ब्रेकिंग न्यूज़ 

अम्मा का अस्त

अम्मा का अस्त

By चेन्नई से बी. आर. हरन

अठारह साल लंबे चले मुकदमे में आखिरकार विशेष जज जॉन माइकेल कुन्हा ने जयललिता को आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति इकट्ठा करने के लिए दोषी पाया और चार साल की साधारण कैद के साथ 100 करोड़ रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। इसी मामले में उनकी सहेली शशिकला, इलावरासी और उनके दत्तक पुत्र तथा शशिकला के भतीजे सुधाकरण को भी चार साल की कैद और 10 करोड़ रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई है। लिहाजा, जयललिता को मुख्यमंत्री पद और विधानसभा सदस्यता से वंचित होना पड़ा। यही नहीं, वे रिहाई के छह साल बाद तक चुनाव लडऩे के कानूनन अयोग्य हो गईं। इस तरह वे दस साल तक सक्रिय राजनीति से अलग हो जाएंगी।

इस सब की शुरुआत 14 जून 1996 को डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की एक शिकायत से हुई। तत्कालीन द्रमुक सरकार ने डीवीएसी को जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति जुटाने पर एफआइआर दर्ज करने का निर्देश दिया था। जयललिता और तीन अन्य के खिलाफ आरोप-पत्र भी दाखिल किए गए। लेकिन 2001 में जयललिता की सत्ता में वापसी के साथ जयादातर गवाह पलट गए तो द्रमुक के अंबुझगन और डॉ. स्वामी ने फरवरी 2003 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की कि मुकदमे को तमिलनाडु से बाहर भेज दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को कर्नाटक में स्थानांतरित कर दिया। दिसंबर 2003 में विशेष अदालत का गठन हुआ और मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। मामला बंगलुरु में चल रहा था इसलिए वे 2011 में सत्ता में वापसी के बावजूद अपना दबदबा नहीं दिखा सकीं। इस बीच अंतरिम राहत की उनकी कोशिशों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। आखिर दो बार उन्हें व्यक्तिगत तौर पर कर्नाटक विशेष अदालत में पेश होना पड़ा। अंतिम सुनवाई 28 अगस्त 2014 को हुई और 27 सितंबर को सजा सुनाई गई। 7 अक्टूबर को कर्नाटक हाईकोर्ट ने उनकी जमानत खारिज कर दी और कोई राहत नहीं दी।

साहसी और रहस्यमय
जयललिता को इसका श्रेय निश्चित रूप से दिया जाना चाहिए कि वे राजनीति में इस ऊंचाई पर कठिन मेहनत और तमाम बाधाओं को पार करके पहुंची हैं। वे अभिनेत्री और पूर्व मुख्यमंत्री एमजीआर की पसंदीदा हिरोइन थीं। एमजीआर ने उन्हें पार्टी में 1982 में शामिल किया और 1983 में पार्टी का प्रोपोगांडा सचिव बनाया। 1984 में वे राज्यसभा की सदस्य बनाई गईं। 1987 में एमजीआर की मृत्यु के बाद जयललिता ने पार्टी की कमान संभाली और वरिष्ठ नेताओं की पार्टी तोडऩे की कोशिशों को नाकाम कर दिया। वरिष्ठ नेताओं ने पहले उन्हें बाहर कर दिया था और एमजीआर की पत्नी जानकी को मुख्यमंत्री बना दिया, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं और दूसरी पांत के ज्यादातर नेताओं के समर्थन के बिना कामयाब नहीं हो पाए। आखिर, केंद्र में राजीव गांधी की सरकार ने 21 दिनों में ही अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल से जानकी रामचंद्रन सरकार को बर्खास्त कर दिया।

फिर 1989 के चुनावों में द्रमुक की सरकार बनी तो जयललिता विपक्ष की नेता बनीं। विधानसभा में द्रमुक के विधायकों ने अपमानित और उत्पीडि़त किया तो जयललिता को जनता की सहानुभूति हासिल हुई। उसके बाद केद्र में चंद्रशेखर की सरकार ने एलटीटीई गतिविधियों के समर्थन के लिए द्रमुक सरकार को बर्खास्त कर दिया। राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर के कारण जयललिता को 1991 के विधानसभा चुनावों में जीत मिली और सरकार बनी।

इस बीच, अन्नाद्रमुक की प्रोपोगांडा सचिव रहते हुए उनके संपर्क में शशिकला आईं, जो तब एक वीडियो कैसेट की लाइब्रेरी चलाती थीं। शशिकला के पति नटराजन सरकार में जनसंपर्क अधिकारी थे। धीरे-धीरे शशिकला उनकी भरोसेमंद बन गईं और फिर उनकी सहयोगी के नाते उनके घर में रहने लगीं। जयललिता का शशिकला पर भरोसा भारी भूल साबित हुई, जिसका अंदाजा शायद उन्हें आज भी पूरी तरह नहीं हो पाया है। 1991 से 1996 के दौरान जब वे सत्ता में थीं तो कथित तौर पर शशिकला ने परदे के पीछे से पूरे प्रशासन को अपनी मुट्ठी में कर लिया और भ्रष्टाचार और अपराध में आकंठ डूब गईं। उस दौर की मीडिया रिपोर्टों से भी यही पता चलता है। उन खबरों पर नजर डालने से भ्रष्टाचार, सौदेबाजी और अपराध की कहानियों का पता चलता है। कुछेक मिसालें प्लीजेंट स्टे होटल मामला, अन्नाद्रमुक समर्थकों द्वारा तीन कॉलेज छात्राओं को जिंदा जलाना, तमिल साप्ताहिक ‘तरासु’ के दो पत्रकारों की हत्या, तांसी (तमिलनाड़ लघु उद्योग निगम) की जमीन का अधिग्रहण, टिडको के शेयर स्पीक की बिक्री, आईएएस अधिकारी चंद्रलेखा पर एसिड हमला, करोड़ों रुपए का रंगीन टीवी घोटाला, आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला वगैरह है। इन घटनाओं-घोटालों की सिलसिलेवार फेहरिस्त बनाई जाए तो एक बड़ा राजनैतिक थ्रिलर तैयार हो सकता है। शशिकला और उसके परिवार की करतूतों के कारण 1996 के चुनावों में जयललिता सरकार की बुरी पराजय हुई। तब से जयललिता शशिकला को दोबार घर से निकाल चुकी हैं और फिर वापस ले लेती हैं। दोनों के रिश्ते बेहद रहस्यमयी बने हुए हैं।

द्रमुक 1996 के चुनावों में जीत गई और सरकार बनाने के बाद जयललिता और उनके सहयोगियों के खिलाफ कई मुकदमे दायर किए गए। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति जुटाने का मामला दर्ज करवाया। जयललिता अपने दूसरे कार्यकाल 2001 से 2006 के दौरान सभी मुकदमों से बरी हो गईं लेकिन आय से अधिक संपत्ति का मामला उनके साथ चिपका रहा। लंबी कानूनी लड़ाई में इस मामले में कई जज और सरकारी वकील आए-गए। इससे कानून की खामियां भी उजागर हुईं और यह पता चला कि रसूखदार लोग न्यायिक प्रक्रिया में कैसे देरी करवाते हैं और मुकदमे का रुख बदलवा देते हैं। कहावत है कि ‘देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर’ होता है। जयललिता के मामले में यह कहावत भी चरितार्थ हुई। वे आरोपित होने के बावजूद दो बार सत्ता का स्वाद चख चुकी हैं। आखिर जयललिता मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार विरोधी कानून में सजा पाने वाली पहली शख्सियत बन गई हैं।

अनेक शून्य और अराजक राज्य
एमजीआर जब अपनी बुलंदी पर थे तो एक नेता की टिप्पणी थी, ”एमजीआर नंबर 1 हैं और उनके बाद सब शून्य हैं।’’ अन्नाद्रमुक में आज भी वही संस्कृति कायम है। जयललिता नंबर 1 हैं और बाकी सब शून्य। फैसले के दिन (27 सितंबर को) सभी मंत्री बंगलुरु पहुंच गए थे, राज्य प्रशासन की सुध लेने वाला कोई नहीं बचा था।

25-10-2014

जब जयललिता की सजा की खबर फैली तो अन्नाद्रमुक के समर्थकों ने हिंसा, आगजनी और लूटपाट शुरू कर दी। कांचीपुरम और तूतीकोरिन में दो बसें जला दी गईं। दुकानों और वाहनों पर हमले किए गए। सड़कों पर अवरोध खड़े किए गए। द्रमुक प्रमुख के. करुणानिधि और भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के घरों पर हमले किए गए। राज्य भर में आत्महत्या की कोशिशों की वारदातें हुईं। आखिरकार केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर राज्यपाल को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलानी पड़ी। सौभाग्य से, अगले दिन रविवार होने के नाते दुकानें और दफ्तर वगैरह बंद थे और लोग घरों से नहीं निकले।

प्रशासन ने फौरन स्थिति पर काबू पा लिया लेकिन अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं का राज्य भर में प्रदर्शन जारी है। उपवास, हड़ताल, काम का बॉयकाट, जुलूस वगैरह जारी है। सभी सरकारी विभागों में अन्नाद्रमुक की ट्रेड यूनियनें अवरोध करना जारी रखे हुए हैं। मछुआरों में अन्नाद्रमुक के सदस्यों ने काम बंद कर रखा है। फिल्मोद्योग में अन्नाद्रमुक सदस्यों ने कॉलीवुड को सोमवार 29 सितंबर को बंद करवा दिया। उन्होंने विरोध में उपवास भी रखा। अब तक करीब दर्जन भर अन्नाद्रमुक कार्यकर्ता खुदकशी कर चुके हैं। यहां तक कि जयललिता द्वारा कुछ साल पहले सम्मानित एक पुलिस सिपाही ने भी डीजीपी दफ्तर के बाहर आत्महत्या की कोशिश की। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों को भी पढ़ाई छोड़कर फैसले के खिलाफ सड़क पर उतरने को मजबूर किया गया। सरकारी अधिकारियों ने सभी मंदिरों के पुजारियों को जयललिता की रिहाई के लिए विशेष पूजा करने का मौखिक निर्देश दिया। चेन्नै के प्रसिद्ध कपीलेश्वर मंदिर में विशेष यज्ञ और होम का आयोजन किया गया। कई सरकारी विभागों के कर्मचारियों ने बांह पर काली पट्टी बांधकर ड्यूटी की। विजयादशमी पर सभी प्रमुख मंदिरों में चांदी होम होता है लेकिन कथित तौर अधिकारियों के आदेश से उसकी जगह जयललिता की रिहाई के लिए विशेष पूजा की गई।

25-10-2014

नामजद मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम और दूसरे मंत्रियों ने सोमवार को आंसू पोंछते हुए शपथ ली और तुरंत बंगलुरु रवाना हो गए। कई नेताओं और अभिनेताओं को खासकर जया टीवी पर अदालत और संबंधित जज को कोसते देखा गया जबकि यह अदालत की अवमानना का मामला बनता है। राज्य भर में अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ताओं ने जस्टिस कुन्हा और कर्नाटक हाईकोर्ट की निंदा करते पोस्टर लगाए हैं। अवमानना का अनोखा मामला तो यह है कि वेल्लोर नगरपालिका परिषद ने फैसले की निंदा में प्रस्ताव पारित किया! यहां तक कि मद्रास नगरनिगम परिषद ने भी फैसले के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया! प्रस्ताव में करुणानिधि का जिक्र करने का विरोध करने वाले द्रमुक पार्षदों के साथ धक्कामुक्की और मारपीट की गई।

हालात ऐसे हैं कि जब तक जयललिता को जमानत नहीं मिल जाती, राज्य में प्रशासन चौपट ही रहेगा। उनकी रजामंदी के बिना मौजूदा राज्य मंत्रिमंडल शायद ही कोई फैसला ले। वजह यह है कि ऐसी स्थिति पहले नहीं आई है और ज्यादातर मंत्री फैसले लेने के काबिल भी नहीं हैं।

तमिलनाडु की राजनीति में अहम मोड़
अभी तो ऐसा ही लग रहा है कि जयललिता कानून के मुताबिक अगले दस साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। यानी चार साल की सजा के बाद छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकतीं। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी है और सजा मुल्तवी करने से इनकार कर दिया है। अब सुप्रीम कोर्ट की बारी है। जो भी हो उनके लिए अगले दो साल तक सरकार और चार साल तक पार्टी को रिमोट से चलाना आसान नहीं होगा। उसके बाद छह साल तक की अयोग्यता राजनीति के मैदान में उनकी सक्रियता पर सवालिया निशान लगा देगी।

ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति करवट बदल सकती है। 2011 से द्रमुक पतन की ओर अग्रसर है। 2011 के विधानसभा चुनावों में उसे तीसरा स्थान मिला तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उसकी झोली एकदम खाली रही। अब पार्टी तेजी से गर्त की ओर जा रही है। द्रमुक प्रमुख करुणानिधि 90 वर्ष की उम्र पार कर रहे हैं और ह्वीलचेयर के सहारे ही हैं। उनके परिवार के उत्तराधिकारी एक-दूसरे से लड़-भिड़ रहे हैं और पार्टी पदाधिकारी बंटे हुए हैं। पार्टी पर भ्रष्टाचार का दाग भी गहरा है। उसके तमाम बड़े नेता भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा और करुणानिधि की बेटी कनिमोझी जेल से लौट चुके हैं और 2जी घोटाले में अभी भी फंसे हुए हैं। करुणानिधि के भतीजे दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन एयरसेल-माक्र्सिस सौदे और घर से गैर-कानूनी टेलीफोन एक्सचेंज चलाने के मामले में सीबीआई जांच का सामना कर रहे हैं। इसलिए द्रमुक पूरी तरह साख गंवा चुकी है इसलिए पार्टी जयललिता की सजा के बावजूद स्थितियों का लाभ अकेले उठाने की हालत में नहीं है। उसे किसी सहयोगी की दरकार है।

दूसरी द्रविड़ पार्टियां भी कमोवेश इसी स्थिति में हैं। उनकी अपनी सीमाएं हैं और इससे वे वाकिफ भी हैं। स्थानीय निकायों के चुनावों का बॉयकाट करके ये सभी 2016 के आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर महागठजोड़ की संभावनाएं तलाशने लगी हैं। हालांकि इनमें कई वायको की एमडीएमके और डॉ. रामदॉस की पीएमके अभी भी भाजपा की अगुआई वाले एनडीए में हैं पर उनका इरादा द्रमुक के साथ जाने का लगता है।

25-10-2014

दिग्गज द्रविड़ नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री अन्नादुरै की जन्म शतवार्षिकी (15 सितंबर) का आयोजन वायको के लिए द्रमुक को यह संकेत देने का अच्छा मौका बना कि जयललिता इकलौती साझा दुश्मन हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उसे हराने के लिए सभी ‘दोस्तों’ को हाथ मिला लेना चाहिए। कयास यह है कि वायको ने यह संकेत करुणानिधि के बड़े बेटे अलगिरी के कहने पर दिया है। अलगिरी अपने छोटे भाई स्टालिन के करुणानिधि के उत्तराधिकारी बनने की संभावनाओं में रोड़ा अटकाना चाहते हैं। करुणानिधि ने भी वायको को सकारात्मक संकेत दिया है क्योंकि वे अपने पूरे परिवार वालों को एकजुट करने के लिए स्टालीन को झटका देना चाहते हैं।

द्रमुक से टूटकर एमडीएमके बनाने वाले वायको तमिलनाडु की राजनीति में नाकाम ही रहे हैं। वे अपनी छवि तमिल ईलम के लिए समर्पित नेता के तौर पर ही स्थापित करने में लगे रहे हैं और स्थानीय मुद्दों की परवाह ज्यादा नहीं करते। उनको बेमानी मानकर करुणानिधि और जयललिता दोनों ही 2011 के चुनावों में अपने गठजोड़ों से दूर रखा। इससे उनकी पार्टी ने चुनाव में हिस्सा ही नहीं लिया। लोकसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर एनडीए में शामिल होने के बावजूद वे ‘मोदी लहर’ को अपने हक में भुना नहीं पाए। इसलिए वायको के पास द्रमुक के पाले में जाने के अलावा कोई चारा नहीं है।

पीएमके के डॉ. रामदॉस अक्टूबर के अंत तक संभावित अपनी पोती की शादी का न्यौता देने करुणानिधि के घर गए। अपनी पार्टी के गठन के समय से ही वे मौका भांपकर बारी-बारी से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के पाले में जाते रहे हैं और हमेशा सत्ता का स्वाद चखते रहे हैं। हालांकि 2011 के विधानसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर उन्होंने द्रमुक और अन्नाद्रमुक से समान दूरी बनाए रखने का फैसला किया तो उनका प्रदर्शन बेहद बुरा रहा। लोकसभा चुनाव के दौरान वे एनडीए में शामिल हो गए। लेकिन वे और उनकी पार्टी के नेता विजयकांत और उनकी पार्टी डीएमडीके के साथ सहज नहीं थे इसलिए प्रचार के दौरान सिर्फ अपनी सीटों पर ही ध्यान दिया। पीएमके सिर्फ एक सीट धरमपुरी ही जीत पाई, जहां से रामदॉस के बेटे पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि खड़े थे। भाजपा ने अंबुमणि को केंद्रीय मंत्रिमंडल में लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है। इस वजह से रामदॉस एनडीए से हटने का मौका तलाश रहे हैं। सो, वे 2016 के विधानसभा चुनावों में द्रमुक की अगुआई वाले गठजोड़ में जा सकते हैं।

फिल्म अभिनेता विजयकांत को राजनीति में 14 सिंतबर को 10 साल हो गए। इसी दिन उन्होंने डीएमडीके का गठन किया था। अपनी नई पार्टी बनाने के दिन से ही वे खुद को राज्य में तीसरे विकल्प के रूप में पेश करते आए हैं। वे दोनों ही मुख्य द्रविड़ पार्टियों से समान दूरी रखते हैं और 8 प्रतिशत वोट हासिल करने में सफल रहे हैं। बाद के चुनावों में उनकी पार्टी का मत प्रतिशत 12 तक पहुंच गया लेकिन उसके आगे नहीं बढ़ रहा है। उन्हें एहसास हुआ कि अपना कद और पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए उन्हें सत्ता में पहुंचने की दरकार है। यही सोचकर उन्होंने 2011 के विधानसभा चुनावों में जयललिता से हाथ मिलाया और डीएमडीके राज्य में दूसरी पार्टी बन गए। आखिर उन्हें विपक्ष के नेता का पद मिला। लेकिन वे हर मुद्दे पर जयललिता का विरोध करने लगे। इससे चिढ़कर जयललिता ने उनके विधायकों को तोडऩा शुरू कर दिया। अब उनके 7 विधायक जयललिता का समर्थन करते हैं लेकिन वे विपक्ष के नेता का पद गंवाने के डर से उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। इस वजह से वे लोकसभा चुनावों में भाजपा के एनडीए में शामिल हुए लेकिन उन्हें एक भी सीट नहीं मिली। डीएमडीके का वोट प्रतिशत भी घटकर 4.5 पर आ गया। इन तमाम सीमाओं को ध्यान में रखकर अपनी पार्टी के वार्षिक दिवस समारोह 14 सितंबर को उन्होंने तमाम विपक्षी दलों को साथ मिलकर जयललिता को हराने का आह्वान किया।

बदलते गठजोड़ समीकरण
वायको, रामदॉस और विजयकांत की नई चालों से एक ही बात का अंदाजा लगता है कि उन सबको जयललिता को हराने के लिए महागठजोड़ बनाने की जरूरत का एहसास हो गया है। द्रमुक प्रमुख ने भी संकेत दिए हैं और यह महागठजोड़ जल्द ही बन सकता है। वायको और रामदॉस को तो एनडीए छोड़कर द्रमुक गठजोड़ में जाने में कोई हिचक नहीं होगी, लेकिन विजयकांत गठजोड़ में शायद भाजपा को भी रखना चाहें। करुणानिधि भी शायद भाजपा का स्वागत करें क्योंकि वह केंद्र में सत्ता में है और उन्हें अपनी बेटी तथा अन्य रिश्तेदारों के मामले में कुछ केंद्रीय दबदबे की दरकार पड़े। हालांकि भाजपा शायद द्रमुक से दूर ही रहना चाहे क्योंकि पार्टी अन्नाद्रमुक की कमजोरियों का लाभ खुद उठाना चाहेगी। भाजपा विजयकांत को एनडीए में रखने की कोशिश भी कर सकती है। हालांकि भाजपा को यह भी एहसास है कि उनकी दोस्ती कुछ कांग्रेसी नेताओं से भी है।

चूंकी विधानसभा चुनावों के दौरान कम्युनिस्टों को अन्नाद्रमुक ने झटक दिया था इसलिए वे भी द्रमुक के साथ जाने में परहेज नहीं करेंगे। इससे कांग्रेस की स्थिति अजीब हो जाएगी। राज्य में दो मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों में भाजपा लगातार बढऩे का संकेत दे रही है जबकि कांग्रेस की तमिलनाडु में हालत सबसे बुरी है। भाजपा का लोकसभा चुनावों के बाद स्थानीय निकाय के चुनावों में भी मत प्रतिशत बढ़ा है। लेकिन कांग्रेस के पास राज्य में अब दो ही विकल्प रह गए हैं। एक विजयकांत के साथ वह द्रमुक के साथ चली जाए या दूसरे, जयललिता के आगे कटोरा लेकर खड़ी रहे। खबरें ये भी हैं कि कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया से आग्रह किया है कि जयललिता को जरूरी राहत मुहैया कराई जाए।

जहां तक अन्नाद्रमुक का सवाल है, पार्टी का फिलहाल एकमात्र मकसद अपने सुप्रीमो की जमानत करवाना है। जयललिता के जेल में रहने से सरकार और पार्टी दोनों का ही नुकसान हो रहा है। वे जेल से बाहर आ जाती हैं तो सरकार के बाहर से ही वे मंत्रियों को निर्देश दे सकेंगी और खुद पार्टी के मामलों की जिम्मेदारी संभाल लेंगी। वे विपक्षी नेताओं को कानूनी पचड़ों में डालने की राहें भी तलाश सकती हैं। वे लोगों में उभरी सहानुभूति को और मजबूत करने के लिए ‘अम्मा’ ब्रांड नाम से कुछ और जन कल्याणकारी योजनाएं चला सकती हैं। अगर उन्हें जमानत मिलने में ज्यादा देर होती है तो सहानुभूति लहर खत्म भी हो सकती है। अगर अन्नाद्रमुक यह सोच रही है कि सहानुभूति 2016 के चुनावों तक कायम रहेगी तो वह भुलावे में है। जयललिता अकेले दम पर लोकसभा चुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों में सफलता हासिल कर चुकी हैं इसलिए वे 2016 के विधानसभा चुनाव भी अकेले लडऩा पसंद करेंगी। अगर कर्नाटक में उन्हें कांग्रेस की मदद मिलती है तो वे शायद उससे गठजोड़ करने की भी सोचें लेकिन यह दूर की कौड़ी ही है। जयललिता अपने चुनाव क्षेत्र श्रीरंगम में उपचुनाव में अपने उम्मीदवार को जबर्दस्त विजय दिलवाना चाहेंगी, ताकि उनके पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रहे। बाद में, अगर उन्हें गठजोड़ की जरूरत महसूस होती है तो वे भाजपा का साथ लेने पर विचार कर सकती हैं, लेकिन यह भी अभी दूर की कौड़ी है।

उधर, भाजपा को लोकसभा चुनावों में वैचारिक रूप से विरोधाभास वाली पार्टियों एमडीएमके, पीएमके और डीएमडीके के साथ गठजोड़ करने का कोई लाभ नहीं मिला। इसलिए वह उनके एनडीए छोड़कर द्रमुक गठजोड़ में शामिल होने पर परेशान नहीं होगी। फिर, हरियाणा और महाराष्ट्र में उसने जैसे आसानी से पुराने गठजोड़ तोड़ दिए, उसे देखते हुए आश्चर्य नहीं होगा कि वह तमिलनाडु में भी एकला चलो की नीति अपना ले।

25-10-2014

द्रविड़ और गैर-हिंदू ताकतों में नया गठजोड़
तमिलनाडु की ताजा घटनाओं से संकेत मिलता है कि राज्य में भाजपा के उभरने से द्रविड़ ताकतें चिंतित हैं। इससे उनसे भी ज्यादा चिंता जेनेरिक चर्च और इस्लामी तत्वों को है। एनडीए में शामिल द्रविड़ नेताओं ने भी भाजपा के ”संस्कृत सप्ताह’’ आयोजन पर कड़ी आलोचना की। उन्होंने इस तथ्य पर गौर नहीं किया कि संस्कृत दिवस 1969 से और संस्कृत सप्ताह 2001 से मनाया जाता है। इसे संस्कृत भाषा के जरिए तमिलों पर हिंदुत्व विचारधारा थोपने का शगल बताया गया। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि संस्कृत सप्ताह आयोजन सिर्फ सीबीएसई के स्कूलों के लिए है, राज्य बोर्ड के स्कूलों के लिए नहीं।

इसी तरह उन सबने केंद्र सरकार की उस अधिसूचना को भी आड़े हाथों लिया कि शिक्षक दिवस को गुरु उत्सव के रूप में सप्ताह भर मनाया जाए। गुरु उत्सव हमारे देश की गुरु-शिष्य परंपरा के लिहाज से सटीक बैठता है। लेकिन सभी द्रविड़ पार्टियों ने इसका खुलकर विरोध किया। यही नहीं, यूजीसी के सभी विश्वविद्यालयों को हिंदी के प्रोत्साहन के लिए लिखी गई चिट्ठी का भी ¬विरोध किया गया। इससे द्रविड़ पार्टियों का एकाधिकारवादी मानसिकता का परिचय मिलता है और तमिल के प्रोत्साहन के मामले में आज तक कुछ नहीं किया गया।

द्रविड़ पार्टियां श्रीलंका के मुद्दे पर भी भाजपा की आलोचना कर रही हैं। गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों के फौरन बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे को मोदी के बुलावे का विरोध किया गया। वायको तो मार्च लेकर दिल्ली तक आए। यह खुला रहस्य है कि तमिल ईलम का मुद्दा जेनेरिक चर्च का एजेंडा है और इसके जरिए वह तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों का इस्तेमाल करता है।

राजनैतिक जानकार यह तस्दीक कर सकते हैं कि चर्च और इस्लामिक तत्वों का सभी द्रविड़ पार्टियों में प्रभाव है। वोट बैंक के नाते द्रविड़ नेता उनकी बातों को मानते हैं। यह भी तथ्य है कि तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियों के प्रभुत्व वाले पिछले 47 वर्षों में इस्लामी कट्टरता और ईसाई धर्मांतरण बढ़ा है। इसके विपरीत द्रमुक और अन्नाद्रमुक के राज में हिंदू धर्म के प्रश्रय के लिए कुछ नहीं किया गया। मंदिरों के नजदीक मस्जिदों और चर्च की इफरात है।

लोकसभा चुनावों में मोदी लहर का असर तो कई सीटों पर नहीं देखा गया लेकिन भाजपा के वोट प्रतिशत में काफी इजाफा हुआ और लोगों ने उसे पांच दशक की द्रविड़ राजनीति का अच्छा विकल्प माना। मोदी लहर खासकर कांग्रेस के सफाए में कारगर साबित हुई। स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा हर सीट पर लड़ी और साफ संदेश दिया कि वह राज्य में गंभीर ताकत के रूप में उभर रही है।

इसलिए स्वाभाविक है कि भाजपा के उभार से द्रविड़ और ईसाई तथा इस्लामी ताकतें चिंतित हैं। द्रविड़ पार्टियां अपने परंपरागत बोट बैंक में सेंध से परेशान है तो कम्युनिस्ट और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय पार्टियों के वोट लगभग पूरी तरह भाजपा की ओर चले गए हैं। कांग्रेस और कम्युनिस्टों की पराजय से भी ईसाई और इस्लामी ताकतें परेशान हैं।

भाजपा को मौका
तमिलनाडु की मौजूदा स्थिति भाजपा के लिए महान अवसर की तरह है। उसकी सदस्यता बढ़ रही है, हिंदू वोटबैंक बढ़ रहा है। पांच दशक से द्रविड़ पार्टियों की भ्रष्टाचार और अपराध से जुड़ी राजनीति से लोग ऊब चुके हैं। मंदिरों का रखरखाव ठीक से नहीं हो पा रहा है। इस्लामी कट्टरता और हिंदू नेताओं की हत्या की वारदातें बढ़ रही हैं। ये मुद्दे अब जनता को छूने लगे हैं। भाजपा केंद्र सरकार की मदद से लोगों को विकास की नीतियों की ओर भी प्रेरित कर सकती हैं।

तमिलों के दिल जीतने के लिए श्रीलंकाई तमिलों और मछुआरों के मुद्दे भी उठाए जा सकते हैं। पार्टी सुब्रह्मण्यम स्वामी के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का भी लाभ ले सकती है। तो, भाजपा के हाथ लड्डू ही लड्डू है, बशर्ते वह अपने पत्ते सही ढंग से सावधानीपूर्वक खेले।

моды world of warplanesipod touch

Leave a Reply

Your email address will not be published.