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वह मुझे प्रधानमंत्री बना सकते हैं

वह मुझे प्रधानमंत्री बना सकते हैं

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा।

बेटा: कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने तो हमारे प्रधान  मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को तो एक बहुत बड़ी चेतावनी दे दी है।

पिता:  क्या?

बेटा:  उन्होंने कहा है कि यदि  मोदी जी ने पिछले लोक सभा चुनाव के समय युवाओं को नौकरी देने का जो वायदा दिया है और अगर उसे पूरा नहीं किया तो छ: माह के बाद ये युवा उनकी पीठ पर छडिय़ा बरसाएंगे।

पिता: हां, ऐसा तो कहा है।

बेटा: क्या ऐसा संभव है?

पिता: ऐसे मौकों पर तो विपक्ष में बैठे अनेक नेता सब कुछ कह देते हैं। उन्होंने भी तो युवाओं से वोट लेने होते हैं।

बेटा: लगभग साढ़े पांच साल पूर्व तो दस साल पहले कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ही सत्तासीन थी।

पिता: हां।

बेटा: क्या जिस दिन उन्होंने सरकार छोड़ी और मोदीजी ने केन्द्र सरकार संभाली तो उस दिन तक काग्रेस सरकार सभी बेरोजगार युवाओं को रोजगार दे चुकी थी?

पिता: क्या बात कर रहा है तू? क्या यह संभव है? जब मतदाताओं ने कांग्रेस सरकार उनसे छीन कर मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए सरकार को सत्ता संभाल दी तो उस दिन भी करोड़ों की संख्या में बेरोजगार थे।

बेटा: तो राहुल जी कैसे ऐसा कह रहे थे?

पिता: यह तो बेटा वह ही जानें।

बेटा: उस समय तो राहुल जी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। तो क्या वह अपने स्वयं के साथ ऐसे ही व्यवहार के कारण ही ऐसा कह रहे थे?

पिता: नहीं बेटा ऐसी खबर तो न मैंने अखबारों में पढी और न ही समाचार माध्यमों में देखी।

बेटा: तो वह किस आधार पर ऐसा कह रहे थे?

पिता: यह तो राहुल जी ही जानें।

बेटा: यह भी हो सकता है कि जब सोनिया जी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार थी तो उनके साथ कुछ ऐसा हुआ हो।

पिता: तब तो हो सकता है कि इन नेताओं ने सत्ता छोड़ कर अपनी पीठ पर डंडों की बौछार से अपने आप को बचा लिया हो।

बेटा: तब तो यह आंकलन ठीक ही लगता है।

पिता: बेटा, यह तो राजनेताओं के पालिटिक्स का कमाल लगता है।

बेटा: राहुल जी के मुंह से जो कुछ भी निकल जाए वही ठीक है। कांग्रेस में तो कोई ऐसी चुनौती देने की हिम्मत कर नहीं सकता।

पिता: यही तो अच्छी बात है। इसे ही तो अनुशासन कहते हैं।

बेटा: सोशल मीडिया में तो एक जगह यह भी दिखाया गया था कि राहुल जी युवाओं की एक रैली को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि युवाओं में तो इतनी शक्ति है कि वह पूरे भारत को ही नहीं सारे देश को बदल सकते हैं।

पिता: यह तो बेटा राहुल जी के राजनीतिक विरोधियों की शरारत है। वह राहुलजी के बारे ऐसी बेहूदा बातें ऐसे ही छपाते-फैलाते रहते हैं।

बेटा: पर इसका तो उन्होंने वीडियो दिखाया हैं।

पिता: आजकल बेटा टेक्नोलॉजी का जमाना है। कुछ भी बनाया जा सकता है, कुछ भी दिखाया जा सकता है।

बेटा: चलो छोडो इस मसले को। कोई और बात करते हैं।

पिता: ठीक, बोल।

बेटा: लगता है, दिल्ली के चुनाव ने जो एक नया अध्याय खडा किया है, उसके बाद हुए घटनाक्रम से तो संकेत मिल रहे हैं  कि देश के चुनावी इतिहास में कुछ नया गुल खिलने वाला है।

पिता: कैसे?

बेटा: आपको तो पता ही है कि 2014 के लोक सभा चुनाव में श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपानीत एनडीए सरकार को अभूतपूर्व व अप्रत्याशित विजय दिलाने वाले कुशल रणनीतिकार प्रशांत किशोर ही थे।

पिता: तेरा मतलब कि यदि प्रशांत किशोर जी न होते तो भाजपा सत्ता में न आ सकती थी?

बेटा: नहीं। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है। मेरा मतलब कि मोदी जी के चुनाव अभियान के पीछे से गति व चुनावी रणनीति के सूत्रधार प्रशांत जी ही थे।

पिता:  यह मान लिया पर चुनाव अभियान के प्रमुख व चेहरा तो स्वयं मोदी जी ही थे न।

बेटा:  यह तो है।

पिता:  क्या कोई यह कह सकता है कि प्रशांत किशोर जी का साथ न होता तो 2014 में मोदी जी भाजपा और एनडीए को सत्ता में न ला पाते और न ही स्वयं प्रधानमंत्री बन पाते।

बेटा:  मेरे कहने का  यह मतलब नहीं है। पर पिता जी बाद में किशोर जी मोदी जी को क्यों छोड़ गये?

पिता:  कहते हैं प्रशांत जी के भाव बढ़ गए थे। मोदी जी अपने कार्यालय में उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा प्रदान कर कोई पद देना चाह रहे थे पर किशोरजी  चाहते थे थे कैबिनेट मत्री का स्तर।

बेटा:  इसलिए उन्होंने मोदी जी का साथ छोड़ दिया।

पिता:  उन्हें पता था कि अब उनके लिए कई पार्टियों में स्वागत के द्वार खुल गए हैं।

बेटा:   हां, उनको  कई पार्टियों ने हाथों-हाथ उठा लिया।

पिता:  पंजाब में कांग्रेस की विजय हुई पर कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के साथ आंकड़ा ठीक नहीं बैठा। पंजाब में कांग्रस तो जीत गई पर कैप्टन प्रशांतजी को कोई श्रेय नहीं देते।

बेटा:  ठीक भी है। पंजाब में तो सत्तासीन भाजपा-अकाली सरकार के विरुद्ध इतना रोष था कि कांग्रेस को तो जीतना ही था। उसे कोई रोक नहीं सकता था।

पिता: यूपी में भी तो प्रशांत जी का जादू सिर चढ़ कर नहीं बोल पाया था।

बेटा: पर बाद में तो नितीशजी उन्हें बिहार में ले गये थे। नितीशजी ने तो उन्हें जनता दल (यू) का उपाध्यक्ष भी बना दिया था। पर बाद में नितीशजी की भाजपा के साथ दोस्ती बनी रहने के कारण तकरार हो गयी। प्रशांतजी ने कह दिया कि गांधी और गोडसे दोने एक साथ नहीं चल सकते। नितीशजी ने उन्हें अपनी पार्टी से ही निकाल दिया।

पिता:  तो नीतीश जी को यह एहसास नहीं हुआ कि प्रशांतजी के बिना उनकी अपनी ही गद्दी खतरे में पड़ जाएगी?

बेटा: नुकसान तो शायद होगा पर नितीश जी के पास भी अब कोई चारा न बचा था।

पिता: पर अब तो लगता है कि किशोर जी ने सोचा कि मशीन के पीछे रहकर बहुत देख लिया और इस बार 2021 के  बिहार विधानसभा में दूसरों को चुनाव जिताने के बजाये स्वयं का भाग्य क्यों न चमकाएं? अब तो लगता है कि  चुनाव में अलग दल बना कर दूसरों का भाग्य न संवार कर वह अपना ही भाग्य उज्जवल करने पर उतर आये हैं।

बेटा: हां, वह युवाओं को इकठ्ठा कर एनडीए (जिसमें जनता दल (यू) भी सम्मिलित है और राजद-कांग्रेस आदि के महागठबंधन से लोहा लेकर एक तीसरा विकल्प खड़ा करना चाहते हैं।

पिता: बहुत अच्छा कर रहे हैं। दूसरों की शादी में अब अब्दुल्लाह कब तक दीवाना होता रहेगा। मैं तो प्रशांतजी के इस निर्णय से बिलकुल सहमत हूं।

बेटा: पर पिताजी मैं यह भी बता दूं कि यदि वह सफल न हुए तो उनकी दुकानसदा-सदा केलिए बंद हो जायेगी।

पिता:  यह तो ठीक है। वह अपने भविष्य को बड़े जोखिम में डाल रहे हैं।

बेटा:  फिर कल को तो लोग कहने लगेंगे कि जो अपना भविष्य  नहीं बना  सकता वह हमारा भविष्य क्या बना सकेगा।

पिता:  वह बहुत बड़ा जोखिम उठा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं।

बेटा: पिताजी, एक बात है। आज सब  प्रशांत जी को अपना करणधार  बनाना चाहते हैं।

पिता:  इस में कोई शक नहीं कि आज तो उनकी बहुत मांग है।

बेटा: पिताजी यदि आप या मैं प्रशांत जी को अपने चुनाव का कर्णधार बना दें तो वह आपको या मुझे अगले लोक सभा चुनाव में मोदी जी के स्थान पर प्रधानमंत्री बना देंगे?

पिता:  बेटा, तू कब से शेख चिल्लियों जैसे सपने देखने लगा है?

बेटा:  पिताजी, मैं सपने नहीं, संजीदगी से बात कर रहा हूं। यदि प्रशांतजी मोदी जी को प्रधानमंत्री बनवा सकते हैं, तो मुझे या आपको क्यों नहीं?

पिता:   उसकी फीस करोड़ों-अरबों में होगी। हमारे पास तो नगरपालिका चुनाव लडऩे के लिए भी पोसे नहीं हैं।

बेटा:  पिताजी, आप पैसे की नकारात्मक बात मत सोचो।

पिता:  जेब में सौ रुपये न हों तो करोड़ों-अरबों का खेल-खेलने की बात करना कोई अकल की बात है क्या?

बेटा:  जब आप या मैं सार्वजनिक रूप में घोषणा कर देंगे कि अगली बार प्रधान मंत्री बनेंगे और उसके लिए हमने प्रशांतजी को अपना रणनीतिकार नियुक्त कर लिया है तो लोग अपनी थैलियां खोल कर हमारे पास दौड़े -दौड़े आयेंगे। हमें आश्वस्त करेंगे कि और भी पूंजी लगायेंगे। बस आपके हुक्म की आवश्यकता है। वह कहेंगे कि हम आपसे कुछ नहीं चाहते। आप आयेंगे तो सबका उद्धार हो जायेगा। यही हमारी इच्छा और कामना है।

पिता: तुझे या मुझे लोग कैसे अपना प्रधानमंत्री चुनने की सोचेंगे?

बेटा: भारत की जनता देश की वर्तमान राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से  तंग आ चुकी है। उसे कुछ नयेपन और नए नेताओं की खोज है।

पिता:  यहां तक तो तेरी बात ठीक है। देश की जनता हमें जीत दिला सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं। पर सारे देश जन-जन तक हमारी बात कौन पहुंचायेगा?

बेटा: यह काम प्रशांतजी करेंगे न। इसी काम के लिए ही तो हम उन्हें मुंह मागी फीस देंगे।

पिता:  यदि वह तुझे या मुझे प्रधानमंत्री न बना पाए तो?

बेटा: पिताजी, मैं तो उनसे सीधी स्पष्ट बात कर लूंगा। यह धंधे की बात है। इसमें सब बात साफ और सीधी होनी चाहिये। मैं पहले ही तय कर लूंगा। यह धंधे की बात है। इसमें कोई पालिटिक्स नहीं है।

पिता:  क्या करेगा?

बेटा: मैं उन्हें कह दूंगा कि आप जितना पैसा मांगेंगे मैं तो उससे भी ज्यादा देने को तैयार हूं। आधी रकम तो मैं उनको काम शुरू करते ही दे दूंगा और बाकी तब जब चुनाव के बाद मैं प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाऊंगा।

पिता: वह मान जायेगा?

बेटा:  क्यों नहीं? यह तो नहीं हो सकता कि मैं उसे सारी फीस दे दूं और चुनाव पूरे हो जाने पर वह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने की बजाये हमें इसी स्थान और दशा में छोड़ जाए जहां आज हैं।

पिता: इस समय तो तू बड़ी समझदारी की बात कर रहा है।

बेटा: तभी तो मैं प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सज पाऊंगा।

पिता: यह तो है।

बेटा:  वैसे मुझे डर भी लग रहा है। यदि वह कुछ न कर पाया तो हम कहीं के न रह जायेंगे। उलटे जिन्होंने हमें चंदा दिया होगा वह वापस लेने आ जायेंगे।

पिता:  मेरे ख्याल में तो कोई नहीं आएगा। उन्हें पता है कि तू आज नहीं तो कल तो अवश्य ही बनेगा। इस लिए वह इसे अपने  भविष्य के लिए लगाई गई पूंजी समझ कर ही संतोष कर लेंगे। सभी व्यवसायी लोग चुनाव के समय अपनी पूंजी सब पार्टियों पर लगाती हैं – जो जीतने वाली है उसे सब से ज्यादा और बाकी को कम। चुनाव हारने पर कोई पैसा नहीं मांगने आता।

बेटा: यही तो उनकी व्यवसायी सूझ-बूझ को दर्शाता है।

पिता: यही कारण है कि सरकार किसी की बने उनके धंधे में कोई विशेष असर नहीं पड़ता।

बेटा:  फिर मैं इस ओर आगे बढूं?

पिता: यह तू पहले अच्छी तरह सोच ले। जोखिम बहुत बड़ी है।

बेटा:  पिताजी छोडो इस बात को। मैं तो आपके साथ बैठ कर मजे ले रहा था।

पिता:  इसी में समझदारी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस बार मोदी जी प्रशांत के बिना भी पहले से अधिक सीटें जीतने में सक्षम रहे हैं।

बेटा:  आपने बिल्कुल ठीक कहा। हां, अब मैं प्रशांत जी की तर्ज पर मैं एक कंपनी खोलने की सोच रहा हूं।

पिता: विचार तो ठीक है। इस पर बाद में सोचेंगे।

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