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दिल्ली के दंगों के पीछे कौन?

दिल्ली के दंगों के पीछे कौन?

दंगे की आग में झुलसते रहे राजधानी दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाके में हालात नियंत्रण में हैं। कहने के लिए शांति भी है। लेकिन यह शांति सतह की है, अंदरखाने में अब भी आग धधक रही है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक दंगों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 46 हो चुकी है। हालात सामान्य करने की दिशा में दिल्ली का प्रशासन लगा हुआ है। दिल्ली सरकार की ओर से मारे गए और घायल हुए लोगों के साथ ही घर गवां चुके लोगों को मुआवजे देने की प्रक्रिया जारी है। लेकिन लोगों के जेहन में एक सवाल यह जरूर अभी तक गूंज रहा है कि जब दिल्ली दंगों की आग में झुलस सकती है तो दूसरे इलाकों में क्या होगा? सवाल यह भी है कि आखिर दंगे शुरू होने के दिन यानी 25 फरवरी को देश की बेहतर मानी जाने वाली पुलिस क्या करती रही? यह सवाल इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब पुलिस ने मोर्चा संभाला तो कुछ ही घंटों में उसने दिल्ली को नियंत्रित कर लिया। दिल्ली पुलिस की की सक्रियता एक मार्च को भी दिखी, जब पहले पश्चिमी दिल्ली और फिर देखते ही देखते दक्षिण और उत्तर पश्चिमी दिल्ली में दंगों की अफवाह फैलाई गई। लेकिन दिल्ली पुलिस ने तत्परता दिखाई और दिल्ली पर अपनी पकड़ कम नहीं होने दी। दिल्ली का आम-जनजीवन पटरियों पर दौड़ता रहा और दिल्ली में असमाजिक तत्व अपने मंसूबे को पूरा करने में कामयाब नहीं हो पाए।

दिल्ली में दंगे कैसे हुए, इस पर तमाम तरह की चर्चाएं चल रही हैं। चूंकि दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में आती है, लिहाजा दंगों के लिए केंद्र सरकार पर सवाल उठने ही थे और उठे भी। लेकिन मीडिया और राजनीति का एक कर्मकांड है। दंगों के लिए किसी को बलि बनाना। जिस तरह का आज का राजनीति एवं मीडिया का विमर्श है, उसमें दंगों के लिए अमित शाह को बलि का बकरा बनाने की कोशिश शुरू हो गई। कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 28 फरवरी को कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस करके और राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान अमित शाह का इस्तीफा मांगकर इस विमर्श को मंच जरूर दे दिया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या अतीत में कांग्रेसी शासन में हुए दंगों में कभी किसी गृहमंत्री से इस्तीफे मांगे गए। कांग्रेस के इतिहास पर नवंबर 1984 का दंगा कालिख की तरह छाया हुआ है। लेकिन क्या उस वक्त के गृहमंत्री पामुलपति वेंकट नरसिंह राव से किसी ने इस्तीफा मांगा। जैसे ही प्रत्युत्तर में यह सवाल उछलता है, अमित शाह के इस्तीफे की मांग बेमानी हो जाती है।

27 फरवरी और 28 फरवरी को दंगाग्रस्त इलाके में जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल उतरे तो उसे लेकर भी राजनीति और मीडिया में दूसरा कर्मकांड शुरू हुआ। कर्मकांड यह कि दिल्ली के दंगे रोक पाने में नाकामी के चलते अमित शाह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नाराज है। यही वजह है कि अजीत डोभाल को मैदान में उतारा गया। सवाल यह भी उछला कि दिल्ली चुनावों के दौरान घर-घर पर्चा बांटने वाले गृहमंत्री दंगों के बीच लोगों के बीच क्यों नहीं गए। हालांकि यह सवाल ही बेमानी है, क्योंकि आज के दौर में जिस तरह का माहौल है, दुनिया में कहीं का भी राष्ट्राध्यक्ष, शासनाध्यक्ष या वैसा ही दूसरा जिम्मेदार व्यक्ति दंगाइयों के बीच नहीं उतर सकता। आज दंगाइयों की मानसिकता और हथियार दोनों बदल गए हैं। तर्क यह भी दिया गया कि देश के बंटवारे के बाद हुए दंगों को रोकने के लिए प्रधानमंत्री नेहरू मैदान में उतर गए थे। लेकिन यह सच है कि अगर आज के दौर में नेहरू भी होते तो शायद ही वे मैदान में उतर पाते और सुरक्षा एजेंसियां शायद ही उन्हें मैदान में उतरने की अनुमति देतीं। रही बात अमित शाह और मोदी के बीच मतभेदों की तो इसका जवाब अजित डोभाल ने खुद ही दिया। यह बात और है कि इसे सुना नहीं गया। अजित डोभाल ने कहा कि वे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की सलाह पर लोगों के बीच आए हैं। वैसे भी अनुच्छेद 370 के कुछ प्रावधानों को हटाने के बाद कश्मीर घाटी के लोगों के बीच हालात सामान्य करने के लिए अजित डोभाल ही गए थे। इसकी वजह यह है कि अजित डोभाल खुफिया ब्यूरो के अधिकारी रहे हैं और बदतर माहौल में भी उन्हें लोगों के बीच काम करने और रणनीति बनाने का अनुभव है, लिहाजा उनका ही मैदान में उतरना जरूरी था।

सवाल तो यह भी उठता है कि दिल्ली में नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम मैदान में क्यों नहीं उतरी? वैसे भी केजरीवाल बार-बार यह कहते हैं कि अगर दिल्ली पुलिस उनके हाथ में होती तो वे सबकुछ ठीक कर देते। 2012-13 में शीला दीक्षित भी तो यही कहती थीं, तब यही केजरीवाल उन्हें मजबूर मुख्यमंत्री बताते हुए थकते नहीं थे। उन्होंने अपना पूरा चुनाव अभियान इसी सवाल के इर्द-गिर्द बढ़ाया था और तब जीत हासिल की थी।

बात अरविंद केजरीवाल की हो रही है तो उनके ही पार्षद ताहिर हुसैन का नाम आना स्वाभाविक है। दंगों का मास्टर माइंड उसे ही माना जा रहा है और इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। दिल्ली के दंगों में पुलिस वाले पर पिस्तौल तानने वाला शाहरूख गिरफ्तार हो चुका है। ताहिर के बारे में कहा जा रहा है कि दंगे वाले दिन उसने पचास बार ओखला से आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान से बात की। इसी तरह उसने दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से अठारह और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से नौ बार बात की। दंगों के पीछे जब ताहिर का नाम सामने आया तो उसने बीबीसी, आजतक और एनडीटीवी जैसे समाचार चैनलों से बात की और खुद को ही पीडि़त बताया। जबकि हकीकत यह है कि उसके घर की छत से भारी संख्या सल्फ्यूरिक एसिड, पेट्रोल बम और पत्थर पाए गए। कहा तो यहां तक जा रहा है कि उसके यहां से एक किशोर बच्ची के कपड़े और उसकी लाश नाले में पाई गई। सवाल यह है कि ताहिर ने इतनी तैयारी की तो दिल्ली का खुफिया तंत्र क्या करता रहा है और दंगे वाले दिन उसने अपने तीन नेताओं से इतनी लंबी बातें क्या की? जब आम आदमी पार्टी ने ताहिर को निलंबित किया तो उसके ठीक नौ मिनट बाद अमानतुल्लाह खान ने उसे निर्दोष बताने वाला ट्वीट कर दिया। ताहिर को निर्दोष बताने की कोशिश में तो जावेद अख्तर भी शामिल हो गए, जिनके गीतों को हिंदू और मुसलमान समझकर लोगों ने नहीं सुना है, बल्कि उन्हें एक कलाकार की हैसियत से इज्जत दी जाती रही। ताहिर हुसैन को मुसलमान और पीडि़त बताकर उसे बचाने की कोशिश हो रही है।

दंगों को भड़काने के लिए मीडिया और राजनीति के एक वर्ग ने आम आदमी पार्टी के पूर्व और अब बीजेपी के नेता कपिल मिश्र को जिम्मेदार ठहराया। पूर्व आईएएस अधिकारी और कांग्रेस के करीबी हर्ष मंदर की संस्था ने कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर पर मुकदमा दर्ज करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट से गुहार लगाई। लेकिन लोग यह भूल गए कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस ने संविधान बचाओ के नाम से जो रैली की थी, उसमें खुद सोनिया गांधी ने लोगों से कहा था कि अब आर-पार का वक्त है और घरों से लोगों को निकलना होगा। जमीयत ए इस्लामी के नेता वारिस पठान हों या शर्जिल इमान हों…किसी ना किसी तरह से भारत को तोडऩे, हिंदू-मुस्लिम करने की कोशिश पहले से हुई है।

वैसे भी नागरिकता संशोधन कानून को संसद से 13 दिसंबर को राज्यसभा से मंजूरी मिली। वैसे एक दिन पहले यानी गुरूवार को ही लोकसभा ने इसे पास कर दिया था। उसी दिन से लोगों में खदबदाहट थी। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं ने संसद के दोनों सदनों में उकसाउ भाषण भी दिए थे। 14 दिसंबर को दिल्ली के जामिया इलाके में ओखला के विधायक अमानतुल्लाह खान ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किया और वह आंदोलन हिंसक हुआ। उसके बाद जामिया और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र सड़कों पर उतरे। जामिया में आंदोलन हिंसक हुआ और पुलिस को कार्यवाही करनी पड़ी। इसके बाद हंगामा बढ़ा। शाहीन बाग में कुछ विपक्षी दलों की शह पर महिलाएं इस कानून को रद्द करने के लिए धरने पर बैठीं। 16 दिसंबर से यह धरना लगातार जारी है। इसकी देखादेखी देशभर में भी धरने शुरू हुए। दिल्ली के जाफराबाद में भी फरवरी में महिलाएं धरने पर बैठीं, उसके खिलाफ कपिल मिश्रा ने प्रदर्शन किया। इसके बाद ही दंगों की रणनीति बनी। जिसमें हजारों करोड़ की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और ये पंक्तियां लिखे जाने तक 46 जानें जा चुकी हैं। शाहीन बाग को चाहे जितना भी शांत और प्रभावी आंदोलन बताया जाए, लेकिन एक बात तय है कि 1984 के बाद के दिल्ली के सबसे भयावह दंगों की कालिख इस आंदोलन पर लग चुकी है।

दिल्ली पुलिस शुरू में किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आई। रिटायर हो चुके दिल्ली पुलिस के कमिश्नर अमूल्य पटनायक पर सवाल उठा। बहरहाल दिल्ली पुलिस की दो टीमें दो उपायुक्तों की अगुआई में इन दंगों की जांच कर रही है। माना जा रहा है कि दंगों के असल दोषियों को जांच टीम सामने लाने में कामयाब रहेगी। अगर मीडिया और राजनीति के प्रचलित विमर्श के मुताबिक अगर रिपोर्ट नहीं आई तो उसे नकारा जाएगा। यह भी सच है कि दिल्ली के दंगों को लेकर जिन राजनीतिक दलों में सवाल उठे हैं, उनके दामन पर लगी कालिख को कोई भी रिपोर्ट साफ नहीं कर पाएगी।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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