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अनेक आकांक्षाएं और बजट 2020

अनेक आकांक्षाएं और बजट 2020

अर्थव्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ेगी यह केवल बजट से ही तय नहीं होगा। इसमें और भी कई पहलू शामिल हैं। उदाहरण के लिए, संसद ने जब दिवालियापन कानून, दिवालिया और दिवालियापन कोड 2016 पारित किया, तब निश्चित रूप से यह उन बीमार बैंकों को मिला एक बड़ा प्रोत्साहन था जो बकाया वसूली के सरल और तेज तरीके से चाहते थे, साथ ही, उन कॉरपोरेट का भी उत्साह बढ़ा जो अनेक कारणों से संघर्ष कर रहे हैं, जिनमें क्षेत्रवार मंदी शामिल है। इस संबंध में, जम्मू-कश्मीर को अवसरवादी राजनीति और नीतिगत पक्षाघात की बेडिय़ों से आजाद कराने वाले कानून को पारित किए जाने पर भी गौर करना चाहिए। आतंकी गतिविधियों पर प्रहार और सबसे नए केंद्र शासित प्रदेश में कंपनियों के लिए नए उद्यमों की शुरुआत की संभावनाओं के बीच, आर्थिक गतिविधियां बढऩे के आसार हैं, जिनसे स्थानीय युवाओं को रोजगार और फैक्ट्री उत्पादन में विस्तार की उम्मीदें पूरी होंगी। इस आलोक में, वह केंद्रीय बजट जिसे वित्तमंत्री द्वारा महीने भर से भी कम समय में पेश किया जाना है उसे मील का पत्थर नहीं तो एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में अवश्य देखा जा सकता है।

उम्मीदें आसमान छू रही हैं और हों भी क्यों नहीं? आगामी बजट को लेकर होने वाली चर्चा प्राइम टाइम न्यूज बन चुकी है और आर्थिक मामलों के जानकारों ने अनेकानेक उपाय सुझाए हैं। ऐसी चर्चा आम है कि कर की व्यक्तिगत दरों में कमी होगी, सरकार की ओर से शिक्षा तथा अन्य सामाजिक क्षेत्रों में अधिक खर्च किया जाएगा और राजकोषीय विवेक का पालन होगा, जो लंबे समय से बीजेपी सरकार के बजट की एक बड़ी बात रही है। एक कार्यकारी आदेश के तहत कॉरपोरेट टैक्स दरों में पहले ही की जा चुकी कटौती चर्चा को इस विषय से भटका रही है कि बजट 2020 में कॉरपोरेटों के लिए क्या किया जाना चाहिए। सरकार के सामने विचार करने वाली अनेक प्रकार की चिंताएं हैं, जिनमें उम्मीद से कम जीएसटी का संग्रह और मुद्रास्फीति की ताकतें शामिल हैं, जिनमें हाल के दिनों में खाने-पीने की चीजों में महंगाई से वृद्धि देखी गई है। चूंकि सरकार ने यह स्वीकार किया है कि देश में आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ गई हैं, इसलिए किसी को भी यह उम्मीद है कि महत्वपूर्ण चिताओं को हाशिए पर धकेला नहीं जाएगा।

तो फिर कौन-कौन सी घोषणाएं होने वाली हैं? आगामी बजट सरकार के पिछले प्रयासों से किस प्रकार अलग होगा और क्या नए प्रयास बाजार में सकारात्मकता का माहौल बना पाएंगे? हालांकि, ठीक-ठीक कोई भी नहीं बता सकता है कि नीति निर्माताओं के मन में क्या चल रहा है, तो चलिए हम यह पता लगाते हैं कि क्या-क्या उम्मीदें हैं और सरकार उन्हें कैसे पूरा कर सकती है।

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व्यक्तिगत आयकर में कटौती

एक बात पक्की है कि विपक्ष, यहां तक कि सरकार के सबसे कट्टर आलोचक भी वित्तमंत्री की ओर से व्यक्तिगत आयकर की दरों में कटौती या आयकरदाताओं के हित में स्लैब में परिवर्तन की आलोचना से पहले सौ बार सोचेंगे। यह महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है कि कुल आबादी का एक छोटा हिस्सा ही कर अदा करता है। इसके साथ ही, पिछले वित्त वर्ष में व्यक्तिगत कर से प्राप्त राजस्व रुपए 5 लाख करोड़ से थोड़ा ही कम था और यह राजस्व के इस स्रोत के महत्व को दर्शाता है। पिछले बजट में, सरकार ने बेहद अमीरों पर अधिक शुल्क लगाने का निर्णय लिया और एक साल में रुपए 2 करोड़ से अधिक की आय वाले व्यक्तियों पर सरचार्ज बढ़ा दिया गया था।

पिछले वर्ष सितंबर में प्रभावी कॉरपोरेट टैक्स की दर को 35 प्रतिशत से घटाकर 25.17 प्रतिशत करने का जो ऐलान किया गया उसे देखते हुए, सरकार के पास व्यक्तिगत टैक्स दरों में कटौती की गुंजाइश बेहद कम है। भारत सरकार के कुल कर राजस्व में चूंकि प्रत्यक्ष कर का हिस्सा लगभग 55 प्रतिशत है, और अप्रत्यक्ष कर से पूरा होने वाले बाकी के आधा हिस्से पर पहले से ही नरमी है, इसलिए सरकार व्यक्तिगत कर से राजस्व के नुकसान को सहने की स्थिति में नहीं है। फिर भी, सरकार ने ऐसे आंकड़े सामने रखे हैं जिनसे पता चलता है कि व्यक्तिगत आयकर में अनुपालना कई गुना बढ़ी है और अनुपालना में यह सुधार करदाताओं के लिए थोड़ी राहत का आधार बन सकता है। अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई है और जीडीपी विकास दर घट कर 5 प्रतिशत से कम हो गई है। अर्थशास्त्री इस पर सहमत हैं कि समस्या आपूर्ति के पक्ष से नहीं बल्कि मांग के पक्ष से है, जो लंबे समय से कमजोर बनी हुई है। अन्य कई कारणों के साथ ही, यात्री वाहनों की बिक्री में कमी, यह बताती है कि लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसों की कमी है।

यह व्यक्तिगत आयकर की दरों में कटौती का एक अच्छा आधार है। सरकार ने रुपए 5 लाख तक की आय को पहले ही करमुक्त कर दिया है। इस बार, सरकार रुपए 5 लाख से ऊपर की आय पर लगाई जाने वाली टैक्स की दरों में कुछ प्रतिशत अंकों की कटौती कर सकती है। इस राहत का विस्तार सभी आय वर्गों तक किया जा सकता है, जिनमें वे बेहद अमीर भी शामिल हैं जो रुपए 5 करोड़ से अधिक की आय पर 43 प्रतिशत तक की ऊंची दर से टैक्स का भुगतान कर रहे हैं। लोगों के पास अधिक पैसा होगा तो वे अधिक खर्च करेंगे, और इस प्रकार, मांग पक्ष को प्रोत्साहन मिलेगा। यह सीधा सा अर्थशास्त्र है। लेकिन यह तस्वीर तब जटिल हो जाती है जब आप मुद्रास्फीति के नवीनतम आंकड़ों को देखते हैं जो दिसंबर 2019 में मुद्रास्फीति में 7.35 प्रतिशत वृद्धि को दिखाते हैं। यह कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है। वास्तव में, सब्जियों की कीमतें बेतहाशा बढ़ी हैं और टैक्स की दरों में कोई राहत नहीं मिली तो मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं पर एक और प्रहार होगा।

इन सबके बीच, सरकार आगामी मौसम में खाद्य पदार्थों की बेहतर पैदावार पर भरोसा और उपभोक्ता उत्पादों के साथ ही फैक्ट्री के अन्य महत्वपूर्ण उत्पादों के वर्ग में दाम कम होने से मांग में वृद्धि की आशा कर सकती है। कार और टू-व्हीलर निर्माता तथा उनके रिटेलर जिस प्रकार नौकरियों में कटौती कर रहे हैं उससे नौकरी के क्षेत्र में संकट का पता चलता है। इन उत्पादों की मांग में वृद्धि ही इससे उबार सकती है, जो मध्यमवर्गीय आबादी के हाथों में खर्च करने की अधिक क्षमता देकर ही संभव हो सकता है।

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विनिवेश

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी कम करना ऐसा क्षेत्र है जहां मोदी सरकार का प्रदर्शन औसत से नीचे रहा है। किसी समय पर जो भारतीय उड्डयन क्षेत्र के सिर का ताज हुआ करता था, वह एअर इंडिया बिक्री के लिए खड़ा है लेकिन एअर इंडिया की परिसंपत्तियों की तुलना में उसके ऊपर बकाए के बोझ को देखते हुए कोई भी खरीदार उसे खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है। पिछले साल के बजट में, विनिवेश का लक्ष्य लगभग रुपए 1 लाख करोड़ था और जब ढाई महीने ही बचे हैं, तब सरकार इस लक्ष्य को पाने में बहुत बड़े अंतर से चूक सकती है। आर्थिक मामलों पर कैबिनेट कमेटी ने जहां भारत पेट्रोलियम (बीपीसीएल), कनटेनर कॉरपोरेशन (कॉनकोर) तथा अन्य पीएसयू में पिछले साल हिस्सेदारी को बेचने को मंजूरी दे दी थी, वहीं 2020 में समाप्त हो रहे वित्त वर्ष में इससे होने वाली वसूली संभव नहीं हो पाएगी। मोदी सरकार ने पिछले वित्त वर्ष में जिस प्रकार रणनीतिक विनिवेश में उम्मीद से बेहतर काम किया था, उसे देखते हुए, बजट के राजस्व पक्ष पर बढ़ते दबाव के बीच, मौजूदा कमी, समस्याओं को और बढ़ा देगी।

सरकार अब ऊपरोक्त उपक्रमों में हिस्सेदारी को बेचने के लिए तैयार है, जो वर्तमान या अगले वित्त वर्ष में संभव होगी, तो वित्त वर्ष 2021 के लक्ष्यों को पहले से कहीं अधिक महत्वाकांक्षी रखने की जरूरत है। और इसके अनेक कारण हैं। विनिवेश के पक्ष में जहां एक तर्क यह है कि सरकार की भूमिका कंपनियों के कामकाज में कम होनी चाहिए, वहीं जो दूसरा तर्क है और वास्तव में अधिक महत्वपूर्ण है कि अनेक पहलुओं में पीएसयू अपने निजी क्षेत्र के साथियों से पिछड़ती रही है। पीएसयू की संख्या कम से कम होने और उनका निजीकरण करने को लेकर एक दमदार तर्क दिया जाता है। बाल्को और हिंदुस्तान जिंक के निजी हाथों में जाने के बाद उत्पादन में वृद्धि एक बड़ा कारण है जिससे बजट 2020 में हिस्सेदारी को बेच कर अधिक से अधिक राजस्व प्रात्त करने का लक्ष्य रखा जाए।

समान क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी कंपनियों के बीच जब एक सीधी तुलना की जाती है, तब पीएयपू में हिस्सेदारी को बेचने का मजबूत कारण सामने आता है। जेएसडब्लू स्टील लिमिटेड ने पिछले दशक में जहां अपना उत्पादन चार गुना बढ़ा लिया, वहीं सेल का उत्पादन मात्र 7 प्रतिशत बढ़ सका। कच्चे तेल के क्षेत्र में, केयर्न इंडिया अपने सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वी ओएनजीसी से काफी आगे है। खनन में, एनएमडीसी की तुलना जब वेदांता की खनन कंपनी से की जाती है तो वह उसके आसपास भी नहीं दिखती। कोल इंडिया का प्रदर्शन औसत से भी कम है जिसके कारण कोयले का आयात करना पड़ रहा है, जो भारत के व्यापार खाते के लिए नुकसानदेह है।

एक कदम से बजट 2020 अनेक समस्याओं को दूर कर सकता है। अगले वित्त वर्ष में विनिवेश के लक्ष्य को बढ़ाकर, सरकार न केवल कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की भरपाई राजस्व के एक निश्चित स्रोत से कर सकती है, बल्कि निजीकरण से जो दक्षता आएगी उससे इन कंपनियों का प्रबंधन बेहतर होगा, और बेहतर स्थित वाली कंपनियां विस्तार की गतिविधियों के लिए कर्ज की मांग को जहां बढ़ाएंगी वहीं रोजगार के अधिक अवसर भी पैदा करेंगी।

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राजकोषीय विवेक – जारी रखें या फिलहाल छोड़ें

राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण अच्छी बात है। आमदनी से अधिक खर्च कोई भी नहीं कर सकता है। लेकिन जब बात ढलान पर जाती अर्थव्यवस्था का दबाव झेल रहे भारत जैसे देश की हो तब वित्त का यह आसान सबक भी बेमानी हो जाता है। और इस वजह से ही ब्रिटिश अर्थशास्त्री, जॉन कीन्स इतने खास हैं। केनेसियन अर्थशास्त्र हमें बताता है कि जब मंदी के दबाव ने अर्थव्यवस्था को जकड़ लिया हो तब सरकारों को अधिक खर्च करना चाहिए। हां, भारत तकनीकी लिहाज से मंदी का सामना नहीं कर रहा है, फिर भी फैक्ट्री उत्पादन में कमी और आशा से कम जीडीपी विकास भारत के सामाजिक-आर्थिक संरचना को गंभीर क्षति पहुंचा सकता है। एक विकासशील देश के रूप में, भारत में अब भी एक बहुत बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। करोड़ों लोगों को गरीबी से उबारने की बात लंबे समय से सभी राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं लेकिन खजाना खोले बिना क्या ऐसा कर पाना संभव है?

मोदी सरकार के नेतृत्व में भारत एक सुरक्षित और मनोरथ पूरा करने के रास्ते पर चला है और जब बात केंद्रीय बजट को बनाने की आती है तब उसने राजकोषीय विवेक को मार्गदर्शक नीति के रूप में अपनाया है। लेकिन इसके साथ-साथ, यह भी देखना जरूरी है कि अर्थव्यवस्था, स्थानीय और वैश्विक, जितनी कठिनाई का सामना आज कर रही है उतना पहले नहीं कर रही थी। जीएसटी संग्रह अब तक सुदृढ़ नहीं हुए हैं और कंपनियां चूंकि निजी निवेश से बच रही हैं, जिससे प्रत्यक्ष कर संग्रह में आशा के अनुरूप वृद्धि नहीं हुई है, इसलिए राजकोषीय विवेक में ही समझदारी दिखती है। फिर भी, वह अधिक सरकारी खर्च का केनेसियन मॉडल ही था जिसने 2000 के दशक के आखिर में आए आर्थिक संकट से उबरने में अमेरिका और यूरोपीय देशों की सहायता की थी। सरकारी खर्च पर नियंत्रण के अपने ही नुकसान हैं और एक ऐसे देश में जहां बुनियादी संरचना पर खर्च जरूरतों को पूरा नहीं कर पाया है, वहां राजकोषीय घाटा राक्षस से कहीं अधिक रक्षक हो सकता है।

स्टील उद्योग से लेकर बेरोजगार युवकों तक, सरकारी खर्च में वृद्धि कई कारणों से खुशी की लहर पैदा कर सकती है। सड़कों और राजमार्गों तथा बंदरगाहों और स्वास्थ्य सेवा में बुनियादी खर्च सुस्त निजी निवेश की काफी हद तक भरपाई कर सकती है। नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स के कारण (वैसे हाल के दिनों में ऋण में वृद्धि हुई है और एनपीए कम हुआ है) बैंक पहले से ही मुश्किल में हैं और कॉरपोरेटों को नए कर्ज अपेक्षित मात्र में नहीं मिल रहे हैं। बुनियादी संचरना के विकास के लिए अधिक धन निर्धारित करना, भले ही इससे राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़े, बजट 2020 का सबसे महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है।

मोदी सरकार ने जिस प्रकार का राजकोषीय अनुशासन दिखाया उससे अर्थव्यवस्था को लाभ नहीं मिला, जिसके कई कारण हैं। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध से भारत के निर्यात क्षेत्र को नुकसान पहुंचा और अमेरिका से जर्मनी तक अर्थव्यवस्थाओं की रफ्तार धीमी पड़ गई, जिससे भारतीय उत्पादों की मांग कम हो गई। जब तक मांग में आती कमी पलटती नहीं, तब तक अर्थव्यवस्था में तेजी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। भारत के बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश की अपार संभावना है और सरकार की ओर अधिक खर्च किए जाने पर, नौकरियों में वृद्धि होगी जिससे अंतोगत्वा लोगों की ओर से अधिक खर्च की उम्मीद की जा सकती है। राजकोषीय विवेक को कम से कम 2 से 3 वित्त वर्ष तक दरकिनार करना और अधिक खर्च के सफर पर बढऩा सही कदम होगा।

नई तकनीकों को विशेष प्रोत्साहन

भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्रों (स्श्र्वं) का निर्माण निर्यात को बढ़ावा देने और लालफीताशाही को कम करने के लिए किया गया था। उनसे लाभ भी हुआ और सर्वाधिक संख्या में सेज वाले राज्य- तमिलनाडु, तेलंगाना और महाराष्ट्र उनके बनने से वित्तीय लाभ को उठा रहे हैं। वित्त वर्ष 2021 का केंद्रीय बजट इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि भारत को आर्थिक गतिविधि में नई जान डालने के लिए नए-नए उद्योगों को स्थापित करने की जरूरत है। मौजूदा प्रौद्योगिकी पर आधारित उद्यम अपने चरम पर पहुंच चुके हैं और इनसे प्राप्त होने वाला राजस्व स्थिर हो गया है।

अब नए युग की तकनीकों में निजी निवेश की जरूरत है, उदाहरण के लिए, कृत्रिम तकनीक और गैर-जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहन। जो काम सेज के साथ सीमा-शुल्क मुक्त आयात और कई वर्षों तक शत-प्रतिशत कर से छूट देकर किया गया था उसे नए उद्योगों के साथ दोहराने की जरूरत है जो उन क्षेत्रों में स्थापित किए गए हैं जिनमें आने वाले वर्षों में भारी मांग देखने को मिलेगी। उदाहरण के लिए इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग को ही ले लीजिए। लिथियम सेल और बैटरियों के निर्माण से लेकर पृथ्वी की दुर्लभ धातुओं की खोज में चीन सबसे आगे है। चीन अकारण ही अमेरिका से आंख से आंख मिलाकर, वह भी बिना झपकाए बात नहीं कर रहा है। नए युग की तकनीक में वे तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और ऐसे समय में भारत इनमें में कई महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों का आयातक बन गया है। इसरो ने कुछ वर्षों पहले जब तक लिथियम-आयन सेल तकनीक नहीं बनाया था तब तक हम कोई भी ऐसा सेल नहीं बना सके थे जिससे किसी इलेक्ट्रिक वाहन को ऊर्जा दी जा सके, और आज भी, इस तकनीक को उद्योग ने नहीं अपनाया है।

केंद्रीय बजट 2020 नए युग के उद्योगों को संबल दे सकता है। इन प्रौद्योगिकियों में शामिल कंपनियों को विशेष प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं और श्रम कानूनों तथा अन्य बाधाओं में राहत दी जा सकती है। बजट 2020 के माध्यम से ऐसी कंपनियों के लिए कॉरपोरेट टैक्स दर में थोड़ी और कटौती या शुरुआती 3 से 4 साल तक शून्य टैक्स की दर लागू की जा सकती है। निश्चित रूप से, इससे सरकार का राजस्व कम होगा लेकिन जो कंपनियां अपने शैशव काल में हैं, उनके लिए इस प्रकार के सहयोग की प्रणाली अत्यावश्क है जिससे उन्हें ऋण प्राप्त करने और नौकरियों के सृजन में सहायता मिलेगी।

जैसा कि पहले बताया गया है, बजट 2020 अनेक नीतिगत कदमों में से एक होगा जिन्हें देश की आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए पूरे साल उठाया जाता है। उम्मीद के अनुसार, विभिन्न क्षेत्रों की अपनी-अपनी मांग होती है। उदाहरण के लिए, रत्न और आभूषण उद्योग सोने पर आयात शुक्ल में कमी की उम्मीद कर रहा है और रिएल्टरों की नजर आईटी एक्ट की धारा 43सीए (कीमत घटाने पर जुर्माना) में संशोधन पर टिकी है। बैंकिंग क्षेत्र में, सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की उम्मीद रहेगी और यह देखना होगा कि वित्तमंत्री किस प्रकार एनबीएफसी क्षेत्र की समस्याओं से निपटती हैं।

संक्षेप में, बुनियादी विकास के रास्ते आर्थिक विकास में नई जान फूंकने की जरूरत को देखते हुए सरकार अगर राजकोषीय विवेक को कुछ समय के लिए छोड़ दे तो गलत नहीं होगा। व्यक्तिगत आयकर की दरों में थोड़ी कमी की जा सकती है ताकि मध्यम वर्ग अधिक खर्च कर सके, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में मांग की कमी को दूर किया जा सकेगा। विनिवेश पर राजस्व जुटाने की दृष्टि से फिर से विचार किया जाना चाहिए और उसके साथ ही साथ पीएसयू में दक्षता लाना तथा नए युग की प्रौद्योगिकी वाले उद्यमों को टैक्स से छूट देना बजट 2020 का एक हिस्सा होना ही चाहिए।

 

डॉ. सुनील गुप्ता

(लेखक चार्टर्ड एकाउटेंट हैं)

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