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दिल्ली की आत्मा हुई लहुलूहान

दिल्ली की आत्मा हुई लहुलूहान

दिल्ली के दंगे प्रभावित क्षेत्र अब नियंत्रण में है। कहने को तो धरातल पर शांति है, लेकिन धरातल के नीचे अभी भी शोले सुलग रहे हैं। इस दंगे में आम आदमी पार्टी (आप) के पार्षद ताहिर हुसैन का नाम सामने आया, जिन्हें माना जाता है कि वह ही दंगों के मास्टरमाइंड हैं। ताहिर हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के ऊपर बंदूक से फायर करने वाला शाहरूख भी अब पुलिस की गिरफ्त में हैं। जब ताहिर का इस हिंसा में नाम आया तो उसने एक तथाकथित पंथनिरपेक्ष न्यूज चैनल से बात की और अपने आप को पीडि़त बताया। जबकि सच्चाई तो यह है कि ताहिर के घर की छत से पेट्रोल बम, पत्थर और एसिड मिला। प्रश्न तो यह खड़ा होता है कि जब ताहिर इस प्रकार की तैयारी कर रहा था, उस समय खुफिया एजेंसियां कहां थी? सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जब आम आदमी पार्टी ने ताहिर हुसैन को पार्टी से निकालने की घोषणा की, उसके नौ मिनट बाद ही आप के विधायक अमानतुल्लाह खान उनके बचाव में उतर गये और उन्हें निर्दोष करार दिया। वहीं जावेद अख्तर ने ट्वीट करते हुए कहा: ‘दिल्ली में कई लोग मारे गए, घर फूंके गए, दुकान लूट ली गईं पर पुलिस सिर्फ एक घर को सील कर मालिक को खोज रही है। संयोग से उसका नाम ताहिर है। दिल्ली पुलिस को सलाम।’

ऐसा लगता हैं कि जावेद अख्तर यह भूल चुके  हैं कि लोग उनके गानों को सुनते समय हिंदू और मुसलमान नहीं देखते। उन्हें लोगों ने हमेशा ही सम्मान दिया है। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि शाहीन बाग ही इस दंगे का मुख्य कारण रहा। इस पृष्ठभूमि में यह कहना उचित होगा कि आखिर मुस्लिम महिलाओं को क्यों रोड ब्लाक करने दिया गया? आखिर यह किस प्रकार का धरना है जिससे आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है? यह रास्ता जो नोएडा और दिल्ली को जोड़ता है, इसे खाली कराने के बजाए आखिर सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े और साधना रामचन्द्रन को बातचीत करने के लिए वहा क्यों भेजा?

नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ यह धरना प्रदर्शन पूरे देशभर में सांप्रदायिक रहा। इस में कुछ हिंदू और सिख भी शामिल रहे। भीम आर्मी चीफ के चन्द्रशेखर ने भी इस प्रदर्शन में भाग लिया, लेकिन वह भूल गये कि सीएए से सर्वाधिक फायदा मुस्लिम देशों में प्रताडि़त हुए हिन्दू समुदाय का दलित समाज ही है। यह दर्शाता है कि यह धरना किस प्रकार से सांप्रदायिक रहा। दिल्ली में हुई हिंसा ने सीएए की आड़ में हो रहे धरने का भी भंडाफोड़ कर दिया। लेकिन यह बात फिर भी वामपंथियों और उदारवादियों के समझ में नहीं आयेगी। इस दंगे से यह भी बात साफ-साफ उभर कर सामने आती है कि जहां पर भी मुस्लिम समाज की जनसंख्या अधिक है, वहां दूसरे वर्ग के लोगों का जीवन कठिन है। एक कट्टर मुस्लिम का हमेशा से ही यह मानता है कि चाहे वह कुछ भी करे, लेकिन अंतत: सहानुभूति उसी को मिलेगी। और दूसरे वर्ग पर धब्बा लगा दिया जायेगा। ये लोग कुछ भी करें तो इन्हें पीडि़त बताकर उनकी बातों को किसी भी प्रकार से सच साबित किया जायेगा। चाहे वह कितना भी निरर्थक क्यों न हो। यह उचित समय है उन्हें यह बताने का कि यह बहुलतावादी देश है और यहां सभी को एक साथ रहना है। जैसे वह कहीं नहीं जाने वाले वैसे ही बाकी वर्ग यहां से कहीं जाने वाला नहीं है। उन्हें इस बात को समझ लेना चाहिये।

Deepak Kumar Rath

 

  दीपक कुमार रथ

 (editor@udayindia.in)

 

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