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किसी न्यायाधीश द्वारा प्रधानमंत्री की प्रशंसा नहीं अनुचित सुप्रीम कोर्ट बार एशोसिएशन का प्रश्न उठाना गलत

किसी न्यायाधीश द्वारा प्रधानमंत्री की प्रशंसा नहीं अनुचित  सुप्रीम कोर्ट बार एशोसिएशन का प्रश्न उठाना गलत

सुप्रीम कोर्ट बार एशोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के जज अरूण मिश्रा द्वारा देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा किये जाने को सही नहीं ठहराया। यहां तक कहा गया कि किसी जज की राजनैतिक नेताओं से नजदीकियां दर्शाता है। बार ने सलाह दी कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को इस तरह की टिप्पणी से अपने को अलग रखना चाहिये ताकि न्याययिक आत्मनिर्भरता बनी रहे।

किसी भी संस्था का इस बात पर प्रश्न लगाना बेवजह लगता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दूरदर्शी कहना और उन्हें जीनियस कह देना कहीं से भी गलत नहीं है। यदि कोई प्रधानमंत्री राष्ट्रपति योग्य है, महायोग्य है, सफल है, विद्वान है तो उसकी प्रशंसा करनें में क्या हर्ज है।

अपने देश के प्रधानमंत्री को महान कह देना भी क्या गलत है। न्याययिक स्वतंत्रता का प्रश्न कहां से आ गया। इस तरह बार एशोसिएशन द्वारा सलाह देना अवश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आघात है।

जब जज न्याययिक कुर्सी पर बैठा होगा तो चाहे गरीब हो, अमीर हो, असाधारण नेता हो या मुख्यमत्री, प्रधानमंत्री उसके लिये सभी बराबर हैं। उस समय किसी पद या प्रभाव से जज अपना न्याय लिखनें में विचलित नहीं होता न ही उसे होना चाहिये। जजमेंट लिखते समय संस्थाओं या पदाधिकारियों या व्यक्तियों पर प्रशंसनीय या विरोधी रिमार्क लिखना भी गलत नहीं समझा जाता है। इस तरह के रिमार्क या लिखी गयी टिप्पणियां कोर्ट की कार्यवाही से अधिक उस समय के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित होती है।

हम यहां इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस ऐ.एन. मुल्ला की मशहूर टिप्पणी का जिक्र करना चाहेंगे। उन्होंने लिखा था ‘पुलिस एक संयोजित डकैतों का संगठन है’ उन्होंने एैसे संगठन नहीं देखे होंगे न ही ये प्रमाणित किया जा सकता है, पर कोर्ट में उनके सामने लाये गये तथ्यों प्रमाणों के आधार पर उन्हें अवश्य लगा होगा कि पुलिस जो चाहे सो कर सकती है और कर रही है  पर उनका ये रिमार्क वर्षों वर्ष न्याययिक प्रक्रिया से जुड़े रहनें और हजारों केस सुनने के बाद आया है। जाहिर है कि ऐसी राय मात्र एक केस पर नहीं दी जा सकती यानि उनकी व्यक्तिगत राय और विचार भी सम्मिलित हो गये। बाद में भले ये रिमार्क उच्च अदालत में हटा दिये गये हों।

प्रधानमंत्री की प्रशंसा किये जाने को किसी भी राजनीति से नहीं जोड़ा जा सकता न ही उसका किसी राजनैतिक झुकाव से कोई लेना देना है। यदि किसी भी व्यक्ति को लगता है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रपति या कोई भी सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति राष्ट्रहित में अच्छा काम कर रहा है या प्रशंसनीय है तो उसकी प्रशंसा में कुछ कह देना बिल्कुल सही है। चाहे ये प्रशंसा जज के द्वारा ही क्यों न की जाये। अपने प्रधानमंत्री को लायक, योग्य और अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर एक दूरदर्शी व्यक्ति कह देने में क्या गलत है और क्या चीज प्रभावित हुई है ये समझ से बाहर है। वैसे भी कोर्ट से बाहर किसी कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक कार्यक्रम में किसी की प्रशंसा कर देना उसे महान अच्छा बताना हमारी स्वस्थ परंपरा का एक अंग है। ये संस्कृति है और हम सदियों से इसे अपना रहे हैं।

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प्रधानमंत्री सरकारी और सार्वजनिक जीवन में किसी भी जज से ऊपर हैं, प्रोटोकोल में भी ऊपर हैं, देश का मुकुट है। वह सिर्फ राजनेता ही नहीं वह किसी भी पार्टी का नेतृत्व करता हो उससे कोई लेना देना नहीं। प्रधानमंत्री आखिर प्रधानमंत्री होता है और वो भारत का प्रतिनिधित्व करता है। जज का किसी प्रधानमंत्री की प्रशंसा या उसे योग्य कह देना कहीं से भी और किसी भी तरह न्याययिक प्रणाली पर असर नहीं डालता है। यदि नरेन्द्र मोदी अदालत में जज अरूण मिश्रा के सामने किसी मामले में आते तो उनके साथ वही व्यवहार होता जो एक किसी साधारण व्यक्ति के पेश होने पर होता है।

जिस कॉन्फ्रेंस में विदेश से आये हुये लगभग 20 से अधिक प्रतिनिधि हों एैसे स्थान पर अपने देश के प्रधानमंत्री को अंतर्राष्ट्रीय जगत का दूरदर्शी और नेता बताना एक दम सही और सटीक बात है। क्या कोई भी भारतवासी ऐसे स्थान पर विदेशों से आये हुये जज इकट्ठे हुये हों अपने प्रधानमंत्री की प्रशंसा किये बिना रह सकता है। यदि एैसे समय और स्थान पर कोई अपने प्रधानमंत्री की तारीफ नहीं करता है तो वो देश के प्रति अपने कर्तव्य को नहीं निभाता है। उस कॉन्फ्रेंस में स्वयं भारत के प्रधानमंत्री मंच पर मौजूद थे। एैसे में हमारी संस्कृति है कि किसी भी कार्यक्रम में मंच पर या हाल में उपस्थित लोगों को गरिमामय कहा जाता है। उन्हें सम्बोधन करते समय पूरे सम्मान से सम्बोधित किया जाता है। जस्टिस अरूण मिश्रा जी ने अपनी संस्कृति और आचार व्यवहार को बनाये रखने के कारण मंच पर बैठे गणमाण्य की प्रशंसा करके उचित कार्य किया है।

वैसे भी जब बार एशोसिएशन इस टिप्पणी पर एकमत नहीं थी तो एशोसिएशन को जस्टिस मिश्रा के खिलाफ सार्वजनिक रूप से इस तरह एशोसिएशन की तरफ से कुछ नहीं कहना चाहिये था। सीनियर एडवोकेट   दुष्यंत दबे का विचार कि स्वतंत्र न्यायपालिका हमारे संविधान की मूल जड़ है और इसे बनाये रखना चाहिये। उनकी इस बात से हम सभी सहमत होंगे लेकिन इसमें दबे को यह कहने की क्या जरूरत है या चिन्ता दिखाने की जरूरत थी कि जज अरूण मिश्रा ने उस बुनियाद के खिलाफ कुछ किया है। जस्टिस मिश्रा की प्रधानमंत्री पर टिप्पणी किसी तरह की कोई न्याययिक पद्धति के खिलाफ  नहीं है। मैं दबे की बात से पूरी तरह असहमत हूं अधिकांश और विशेष तौर से राजनैतिक रूप से स्वतंत्र विचार वाले सभी प्रवुद्ध कानूनविद हमारी राय से सहमत होंगे।

बार कांउसिल ऑफ इंडिया के चेयरपरसन वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने ठीक कहा है कि जस्टिस मिश्रा उस समय एक यजमान जगह पर थे इसलिये उनके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिये चुने गये, कहे गये शब्दों का चयन एक दम ठीक था। यदि हम समग्र परिस्थितियों, स्थान और समय तथा विदेशी मेहमानों की उपस्थिति के मद्देनजर रख कर विचार करें तो पायेंगे कि जस्टिस मिश्रा ने कार्यक्रम में यजमान होने के नाते काम किया है और यही उनकी जिम्मेदारी भी थी। बार एशोसिएशन की चिल्लपों और हंगामा बेमतलब का है। हो सकता है इसके लिये कोई व्यक्तिगत सोच काम कर रही हो।

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