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”सावरकर कोई व्यक्ति नहींबल्कि एक विचार’’

”सावरकर कोई व्यक्ति नहींबल्कि एक विचार’’

अखिल भारतीय स्वातंत्रवीर साहित्य सम्मलेन का आयोजन फरवरी 26-27 को दिल्ली स्थित डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेन्टर में किया गया, जिसमें कई राजनीतिक व सामाजिक चिंतकों ने भाग लिया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में सभी विश्लेषकों ने माना कि वीर सावरकर को न केवल भारत रत्न दिया जाना चाहिए बल्कि वे इसके सबसे सही दावेदार हैं। उन्हें इस सम्मान से बहुत पहले सम्मानित हो जाना चाहिए था। बात सिर्फ यही नहीं रुकी जब वक्ताओं ने कहा की वे पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने देश के नागरिको को फौजी प्रशिक्षण दिए जाने की बात की। इसलिए देश में जितने में युद्धपोत या अन्य आयुद्ध साजसज्जा है, उन्हें वीर सावरकर का नाम दिया जाना चाहिए।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने वीडियो कान्फ्रेन्सिंग के माध्यम से अपने भाषण में कहा की वीर सावरकर कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचार है जिसमें करोड़ो लोग समाहित है। वे करोड़ों लोगों लिए एक प्रेरणा है। इस दो दिवसीय अधिवेशन की शुरुवात सावरकर के सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और वैचारिक कार्यों पर चर्चा के साथ शुरू हुई और सभी एकमत थे कि सावरकर के साथ लोगो ने अन्याय किया और अपमानित किया। उन्हें न केवल अंगे्रजों द्वारा बल्कि स्वतंत्र भारत की सरकारों ने गलत ढंग से चित्रित किया है।

केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि पांच हजार साल के इतिहास में अभी तक ऐसी कोई घटना नहीं हुई है कि किसी हिंदू राजा ने कोई मस्जिद को तोड़ा है और तलवार के आधार पर किसी का जबरन धर्मांतरण किया है। हमारी हिंदू संस्कृति- हमारी भारतीय संस्कृति प्रगतिशील भी है, सर्वसमावेशक भी है, सहिष्णु भी है। यह संकुचित नहीं है, जातिवादी नहीं है, सांप्रदायिक नहीं है। अगर हिंदुस्तान को भविष्य में जीवित रखना चाहते हो, सावरकर को अगर भूल जाएंगे तो जो 1947 में एक बार हुआ, मुझे लगता है कि आगे भविष्य के दिन भी अच्छे नहीं जाएंगे। यह मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं। सावरकर ने राष्ट्रवादी विचार की जो सोच दी थी वह आज हमारे लिए बहुत जरूरी है। अगर उसकी तरफ हमने ध्यान नहीं दिया तो एक बार तो हमने देश का दो टुकड़ों में बंटवारा देखा है, अगर ऐसा ही रहा तो हमारे देश में ही नहीं दुनिया में न समाजवाद रहेगा, न लोकतंत्र रहेगा न धर्मनिरपेक्षता रहेगी। गडकरी ने कहा कि मुस्लिम समाज में भी प्रगतिशील और उदारवादी लोग हैं। जो चाहते हैं कि शिक्षा का प्रसार हो और भविष्य ज्ञान-विज्ञान से जुड़े। उन्होंने कहा कि हम किसी धर्म के खिलाफ नहीं हैं। हम सर्वसमावेशी, उदार और सहिष्णु हैं। हम मुस्लिम के खिलाफ नहीं हैं, मुस्लिम संस्कृति के खिलाफ नहीं है। जो आतंकवादी हैं, जो फंडामेंटलिस्ट हैं, जो कहते हैं कि हम अच्छे हैं, बाकी सब काफिर हैं, सबको हटाओ- इस प्रवृति के खिलाफ हैं।

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केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री प्रह्लाद पटेल ने इस अवसर पर कहा कि अगर लोगो के कार्य का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है तो सभी के कार्यों का पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए किसी विशेष व्यक्ति का ही केवल क्यों? सावरकर के योगदान का प्रतिफल नहीं मिला लेकिन यह हमारी जिम्मेदारी बनती है की इस कार्य को पूरा किया जाए। उन्होंने आगे कहा की यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि सावरकर के कार्यो को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए कि  वे न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि एक इतिहासकार, साहित्यकार, कवि और समाज सुधारक थे।

मध्य प्रदेश और गुजरात के पूर्व राज्यपाल ओम प्रकाश कोहली ने कहा की सावरकर ने ही सर्वप्रथम 1857 को पहले स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा की भारत की भौगोलिक परिधि में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। उन्होंने कहा की गांधी जी के अतिरेक अहिंसा ने देश को कितना नुकसान पहुंचाया यह इतिहासकारो के लिए शोध का विषय है लेकिन सावरकर के इस मामले में अपने विचार थे और गांधी से पहले आये जब उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने की बात कही थी।

राज्यसभा सांसद और पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता ने कहा सावरकर एक राजनैतिक हिन्दू थे जिन्हे मथुरा और काशी याद रहा जैसे कि शिवाजी को हमेशा स्मरण रहा। उन्होंने हिन्दू सभ्यता की बात जिंदगी भर किया उसका पूजा पद्धति से लेना देना नहीं था।  इसको समझने के लिए उन्होंने पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का उदाहरण दिया जो अपने को पोलिटिकल हिन्दू मानते थे।

इस अवसर पर बोलते हुए सावरकर मामलो के जानकार श्रीरंग गोडबोले ने कहा कि सरकार को देश की परमाणु पनडुब्बियों को सावरकर का नाम देना चाहिए। देश में आई एन एस सावरकर, आई एन एस मुंजे और आई एन एस सुभास क्यों नहीं हो सकता?

(उदय इंडिया ब्यूरो)

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