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महाराष्ट्र त्रिशंकु विधानसभा?

महाराष्ट्र  त्रिशंकु विधानसभा?

By जयशंकर

इस बार के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बहुत कुछ अभूतपूर्वक हो रहा है। पिछले 25 वर्षों से साझा सरकार बनाने और चलाने वाले हिंदुत्व के दो बड़े पैरोकार शिवसेना और भाजपा इस बार एक दूसरे को चुनौती दे रहे हैं। हालांकि केंद्र की भाजपानीत राजग सरकार में शिवसेना का प्रतिनिधि अभी भी शामिल है। दूसरी तरफ, 15 साल पहले, 1999 से गठबंधन कर लगातार सरकार चलाने वाली कांग्रेस और उससे ही निकली शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस भी एक बार फिर चुनाव मैदान में अलग-अलग जोर आजमाइश कर रहे हैं। शिवसेना से अलग हुए प्रमुख उद्धव ठाकरे के चचेरे भाई राज ठाकरे अपनी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ अलग से हुंकार भर रहे हैं। इस तरह से महाराष्ट्र विधानसभा का यह चुनाव पंचकोणीय और अगर चुनाव मैदान में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों की उपस्थिति को भी ध्यान में रखें तो कई क्षेत्रों में मुकाबला बहुकोणीय होते दिख रहा है, जिसमें बहुमत मिलते तो किसी को भी नहीं दिख रहा लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के रूप में भाजपा के उभरने की बातें जरूर कही जा रही हैं।

हाल के दशकों में यह पहला विधानसभा चुनाव है जिसमें शिवसेना के पूर्व प्रमुख बालासाहेब ठाकरे और भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे भी नहीं हैं। मुंडे का पिछले दिनों नई दिल्ली में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। अगर मुंडे आज जीवित होते तो राज्य के मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा की ओर से स्वाभाविक दावेदार होते। महाराष्ट्र विधानसभा का यह चुनाव इसलिए भी अभूतपूर्व है कि आजाद भारत के इतिहास में संभवत: पहली बार देश के किसी प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) ने किसी राज्य विधानसभा के चुनाव में इस तरह से अपनी पूरी ताकत और ऊर्जा झोंकी है। मोदी ने राज्य में तकरीबन दो दर्जन चुनावी रैलियों को संबोधित किया। संभवत: और किसी दल के नेता अथवा मुख्यमंत्री पद के दावेदार ने भी महाराष्ट्र में इतनी अधिक रैलियों को संबोधित नहीं किया होगा। इसलिए पिछले लोकसभा चुनाव की तरह हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव भी ‘मोदी बनाम अन्य’ नजर आ रहा है।

25-10-2014

महाराष्ट्र में दोनों पुराने गठबंधनों के टूट जाने का प्रमुख कारण पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर मुंबई की सत्ता पर काबिज होने की ललक के साथ ही अपनी राजनीतिक ताकत को लेकर पैदा हुआ अति-आत्मविश्वास या फिर मुगालता भी कहा जा सकता है। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के 46 यानी सेना के 44 से दो अधिक विधायक चुनकर आए थे। इसी आधार पर उसने सेना से विधानसभा में विपक्ष के नेता का पद भी हथिया लिया था। इस बार इन सारे कारकों को सामने रखकर ही भाजपा का दावा था कि उसे पहले से ज्यादा बल्कि आधी सीटों पर लडऩे का अवसर मिलना चाहिए। उसकी तरफ से फॉमूला दिया गया कि 288 में से 18 सीटें छोटे सहयोगी दलों-संगठनों के लिए छोड़ दी जाएं और बाकी 270 सीटें सेना और भाजपा के बीच आधी-आधी (135-135) बांट ली जाएं। भाजपा का एक तर्क यह भी था कि राज्य में 50 से अधिक शहरी सीटें ऐसी हैं जिन पर पिछले चुनावों में हर बार सेना के उम्मीदवार लड़ते हैं मगर जमानत भी नहीं बचा पाते रहे हैं। इस तरह की दर्जन भर सीटें भाजपा के खाते में भी हैं जिन पर उनके उम्मीदवार लड़े तो हर बार मगर जीते कभी नहीं। भाजपा इन सीटों की अदला-बदली भी चाहती थी। भावी मुख्यमंत्री का सवाल भाजपा चुनावी नतीजों के हवाले छोडऩे पर अड़ी थी। दूसरी तरफ शिवसेना का तर्क था कि पिछले सभी चुनावों में केंद्र में सत्तारूढ़ होने पर प्रधानमंत्री भाजपा का और महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री सेना का होगा, इसी तरह का समझौता दोनों दलों के बीच रहा है। भाजपा के साथ महायुती में शामिल चार छोटे सहयोगी दल भी शामिल हो गए, लेकिन यह गठबंधन नामांकन की अंतिम तिथि के ठीक पहले ही टूटा जिससे दोनों दलों को ठीक से उम्मीदवार चुनने में भी दिक्कतें हुईं। भाजपा को तो 50 उम्मीदवार ऐसे देने पड़े जो मनसे, कांग्रेस, एनसीपी और सेना छोड़कर आए थे। इनमें से ही एक ‘भ्रष्टाचार शिरोमणि’ कहे जानेवाले एनसीपी के बड़े नेता बबनराव पचपुते भी हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते ही मंत्री पद छोडऩा पड़ा था।

दूसरी तरफ पिछले 15 वर्षों से साझा सरकार चला रहे कांग्रेस और एनसीपी को लोकसभा के चुनाव में अन्य राज्यों की तरह ही महाराष्ट्र में भी मतदाताओं की भारी नाराजगी झेलनी पड़ी। इनके कुल छह उम्मीदवार ही सांसद चुने जा सके। एनसीपी के चार और कांग्रेस के दो ही उम्मीदवार जीते, इस आधार पर एनसीपी ने भी आधी-आधी सीटों पर चुनाव लडऩे और सत्तारूढ़ होने पर मुख्यमंत्री पद ढाई-ढाई साल के लिए बांटने पर दबाव देना शुरु किया। अंतिम समय पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच भी सीटों का बंटवारा नहीं हो सका। जिससे कुछ सीटों पर कांग्रेस के लिए सपा के उम्मीदवार भी मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।

25-10-2014

सेना का नेतृत्व महाराष्ट्र के चुनाव अभियान में जुटे मोदी और उनके मंत्रियों की तुलना सत्रहवीं सदी के अफजल खान से कर रहे हैं जिसने छत्रपति शिवाजी के साथ विश्वासघात करने की कोशिश की थी और शिवाजी ने जिसकी अंतडिय़ां निकाल ली थीं। इस तरह की बयानबाजियों के मद्देनजर भविष्य में सेना और भाजपा के बीच किसी तरह के गठबंधन की संभावना बची रहती है क्या? भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राजनीति में कोई पूर्णविराम नहीं होता। चुनाव अभियान के दौरान इस तरह के आरोप प्रत्यारोप तो लगते ही हैं लेकिन नतीजों के बाद जमीनी हकीकत को सामने रखकर गठबंधन भी हो जाते है। और फिर इस मामले में शिवसेना के खिलाफ भाजपा कहां हमलावर है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र फडऩवीस ने कहा कि केंद्र सरकार में सेना के प्रतिनिधि अनंत गीते अभी भी मंत्री हैं तो क्या वह अफजल खां की सेना के सिपहसालार हैं? दूसरी तरफ भाजपा के नेता दावे करते हैं कि बात हद से ज्यादा बिगड़ जाने का खामियाजा सेना को ही ज्यादा भुगतना पड़ सकता है।

महाराष्ट्र की राजनीति को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वहां चुनावी नतीजों के बाद कोई भी किसी से गठजोड़ कर सकता है। जरूरत के मुताबिक भाजपा अपने पुराने सहयोगी शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और एनसीपी के साथ भी गठजोड़ कर सकती है। मोदी और उनकी गुजराती अस्मिता की बार-बार दुहाई देने के खिलाफ महाराष्ट्र (मराठा) गौरव के नाम पर शरद पवार, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे भी एकजुट हो सकते हैं! मराठा गौरव के साथ ही उन्हें एक बात और भी एकजुट करती है, वह है महाराष्ट्र का विभाजन कर अलग विदर्भ राज्य के गठन की मांग का भाजपा के द्वारा पुरजोर समर्थन। भाजपा शुरु से ही छोटे राज्यों की समर्थक रही है। अलग विदर्भ की मांग सदा से ही उसके एजेंडे में रही है, लेकिन शिवसेना के साथ राजनीतिक गठबंधन के कारण सत्तारूढ़ होने पर भी कभी वह इस पर अमल नहीं कर सकी और ना ही विपक्ष में रहने पर इसके लिए खुलकर दबाव बना सकी। इस बार सेना से अलग हो जाने के बाद भाजपा अलग विदर्भ का नारा जोर शोर से उछालने लगी है। इससे विदर्भ में उसकी पकड़ भी मजबूत हुई है। लेकिन इसके खिलाफ पवार और दोनों ठाकरे के एकजुट होने के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी को महाराष्ट्र के धुले की एक सभा में कहना पड़ा, ”मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि हमारे दिल्ली में प्रधानमंत्री रहते दुनिया की कोई ताकत महाराष्ट्र का बंटवारा नहीं कर सकती और ना ही कोई मुंबई को महाराष्ट्र से अलग कर सकता है।’’ इसके पीछे मोदी की क्या रणनीति रही होगी, यह तो वही बेहतर समझते होंगे लेकिन उनके इस बयान से विदर्भ में भाजपा की चुनावी संभावनाएं जरूर प्रभावित हो सकती हैं।

25-10-2014

हालांकि इसकी संभावना फिलहाल नगण्य ही लगती है, जोड़-तोड़ से बहुमत की गुंजाइश नजर आने पर कांग्रेस, एनसीपी और मनसे के लोग भी करीब आ सकते हैं। फिलहाल तो कांग्रेस और एनसीपी के नेता एक दूसरे को ही भ्रष्ट और निकम्मा साबित करने में लगे हैं। कांग्रेस का तर्क है कि एनसीपी के अलग हो जाने के कारण उसके नेतृत्व वाली सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप कमजोर पड़ेंगे। कम से कम निवर्तमान मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई गंभीर आरोप नहीं हैं। कांग्रेस को लगता है कि राज्य में दलितों, अल्पसंख्यकों और खासतौर से विदर्र्भ, मराठवाड़ा एवं पश्चिम महाराष्ट्र में मराठा किसानों के बीच उसकी पुरानी पकड़ उसके काम आएगी। कांग्रेस सरकार ने राज्य के दबंग मराठों को पिछले दिनों पिछड़ी जातियों की सूची में शामिल कर 16 फीसदी और मुसलमानों को पांच फीसदी आरक्षण का लाभार्थी बनाया था। उसके रणनीतिकारों को लगता है कि इससे मराठा किसान और मुसलमान बड़े पैमाने पर उसके साथ जुड़ सकते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के जाट किसानों के साथ उसका इसी तरह का राजनीतिक प्रयोग सफल नहीं हो सका था। इसलिए अपनी 15 साल की लगातार सरकारों के विरुद्ध नकारात्मक रुझान झेल रही कांग्रेस को बहुमत अथवा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के लिए भी किसी चमत्कार पर ही भरोसा करना पड़ सकता है। अलबत्ता वह एनसीपी के मुकाबले ज्यादा सीटें जीतने की होड़ में जरूर शामिल हो सकती है।

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