन नेताओं, सांसदों, विधायकों, 140 संगठनों से केंद्र सरकार ने 2015 में 129 घंटे बातचीत की थी, बेहतर होता कि उन्हें एक बार फिर भरोसे में लिया जाता। तब शायद वैसे हालात नहीं होते, जैसे आज हैं?

उमेश चतुर्वेदी

 

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