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केजरीवाल बाग में सबका गणित फेल

केजरीवाल बाग में सबका गणित फेल

दिल्ली चुनाव के परिणाम राजनीतिक विशेषज्ञो की आंख खोलने वाले है और अब वे इसके अनुसार बिहार और पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति बनायेंगे। यह विशेषज्ञ अपनी मान्यताओं के अनुसार ही आकलन कर रहे हैं। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि दिल्ली वालों के लिए राष्ट्रीय मुद्दे हमेशा क्षेत्रीय मुद्दों पर हावी नहीं होते। और कुछ ऐसा ही दिल्ली चुनाव परिणाम में देखने को मिला। अरविन्द केजरीवाल भी यही चाहते थे कि लोग दिल्ली के मुदें पर ही अपना मत दे, न की राष्ट्रीय मुद्दों पर। और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। यह तो स्पष्ट है कि जहां एक तरफ दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को दुबारा मौका दिया, वहीं भाजपा को दरकिनार भी नहीं किया, क्योंकि दिल्ली चुनाव में भाजपा के वोट प्रतिशत में वृद्धि हुई है। और भाजपा को पहले से अधिक सीटे भी मिली हैं। हालांकि इस चुनाव परिणाम को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भाजपा के लिए दिल्ली निवासियों में स्वीकार्यता लाना थोड़ा कठिन लग रहा है। क्योंकि यहां पर बड़े नेताओं का करिश्मा कम और आम लोगों के दैनिक मुद्दों की स्वीकार्यता अधिक है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने सिर्र्फ यह दिखाया की वह भी चुनाव लड़ी थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केजरीवाल की जीत के पीछे कांग्रेस की बुरी हालत के अलावा मुफ्त बिजली और पानी और बसों में महिलाओं की फ्री यात्रा भी काफी असरदार मुद्दे रहे। यहां यह बताना आवश्यक है कि यह वहीं ‘आप’ है जिसे 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में महज 18 प्रतिशत वोट मिले थे, वहीं भाजपा को 55 प्रतिशत। तो क्या ‘आप’ को दिल्ली की जनता ने लोकसभा चुनाव में इसलिए वोट नहीं दिया क्योंकि उसने अच्छा कार्य नहीं किया था? ऐसा इसलिए हुआ कि दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को पूरे देश में शासन करने योग्य नहीं माना। यही भाजपा के साथ भी हुआ। भाजपा पिछले 25 वर्षों से दिल्ली की सत्ता में नहीं रही है, अत: इसके पास दिखाने के लिए कुछ नहीं है। अत: दिल्ली में फिर 2015 जैसे ही चुनाव परिणाम आये हैं और दिल्ली की जनता ने यह बता दिया कि केन्द्र में मोदी तो दिल्ली में केजरीवाल।

लेकिन ‘आप’ की जीत में कांग्रेस का भी बड़ा योगदान रहा। कांग्रेस ने 66 में से 63 सीटों पर अपनी जमानत भी खो दी। प्रश्न तो अब यह खड़ा होता है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व यह मान चुका है कि दिल्ली में कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं है? कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार,  दिल्ली के नतीजों ने साफ कर दिया है कि  अब जनता भाजपा के सामने एक बड़ा विपक्ष चाहती है,  ताकि उनके मुद्दों को एक मंच पर लाया जा सके। लेकिन मेरा प्रश्न  यह हैं कि किसी भी क्षेत्रीय दल के पास उतना सुदृढ़ सांगठनिक ढांचा है जितना की भाजपा के पास है? इसके लिए सभी क्षेत्रीय दलों को देशहित के मुद्दों पर सहमत होकर एक होना पड़ेगा, जो संभव नहीं है। इसके लिए इन दलों को लोकलुभावन नीतियों से भी ऊपर उठना पड़ेगा। यहां यह कहना आवश्यक है कि केजरीवाल ने अपने कार्यकर्ताओं को कुशलतापूर्वक संगठित किया और भाजपा को हराने के लिए रणनीति बनाई जिसमें वे सफल भी हुए। आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की  करीब-करीब अनुपस्थिती को भी भुनाया। वहीं भाजपा को भी 38.5 प्रतिशत मत मिले जो काफी महत्वपूर्ण है। इसका मतलब भाजपा को सीएए के नाम पर मत अवश्य मिले। दूसरी तरफ देखा जाए तो आम आदमी पार्टी को केजरीवाल सरकार के शासन के लिए वोट मिले। और भाजपा की यही सबसे बड़ी भूल रही की वह लोगों के मन की बात को करने के बजाय दूसरे मुद्दों में ही व्यस्त रही।

Deepak Kumar Rath

 

  दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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