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नागरिकता संशोधन का तर्कहीन विरोध

नागरिकता संशोधन का तर्कहीन विरोध

नागरिकता कानून में संशोधन को लेकर देश में एक राजनीतिक विरोध का माहौल पैदा कर दिया गया है। भारत में नागरिकता कानून 1955 में लागू किया गया था जिसमें धारा-2(बी) के अन्तर्गत ‘अवैध प्रवासी’ शब्द की परिभाषा इन शब्दों में दी गई है – ”वह विदेशी जो पासपोर्ट या अन्य आवश्यक यात्रा दस्तावेजों आदि के बिना भारत में प्रवेश करता है। इसके साथ-साथ वह विदेशी जो बेशक ऐसे वैध कानूनी दस्तावेजों के साथ भारत में प्रवेश करें परन्तु निर्धारित समय सीमा के बाद भी भारत में ही रहता रहे।’’

इसी प्रकार नागरिकता कानून की धारा-3 जन्म पर आधारित नागरिकता को भी परिभाषित करती है। नागरिकता का विस्तार वर्ष 2004 के नागरिकता संशोधन कानून के द्वारा भी किया गया था। इसी प्रकार वर्ष 1985, 1992 तथा 2005 में भी नागरिकता कानून के कुछ प्रावधानों में संशोधन किये गये थे।

केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मई, 2014 में सरकार का गठन हुआ था। मैं उस समय राज्यसभा का सदस्य था। मैंने राज्यसभा की याचिका समिति के समक्ष एक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था। इस प्रतिवेदन में कहा गया था कि पाकिस्तान के अनेकों हिन्दू अल्पसंख्यक लोग धार्मिक हिंसा के कारण भारत में आकर बस चुके हैं। ये लोग लम्बी अवधि के वीजे पर भारत आकर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब तथा दिल्ली सहित कई अन्य राज्यों में बसे हुए थे। ये लोग अब भारत में ही रहने के इच्छुक हैं और इस सम्बन्ध में इन्होंने अनेकों बार भारत सरकार को आवेदन भी किया है। इनकी मुख्य मांग है कि इनकी भारत में प्रवास की अवधि बढ़ाई जाये और इन्हें स्थाई नागरिकता का अधिकार दिया जाये। मेरी इस याचिका के उत्तर में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने अपना 15 दिसम्बर, 2014 का एक निर्देश पत्र मुझे भेजा जिसमें यह कहा गया था कि पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, इसाई और बौद्ध अल्पसंख्यक लोगों को ही लम्बी अवधि का वीजा दिया जाता है, जिससे वे भारत के स्थाई नागरिक बन सकें। इसके अतिरिक्त उन पाकिस्तानी महिलाओं को भी यही लाभ दिया जाता था जो भारतीय नागरिक के साथ विवाह करके भारत में रह रही हों। इसी श्रेणी में ऐसी भारतीय महिलाएं भी शामिल की गई थीं जिन्होंने पाकिस्तानी नागरिकों के साथ शादी की परन्तु विधवा या तलाक की परिस्थितियों में उनका पाकिस्तान में रहना कठिन हो रहा था। सरकार ने यह स्वीकार किया कि लम्बी अवधि की वीजा वाले ऐसे अनेकों पाकिस्तानी नागरिकों की समस्याओं के आवेदन सरकार को मिले थे। गृह मंत्रालय ने इन सब परिस्थितियों और समस्याओं का अवलोकन करने के बाद लम्बी अवधि का वीजा देने की प्रक्रिया में कई संशोधन किये जिससे उनका भारत में आवास सरल भी हो सके और वे स्थाई नागरिकता के अधिकारी बन सकें। लम्बी अवधि का वीजा 5 वर्ष के लिए दिया जाने लगा। राज्य सरकारों को यह अधिकार भी दिये गये कि ऐसे लोगों को निजी रोजगार प्रारम्भ करने की सुविधाएं दी जा सकें। ऐसे परिवारों के बच्चों को हर प्रकार की शिक्षा की सुविधाओं से भी वंचित नहीं किया जा सकता था।

भारत मूलत: एक आध्यात्मिक देश है। बेशक हमारी मूल संस्कृति केवल वैदिक धर्म की शाखाओं के रूप में ही विद्यमान थी, परन्तु मुगलों और अंग्रेजों के राजनीतिक हमलों और शासनों के बाद इस्लाम और ईसाइयत भी एक धार्मिक विचारधारा के रूप में भारतीय समाज का ही एक अंग बन गये। यह भारतीय समाज की सहनशक्ति और उदारता का एक विशाल उदाहरण विश्व के सामने प्रस्तुत हुआ। वर्ष 1947 में भारत का विभाजन भी केवल राजनीतिक विरोध का ही परिणाम था। जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग की। समूची कांग्रेस को और भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने वाले किसी भी कांग्रेसी नेता या कार्यकर्ता को यह मांग मंजूर नहीं थी। स्वयं गांधी जी भी इस मांग के पक्षधर नहीं थे, परन्तु जिन्ना की जिद के सामने उन्हें उदारता दिखानी ही पड़ी। उन्होंने सोचा था कि शायद इस बंटवारे से देश के मुसलमानों को शांति महसूस होगी और किसी प्रकार का कलह-क्लेश नहीं होगा। परन्तु पाकिस्तान बनने के बावजूद भी लाखों लोगों को जान गंवानी पड़ी, घर से बेघर हुए, शिक्षा और रोजगार पूरी तरह से ठप्प हो गये। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बावजूद समाज की प्रवृत्ति नहीं बदली। भारत में लाखों मुसलमान पूर्ववत रहते रहे और इसी प्रकार लाखों हिन्दू और सिख पाकिस्तान में जीवन बिताते रहे। परन्तु पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं और सिखों की दुर्दशा लगातार बढ़ती रही। पाकिस्तान के अनेकों शहरों और गांवों से हिन्दुओं और सिखों पर अत्याचारों की खबरें सुनने को मिलती रहीं। भारत के हर ग्राम और मोहल्ले में श्मशान घाट है जबकि पाकिस्तान के हिन्दुओं को मृतकों के अन्तिम संस्कार करने के लिए 100 किलोमीटर की दूरी पर श्मशान घाट ढूंढना पड़ता है। पाकिस्तान में मंदिरों की घंटियां बजने पर आस-पड़ोस के लोग नींद हराम होने की आपत्तियां करते हैं। जवान लड़कियों का अपहरण करके धर्मांतरण और फिर मुसलमान लड़कों से निकाह तो आम बात हो गई है। अपहरण और बलात्कार की घटनाएं अल्पसंख्यक वर्ग की लड़कियों के साथ बहुत अधिक मात्रा में होती हंै। ऐसी घटनाओं  ने पाकिस्तान में हिन्दू, सिख आदि अल्पसंख्यकों का जीना पूरी तरह कष्टकारी बना दिया। यहां तक कि पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने भी वहां के अल्पसंख्यकों के विरुद्ध मानवाधिकार हनन की घटनाओं पर चिन्ता जताते हुए यह कहाा है कि इन अल्पसंख्यकों के पास तो शरण लेने का भी कोई स्थान नहीं है

विभाजन के पांच-छ दशकों के बाद भी कुछ लोग हिम्मत जुटाकर पाकिस्तान से भारत आते रहे और यहां के स्वर्ग को देखकर उन्होंने यह संकल्प कर लिया कि भारत की धरती पर मरना मंजूर है परन्तु पाकिस्तान जाने का अब कोई लाभ नहीं।

जब कोई व्यक्ति अपने देश से दूसरे देश प्रवेश करने की अनुमति चाहता है और स्थाई रूप से दूसरे देश में बसना चाहता है क्योंकि उसके अपने देश में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन होता है और वह हर समय प्रताडि़त महसूस करता है, ऐसे व्यक्तियों को शरणार्थी कहा जाता है, क्योंकि वे कानून के अनुसार शरणागति प्राप्त करना चाहते हैं। इससे भिन्न कुछ लोग गैर-कानूनी रूप से दूसरे देशों में प्रवेश करते हैं, ऐसे लोगों के जीवन में अपने देश में अत्याचार जैसे तथ्य नहीं जुड़े होते। ऐसे लोग दूसरे देशों में तस्करी या अन्य अपराध करने के उद्देश्य से प्रवेश करते हैं। ऐसे लोगों को घुसपैठिये कहा जाता है। हर देश को शरणार्थी और घुसपैठिये में अन्तर समझना चाहिए। शरणार्थी को शरण देना हर देश का मानवीय कत्र्तव्य है। विश्व में लगभग 100 से अधिक इसाई देश हैं और 30 से अधिक बौद्ध देश हैं। परन्तु किसी भी देश का ध्यान पाकिस्तान के ईसाई और बौद्धों को शरण देने की ओर नहीं गया। भारत ने हिन्दुओं और सिखों के साथ-साथ बौद्ध, ईसाई और पारसी अल्पसंख्यकों को भी नागरिकता की सुविधा का विस्तार किया है तो इसे मानवता का उदाहरण समझना चाहिए, राजनीति नहीं।

श्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद ऐसे लोगों की सहायता और संरक्षण की नैतिक जिम्मेदारी की घोषणाएं की। वर्ष 2019 में एक बार फिर जोरदार बहुमत के साथ दूसरी अवधि मिलने पर केन्द्र सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन का प्रयास सफल कर दिखाया। वर्ष 2019 के इस संशोधन में केवल एक मुख्य प्रावधान पुराने नागरिकता कानून की धारा-2(बी) के साथ जोड़ा गया है, जिसके अनुसार – ”पाकिस्तान, बंगलादेश तथा अफगानिस्तान के ऐसे हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई नागरिक जो 31 दिसम्बर, 2014 तक भारत आ चुके थे, उन्हें अवैध प्रवासी नहीं माना जायेगा।’’ इस संशोधन से वर्ष 2014 तक भारत आने वाले ऐसे लोगों को ही नागरिकता का लाभ मिलना सम्भव होगा। किसी दृष्टि से भी इस संशोधन का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि भविष्य में इन तीनों मुस्लिम देशों के अल्पसंख्यकों को भारत बुलाकर नागरिकता दी जा सकेगी।

राजनीतिक विरोध का एक बिन्दु यह भी है कि यह संशोधन भेदभावपूर्ण है, क्योंकि इन तीनों देशों के मुस्लिम नागरिकों पर इसे क्यों नहीं लागू किया गया। इसका उत्तर स्पष्ट है कि यह तीनों देश भारत की तरह सेक्यूलर नहीं हैं। बल्कि यह तीनों देश घोषित मुस्लिम देश हैं। दूसरा विरोधी तर्क यह है कि भारत के संविधान में धर्म पर आधारित भेदभाव की अनुमति नहीं दी गई। भारत का संविधान भारतीय नागरिकों को ही मूल अधिकार प्रदान करता है। इसलिए समानता का यह मूल अधिकार पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगलादेश जैसे मुस्लिम देशों के नागरिकों को देना भारत सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिकता देने के लिए क्या शर्तें और प्रक्रिया होगी इस सम्बन्ध में मुख्य नागरिकता कानून की धारा-5 में विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित है जिसके अनुसार केन्द्र सरकार ही नागरिकता का पंजीकरण करती है। उस प्रावधान और प्रक्रिया में कोई विशेष संशोधन नहीं किया गया बल्कि केवल यह घोषणा की गई है कि जिन लोगों को नई नागरिकता दी जायेगी, उनकी नागरिकता उनके भारत प्रवेश वाली तिथि से लागू होगी। इन तीन देशों के अल्पसंख्यकों के लिए भारत में उनका प्रवास पांच वर्ष से कम नहीं होना चाहिए। नागरिकता संशोधन कानून का मुख्य लाभ वर्ष 2014 तक इन तीन पड़ोसी देशों के भारत आ चुके अल्पसंख्यकों पर केन्द्रित है। इस कानून से वर्ष 2014 के बाद आने वाले किसी व्यक्ति को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। इसलिए इस कानून का विरोध केवल मात्र दिखावे का राजनीतिक विरोध है, जिसमें तर्कशीलता और विवेक का पूरी तरह अभाव ही दिखाई देगा।

 

अविनाश राय खन्ना

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

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