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बजट 2020 की तीन वैचारिक विशेषताएं

बजट 2020 की तीन वैचारिक विशेषताएं

बजट वर्ष भर की सबसे बड़ी आर्थिक घटना होती है। साधारणत: उसे आय-व्यय के लेखे-जोखे और नीति दस्तावेज की तरह देखा जाता है। सारा संकेद्रण किस वर्ग को क्या मिला, किस सेक्टर पर क्या असर पड़ा, किस क्षेत्र ने अधिकांश साधन खींच लिए या फिर स्टॉक मार्केट या विभिन्न उद्योगों पर क्या असर पड़ा इत्यादी की विवेचना पर होता है। कुछ विशेषज्ञ चर्चाओं एवं समीक्षाओं में अर्थव्यवस्था के लघु, मध्यम व दीर्घकालिक प्रभावों पर बात कर ली जाती है। और इसके अलावा होती है ढेर सारी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं।

इस सब संगत-असंगत शोर में और आकड़ों के दुरूह जाल में अक्सर बजट की भावना उसमें छिपे ‘बिग-आइडियाज’ या उसकी विशिष्टतांए अक्सर अनदेखी रह जाती हैं।

दरअसल नीति-निर्णयों के दिशासूचक व सरकार की मनोभावना उसके जनता से ‘आर्थिक संवाद पर्व’ के रूप में बजट को विश्लेषित करने की परंपरा अभी भारत में विकसित ही नहीं हुई, जहां इस दस्तावेज की मीमांसा राजनीति व हल्की कारोबारी आर्थिक समीक्षा से ऊपर और परे होने की संभावना बनती है। जहां देश को एक ‘इकॉनोमी’ से वृहत्तर तौर पर देखने व समझने का प्रयत्न किया जाता है।

इस लेख के माघ्यम से साधारण समीक्षा के परे ऐसे कुछ विशिष्ट विचारों पर आपसे चर्चा करना चाहती हूं।

सांस्कृतिक अर्थवाद

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत के विचार का पर्याय है, पर दुर्भाग्य से आर्थिकी की जब भी बात होती है तो हम पश्चिम की ओर देखते हैं। चाहे वह विकास की अवधारणांए हो, मॉडल हो या अर्थशास्त्रीय विचार हो। एक देश के रूप में हम सुदृढ़ राजनैतिक ही नहीं आर्थिक शक्ति भी पुरातन काल से रहे। इस बार के ‘आर्थिक सर्वेक्षण’ और बजट में भारतीय आर्थिक विचार जिसमें ‘समृद्धि की रचना’ (Wealth Creation) ‘उद्यमिता’ व गुड गवर्नेंस की भारतीय आर्थिकी में पुरातन काल से महत्ता व ‘शाश्वत मूल्यों’ की भांति प्रतिपादन करके उसे वाणी दी गयी। इसे चिन्हित करना और भारतीय अर्थ-धारणाओं के आधार पर नीति रचना की बात करना एक अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक पहल है। मैं अगले कुछ लेखों में इस विषय पर आपसे और बात करूंगी पर अभी इतना ही कि यह भारत में ‘सांस्कृतिक अर्थवाद’ के उदय का सूत्रपात है। अब इसके अगर आंकड़े भी जोडऩे हों तो प्रारंम्भिक तौर पर भारत की परंपरा व सांस्कृतिक धरोहरों पर व संग्रहालय निर्माण व भारत को एक ‘सॉफ्ट पावर’ के तौर पर स्थापित करने का यत्न सग्रहालयों, धरोहरों और पर्यटन पर खर्च के आकड़ों से समझा जा सकता है।

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‘विश्वास’ व मुक्त अर्थव्यवस्था का संयोग

अगर आपने आर्थिक सर्वेक्षण ध्यान से पढ़ा है तो असका प्रमुख विचार ही ‘विश्वास’ व ‘मुक्त अर्थव्यवस्था’ का अनुकूलतम मिश्रण है। अगर मुक्त अर्थव्यवस्था के ‘इनविसिबल हैंड’(Invisible hand) से विश्वास जोड़ दिया जाए तो अनुकूलतम परिणाम आयेंगे

‘विश्वास’ सरकार का जनता में और जनता का सरकार में, निवेशक का बाजार व बैकिंग में, बैंक का उद्यमिता में, उद्यमिता का ‘जोखिम में विश्वास ही वह तत्व है जो एक अर्थव्यवस्था को ‘उछाल’ का ‘सेंटीमेंट’ या भावना देता है। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में केवल इस विश्वास का बारम्बार जिक्र ही नही’ किया पर ऐसे कदम भी प्रदर्शित किये हैं, जो इस विश्वास को बढायेंगे 1 लाख से 5 लाख का बचत धारक की इन्शोरेंस सीमा बढ़ाना, आयकर में पुराने या नये में चयन की स्वतंत्रता, छोटे उद्योगों के लिए ‘ऋण’ रीस्ट्रक्चर करने की मियाद को बढ़ाना, और बैंकिग व एनबीएफसी सैक्टर में नये कदम जहां जनता का विश्वास बढ़ायेंगे वहीं जिस धटक पर समीक्षाओं में बात नहीं की गयी वह है भारत की युवा जनता पर ‘उद्यमिता’ से ‘वैल्थ क्रियेशन’ के लिए उत्साह व इच्छा होने का भारत की सरकार का जनता पर विश्वास। एक उत्प्रेरक वातावरण से भारत का युवा व उद्यमी लाभ उठा सकने में समर्थवान है इसका विश्वास। पूरे आर्थिक सर्वेक्षण एवं बजट में मुक्त अर्थव्यवस्था से उत्पन्न हाने वाले रोजगार निवेश व विकास से पैदा होने वाले अवसरों का भारत का नागरिक लाभ ले सकेगा, इसी विश्वास की अनुगूंज है। यही तो मुक्त अर्थव्यवस्था की खूबसूरती है और यही महत्वकांशी भारत का सपना भी है। इसी परिप्रेक्ष्य में आप कंपनी एक्ट का सुधार, एलआईसी का विनिवेश, डीडीटी को हटाना, इत्यादि देखेगें तो सरकार के निर्णयों में 2014 से सूत्र-बद्धता नजर आती है। ‘उद्यम’ सरकार का काम नहीं है बल्कि उन्नत उद्यमिता के लिए उत्प्रेरणा व ‘गुड गवर्नेस’ देना यह सरकार का धर्म है।

युवा ‘न्यू’ इकॉनोमी से निर्यातोन्मुखता तक

युवा-भारत इस नयी अर्थव्यवस्था का ‘नेवीगेटर’ होने वाला है यह बात वितमंत्री ने बहुत गहराई से समझी है। चाहे नयी शिक्षा नीति की बात हो, इंफ्रा पाइप लाइन से रोजगार की बात हो, स्टार्ट अप्स में नये टैक्स सुधार हों या श्रम शक्ति निर्यात द्वारा रोजगार-जिसके लिए अध्यापन व नर्सिंग के क्षेत्र में ब्रिज कोर्स शुरू करने की बात है या ‘शिक्षा’ के क्षेत्र में 99300 करोड़ खर्च और ‘स्किल’ के क्षेत्र में  3000 करोड़ रूपये लगाने की बात है, हर निणर्य में ‘एस्पेरेशनल युवा भारत’ का प्रतिबिंब होती है। राजस्थान में किये एक प्रयोग ‘युवा विकास प्रेरक’ जैसा ही प्रयोग युवा इंटर्न (Interns) को स्थानीय निगम निकाय में एक वर्ष के लिए इंटर्नशिप पर लेना हो या क्वांटम कंप्यूटिंग पर आने वाले पांच वर्ष में 8000 करोड़ रूपये का व्यय करना हो- सरकार की युवाओं की आकांक्षाओं के अनुरूप अर्थव्यवस्था रचने की इच्छा स्पष्ट प्रतिबिंबत होती।

साथ ही ‘मेक इन इंडिया’ द्वारा निर्यात व रोजगार के लक्ष्य साधना इस ‘नयी आर्थिकी, की बदलती सोच को परिलक्षित करता है

आर्थिक सर्वेक्षण में जहां असेंबल इन इंडिया को निर्यात, रोजगार व विकास क्षमता पर गहराई से लिखा गया है वहीं बजट में कस्टम ड्यूटी को कई उत्पादों पर बढ़ा कर जहां ‘स्वदेशी’ को बढ़ावा देने की बात है वहीं निर्यात को आसान व प्रोत्साहन देने के लिए कई उपाय जिसमें ‘निरविक’ जैसे उपाय व्यवहारिक हैं, उन पर भी घ्यान दिया है।

आर्थिक विकास, समाज में वंचित के विकास की इच्छा यानि अंत्योदय और आकांक्षावान भारत की त्रि-सिद्धांत पर खड़ा यह बजट वास्तव में नये भारत का विजन प्रस्तुत करता है। ऐसा भारत जो तकनीक के उभरते क्षेत्रों के साथ-साथ अपनी समृद्ध परंपरा व वैचारिक विरासत के आधार पर विश्व में अपनी अलग आर्थिक पहचान उकेरना चाहता है।

डॉ. ज्योति किरण शुक्ला

(लेखिका पूर्व अध्यक्षा, राज्य वित्त आयोग, राजस्थान, हैं)

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