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आखिर कब आचरण में लाएंगे हम संपूर्ण स्वच्छता को?

आखिर कब आचरण में लाएंगे हम संपूर्ण स्वच्छता को?

By शिरीष सप्रे

आज से कुछ वर्ष पूर्व मैंने एक लेख पढ़ा था। उसमें प्रसिद्ध उद्योगपति राहुल बजाज ने कहा था कि यदि हम केवल स्वच्छता को ही अपनालें तो केवल पर्यटन उद्योग से ही हम पर्याप्त रोजगार उत्पन्न कर सकते हैं। दूसरी बात उन्होंने उन छोटे-मोटे धंधे करने वालों के संबंध में कही थी कि वे किस प्रकार से विदेशियों को ठगते हैं। इन्हीं मुद्दों को लेकर आमिर खान ने टी.वी. पर ‘शर्म का ताज’, और ‘अतिथि देवो भव’, ‘सत्यमेव जयते’ जैसे कायक्रमों के माध्यम से प्रचार कर हमारा आचरण किस प्रकार का है और किस प्रकार का होना चाहिए का संदेश दिया था।

भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम ने भी अपने हैदराबाद के प्रसिद्ध भाषण में जो कुछ कहा था उसका लब्बोलुआब कुछ इस प्रकार का था कि आप सिंगापूर की सड़कों पर सिगरेट का टुकड़ा नहीं फेंकते, किसी स्टोर में नहीं खाते। ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के समुद्र तटों पर कचरा नहीं फेंकते। जापान की सड़कों पर पान खाकर नहीं थूकते। परंतु, भारत में हमारा आचरण वहां हम के आचरण से ठीक विपरीत होता है। अमेरिका में हर कुत्ते का मालिक उसके कुत्ते के मल त्याग के पश्चात उसको स्वयं साफ करता है, यूं ही सड़क को खराब करने के लिए छोड़ नहीं देता। इसके विपरीत भारत में लोग सुबह-शाम कुत्ते को लेकर घूमने निकलते हैं और उनके कुत्ते जगह-जगह मल-मूत्र विसर्जन करते फिरते हैं और बाद में वे ही लोग शिकायत करते फिरते हैं कि नगरपालिका साफ-सफाई नहीं करती। लेकिन हम अपने गिरेहबान में झांककर नहीं देखते।

कुछ वर्ष पूर्व मैं पूणे गया था, वहां एक उद्योगपति ने तिरुपति बालाजी की प्रतिकृति वाला मंदिर बनाया है। उस मंदिर परिसर की शौचालयों सहित स्वच्छता देखते ही बनती थी। परंतु, चारों ओर ध्यान से देखने पर नजर आया कि जगह-जगह पर सिक्यूरिटी गॉर्ड लगे हैं, इसलिए यह स्वच्छता है। यही हाल अंतर्राष्ट्रीय एअरपोर्ट का है। वहां जो स्वच्छता नजर आती है वह इसीलिए है कि वहां सतत स्वच्छता चलती ही रहती है। यदि सतत स्वच्छता ना चले तो क्या होता है यह मैंने इंदौर-भोपाल के बीच चलने वाली डबल डेकर ट्रेन में देखा है, जिसका किराया लगभग 450 रूपए है। उस ट्रेन के हर डिब्बे में कचरे का डिब्बा रखा हुआ है, परंतु लोग ट्रेन में खाते-पीते हैं और कचरे को जहां बैठे थे वही कहीं डाल देते हैं, घुसेड़ देते हैं।

25-10-2014

उपर्युक्त पर से यह साफ दिख पड़ता है कि अस्वच्छता के मामले में हममें अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं है। अस्वच्छता फैलाने में कोई किसी से कम नहीं है। हम अफ्रीकियों के बारे में कोई बहुत अच्छे विचार नहीं रखते। परंतु, वे भी इस मामले में हमसे बेहतर हैं। मैंने अपने भाई, जिन्होंने युगांडा (कम्पाला) की यात्रा की है उन्हीं से यह जाना है कि वहां कोई सड़क किनारे पेशाब करते नहीं दिखेगा। वैसे मैंने वहां की सड़कों के चित्र देखे हैं जिन पर कागज का एक टुकड़ा तक नजर नहीं आता, जबकि हमारे यहां मुंबई के पेडर रोड, मलाबार पर तक गंदगी दिख पड़ती है। यह देखकर लगता है कि दुनिया में शायद सबसे गंदे लोग हम ही हैं।

कहने को तो हम लोग बड़े धार्मिक हैं और हमारा देश बड़ा धर्मपरायण है और सभी धर्म स्वच्छता पर जोर देते हैं। महामहोपाध्याय डॉ. पांडुरंग काणे लिखित ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ (भाग 1) का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। इसमें मल-मूत्र त्याग एवं देह की स्वच्छता एवं शुद्धि के नियम विस्तार से ‘आह्निक एवं आचार’ के अंतर्गत देते हुए हैं जो पर्यावरण हितैषी भी हैं। एक स्थान पर कहा गया है ‘बस्ती से दूर दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम जाकर मल-मूत्र त्याग करना चाहिए।’ (मनु 5/126) प्रात: समय शरीर-स्वच्छता तो सामान्य शौच (शुद्धता, पवित्रता) का एक अंग है। गौतम (8/24) के मत से शौच एक आत्मगुण है। ऋग्वेद (7/56/12) ने शुचित्व पर बल दिया है। हमारे यहां स्नान किए बगैर कोई धार्मिक कर्मकांड किया ही नहीं जा सकता। हर पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है। चाणक्य ने भी नदी में मल-मूत्र त्याग करने को मना किया है।

कुरान में भी कहा गया है अल्लाह खूब पाक रहने वालों को पसंद फरमाता है। पैगंबर की आज्ञा है कि प्रार्थना के समय शरीर अपवित्र हो गया हो तो स्नान करना चाहिए। वैसी आवश्यकता ना होने पर प्रत्येक प्रार्थना के समय कम से कम ‘वुजू’ तो भी करना चाहिए। वुजू का बहुत महत्व है। क्योंकि, पैगंबर ने कहा है कि जो प्रार्थना के पूर्व वुजू करता है उसके हाथ-पांव आदि अवयव न्याय दिवस के दिन पूर्णिमा के चांद के समान चमकेंगे, इस कारण वह भीड़ में भी उठकर दिखेगा और उसे स्वर्ग की ओर बुलाया जाएगा। इसलिए वुजू (नमाज के लिए नियम पूर्वक हाथ-पांव और मुंह आदि धोना) करें यह पैगंबर का कहना है। बाईबल भी सीखाती है ‘क्लीनलीनेस इज नेक्सट टू गॉडलीनेस’ जो अंग्रेजी में एक वाक्यांश भी है जिसका अर्थ है: ईश्वरीय ही है स्वच्छता। स्वच्छता ईश्वर के निकट ले जाती है।

25-10-2014

अमेरिका के लोग हर रविवार चर्च जाते हैं, उनमें से कई चर्च द्वारा किए जाने वाले धर्मांतरण के या अन्य अवांछित राजनैतिक क्रियाकलापों से सहमत नहीं होते, उसका विरोध भी करते हैं। परंतु, वे चर्च में बड़ी श्रद्धा से अपनी सेवाएं किसी ना किसी रुप में अवश्य प्रदान करते हैं। इस संबंध में एक इंदौर के प्रसिद्ध आश्रम के ब्रह्मचारी ने जो एक सन्यासी के साथ ही थे, ने चर्चा के दौरान कहा अपने यहां तो इसके उलट होता है। हमारे आश्रम में लोग आते हैं और स्वच्छता में हाथ बंटाने की बात तो दूर रही पर गंदगी अवश्य फैला जाते हैं।

गांधीजी देश के पहले ऐसा नेता हैं जिन्होंने शौचालयों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया था। उनके कई अनुयायियों ने आजीवन सार्वजनिक सफाई का काम किया। गांधीजी के अनुयायी अप्पा पटवर्धन ने तो 1928 से ही संडास-मूत्रालय-सफाई बाबद अनेक उपक्रम, प्रचार, प्रयोग और सत्याग्रह किए थे। सेनापति बापट (12-11-1880 से 28-11-1967) जो सशस्त्र क्रांतिकारी, तत्वचिंतक और संघर्षशील समाज सेवक थे, सुबह उठकर गांव के रास्तों पर झाडू लगाना और शौचालय स्वच्छ करने के व्रत को उन्होंने जीवन भर जीया। बाबा आमटे जब वर्धा नगरपालिका के अध्यक्ष थे तब उन्होंने सफाईकर्मियों की हड़ताल के समय सड़कों पर उतरकर स्वयं सफाई कार्य किया था।

भारत सरकार ने सन् 1886 में केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम प्रारंभ किया था, जो 1999 में संपूर्ण स्वच्छता अभियान (टीसीसी) में रुपांतरित हो गया। 2012 में निर्मल भारत अभियान को भी इसी मकसद से शुरु किया गया। जब जयराम रमेश ग्रामीण विकास मंत्री थे तब उन्होंने शौचालयों की आवश्यकता की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए कई बयान दिए उनमें विवादस्पद भी थे। उसी समय मोदी ने भी पहले ‘शौचालय फिर देवालय’ का नारा दिया। परंतु जैसी चाहिए वैसी सफलता हासिल हो नहीं पाई। अब मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 2 अक्टूबर से गांधीजी की 150वीं जयंती 2019 से पहले गांधीजी के स्वप्न स्वच्छ भारत को साकार करने के लिए संपूर्ण भारत को स्वच्छ बनाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान का श्रीगणेश स्वयं हाथ में झाडू लेकर किया है। जिसे अच्छा प्रतिसाद भी मिला है।

लेकिन क्या इससे सचमुच भारत स्वच्छ हो जाएगा? क्योंकि, यह कार्य प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है, जो प्रेरणास्पद तो निश्चय ही है और यह बात भी निश्चित ही है कि इस कार्य में, जो चाहिए वह लक्ष्य हासिल करने में जब तक समाज का साथ नहीं मिलेगा, सफलता मिलना मुश्किल ही है।реклама в гугл бесплатноdocument translation website

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