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किस्सा रिश्वतखोर अफसर का

किस्सा रिश्वतखोर अफसर का

मुझे यह तो पता चल गया था कि यह अफसर रिश्वत धड़ल्ले से खाता है-परन्तु साथ ही यह भी पता चला था कि वह रिश्वत कार में खाता है।

दफ्तर अथवा घर में वह रिश्वत के हाथ भी नहीं लगाता। मेरे सामने कठिनाई यह थी कि अफसर को कार में कैसे बिठाऊं? पर भगवान बड़ा दयालु है। यह समस्या अपने आप हल हो गई। कार खुद अफसर के पास थी। उसके एक मातहत कर्मचारी ने साहब के लंच पर जाने के बहाने मुझे उसकी कार में पीछे बैठा दिया। कार चल दी, काफी देर तक चलने के बाद सिगार का धुंआ छोड़ते हुये अफसर बोला-‘चुपचाप माल सीट के नीचे घुसेड़ दो।’

अंधे को क्या चाहिए दो नैन, वह मिल गये। मैंने ब्रीफकेस खोलकर सौ के नोटों की दस गड्डियां ठिकाने लगा दी। कार किसी भी जगह लंच लेने नहीं रूकी। वापस हो गई। मुझे एक जगह उतार दिया और पता नहीं अफसर कहां चला गया।

इस घटना के एक माह बाद मैं हैरान रह गया। मुझे उस ऑफिस में पांच लाख की सप्लाई का आदेश डाक से मिल गया। जुआ में लगाया पैसा फलीभूत हो गया। खुशी के मारे मैं उछल पड़ा। भाग कर उसी अफसर के पास पहुंचा तो अफसर ने आंखें निकाली। मैं बोला-‘लंच का टाइम हो गया, चलिये लंच ले हो लें।’

अफसर ने दफा हो जाने को कहा, मैंने कहा-‘मैं ब्रीफकेस खाली करना चाहता हूं।’

अफसर बोला-‘दस आदमी तुम्हारे जैसे निपटा चुका हूं ।अब पूरे साल मुझे रोटियां खानी हैं, रिश्वत वर्ष में केवल मार्च माह में ही खाता हूं।’

मैं अफसर की ईमानदारी पर गदगद हो गया, बोला-‘प्रभो, अवधि बढ़ाइये, इस एक माह की जगह दो माह कर दीजिये, यह तो बहुत कम है।’

‘कोई फायदा नहीं। इतना कमा लेता हूं, पानी की तरह बहाने के बाद भी दो-चार लाख बच जाते हैं हर साल। इसलिए आटे में नमक जितना ही पाप करता हूं मैं। भला चाहते हो तो फूट लो वरना जो आदेश मिला है उसमें भी व्यवधान खड़े कर दूंगा।’ अफसर ने कहा और मैं लौट आया।

एक दिन उसी दफ्तर का वही मातहत कर्मचारी आया, बोला-‘मेरा भी तो ख्याल करिये। मैंने आपका लेटर बनाकर साहब के हस्ताक्षर करवाये हैं।’

मैं बोला-‘ये लो सौ रूपये का नोट परन्तु एक बात बता जा कि तेरा साहब रिश्वत कार में ही क्यों खाता है?’

मातहत कर्मचारी हंसा और बोला-‘अब क्या बताऊं, लक्ष्मी चंचला होती है। एक जगह नहीं ठहरती, हमारे अफसर भी चंचल है।

दफ्तर में नेक-ईमानदार और अच्छे कहलाते हैं, घर में भजन-पूजा-पाठ करते हैं और सारी कृपा ईश्वर की मानते हैं। घरवालों को पता यह है कि सारा ठाठ मेहनत का है, इसलिए रिश्वत खाने की जगह मात्र कार ही रह गई है। भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का भी खतरा नहीं रहता कार में।’

‘भ्रष्टाचार निरोधक विभाग, यह क्या काम करता है ?’ मैंने पूछा।

‘यह भ्रष्टाचार रोकता है और इसे बढऩे नहीं देता।’

‘यानि जितना हो रहा है, उतना ही होता रहे।’

‘नहीं, ज्यादा करना हो तो उसे भी शामिल करके भ्रष्टाचार को चरम पर पहुंचाया जा सकता है। भ्रष्टाचार निरोधक विभाग का अफसर भ्रष्टाचारियों को पकड़ कर उन्हें छोडऩे का काम लेता है और इस तरह देश में यथास्थिति बनाये रखता है।’ कर्मचारी बोला।

मैंने जिज्ञासावश पूछा-‘लेकिन तुम्हारा अफसर कितने वर्षों से खा रहा है रिश्वत?’

‘देखिये बीस वर्ष की उम्र तक तो इन्होंने रोटियां खायीं, उसके बाद नौकरी लग गयी। उसके बाद से छोटी-बड़ी रिश्वत खाने लगे। अब तो सिवाय रिश्वत-कमीशन खाने के, इनके पास कुछ है ही नहीं। कोई पिला जाता है कोई खिला जाता है। कोई भेंट दे जाता है, कोई पैकिट रख जाता है-इस प्रकार पूरा जीवन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा है, मातहत कर्मचारी ने बताया।’

मैंने उसकी जेब में पचास का एक नोट और खिसकाया और पूछा-‘सच बताओ, तुम्हारी क्या हालत है?’

‘आपने पचास रूपये इस बात के दिये हैं तो मैं यह भी बताऊंगा। आजकल मैं भी खूब खाता हूं। देखिये न आपके घर आ गया। आदत खराब हो गई है। बेवजह आपसे रिश्वत प्राप्ति करने के लिए दफ्तर व अफसर की गोपनीय बातें बता रहा हूं। आपको पता नहीं

था कि मेरा अफसर रिश्वत कहां खाता है? मैं नहीं बताता तो बताइये आपका काम कैसे होता? मैंने ही बताया कि वह कार में खाता है। मेरा सेवा शुल्क इसी बात का है कि अफसर तक पहुंचने का मार्ग पीडि़त लोगों को बताता रहूं। आपने डेढ़ सौ रूपये दिये ही इसी बात के हैं। पचास रूपये और दें तो एक बात और बताऊं?’

मैंने पचास का नोट थमा दिया और वह बोला-‘आपका एक डेढ़ लाख का चैक बन गया है, उसे चाहो तो कैशियर से ले आओ।’

‘कैशियर, परन्तु यह भी बताओ कि वह मुझे भेजा क्यों नहीं जा रहा?’ मैंने पूछा।

‘वह इसलिए नहीं भेजा जा रहा, क्योंकि कैशियर आपसे सौ-सौ के पांच नोट प्राप्त करने को बेताब है।’

मैं लपककर कैशियर के पास पहुंचा। कैशियर संजीदा हो गया मुझे देखकर। मैंने पांच सौ-सौ के नोट चढ़ाये तो हैं….हैं…… कर हंसने लगा। मैंने चैक लिया और घर आ गया। परन्तु मैंने आकर सांस भी नहीं ली कि बाहर कार का हार्न बज उठा। मैंने सिर पीट लिया। बाहर देखा तो कार में अफसर सिगार फूंक रहा था। मैंने बाहर आकर कहा-‘मैं तो लंच ले चुका।’

‘लेकिन मैंने नहीं किया है।’

विवश होकर कार की पिछली सीट पर बैठ गया। सौ-सौ के नोट सीट के नीचे धरने लगा तो उसने टोक दिया-‘इन्हें अपनी जेब में रख लो। मैं तुम्हें यह बताने आया हूं कि अगले साल एक लाख में काम नहीं हो सकेगा। पूरे दो लाख लूंगा, तब तो कार में बैठना अन्यथा रास्ता नापना। अब कार से उतर जाओ।’

उसने मुझे फिर अपरिचित जगह उतार दिया। मैंने आटो करके घर की राह पकड़ी। मैं लगातार यह सोचता रहा कि आखिर यह आदमी इतना ईमानदार क्यों है। रिश्वतखोरों की इस ईमानदार दुनिया पर मैं हैरत में था। अगले साल दो लाख देकर सात लाख मारूंगा। लूटो और खाओ, खाओ और खिलाओ और यही तो है हमारी नौकरशाही का असली चेहरा।

पूरन सरमा

 

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