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…और वो दिल्ली दहला गए

…और वो दिल्ली दहला गए

यह अजीब इत्तेफाक है। 11 फरवरी को दिल्ली में चुनाव का नतीजा आया। चुनाव में आम आदमी पार्टी को 62 और भाजपा को आठ सीटें मिलीं। 16 फरवरी को दिल्ली की नई सरकार ने शपथ ग्रहण किया। अरविंद केजरीवाल फिर मुख्यमंत्री बने। इसके ठीक आठ दिन बाद दिल्ली में सांप्रदायिक उन्माद भड़का और दिल्ली के कुछ इलाके हिंसा की भेंट चढ़ गए। मुस्तफाबाद विधानसभा में चांदबाग के पास धरना स्थल पर नागरिकता संशोधन कानून-2019 के विरोधियों को मनाने गए आईपीएस अधिकारी अमित शर्मा को भीड़ ने पत्थरों से लहूलुहान कर दिया। हेड कांस्टेबल रतनलाल को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। यह घटना भी तब घटी जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मेहमान के तौर पर हमारी धरती पर आ चुके थे। आखिर इस तरह से दंगे की आग में जली दिल्ली का जिम्मेदार कौन है?

दिल्ली हिंसा का गुनहगार कौन?

सवाल छोटा है, लेकिन इसका जवाब आने में अभी समय लग सकता है। दिल्ली के नए पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव इसका हल ढूंढ रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें जांच करने और गुनहगारों को कानून के सीखचों तक ले आने के लिए खुली छूट दे दी है। पूरे मामले की निगरानी वह खुद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिल्ली में 72 घंटे तक घटी अप्रिय घटना से काफी आहत हैं। इसे इतने भर से समझा जा सकता है कि दिल्ली में सबकुछ ठीक ढंग से चले, राजधानी अपने स्वरुप में रहे और लोगों के भीतर दहशत अपना स्थान न बनाए, इसकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को देकर उन्हें हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में भेजा। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की रिपोर्ट के आधार पर सरकार आगे बढ़ी। 24 घंटे के भीतर हालात सामान्य होने की तरफ बढ़ गए। अब धीरे-धीरे अमन लौट रहा है।

दिल्ली में हिंसा: देश-विरोधी ताकतों की चाल?

जब दिल्ली में हिंसा की चिनगारी से दंगाई खेल रहे थे तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौर पर थे। खुफिया एजेंसी के सूत्र भी इस समय को दंगे के लिए चुना जाना काफी महत्वपूर्ण मान रहे हैं। क्योंकि जिस सीएए के विरोध को लेकर दंगा भड़का, उसका विरोध अल्पसंख्यक मुसलमान समुदाय काफी पहले से कर रहा था। 15 दिसंबर से काफी संख्या में मुसलमान महिलाएं, युवतियां शाहीन बाग में धरने पर बैठी हैं। इस दौरान दिल्ली में विधानसभा चुनाव भी हो गया, लेकिन तनाव, टकराव पैदा नहीं हुआ। एक बात और नागरिकता संशोधन अधिनियम पड़ोसी देशों के प्रताडि़त अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने के लिए है। इसमें किसी की नागरिकता जाने का सवाल ही नहीं उठता। फिर भी लोग इस कानून का विरोध कर रहे हैं। इन सबके बावजूद सीएए का विरोध ही केवल दिल्ली में हिंसा पीछे का कारण नहीं लगता। आखिर फिर क्या कारण थे दिल्ली में सांप्रदायिक तनाव बढऩे के? पीछे मुड़कर देखें तो देश विरोधी ताकतों की तरफ ईशारा जाता है। दिल्ली में दंगे को पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खूब हवा देने की कोशिश की। संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर वह पिछले काफी समय से भारत के खिलाफ मुसलमान विरोधी होने का आरोप लगाकर सक्रिय है। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति, जम्मू-कश्मीर को लद्दाख से अलग करके केन्द्र शासित प्रदेश बनाना, लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश बनाकर उसका गौरव लौटाना, यह पाकिस्तान को नहीं पच रहा है। इसी तरह से दिल्ली की हिंसा को राष्ट्रपति ट्रंप की यात्रा से जोड़कर देखना गलत नहीं होगा। समझा जा रहा है विदेशी ताकतों ने राष्ट्रपति ट्रंप की यात्रा को प्रभावित करने के लिए ही यह दंगा कराया था। ताकि राष्ट्रपति ट्रंप को भारत में बढ़ रही असहिष्णुता का वातावरण दिखाई दे, जबकि हो गया उल्टा। राष्ट्रपति ट्रंप जाते-जाते भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ के कसीदे पढ़ते हुए गए। एक संभावना है कि इस तरह से दंगा कराने के लिए देश विरोधी ताकतों दिल्ली और आस-पास फैले स्लीपर सेल को एक्टिवेट किया। इन लोगों ने दिल्ली में आग को हवा दी और दिल्ली जल उठी। जांच ऐजेंसियां इस कोण से जांच कार्य को आगे बढ़ा रही हैं।

भड़काऊ बोल ने किया आग में घी का काम

दिल्ली में हिंसा को भड़काने में नेताओं के भड़काऊ बोल की भी बड़ी भूमिका है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक भाषण को भी राजनीतिक गलियारे में दंगाइयों को ताकत देने वाला माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के कुछ नेताओं ने इस कड़ी में वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर, सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा और भाजपा नेता कपिल मिश्रा का नाम लिया है। आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आम आदमी पार्टी के एक अन्य विधायक पर दिल्ली में दंगा भड़काने में उसकी भूमिका को लेकर शिकंजा कस सकता है। बताते हैं इस विधायक के खिलाफ भी मामले की जांच की जा रही है।

निर्दोष के खून से किसके सने हैं हाथ?

दिल्ली पुलिस ने दिल्ली में हिंसा की जांच का जिम्मा एसआईटी को सौंपा है। एसआईटी सीसीटीवी फुटेज, लोगों की शिकायत और अन्य सबूत जुटाकर दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही कर रही है। दिल्ली में भड़की हिंसा में 47 लोग मारे गए हैं, 150 से अधिक अभी भी घायल हैं। अभी तक 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सौ से अधिक लोगों को पुलिस ने जांच में सहयोग करने के लिए बुलाया है। सम्मन भेजा है। इसी क्रम में दिल्ली पुलिस ने उ.प्र. के शामली से शाहरुख नाम के शख्स को गिरफ्तार किया है। यह वही शाहरुख है जो हाथ में पिस्तौल लेकर लोगों पर गोलियां चला रहा था और पुलिस उसके खोखे बीन रही थी। खबर है कि शाहरुख ने कोई आठ राऊंड गोलिया चलाई है।  सूचना है कि गोलियां चलाते हुए शाहरुख को पुलिस के जवान ने दबोच लिया था। उस समय वह एक सुरक्षा कर्मी पर पिस्तौल ताने था, लेकिन दिल्ली में हिंसा भड़काने लोग उस समय उसे छुड़ा ले गए थे। दूसरी बड़ी गिरफ्तारी आम आदमी पार्टी के निगम पार्षद ताहिर हुसैन की हुई है। ताहिर हुसैन अपने आपको निर्दोष बता रहे हैं। वह वीडियों जारी करके सफाई दे चुके हैं। उनका कहना है कि 24 तारीख को ही उन्होंने पुलिस से मदद मागी थी और स्थानीय एसएचओ उन्हें परिवार सहित मकान से निकालकर ले गए थे। बाद में उनके घर पर दंगाइयों ने कब्जा कर लिया था। हालांकि ताहिर की यह थ्यौरी पुलिस को कम समझ में आ रही है। क्योंकि ताहिर एक वीडियों में दंगे जैसे हालात के दौरान अपनी छत पर डंडा लिए घूम रहे हैं। उस दौरान छत पर कुछ युवक भी हैं। हालात सामान्य होने पर उनके घर की छत से तमाम पेट्रोल बम के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली पेट्रोल से भरी बोतले, गुलेल और कई बोरी पत्थर मिले हैं।

आईबी अधिकारी अंकित शर्मा को किसने मारा?

अंकित शर्मा देश की खुफिया एजेंसी आईबी में काम करते थे। ड्यूटी से घर लौटे थे। बात 24 फरवरी की है। तब उनकी गली के पास दंगा फैल रहा था। अंकित शर्मा की मां बताती हैं कि घर में घुसते ही अंकित के कानों में पड़ोस से किसी महिला की आवाज आई। वह बचाव के लिए गुहार लगा रही थी। अंकित की मां ने बेटे के लिए गैस चूल्हे पर चाय रखी थी। वह बेटे से चाय पी लेने के लिए कहती रही और अंकित पड़ोसी को सहायता देने के लिए घर से बाहर चला गया। वह लौटकर नहीं आया। 25 फरवरी को भी परिवार ने ढूंढा। पुलिस से मदद मांगी और अंत में पास के नाले से उसका शव बरामद हुआ। बताते हैं कुछ दंगाई उसे घर तक जाने वाली गली में से ही खीचकर ले गए थे। उसके पिता का आरोप हैं कि खींचकर ले जाने वाले पार्षद ताहिर हुसैन के गुर्गे थे। वह उसे ताहिर के मकान में ले गए और मार डाला। अंकित के शरीर पर कोई 400 से अधिक चाकू के वार थे। बड़े निर्मम तरीके से उसकी हत्या की गई। फिलहाल सच क्या है, हत्या के पीछे कौन है और कैसे अंकित की हत्या हुई, इसकी जांच दिल्ली पुलिस कर रही है।

सोशल मीडिया बनी दंगाईयों की टूल

दिल्ली में हिंसा भड़काने में सोशल मीडिया की काफी बड़ी भूमिका थी। सुरक्षा एजेंसियों के सूत्र बताते हैं कि हिंसा भड़कने के पहले से सोशल मीडिया पर उत्तेजक, भड़काऊ पोस्ट, वीडियो आदि डाली जा रही थी। दंगा भड़क जाने के बाद भी सोशल मीडिया पर एक अलग जंग छिड़ी हुई थी। बताते हैं दंगाई भी सोशल मीडिया पर हिंसा के हालात का वीडियो डालकर दिल्ली पुलिस को ही इसका जिम्मेदार बता रहे थे। ताकि लोगों को उनके घरों से बाहर निकालकर दंगे की आग में झोंका जा सके । इसके अलवा दंगा फैलाने के कई आरोपी एक तरफ हिंसा को हवा दे रहे थे और दूसरी तरफ खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए इसका दुरुपयोग भी कर रहे थे।

क्या राजनीतिक पार्टियों का यही धर्म है

हिंसा भड़कने के बाद लाशों पर राजनीति न हो, यह भारतीय लोकतंत्र में भला अछूता कैसे रह सकता है। दिल्ली में हिंसा भड़कने से लेकर अब तक यह हो रहा है। आम आदमी पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, दिल्ली सरकार के मंत्री पहले दिल्ली में हिंसा का दोष भाजपा नेताओं पर मढ़ रहे थे। भाजपा के नेता कपिल मिश्रा के नाम को उछाल रहे थे। इसके लिए आम आदमी पार्टी ने काफी आक्रामक तेवर अपनाया था, लेकिन जैसे ही 26 फरवरी को पार्षद ताहिर हुसैन की छत पर पेट्रल बम, पत्थर, गुलेल समेत अन्य सबूत मिलने शुरू हुए, आम आदमी पार्टी को सांप सूघ गया। उसके बाद से दिल्ली के मुख्यमंत्री लगातार रक्षात्मक लाइन लेकर चल रहे हैं। इसके सामानांतर कांग्रेस पार्टी के नेता दिल्ली में हिंसा को अपने हिसाब से तूल देने में लगे हुए हैं। पहले कांग्रेस समेत विपक्ष के नेताओं ने दिल्ली में शाहीन बाग में महिलाओं के प्रदर्शन को लेकर राजनीति की। मणि शंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह, शशि थरूर जैसे तमाम नेता शाहीन बाग भी गए और अब पार्टी दिल्ली में हिंसा पर राजनीति कर रही है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी केन्द्र सरकार पर दबाव बनाने के इरादे से दो दिन पहले दंगा प्रभावित इलाके का दौरा भी कर आए हैं। ताकि मुस्लिमों में कांग्रेस की छवि को धार दिया जा सके।

होली के बाद संसद में होगी चर्चा

अवकाश के बाद संसद में बजट सत्र का दूसरा चरण चल रहा है। इस दौरान विपक्षी दलों ने दिल्ली में हिंसा पर चर्चा को लेकर जमकर राजनीति की है। हालांकि केन्द्र सरकार दिखावे की चर्चा नहीं चाहती। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह और नरेन्द्र मोदी मामले में दूध का दूध और पानी का पानी चाहते हैं। इस दंगे में दो सुरक्षा अधिकारियों की शहादत हुई है और एक आईपीएस गंभीर रूप से अफसर घायल है। इसको लेकर सुरक्षा बलों में भी काफी गुस्सा है। दर्जनों मकान जले हैं, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जगहंसाई हुई है। इसलिए केन्द्र सरकार जांच का ठोस नतीजा आने के बाद चर्चा चाहती है। संसदीय कार्यमंत्री ने जानकारी दी है कि दिल्ली में हिंसा पर होली के बाद होगी। चर्चा का जवाब खुद केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह देंगे। समझा जा रहा है कि इस दौरान विपक्ष के हर तीखे सवाल का जवाब देकर दिल्ली हिंसा को लेकर दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे। एक बात तय है कि केन्द्र सरकार दिल्ली हिंसा के जिम्मेदार किसी भी व्यक्ति को बख्शने के मूड में नहीं है।

रंजना

 

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