ब्रेकिंग न्यूज़

एक भावनात्मक कहानी

एक भावनात्मक कहानी

खिड़कियों से झांकती आंखें सुधा ओम ढींगरा का सातवां कहानी संग्रह है। इन सभी कहानी संग्रहों को पढऩे के बाद स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि आपकी कहानियां भारत और अमेरिका के बीच एक ऐसे पुल का निर्माण करती हैं, जिस पर चलकर आप इन दोनों देशों के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने बहुत बारीकी से समझ सकते हैं। आप चीजों को व्यापक परिदृश्य में देखते हैं और इस प्रक्रिया में आपके कई पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते हैं। यह प्रक्रिया किसी एक कहानी में नहीं बल्कि कहानी-दर-कहानी चलती रहती है। समीक्ष्य संग्रह की पहली कहानी खिड़कियों से झांकती आंखें से लेकर अंतिम कहानी एक नई दिशा तक आते-आते आपकी धारणा और अधिक पक्की होती जाती है। संग्रह की प्रतिनिधि और प्रथम कहानी खिड़कियों से झांकती आंखें अत्यंत संवेदनशील है। इस कहानी में आंखें प्रतीक हैं, उन वृद्धों की, जिनकी संतानें सफलता की राह पर आगे बढ़ गईं और ये बहुत पीछे छूट गए। अब ये आंखें स्नेह एवं प्रेम की एक किरण जहां दिखाई दे उसी से चिपक जाना चाहती हैं, लेकिन यही आंखें कथा नायक डॉ. मलिक को असहज कर देती हैं क्योंकि वह इनकी सच्चाई नहीं जानता।

9

सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में यह बात बार-बार उभर कर सामने आती है कि स्वदेश में रहने से सब बहुत अच्छे और विदेश में रहने से बुरे नहीं बन जाते। न ही उन संस्कारों को भूलते हैं जो उन्हें परिवार और समाज से मिले और जो भूल जाते हैं या स्वार्थी बन जाते हैं, ऐसे अपवाद कहीं भी हो सकते हैं। किसी के व्यक्तित्त्व निर्माण में देश विशेष का प्रभाव तो अवश्य भावी है, लेकिन और भी अनेक कारक हो सकते हैं। समीक्ष्य संग्रह की दूसरी कहानी ‘वसूली’ में ऐसे ही एक विषय को उठाया गया है। ‘वसूली’ कहानी सत्तर के दशक से नब्बे के दशक तक जाती है, इसमें लेखिका ने हरि और सुलभा के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया है कि प्रवासी भारतीय अपनी भारतीयता, देश और परिवार से कितना लगाव रखते हैं, जबकि भारत में रहने वाले कितने भारतीय ऐसे हैं जिनके लिए उनका स्वार्थ सर्वोपरि है। यह कहानी वैसे तो संपति के लालच में एक परिवार के बिखराव की कहानी है लेकिन इसके छोटे से कथ्य में व्यापक गहराई है। लेखिका ने एक परिवार की समस्या के माध्यम से मानवीय व्यवहार का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। इसका विस्तार दिल्ली से लेकर अमेरिका तक है। समीक्ष्य कहानी इस भ्रम को भी तोड़ती है कि सुसंस्कार और उदार व्यक्तित्त्व स्वदेश में रहकर ही हो सकते हैं, उदाहरण के रूप में सुलभा एवं हरि जैसे पात्रों को देखा जा सकता है, विशेष रूप से सुलभा के चरित्र को। यदि सुलभा का चरित्र उमा जैसा होता तो हरी का व्यक्तित्त्व निश्चत ही कुछ और होता। की धारणा और अधिक पक्की होती जाती है।

सुधा ओम ढींगरा कहानियां लिखती नहीं, वे उन कहानियों में स्वयं रच-बस जाती हैं। आपके पास व्यापक अनुभव हैं इसलिए हर कहानी कथावस्तु की दृष्टि से, एक दूसरे से नितांत भिन्न होती है लेकिन एक ऐसा तंतु इन कहानियों में छुपा रहता है जिससे ये लेखक का परिचय स्वयं दे देतीं हैं। यह पुस्तक पाठकों को प्रभावित करेगी और पढऩे पर विवश करेगी।

 

उदय इंडिया ब्यूरो

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.