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अर्थव्यवस्था : समुद्र मंथन जारी है

अर्थव्यवस्था : समुद्र मंथन जारी है

अर्थव्यवस्था में जो बदलाव के संकेत हैं, इनको और सरकार की वित्तीय नीतियों को लेकर जमकर चर्चा हो रही है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों को लेकर विरोधियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी की चपेट में घोषित कर दिया है। पर ‘अर्थव्यवस्था में मंदी का शोर’ आधा सच ही है। ये सही है कि विकास दर और कई महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतों में गिरावट आई है। जिस पर चिंता होना स्वाभाविक है। पर इसकी गहराई में जाने की आवश्यकता है। देश की अर्थव्यवस्था और वित्तीय तंत्र एक गहरे बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इस बदलाव को कुछ उदाहरणों से महसूस किया जा सकता है।

मेरा बेटा मुंबई में एक कंपनी में काम करता है। उसकी आमदनी भी ठीक-ठाक है। जॉब में सुरक्षा भी है। लेकिन पिछले 2 बरस से मैं जब भी उससे कहता हूं कि तुम कार खरीद लो तो वह कहता है कि उसे कार की आवश्यकता नहीं है। वह कहता है कि  उसका काम ओला और उबर से चल जाता है। कार खरीदने को वह बेकार का खर्च बताता है। याद कीजिये, जब हमने कमाना शुरू किया था तो पहली इच्छा यह होती थी कि अपना वाहन खरीदे। पहली मोटर साइकिल/स्कूटर या पहली कार – इसका उत्साह, इसका आनंद कुछ और ही था। यह बात सिर्फ मेरे बेटे की नहीं है बहुत सारे अच्छा कमाने वाले लोगों को मैं जानता हूं जो अब अपना वाहन खरीदने में विश्वास नहीं रखते। अगर आप वाहनों की बिक्री के आंकड़े को देखेंगे तो आपको लगेगा कि देश की अर्थव्यवस्था खतरे में हैं। पर ऐप आधारित टैक्सियों का कारोबार तो बढ़ रहा है।

एक और उदाहरण देता हूं। आजकल कई बार आप बाहर खाने के लिए जाते हैं तो कई रेस्टोरेंट्स खाली मिलते है। लेकिन असलियत तो ये है कि बहुत से लोग अब खाने का ऑर्डर करने वाले ऐप्स के माध्यम से खाना आर्डर करते हैं। यह पहले नहीं होता था। आप खाली रेस्टोरेंट को देख कर कह सकते हैं कि अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है लेकिन बाहर से खाना खाने का चलन पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गया है। और रेस्टॉरेंट का धंधा पहले जितना या उससे ज्यादा चल रहा है। मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं इसलिए कह नहीं सकता कि इसका क्या परिणाम अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। लेकिन ये इस बात को तो इंगित करता है कि लोगों के खानपान की आदतें, खरीदारी की आदतें और वित्तीय व्यवहार में खासा परिवर्तन हो रहा है। इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। इसे बारीकी से समझने की जरूरत है।

सरकार ने अर्थव्यवस्था को आने वाले समय के हिसाब से तैयार करने के लिए जो कदम उठाए वे हैं नोटबंदी, जीएसटी, रेरा आदि। ये कदम जरूरी थे, लेकिन उनके क्रियान्वयन में जो सतर्कता बरतनी चाहिए थी वह कई बार दिखाई नहीं दी। सरकार को दुनिया में आ रहे बड़े बदलावों के मद्देनजर लोगों की ट्रेनिंग की व्यवस्था करनी चाहिए थी। यह करने में सरकार पूरी तरह से विफल रही है। हाल के वर्षों में हमने देखा है कि डेटा से संबंधित नौकरियां बहुत बढ़ रही हैं।  ‘ब्लॉकचेन’, ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ और ‘इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ से जुड़ीं नौकरियां बहुत तेजी से बढ़ रही हैं।

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लेकिन क्या हम अभी तक इन बदलावों को समझकर सही प्रशिक्षण अपने बच्चों को दे पाए हैं? सरकार ने ‘स्किल डेवलप्मेंट’ नाम पर एक मंत्रालय तो बना दिया लेकिन मुझे नहीं मालूम कि उस मंत्रालय ने क्या काम किया? हां, इतना तो कहा जा सकता है कि लोगों को प्रशिक्षण देने और नए तरीके के रोजगार के लिए तैयार करने का जो काम था वह नहीं हुआ। एक तरफ यह स्थिति है कि हमें प्रशिक्षित लोग नहीं मिलते। दूसरी तरफ बहुत सारे युवक-युवती हैं ऐसे हैं जिनके पास डिग्री है, डिप्लोमा है लेकिन काम नहीं है। उनको जो पढ़ाया और सिखाया गया उसकी जरूरत ही नहीं है। सरकार की यह एक बड़ी विफलता है। लेकिन यह विफलता सिर्फ केंद्र सरकार की नहीं है। यह विफलता हमारे सारे सिस्टम की है। हमारी राज्य सरकारों की है। शिक्षा चलाने वाले लोगों की है। निजी शिक्षा संस्थानों की है। और इस तरफ सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

एक और दिक्कत लोगों को आ रही है जिसकी तरफ सरकार को तुरंत ध्यान देना चाहिए। पहले जब हमारी अर्थव्यवस्था काफी इनफॉर्मल थी तो एक व्यक्ति को दुकान खरीदने के लिए या नया धंधा चलाने के लिए जो पैसा चाहिए होता था वह गैरपारंपरिक  स्रोतों से मिल जाता था। अब पैसे के लिए बैंक जाना पड़ता है और हमने इन बैंकों को इतना परिवर्तित नहीं किया है वो तुरंत से पैसा दे दें। एक तरफ हम ये कहते हैं कि ये ‘स्टार्ट अप’ का जमाना है। हमारे बच्चों को रोजगार लेने वाला नहीं, रोजगार देने वाला होना चाहिए। लेकिन नया धंधा शुरू करने के लिए जो पूंजी चाहिए वो कहां से आएगी? हुआ ये है कि नोटबंदी और बैंकों द्वारा एनपीए के मामलों में सख्ती के बाद अचानक से बाजार में पूंजी की कमी हो गयी है। आपने एक नल तो बंद कर दिया पर दूसरी व्यवस्था नहीं की। इससे हाहाकार तो मचेगा ही। हमें कम ब्याज पर आसानी से मिलने वाली पूंजी की व्यवस्था करनी पड़ेगी। हमारे बैंक/ वित्तीय संस्थान अभी तक इस में अक्षम रहे हैं। इसका व्यापक असर पड़ा है। खासकर छोटे उद्योग इससे मुश्किल में आ गए हैं। सबसे अधिक रोजगार देने वाले ये धंधे अगर तकलीफ में होंगे तो रोजगार, आमदनी और व्यय तीनों ही कम होंगे। इसका सीधा असर वस्तुओं की मांग पर दिखाई दे रहा है।

बाजार में पैसा इसीलिए भी कम हुआ है क्योंकि काले धन पर नकेल कसी गई है। काले धन की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बाजार से गायब हो गया है। इससे वर्तमान में तो दिक्कतें बढ़ रही हैं लेकिन लंबे समय के लिए सिस्टम सेट हो रहा है। उदाहरण के लिए रियल एस्टेट बाजार को काले धन की कमी का भारी नुकसान झेलना पड़ा है। साथ ही रेरा जैसा कानून आने से बिक्री पर कुछ ब्रेक लगा है। लेकिन क्या ये सच नहीं है कि मकान और जमीन के दाम लंबे समय बाद आम आदमी की पहुंच में आने लगे हैं। क्या ये भी सच नहीं है कि विदेशी पैसा रियल एस्टेट सहित कई क्षेत्रों में आने के लिए तैयार है।

दुनिया बदल रही है। हम लोगों की जिन्दगी में टेक्नोलॉजी के दखल के कारण आमूल-चूल बदलाव हो रहे हैं। इसका सीधा असर हमारे उद्योग, कारोबार, रोजगार, विकास की दर आदि पर आज दिखाई दे रहा है। पर मेरे विचार से ये तात्कालिक है। अर्थव्यवस्था और अर्थतंत्र नयी करवट ले रहा है। देश का एक तबका ऐसा है जिसे इसका भान है। वह दुनिया के कदम-दर-कदम मिलकर बढऩे को आतुर है। हमें इसे समझकर उसकी मदद करने की जरूरत है। ये तबका है – देश का युवा। भारत के युवाओं को अपने आस-पास देखिए। पहले आदमी सबसे पहले घर खरीदता था और फिर उसका दूसरा बड़ा खर्चा होता था – उसकी गाड़ी। आज के युवा को कार नहीं, अच्छा पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम चाहिए।

देश-विदेश में हो रहे सागर-मंथन की प्रक्रिया को ये युवा समझ रहा है। क्या हमारे मंत्री और बाबू देश के इस युवा के दिल की आवाज को सुन पा रहा है? आज हम सबको अगर सागर-मंथन से विष निकलता दिख रहा है तो हमें ये भी समझना होगा कि ये एक बदलाव का काल है। नोटबंदी के तीन साल बाद कुछ सिस्टम सेट हो गए हैं। कुछ हो रहे हैं। मंथन से निकला विष जल्द ही खत्म होगा, तब समय होगा छककर अमृत पीने का।  लेकिन उसके लिए सिस्टम में सही समय पर सही बदलाव करने और देश के युवा को समझकर आगे की योजनाएं बनाकर उनके सही क्रियान्वयन की जरूरत है।

 

उमेश उपाध्याय

 

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