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गजवा-ए-हिन्द की एक झलक?

गजवा-ए-हिन्द की एक झलक?

दिल्ली दंगों के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में जिस तरह की हालत देखने को मिली, वह दुख और शर्म की बात है। अगर दंगे जैसे संवेदनशील मसले पर किसी सार्थक चर्चा या संवाद के बजाय जनप्रतिनिधि धक्का-मुक्की, मारपीट जैसे अशोभनीय कृत्य करने लगें, तो यह जाहिर होता है कि उनके मुद्दे दंगा नहीं है, बल्कि इसकी आड़ में पक्ष-विपक्ष की क्षुद्र राजनीति है। दिल्ली दंगों के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा और इस मुद्दे पर गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांगा। यह होना भी चाहिए और एक जिम्मेदार विपक्ष का यह फर्ज भी बनता है कि वह सरकार पर दबाव बनाते हुए दंगे की जांच करवाए और सच्चाई को सामने लाए। लेकिन बजाय इसके लोकसभा में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जिस तरह की तू-तू मैं-मैं और भाजपा तथा कांग्रेस सदस्यों के बीच धक्का-मुक्की देखने को मिली, उससे दंगे का मुद्दा पीछे छूट गया। भाजपा सांसद जसकौर मीणा ने कांग्रेस की राम्या हरिदास को धक्का दे दिया। विपक्षी सदस्य हाथों में पोस्टर लिए अध्यक्ष के आसन के पास पहुंचे तो भाजपा की महिला सांसदों ने रास्ता रोक दिया और यह सारा नजारा धक्का-मुक्की में ऐसे तब्दील होता चला गया जैसे सड़कों-गलियों में आमतौर पर देखने को मिल जाता है।

यह तो संसद की बात हुई लेकिन इसके इतर एक सच्चाई और भी है जो की सबके सामने लायी जानी बहुत जरुरी है। दरअसल यह दंगे भारत को गजवा-ए-हिन्द (हिन्दुओं के खिलाफ मुसलमानो की लड़ाई) की तरफ धकेलने की साजिश है। इन दंगो को एक सिलसिलेवार ढंग से अंजाम दिया गया, एक सोची-समझी साजिश के तहत।  इसकी तयारी पिछले कई दिनों से चल रही थी। अगर शुरुआत से देखें तो पिछले 75 दिनों से मुस्लिम समुदाय के लोग शाहीन बाग मे नागरिकता कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे जिसमें हिन्दू समुदाय के खिलाफ नारे लगाये जा रहे थे, जैसे हिन्दुओं की कब्र खुदेगी, हमे चाहिये आजादी, हिन्दुओं से आजादी, अमित शाह (भारत के गृहमंत्री) से आजादी, मोदी (भारत के प्रधानमंत्री) से आजादी। जहां उनके लोग भारत विरोधी भाषण देते थे वहीं जेएनयू के सर्जील इमाम ने इसकी परिकल्पना प्रस्तुत की थी। उसने भाषण देते हुए कहा था की क्या हमारे लोग भारत मे चक्का जाम नही कर सकते, क्या हम जहां हैं वहां के फ्लाई ओवर को बम से उड़ा दें तो ये न्यूज नहीं बनेगी, बनेगी क्योंकि ये दिल्ली है और हम सुर्खियों मे होंगे क्योंकि यहां सारी मीडिया है, सरकार का सारा तंत्र है यहां हैं। इसी तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उसने असम को भारत से अलग करने की बात कहते हुए कहा की अगर हमारे लोग भारत को नार्थ ईस्ट से जोडऩे वाली चिकन नेक (Chicken Neck) को जाम कर देंगे तो आर्मी को मदद नही पहुंचेगी और कम से कम दो-तीन महीनों तक हम उसे रोक के रख सकते हैं क्योंकि वहां हमारे लोग बहुसंख्यक हैं। इन्होंने हिन्दुओं को चेतावनी देते हुए अपने साथ आने को कहा नहीं तो ये हिन्दुओं को तय करना है की उनकी कब्र दो फीट गहरी होगी या दस फीट ये फैसला हिन्दुओं को करना है। ये अलग बात है की मीडिया में वीडियो लीक हो जाने से गोहाटी पुलिस और अन्य राज्यों में उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता के सेक्शन Section 153 (A), 153 (B), 124 और 13 (1)/18 के तहत मुकदमा चलाये जा रहे हैं।  गौरतलब है की इन सभी को आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान का पूरा समर्थन मिला था और ये लोग मुस्लिमों को एकजुट करने मे सफल हुए थे और इस सब का पूरा फायदा ‘आप’ को जीत दिलाने मे हुआ क्योंकि उन्होंने 90 प्रतिशत  से भी ज्यादा मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष मे कर लिया था। दिल्ली चुनावों में माना जा रहा था की दिल्ली की लगभग 60 प्रतिशत हिन्दू भाजपा को वोट करेंगे लेकिन हिन्दुओं ने आत्मघाती कदम उठाते हुए ‘आप’ को वोट किया क्योंकि उन्होंने फ्री में बिजली और पानी देने का वादा किया था।

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दंगे की साजिश

दिल्ली के दंगे पूरी तरह से सुनियोजित थे जिसकी तैयारी केजरीवाल सरकार बनने के बाद से ही शुरू हो गयी थी। ‘आप’ के पार्षद ताहिर हुसैन इस साजिश के सूत्रधार बनते हैं, अमानतुल्लाह खान का और केजरीवाल का मौन समर्थन पाकर। चुनावों के करीब पंद्रह दिनों के बाद 24 फरवरी को सुबह 11:00 AM बजे से ही ताहिर हुसैन ने लोगों को इकट्ठा करना शुरु कर दिया था। 12:00 AM पर सभी मुस्लिम माता-पिता ने स्कूल से अपने बच्चों को निकालना शुरु कर दिया था। पूछे जाने पर बताया की दंगे होने वाले हैं लेकिन प्रिंसिपल ने उनकी बातों को गम्भीरता से नहीं लिया क्योंकि उन्होंने साफ-साफ कुछ भी नहीं बताया तो उन्होंने सोचा की शायद ये लोग नागरिकता कानून के विरोध प्रदर्शन में जा रहे होंगें। तब तक स्कूल मे सिर्फ हिंदुओं के हीं बच्चे रह गए थे, मुस्लिम दुकानदार अपनी दुकान बन्द कर घर जा चुके थे। इसके बाद लगभग 02 बजे हजारों की संख्या में मुस्लिम भीड़ हिन्दुओं की गलियों में घुसते हुए रास्ते में आये पेट्रोल पंप फूंकती हैं। मुस्लिमों की दुकानों को छोड़ते हुए सिर्फ हिन्दुओं दुकानों को लूटने के बाद जलाया गया क्योंकि उनकी दुकान हिन्दु नाम से पहचानी जा चुकी थी और मुसलमानों की दुकानों को छोड़ दिया गया क्योंकि उनपर NO CAA, NO NRC, NO NPR लिखा गया था। स्कूल, कोचिंग से लौट रहे बच्चियों के साथ भी ये दंगाई हैवानियत करने से नहीं चूके। उसी इलाके के एक मन्दिर मे कुछ महिलायें पूजा कर रही थीं इतने मे 20-30 मुसलमानों ने मन्दिर मे घुस कर उसका दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और उपर से तिरपाल में आग लगा दी, उस वक्त मन्दिर में पुजारी सहित 10 लोग थे, 8-9 महिलायें जिसमे 2 जवान लड़कियां भी थीं।

वे लोग पहले बाहर निकलने की गुहार लगाती रही परंतु जब उन्हें पता चला की ये लोग उग्रता से अपनी मन-मानी कर रहे तो वे लोग शांत हो गए और मन्दिर को अन्दर से बंद कर दिया ताकी उन्हे लड़कियों के बारे मे पता ना चले। दंगाइयों ने 2 घंटों तक लगातार गेट पे पत्थर हमला करते रहे, पूरी मन्दिर मे तोड़-फोड़ किया गया जितना भी वो कर सकते थे उन्होंने अपनी मनमानी की।

लोगों ने अन्दर से लगातार पुलिस को कॉल किया, एम्बुलेंस को कॉल किया, फायर ब्रिगेड को कॉल की पर कोई नही आया। लगभग 7 सात घंटे तक अन्दर ही रुकना पड़ा और जब रात के 7-8 बजे, माहौल थोड़ा शान्त हुआ तो पड़ोसी ने उन्हें निकाल कर अपने घर ले गये।

शुरुआत में पुलिस ने इन लोंगों को रोकने की पूरी कोशिश की और कुछ हद तक सफल भी हुए, परंतु जब दंगाईयों की संख्या मे एकाएक बढ़त के कारण, पुलिस बल एक दुसरे से बिछड़ चुके थे और इतने मजबूर हो गए थे की वे अपनी आत्मरक्षा के लिए इधर -उधर भाग रहे थे क्यांकि उनकी संख्या दो कम्पनी मिला कर 200 थीं और दंगाई हजारों में। इसी के दौरान दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल (42), सीकर (राजस्थान) के निवासी अपने परिवार के साथ गोकुलपुरी (दिल्ली) के ACP Office मे Operator थे, वे दंगाइयों से झूझते हुए उनकी गोली के शिकार हो कर शहीद हो गए। एक मुस्लिम युवक जिसका नाम शाहरुख है, वो सरेआम अपने हाथ मे पिस्तौल लहराता हुआ हिंदुओं के उपर गोलियों की बरसात कर रहा था, उसे ना पुलिस का डर थी था ही अपने अपराधों का। खुलेआम उसने पुलिस वालों पे फायरिंग की, ‘आप’ नागरिकों पे फायरिंग की। कुछ मीडिया के द्वारा खासकर एनडीटीवी के रविश कुमार ने शुरुआत मे उसका नाम हिंदू (अनुराग मिश्रा) बता कर उसके मुस्लिम होने का बचाव भी किया गया ताकि लोगों को लगे की दंगा करने मे सिर्फ मुस्लिम ही नहीं हैं बल्कि हिन्दु भी हैं। सिस्टम मे शामिल लोग इतने भरे हुए हैं की किसी ने अब तक रविश को कटघरे में खड़ा नहीं किया है।

दंगाईयों की तैयारी उस स्तर की थी जैसे उन्होंने इसकी योजना महीनों पहले से कर रखी हों, हर 10-15 घरों पर बड़े-बड़े गुलेल तैयार किये गए थे ताकी उससे पत्थर को दूर तक फेंका जा सके। लगातार घंटों तक लोगों के ऊपर पेट्रोल बॉम्ब से हमले किये गए, ईट -पत्थर फेंके गए, ऐसिड से भरे पॉलिथीन फेंकी गई। महिलाओं एवं लड़कियों को जबरदस्ती घरों से ले जाया गया। जब दंगाई लड़कियों को ताहिर हुसैन के घर की तरफ ले जा रहे थे तब ड्यूटी से लौट रहे भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो के अफसर अंकित शर्मा तुरंत अपने तीन दोस्तों के साथ उनको बचाने ताहिर हुसैन के घर की ओर बढ़ गए इतने मे भीड़ ने उन्हें चारों ने पकड़ लिया और अपने साथ मारते हुए ले जाने लगे। इस दौरान अंकित के मित्र ‘प्रदीप’ जो मात्र एक चश्मदीद गवाह बचे हैं जिन्होंने आखरी बार अंकित शर्मा को देखा था, वे खुद को दंगाईयों कीपकड़ को कमजोर करते हुए उनसे अपने आप को बचाने में सफल हुए। उन्होंने बताया की जब उसने भागते हुए पीछे पलट कर के देखा तो उसके तीनों दोस्त कहीं दिखायी नही दिये।

जब उनके घर वालों ने उन्हे ढूंढा तो कहीं पता नहीं चल पाया की वो कहां हैं, कुछ लोगों ने दो शवों को ताहिर हुसैन की घर के पीछे वाले नालों मे फेंकते देखा था और अपने मोबाइल से उसकी विडियोज भी बनाई थी उन्होंने और बाकियों को भी बताया। दूसरे दिन, उस नाले मे ढूंढा गया तो सबसे पहले अंकित शर्मा की लाश मिली। ताहिर हुसैन के घर से एक महिला के अर्ध-जले कपड़े मिले हैं माना जा रहा की उस महिला के साथ बलात्कार कर के उसे नाले में डाल दिया गया है जहां अंकित शर्मा का शव मिला। अंकित शर्मा के शव-परीक्षण (्रह्वह्लशश्चह्य4) की रिपोर्ट के अनुसार उसके जिस्म को 6 घंटों तक 400 बार चाकू से काटा गया था, शरीर  का कोई भी ऐसा अंग बचा नही जिसपर की चाकू के निशान ना हों, उनके दोनों आंखों को निकाल लिया गया, आंतें बाहर निकाली गयी थीं, गला रेता गया था, एसिड से चेहरों अथवा जिस्म को जलाया गया था, डॉक्टरों का कहना है की उन्होंने अपने पूरे करियर में कभी ऐसा केस नहीं देखा था। क्या ये सब अचानक से किया गया? नहीं, इससे ये साफ होता है की ये सब एक योजना के तहत किया गया है!

वहीं ह्रश्चढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड की रिपोर्ट में मिले जानकारी के आधार पर अंकित शर्मा, ताहिर हुसैन के आतंकवादियों से जुड़े होने की जांच कर रहे थे, जिसका पता ताहिर हुसैन को लगा था और मौके की तलाश में था जिसे उसने पूरा किया।

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अंत में

राजनीति और धर्म का घालमेल जब ज्यादा हो जाए तो यह दंगो की शक्ल अख्तियार कर लेता है। इससे जूझने के लिए संवेदनशीलता की जरुरत होती है लेकिन दिल्ली दंगो में सभी पक्षों ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दिखाई।  दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों से डर का ऐसा माहौल बना है कि नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के हिन्दू अभी भी दहशत में हैं। कइयों के घर जला दिए गए तो कइयों की जानें चली गईं। इस पूरे प्रकरण में मीडिया रोल एकदम संवेदनहीन रहा और उसने सच्चाई दिखाने से परहेज किया। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने तो अपनी खबर में यहां तक दावा कर दिया कि आईबी अधिकारी अंकित शर्मा को ‘जय श्री राम’ चिल्लाती हुई भीड़ ने मारा है। जबकि अंकित के भाई अंकुर लगातार इस खबर को नकार रहे हैं क्योंकि ताहिर हुसैन के गुंडों ने प्रताडि़त कर के अंकित को मार डाला। 84 के दंगो के समय दिल्ली में दंगों के थमने के बाद जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) और दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र दंगों में मारे गए या घायल लोगों के पुनर्वास के काम में जुट गए थे। अब 36 सालों बाद उसी जेएनयू के छात्र संघ ने दंगा प्रभावितों से कहा है कि वे उन्हें यूनिवर्सिटी में शरण देने को लिए तैयार हैं। ऐसी पेशकश का क्या मतलब है? आपको किसी की मदद करनी है तो आप उनके पास जाइए। उन्हें अपने यूनिवर्सिटी कैम्पस में कैसे बुला सकते हैं? यह अधिकार आपको किसने दिया? मतलब साफ है कि आपको तो हर जगह सियासत करनी है। आपको लाशों पर सियासत करने में शर्म नहीं आती। दंगे रोक पाने में नाकामयाब रहने के लिए बहुत से कथित ज्ञानी दिल्ली पुलिस को भी आड़े हाथों ले रहे हैं। पर क्या उन्हें मालूम है कि दो करोड़ की आबादी वाले शहर में कुल जमा पुलिस कर्मिंयों की तादाद एक लाख भी नहीं है? काफी संख्या में पुलिस वाले वीआईपी ड्यूटी भी कर रहे होते हैं। उन्हें भी साप्ताहिक विश्राम लेना होता है। क्या उनका परिवार नहीं है? दिल्ली पुलिस के जवान रतन लाल को दंगाइयों ने मार डाला। फिर भी कुछ चिर-परिचित असंतुष्ट ब्लेमगेम में बिजी हैं।

कपिल मिश्रा को दंगों के लिए दोषी कहने वाले अपने गिरेबान में झांके। अपने से सवाल करें कि उन्होंने जाफराबाद में एक और शाहीन बाग बनाने की कोशिशों का विरोध क्यों नहीं किया? आपको सरकार के किसी फैसले का विरोध करने का अधिकार है, तो क्या हर जगह धरने पर बैठ जाएंगे? सड़क जाम करने लगेंगे? जब धरना देने के लिए जंतर-मंतर तय जगह है, तब आप अपने स्तर पर फैसला कैसे ले सकते हैं। बेशक, दिल्ली के 2020 के दंगे बहुत से सवाल छोड़ गए हैं।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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