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सभ्यता का अविभाज्य अंग है स्वच्छता

सभ्यता का अविभाज्य अंग है स्वच्छता

By दीपक कुमार रथ

अपने परिवेश को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए भारत के लेागों को प्रेरित करना हमेशा ही कठिन कार्य रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने वह कर दिखाया है जो हमारे राष्ट्रनिर्माता पुरखों को स्वतंत्रता हासिल करने के साथ ही करना चाहिए था। मोदी जब हमारे महापुरुषों से प्रेरणा लेकर उनका उद्धरण देते हैं तो वे सिर्फ राजनैतिक प्रतीकों का सहारा नहीं लेते, बल्कि वे उनसे सच्ची प्रेरणा प्राप्त करते हैं और उनके विचारों पर अमल करने की कोशिश करते हैं जिन्हें दशकों से क्षुद्र स्वार्थों के वशीभूत अदूरदर्शी नेताओं ने नजरअंदाज कर दिया था।

इस साल 2 अक्तूबर को सरकार ने जिस स्वच्छ भारत अभियान की नींव रखी, वह अपनी भवना और व्यवहार दोनों में पूरी तरह गांधीवादी कर्म है। सरकार के मुताबिक स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य 2019 में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक स्वच्छ भारत के सपने को साकार करना है। मोदी के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान का निश्चित रूप से गहरा असर होगा और भारत भर में सरकारी दफ्तरों का चेहरा और चाल बदल जाएगी।

महात्मा गांधी की स्वच्छता के तीन स्तर थे – स्वच्छ दिमाग, स्वच्छ शरीर और स्वच्छ परिवेश। उन्होंने ‘स्वच्छता को ईश्वर की पूजा का एक रूप’ माना था। उन्होंने साफ-साफ लिखा, ”हम अपवित्र मन से ईश्वर का आशीर्वाद नहीं पा सकते और पवित्र मन अस्वच्छ शरीर में नहीं रह सकता। इसी तरह स्वच्छ शरीर अस्वच्छ शहर में नहीं रह सकता।’’ गांधी जी जानते थे कि स्वच्छता के प्रति रुझान न होना मन को मलिन बना देता है। हर गर्वान्वित सभ्यता साफ-सुथरे, स्वस्थकर वातावरण में फलती-फूलती हैं। आम आदमी और औरत का मनोबल तोडऩे का आसान उपाय मलबे और गंदगी को बिखेर देना ही है। गांधी ने आजादी के आंदोलन के साथ लोगों को अपने वातावरण के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए कई जागरूकता अभियान भी चलाए।

हमारे प्राचीन ग्रंथ, महाकाव्य और संस्कृति सभी हमें स्वच्छता का महत्व बताते हैं। हजारों साल पहले हड़प्पा और मोहेजोदाड़ो सभ्यताओं में भी कारगर जल-मल निकासी की व्यवस्था बनाई गई थी। हिंदू धर्म में तो स्वच्छता कर्मकांड की तरह है। हम मंदिरों में अस्वच्छ शरीर लेकर नहीं जा सकते, न ही पूजा कर सकते हैं। गुरुकूल परंपरा में तो हर छात्र को पहली शिक्षा स्वच्छता और पवित्रता की ही दी जाती रही है। भारत को दुनिया की धार्मिक और आध्यात्मिक राजधानी कहा जाता रहा है, लेकिन अब तो हमारे मंदिर और तीर्थस्थल भी विश्व में सबसे गंदे स्थानों में तब्दील हो चुके हैं।

जापानी दर्शन में बच्चों को अपने स्कूल के शौचालयों को खुद साफ करने की सीख दी जाती है। यह एक तरह से बालक के मन में जिम्मेदारी और स्वच्छता की नींव रखने जैसा है।

यह सुनने में बुरा लग सकता है लेकिन सच्चाई यही है कि भारत के लोगों को अपने आसपास गंदगी और कूड़ा-कचरा बिखरा होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हम अपने घरों को चमाचम साफ रखते हैं लेकिन अपने पड़ोस, सड़कों और गलियों में कचरे को देख आंख मूंद लेते हैं। आज स्थिति यह है कि हम कचरा पैदा करते हैं

और उसके निबटारे पर ध्यान नहीं देते। असल में कचरा तो अब हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। सड़कों, गली-कूचों में कूड़ा-कचरा फैला रहना अब आम बात है। नालों से निकाला गया मलबा कई दिनों तक यूं ही सड़कों पर सूखने दिया जाता है और फिर उसे उसी नाले के हवाले कर दिया जाता है जिससे वह निकाला गया। हमारी आंखें खुले सीवेज को देखने और हमारे नाक सड़ांध की बदबू सूंघने को अभ्यस्त हो गए हैं। हमारे आसपास कितना ही कचरे पसरे हों, हमारा ध्यान उस ओर नहीं जाता। विदेश में ज्यादातर देशों में कचरा फैलाना अपराध माना जाता है और सड़कों पर अवांछित वस्तु फेंकने पर जुर्माना भरना पड़ता है। भारत में कोई कहीं भी कुछ फेंक सकता, कोई कानून उसके आड़े नहीं आता।

प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद तो झाड़ू की मांग बढ़ गई है और उसकी कीमत भी बढ़ रही है। उन्होंने हर किसी से सप्ताह में न्यूनतम दो घंटे जो स्वच्छता को देने को कहा है। कहने की जरूरत नहीं कि स्वच्छ भारत अभियान आज की सबसे बड़ी जरूरत है। मोदी ने इंडिया गेट पर कहा, ”अगर भारत के लोग मंगल पर पहुंच सकते हैं तो वे निश्चित रूप से देश को साफ-सुथरा भी बना सकते हैं।’’

अब सवाल है कि क्या यह सब कुछ एक घटना बनकर रह जाएगा? क्या प्रधानमंत्री का राजघाट, वाल्मिकी बस्ती और इंडिया गेट पर बच्चों के साथ महात्मा की तरह टहलना महज एक आयोजन होकर रह जाएगा? उस आयोजन की तस्वीरों में प्रधानमंत्री के पीछे चल रहे अधिकारियों को हंसी-ठिठोली करते देखा गया। ऐसा लगा कि वे इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, मानो उनके लिए यह कोई मीडिया इवेंट भर हो। दरअसल हमारे व्यवहार में व्यापक बदलाव की दरकार है जो होता नहीं दिख रहा है। लाल किले पर मोदी के भाषणों से लोगों को पे्ररणा तो मिली लेकिन आज भी वहां कूड़ा फैला दिखता है।

александр лобановский харьковпосле чистки зубов

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