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कांग्रेस का कमजोर नेतृत्व नहीं संभाल पा रहा अपना ‘किटी’ मध्य प्रदेश निकला तो राजस्थान भी निकल जायेगा हाथों से

कांग्रेस का कमजोर नेतृत्व नहीं संभाल पा रहा अपना ‘किटी’  मध्य प्रदेश निकला तो राजस्थान भी निकल जायेगा हाथों से

जिन परिस्थितियों में मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने इधर-उधर से विधायक जुटा कर सरकार बनायी उसके गिरनें का खतरा सदा मंडराता रहेगा। पार्टी से बाहर के विधायक तो किसी न किसी प्रलोभन में साथ रहेंगे लेकिन उनसे ज्यादा खतरा तो पार्टी को खुद अपने विधायकों से है। जो मंत्री नहीं बनाये गये हैं या जो खुद कांग्रेस के अन्दर मुख्यमंत्री कमलनाथ के विरोधी नेताओं के रुप में है, जब कमलनाथ को पार्टी हाइकमान ने मुख्यमंत्री बनाया था तब प्रदेश के महत्वपूर्ण नेताओं, जिनके साथ कुछ न कुछ विधायक हैं ने दबी आवाज से विरोध किया था।

मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदार और कई बार मंत्री रहे कांग्रेस के एक समय प्रधानमंत्री पद के दावेदार अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह राहुल के चुनाव हार जानें से कमलनाथ की लाटरी खुल गयी अन्यथा की स्थिति में शायद वे ही मुख्यमंत्री बनते। दिग्विजय सिंह को तो उनका समर्थन करना ही पड़ता और हाईकमान के करीबी माने जाने वाले नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमलनाथ को रोकने के लिये राहुल का ही साथ देना पड़ता। उनके चुनाव हारने के बाद दिग्विजय सिंह और सिंधिया ही प्रमुख दावेदार बचे थे। दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश में अपनी साख खो चुके हैं और उनके ऊल-जुलूल वक्तव्यों ने कई बार पार्टी की किरकिरी भी करायी है इधर सिंधिया उन्हें हाईकमान से दूर करने में सफल भी रहे हैं।

सिंधिया का राहुल और प्रियंका वाड्रा के नजदीक होना इससे ही पता चलता है कि उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका दी गयी। चूंकि दिग्गी और सिंधिया में 36 का आंकड़ा है। वे एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देख सकते इसके कई कारण है। दोनों का राजनीति का और चुनाव लडऩे का क्षेत्र एक ही है। उसी क्षेत्र के सिंधिया महाराजा रह चुके हैं जहां दिग्विजय सिंह के पूर्वजों की एक छोटी सी स्टेट सिंधिया के मातहत रही है। यही कारण है कि कमलनाथ के समर्थन में कांग्रेस के कम विधायकों की सहमति होते हुये भी वे मुख्यमंत्री बन गये।

लम्बे समय से घुटन महसूस करने वाले सिंधिया मध्य प्रदेश सरकार के कामकाज पर उंगली उठानें लगे। धीरे-धीरे वे इतने मुखर हो गये कि सार्वजनिक रूप से सरकार पर प्रहार करने लगे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि मध्य प्रदेश सरकार अपने वादे पूरी नहीं कर रही है और वे सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आयेंगे। यदि सरकार ने घोषणा पत्र में किये गये वादों को पूरा नहीं किया तो वे सड़को पर उतर कर प्रदर्शन करेंगे। यह भी एक भरी पूरी जनसभा में कहा। क्या किसी राष्ट्रीय स्तर के नेता से पार्टी कभी ऐसी उम्मीद कर सकती है कि वे बजाय हाईकमान से अपनी बात रखनें के कमलनाथ सरकार को भरे बाजार नंगा करेंगे और चेतावनी देंगे।

कमलनाथ और सिंधिया के बीच चलने वाली इस राजनीतिक लड़ाई में या यूं कहें कि कुर्सी की लड़ाई में कांग्रेसी नेताओं की प्रतिक्रियायें दोनों के ही पक्ष में आयी है। यहां यह बताना जरूरी है कि यदि सिंधिया चाहेंगे तो सरकार को गिरने में दो मिनट लगेंगे। क्योंकि सरकार मामूली बहुमत में है सिंधिया के ग्रुप में इतने विधायक हैं जो उनके कहने पर कमलनाथ सरकार के विरूद्ध जा सकते हैं

इधर दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश में पूरी पावर मिली हुयी है, कमलनाथ ने दिग्गी को अपने पक्ष में रखने के लिये उन्हें पूरी तरह साध रखा है। उनके विधायकों के काम हो रहे हैं। जबकि सिंधिया समर्थक मंत्री प्रदुमन सिंह तोमर, इमरती देवी आदि कह रहे है कि उनके विभाग में ही उनकी नहीं चलती है। इसलिये सिंधिया का नाराज होना लाजमी है। सिंधिया इसके पहले सोशल मीडिया में अपने को कांग्रेस पार्टी से अलग कर चुके हैं। कुल मिलाकर सिंधिया ने कमलनाथ से दो-दो हाथ करने की ठान ली है।

खबर ये भी है कि सिंधिया चाह कर भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से नहीं मिल पाये और राहुल उनकी कोई मदद नहीं कर पाये या करना नहीं चाहते हैं। कमजोर हाईकमान के सामने इधर कुआं उधर खाई है। कमलनाथ को हटाते ही सरकार गिरेगी, विधायक बंटेंगे। सिंधिया को किसी भी सूरत में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री नहीं बननें देंगे। भले भाजपा सरकार बन जाये, उनके भाई लक्ष्मण सिंह भी विधायक हैं जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा कर चुके हैं और पहले भाजपा में रह चुके हैं। दिग्विजय सिंह की हैसियत आज खुद मुख्यमंत्री बन पाने की नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस हाईकमान पूरी तरह लाचार है और मध्य प्रदेश की जोड़-तोड़ लगा कर बनी कांग्रेस सरकार पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।

चर्चा है कि सिंधिया कांग्रेस छोड़ सकते है यदि एैसा हुआ तो मध्य प्रदेश सरकार तुरन्त गिर जायेगी। चाहे वे भाजपा में शामिल हो या कोई अन्य पार्टी बनाये। उनके पिता माधव राव सिंधिया ने भी कांग्रेस से अलग होकर एक पार्टी बनायी थी और बाद में कांग्रेस में वापिस आ गये थे।

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हाल की खबरों में लगभग एक दर्जन विधायकों के कांग्रेस से समर्थन वापिस लेने की बात सामनें आ रही है। जिसमें बसपा के विधायक निर्दलीय विधायक और कांग्रेस के छ: से लेकर आठ विधायकों के नाम सामने आये है। उनकी नाराजगी का फायदा भाजपा को मिल सकता है क्योंकि भाजपा के पास 107 विधायक हैं और सरकार 116 विधायकों पर बनती है। आठ-नौ विधायक खुले आम अपनी नाराजगी कमलनाथ सरकार के खिलाफ जता चुके हैं जिनमें कुछ मंत्री भी हैं। ये विधायक गुरूग्राम में हों या देहली में हों या चिकमगलूर में या कहीं और, इससे कोंई अंतर नहीं पड़ता है, सिंधिया चाहेंगे तो सरकार गिरेगी ही। सिंधिया की नाराजगी को दूर करने के बजाय, कंाग्रेस पार्टी बेकार ही भाजपा को दोष दे रही है।

राजनीति में यदि अवसर मिलेगा तो कौन छोड़ेगा। भाजपा इन नाराज विधायकों को तुरन्त लपक लेगी। सिंधिया को सोनिया गांधी द्वारा अलग से समय नहीं देना जरूर भारी पड़ा होगा। कांग्रेस में अध्यक्ष पूर्णकालीन नहीं है पार्टी बिखरी पड़ी है केन्द्रीय नेता जिसकी जो मर्जी आती है कहते रहते हैं। रास्ता भटकी कांग्रेस सीएए का लोकसभा में समर्थन करती है तो राज्यसभा में विरोध। यहां तक कि 370 के कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में लम्बित कह कर देश के खिलाफ बोलती है। इन बातों से सांसद, विधायक पार्टी के बड़े नेता बेलगाम हो गये। हाईकमान की पकड़ धीमी हो गयी। वैसे भी डूबते जहाज से पंछी उडऩे लगते है।

मध्य प्रदेश के विधायकों या सिंधिया जैसे नेताओं द्वारा पार्टी का मुख्य विरोध दर्शाता है कि उन्हें हाईकमान की परवाह नहीं है। अब एैसे में भाजपा जो कि लगभग सरकार बनाने की स्थिति में पहले थी और अब भी लगभग बराबर की ताकत रखती है, तो कांग्रेस के नाराज विधायकों पर अवश्य ही हाथ रखेगी। भाजपा आसानी से सरकार बना लेगी और कांग्रेस कहती रहेगी कि खरीद-फरोख्त हो गयी। दूसरों को दोष देने बजाय यदि कांग्रेस अपना घर संभालने की फिक्र करे तो ज्यादा अच्छा होगा। कमजोर कांग्रेसी नेतृत्व के रहते यदि मध्य प्रदेश की सरकार गिरी तो राजस्थान की सरकार को तो और भी बड़ा खतरा है। जहां भाजपा अधिक शक्तिशाली है। जब अपना सिक्का खोटा हो तो दूसरे को दोष देना बेकार है।

डॉ. विजय खैरा

 

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