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रक्षा उत्पादन से पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की खुलती राह

रक्षा उत्पादन से पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की खुलती राह

यह सच्चाई सभी भारतीयों को पता है कि हम एक क्षेत्रीय शक्ति हैं और हथियारों के सबसे बड़े आयातक के तौर पर प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी हैं। इससे न केवल बहुमूल्य विदेशी भंडार को बड़े पैमाने पर गति मिलती है बल्कि इससे भी ज्यादा हथियार निर्माता देश अपनी चाल को अंजाम देने में कामयाब रहते हैं, जिससे पांच छह देशों का ही कब्जा बना रहता है। यह कारगिल युद्ध के दौरान भी देखा गया था। शीत युद्ध के दौरान, समस्या कम हो गई थी क्योंकि भारत को सोवियत संघ से भारतीय मुद्रा में भुगतान करके हथियार लेने की सुविधा थी। हालांकि, शीत युद्ध के बाद यह सुविधा खत्म हो गई, नतीजन सामरिक कौशल की कमी के चलते हमारी सामरिक भेद्यता बढ़ गई।

असल में, शीत युद्ध की समाप्ति के बाद,  पश्चिम का नेतृत्व एकतरफा संयुक्त राज्य अमेरिका के पास चला गया और इसलिए,  हथियारों की हमारी महत्वपूर्ण जरूरतें अमेरिका और उसके सहयोगियों के  सैन्य-औद्योगिक प्रभुत्व वाले देशों के शोषण पर निर्भर हो गईं। इसलिए, बदलती सुरक्षा की गति और भू-राजनीतिक प्रतिमान के साथ, हथियारों की आत्मनिर्भरता केवल 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य नहीं है, देश ने निकट भविष्य में इसकी परिकल्पना की है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हमारी सामरिक स्वायत्तता के लिए एक अपरिहार्य आवश्यकता है। वास्तव में, समय बदला है क्योंकि शीत युद्ध के खत्म होने के बाद भौगोलिक-राजनीतिक वातावरण कभी भी हमारे लिए इतना फायदेमंद नहीं रहा है। चीन के उत्थान और सामरिक हितों के लिए अमेरिका, जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर नए रणनीतिक संदर्भ में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के गठन को मजबूर किया गया है। अब जब अमेरिकियों ने अपने युद्ध सामग्री का 60 प्रतिशत हिस्सा एशिया प्रशांत क्षेत्र में रखने का फैसला किया है, तो इंडो-पैसिफिक का मतलब है कि भारत केवल हिंद महासागर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण चीन सागर से भी कही अधिक है। वर्तमान परिस्थितियों में, यदि भारत को इंडो पैसिफिक क्षेत्र में एक सार्थक भूमिका निभाने और क्षेत्रीय स्तर पर चीन को रणनीतिक चुनौती देने की उम्मीद है, तो हमारे पास उपयुक्त राजनयिक और रक्षा ताकत होनी चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रक्षा और कूटनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इस तरह, भारत के रणनीतिक साझेदारों के भारत में हथियारों के उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिए निहित स्वार्थ है, जो केवल तभी हो सकता है जब हमारे पास एक मजबूत स्वदेशी निर्माण क्षमता हो।

हम क्यों पिछड़ गए?

औद्योगिक क्रांति के बाद भारत उपनिवेश था और ब्रिटिश आकाओं की ओर से युद्ध लड़े गए, जिसमें उच्च रक्षा योजना या हथियार निर्माण के मामलों में रणनीति की कोई भूमिका नहीं थी। देश ब्रिटिश और गरीबी से प्रभावित था जिसके कारण भारतीयों को पहले और दूसरे विश्व युद्ध में भारी संख्या में युद्द की बलि के लिए इस्तेमाल किया गया था। असल में दूसरे विश्व युद्ध में ही, 2.5 मिलियन की एक भारी भरकम सेना को स्वैच्छिक आधार पर जुटाया गया और बाद में बिना किसी मुआवजे या पश्चाताप के युद्ध के तुरंत बाद नौकरी से निकाल दिया गया। हालांकि देश के पास आर्डिनेंस फैक्ट्री और हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड के तौर पर अपेक्षाकृत उत्कृष्ट रक्षा निर्माण का बुनियादी ढांचा था। लेकिन हथियार निर्माण संस्कृति और संसाधनों की कमी के कारण देश को स्वदेशी हथियार निर्माण क्षमता का सामना करना पड़ा। सच कहा जाए, तो हमारा औद्योगिक उत्पादन पूरी तरह से उपयोगिता की वस्तुओं पर केंद्रित था, न कि हमारी रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने के लिए। जिसके लिए सीधे तौर पर हमारे फैसला करने वाले दोषी हैं। जिनके पास न तो सोच है और न ही भारत को दुनिया में एक सैन्य बल के रूप में विकसित करने की इच्छाशक्ति। यद्दपि, स्वतंत्रता के बाद कुछ मामूली प्रयास किए गए लेकिन वो भी केवल कॉस्मेटिक प्रकृति के थे। मसलन, पहले भारतीय पीएम नेहरू ने स्वदेशी लड़ाकू विमान को विकसित करने की कोशिश की और इस सपने को साकार करने के लिए प्रसिद्ध एयरक्राफ्ट डिजाइनर कर्ट टैंक को नियुक्त किया, लेकिन बाद में उनका यह कदम नाकाम साबित हुआ और पूरा कार्यक्रम खत्म हो गया। देखा जाए तो भारत ने भी जबलपुर में अपने स्वयं के सैन्य वाहनों का उत्पादन शुरू किया, लेकिन विभिन्न कारणों से इस पहल का स्वदेशीकरण की दिशा में हमारे अभियान पर कम ही प्रभाव पड़ा।

मिशन मोड बनाम नौकरशाही मोड

जिस भी क्षेत्र में हम मिशन मोड में गए, हमने आश्चर्यजनक सफलता हासिल की। यह साफ तौर पर हमारी क्षमताओं को बताता है। उदाहरण के लिए, जब डॉ. होमी जे भाभा के अधीन परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की गई थी, तब इसे किसी मंत्रालय के अधीन नहीं किया गया था, बल्कि यह सीधे पीएम के तहत था। नतीजा सभी जानते हैं। उन दिनों परमाणु ऊर्जा आयोग बिना किसी नौकरशाही की रुकावट, मध्यस्थता या इंटरफेस के एक कागज रहित संगठन था। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि 50 के दशक के अंत तक भाभा ने परमाणु बम का परीक्षण करने की क्षमता का दावा किया था। अगर ऐसा होता तो 1962 का भारत-चीन युद्ध रुक जाता। डॉ. भाभा की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई जब उनका एयरक्राफ्ट 1966 में दुर्घटनाग्रस्त हो गया और हमारे कार्यक्रम को एक अस्थायी झटका लगा। बावजूद इसके, हमने बाधा पर काबू पा लिया और मिशन मोड में परमाणु बम की अपनी खोज जारी रखी। आज भारत परमाणु प्रौद्योगिकी में अग्रणी शक्तियों में से एक है, यही बात हमारी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कौशल के बारे में भी कही जा सकती है। हमारी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को भी पश्चिमी शक्तियों द्वारा खड़े किए गए तमाम विरोध का सामना करना पड़ा। इन शक्तियों ने भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रसिद्ध वैज्ञानिक नंबिनिकन पर एक झूठी कहानी गढ़कर जासूसी के आरोप लगाए ताकि इसरो की इस तकनीकी को नाकाम किया जा सके। मिशन मोड में होने के कारण मिसाइल तकनीक के साथ-साथ हमने परियोजना में कारगर उन्नति की है। इसलिए, वास्तव में हम जानते हैं कि भारतीय हथियारों का उद्योग क्या है। समाधान हमारे पास उपलब्ध है जैसा कि परमाणु और मिसाइल प्रौद्योगिकी में हमारे अनुभव द्वारा प्रदर्शित किया गया है। इससे अलग देखने की कोई मजबूरी नहीं है।

बदलाव की शुरुआत

मौजूदा समय में हथियारों और उपकरणों के निर्माण के लिए अखिल भारतीय पारिस्थिति और बुनियादी ढांचे के निर्माण की जरूरत है। इसे देखते हुए इस क्षेत्र में निवेश और प्रौद्योगिकी के लिए बोली लगाई गई है। निवेश, प्रौद्योगिकी और तकनीकी जनशक्ति सबसे कठिन चुनौतियां हैं। इसके लिए उन देशों के अनुभव भी आकर्षित करते हैं, जिन्होंने रक्षा उद्योगों को बढ़ावा देने और सुविधा के लिए औद्योगिक क्लस्टर बनाए हैं। इसने स्पेशल इकॉनोमिक जोन (एसईजेड), नेशनल इन्वेस्टमेंट जोन और इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने के अपने प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। ये औद्योगिक क्लस्टर प्रदर्शन, लाभ, अर्थव्यवस्था के पैमाने, विशेष उपक्रमों की निकटता, कम परिवहन लागत और एकीकृत नेटवर्क के मकसद से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे औद्योगिक क्लस्टर का एक उदाहरण दक्षिणी फ्रांस में मार्सिले है, जो विमान के पुर्जों और हेलीकॉप्टर डिजाइनों के निर्माण में माहिर है। यह बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार प्रदान करता है और इसमें एयरोस्पेस सिमुलेटर और प्रशिक्षण केंद्रों की भी सुविधा है। इसी तरह, मलेशिया में लुमुट और मंजुंग क्लस्टर है। इस क्लस्टर ने 200 से अधिक समुद्री उद्योगों को आकर्षित किया है। इसमें नौसेना अकादमी और अनुसंधान केंद्र भी शामिल है। हमारे मामले में, इन समूहों, एसईजेड, एनआईएनजेड को स्वदेशी हथियार उद्योगों द्वारा शुरुआत की परेशानियों को ठीक करने के लिए उचित बुनियादी ढांचे और कर की जरूरत है। यह भी माना जाना चाहिए कि आधुनिक फाइटिंग प्लेटफॉर्म प्रकृति में बहु-विषयक हैं। कोई भी निर्माता सभी डोमेन को पूरा नहीं ले सकता है, इसलिए उन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादन, रखरखाव और अर्थव्यवस्थाओं के लिए विभिन्न अन्य निर्माताओं के साथ निकटता की जरूरत है। इसलिए, एक दूसरे का सहयोग जरूरी है।

शस्त्र निर्माण नीति

भारतीय प्रतिष्ठान ने हथियारों की खरीद और उद्योग के निर्माण के लिए अलग-अलग तरीकों की घोषणा की है मसलन, मेक इन इंडिया, बाय इंडियन (आईडीडीएम-स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित), बाय और मेक (भारतीय)। इसके पीछे प्रेरणा भी स्पष्ट है – हम खरीद (वैश्विक) के लिए बंधक नहीं बनना चाहते हैं। हम घरेलू बुनियादी ढांचे को स्थापित करने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की तलाश के लिए वैश्विक ओईएम (मूल उपकरण निर्माता) के साथ रणनीतिक साझेदारी की भी मांग कर रहे हैं। ऑफ-सेट दायित्वों पर अपनी नीति को भी लगातार संशोधित कर रहे हैं। भारतीय सशस्त्र बलों के लिए बड़ी संख्या में प्राप्ति को देखते हुए,, वैश्विक खिलाडिय़ों द्वारा मेक इन इंडिया के लिए एक बड़ा अवसर है।

चुनौतियां

दुनिया के किसी भी देश में हर तरह के हथियारों, उपकरणों के डिजाइन और निर्माण की क्षमता नहीं है। तो मेक इन इंडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती प्रौद्योगिकी और कौशल के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के निर्माण की है। इलेक्ट्रॉनिक्स और धातु विज्ञान दो प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाना है। यह केवल तभी हो सकता है जब उद्योग और शिक्षाविदों के बीच साझेदारी हो। हमें रक्षा मेक्ट्रोनिक्स (मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग) पर विशेष ध्यान देने के साथ प्रतिभाओं का पोषण करने की जरूरत है क्योंकि तकनीकी जनशक्ति की मौजूदा आपूर्ति केवल पीएसयू और रक्षा सेवाओं से है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एसईजेड, एनआईएनजेड और औद्योगिक गलियारों को कर लाभ, कारोबारी प्रोत्साहन के लिए उदार आर्थिक नीतियों, पर्याप्त बिजली, पानी की आपूर्ति उद्योग की उम्मीद को पूरा करने की जरूरत है और  एसईजेड की श्रृखंला के तहत सड़कों, रेलवे, हवाई अड्डों, टेलीफोन लाइनों जैसी जरूरी चीजों की भी जरूरत है।

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आर्थिक गलियारे

भारत ने पांच औद्योगिक गलियारों की घोषणा की है। ये गलियारे स्मार्ट शहरों के साथ बनाए जाएंगे और बड़े आर्थिक गलियारों का हिस्सा होंगे। 1043 किमी लंबे दिल्ली- मुंबई आर्थिक गलियारे का निर्माण 90 बिलियन अमरीकी डालर की लागत से किया जा रहा है, जो भारतीय राजनीतिक पूंजी को वित्तीय पूंजी से जोड़ेगा। गलियारों में नौ मेगा औद्योगिक क्षेत्र होंगे, प्रत्येक क्षेत्र में 200-250 वर्गमीटर का हिस्सा होगा। जो हाई-स्पीड फ्राइट लाइन, छह हवाई अड्डे, छह-लेन एक्सप्रेसवे, एक 4000 मेगावाट बिजली संयंत्र, औद्योगिक हब और क्लस्टर से जुड़ा हुआ है।

डिफेंस कॉरिडोर

सरकार दो रक्षा गलियारे स्थापित कर रही है, चेन्नई- बेंगलुरु गलियारा जो चेन्नई-होसुर-कोयंबटूर-सालर-तिरुची से गुजरेगा। दूसरा बुंदेलखंड गलियारा है, जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच विभाजित है, जिससे 2 लाख 50 हजार करोड़ रुपये का राजस्व आने की संभावना है।

नतीजा

हथियारों के उद्योग के हर क्षेत्र में देरी से प्रवेश नहीं किया जा सकता। इजरायल ने इसका एहसास किया और विनिर्माण प्लेटफार्मों पर समय और संसाधनों को खराब नहीं करने का फैसला किया। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य ऐड-ऑन को बढ़ावा मिलता है, जो हथियार प्रणाली को चुस्त और मजबूत बनाता है। इसी तरह, हमें प्लेटफार्मों के निर्माण पर अपनी ऊर्जा और संसाधनों को नष्ट नहीं करना चाहिए। बल्कि, हमारा ध्यान ऐसी तकनीकों को विकसित करने पर होना चाहिए, जिनमें दोहरा अनुप्रयोग हो। यह हमें अपने दुर्लभ संसाधनों को बेहतर तरीके से उपयोग करने में भी मदद करेगा। इस संबंध में हम शुरुआत कर चुके हैं,। रक्षा मंत्रालय ने कार्बन नाइट्राइड नैनोमीटर को विकसित करने के लिए वैज्ञानिक अजय एम वीनर को 2 मिलियन अमरीकी डॉलर दिए हैं।

यह नैनोमीटर उपलब्ध सिस्टम की तुलना में अधिक कुशलता से वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करता है। आखिर में  हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी हथियार उत्पादन परियोजनाएं नौकरशाही मोड के बजाय मिशन मोड में हैं। हमारे पास वास्तव में क्षमता है। हमारे पास धनुष आर्टिलरी गन, पिनाका एमबीआरएल, ब्रह्मोस, अर्जुन एमबीटी, ध्रुव हेलीकॉप्टर, तेजस एलसीए, परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत और ऑफ शोर पेट्रोल पोत जैसे हथियार हैं। भारत ने अब अपने स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस  विक्रांत-1 का निर्माण शुरू कर दिया है।

4  अक्षय कुमार

(लेखक कारपोरेट सेक्टर में कार्यरत हैं)

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