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जय हो! मंगलयान

Deepak Kumar Rath

By दीपक कुमार रथ

भारत के लोगों को प्राचीन काल से ही अंतरिक्ष आकर्षित करता रहा है। हमारे पुरखों ने आकाश के रहस्यों को जानने-समझने के लिए सारी दुनिया को ज्ञान मुहैया कराया है। हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष की गणनाओं में पूरा जीवन व्यतीत किया है। आधुनिक दौर में एस.एन. बोस और सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर जैसे वैज्ञानिकों ने विज्ञान को समृद्ध करने में महती योगदान दिया है। सो, देश के मंगल मिशन की सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से सही ही कहा, ”आपने अपनी उपलब्धि से हमारे पुरखों को सम्मानित किया और भावी पीढिय़ों को प्रेरणा दी।’’ बेशक, आर्यभट्ट और भास्कराचार्य जैसे गणषियों को इन वैज्ञनिकों पर गर्व हो रहा होगा!

यही नहीं, मंगल मिशन की सफलता अस्वाभाविक-सी लगने वाली रकम महज 7.4 करोड़ डॉलर में ही हासिल कर ली गई, जो विश्व की दूसरी तमाम एजेंसियों के ऐसे मिशन पर खर्च का दशमांश भर है। अमूमन दुनिया में मंगल मिशनों की असफलता की दर भारी रही है। अब तक 51 मिशनों में सिर्फ 21 ही सफल हो पाए हैं। लेकिन इसरो ने अपने पहले अभियान में ही सफलता हासिल करके विश्व में चौथी अंतरिक्ष एजेंसी कहलाने का खिताब पा लिया है। मंगल अभियान में सफलता प्राप्त करने वाली बाकी तीन हैं – अमेरिका की नेशनल एअरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा), रूसी फेडरल स्पेस एजेंसी (आरएफएसए) और यूरोपियन स्पेस एजेंसी। भारत के मंगल मिशन को एशिया की अंतरिक्ष पहल का नया नमूना माना जा रहा है।

पिछले साल जब हमारे रॉकेट नाकाम हो गए थे तो कई पश्चिमी पत्रकार खिल्ली उड़ाने के अंदाज में तीखी आलोचना पर उतर आए थे। लंदन के गॉर्जियन की सुर्खी थी, ”भारत ने भारी गरीबी के बीच शुरू किया मंगल मिशन।’’ इन खबरों में एक हल्की-सी चेतावनी भी थी, ”इसरो ने भारत का पहला मंगल अंतरिक्षयान लांच किया। देश में ब्रिटेन के सहायता कार्यक्रम के आलोचक इस मिशन से नाराज हैं। ब्रिटेन हर वर्ष भारत को 30 करोड़ पाउंड के आसपास मदद देता है।’’ यहां तक कि हमारे देश के हर्ष मंदर ने भी मंगल मिशन को गरीबों की ‘गरिमा की आश्चर्यजनक उपेक्षा’ की संज्ञा दी थी।

गरीबी ही क्यों, यहां भी ‘भारी गरीबी’ का ही जिक्र होना चाहिए था। वे चकित थे कि भला भारत अंतरिक्ष की ओर कैसे देख सकता है? आखिर वैज्ञानिक शोध में कदम बढ़ाने वाले देशों का सामना गरीबी से तो नहीं है। ऑस्ट्रेलिया का तो कोई अंतरिक्ष कार्यक्रम ही नहीं है और अंतरिक्ष के प्रति उसकी आकांक्षाएं महज व्यावहारिकता से ही प्रेरित हैं। दूसरी ओर, मलेशिया जैसे अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक देश अंतरिक्ष में अपने वैज्ञनिकों को भेजने का इरादा रखते हैं।

इसलिए मंगल मिशन की सफलता का यह क्षण हर भारतीय के लिए गर्व का मौका है। जरा सोचिए अमेरीकियों को पहली बार चांद पर पहुंचकर कैसा लगा था। तो, जैसे ऑर्मस्ट्रांग अमेरिका के लिए 1960 के दशक में गर्वानुभूति लेकर आए थे, उसी तरह भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने काम से हमारा सीना चौड़ा कर दिया है। हमारा मंगल मिशन सिर्फ 14 महीने में महज 7.5 करोड़ डॉलर में पूरा हुआ और तिस पर पहले से इस बारे में हमारी खास विशेषज्ञता भी नहीं थी। इससे भी बढ़कर बात यह है कि हम पहली कोशिश में ही कामयाब हो गए। चीन, जापान, और रूस को पिछले दो दशकों से नाकामियों की वजह से अपने मंगल मिशन को मुल्तवी करना पड़ा है। इसलिए हमारे वैज्ञानिकों के इंजीनियरिंग कौशल को सलाम! अंतरिक्षयान आश्चर्यजनक रूप से 65 करोड़ कि.मी. की दूरी नापी, जो मनुष्य की कल्पना को भी चुनौती देने के समान है। इसरो ने ऐसे रास्ते से अपने यान को सफलतापूर्वक मुकाम पर पहुंचाया जिसका पता बहुत ही कम है।

अब आइए जरा इस पर गौर करें कि आखिर भारत को मंगल मिशन की क्या दरकार है? एक तो इसीलिए कि भारत को अपनी तकनीकी क्षमताएं भविष्य में सिर्फ अंतरिक्ष ही नहीं, हर मामले में साबित करनी है। अगर हम महज एक हॉलीवुड फिल्म के बजट में मंगल मिशन पूरा कर सकते हैं तो कुछ भी हासिल कर सकते हैं। इसके अल्पकालिक और दूरगामी, दोनों तरह के परिणाम हैं। इससे भारत की टेक्नोलॉजी कंपनियों को भारी मदद मिलेगी।

इससे बच्चों और किशोरों का मनोबल बढ़ेगा और वे विज्ञान, टेक्नोलॉजी और शोध के क्षेत्र में कॅरिअर बनाने की सोच सकते हैं। इसरो दूसरे देशों के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की पहले से ही मदद कर रहा है और अच्छी-खासी कमाई भी कर रहा है। अगर हम कम कीमत में अधिक गति वाले यान में कामयाब हो जाते हैं तो भारत अंतरिक्ष के मामले में अग्रणी देश बन सकता है। लिहाजा, भारत हजारों इंजीनियरों को रोजगार देने और विदेशी मुद्रा की आय का साधन बन सकता है। इस तरह देश अंतरिक्ष के साजो-सामान और सेवाओं में महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर रहा है।

चार साल पहले भारत ने यह पुष्ट किया था कि चांद पर पानी है, जिसकी खोज में दुनिया भर के वैज्ञानिक पांच दशकों से लगे थे। यह मिशन मिथेन की तलाश के लिए था जिससे भारतीय विज्ञान को नया जीवन मिल सकता है। हमें अपने पुनर्जागरण की जरूरत है। हमें गरीबी के दुष्चक्र से निकलने के लिए कुछ अनोखे विचारों को अजमाना होगा। अगर हम मंगल पर पहुंच सकते हैं तो राजनीति, कला, विज्ञान या खेल में कुछ भी कर गुजर सकते हैं।

उत्साहित प्रधानमंत्री मोदी, जो अंतरिक्ष मामलों के भी मंत्री हैं, ने कहा, ”आज इतिहास रचा गया। हम अनजान क्षेत्रों में पहुंच गए और असंभव को संभव बना लाए।’’

भारत अभी भी वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग में छोटा खिलाड़ी ही है। यह उद्योग 314 अरब डॉलर का हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि मंगल मिशन से काफी कुछ बदल जाएगा और इसरो को काफी कारोबार मिल जाएगा। भारत अभी 30 अपने और 40 विदेशी सैटेलाइट का प्रक्षेपण कर चुका है। उसकी करीबी होड़ चीन से है जिसके पास बड़े स्पेस लांचर हैं लेकिन यह स्थिति अब बदलने वाली है। मौजूदा कामयाबी हमारे लिए विज्ञापन का काम करेगी कि हम अमेरिकी और यूरोपीय देशों से काफी कम कीमत में यान अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम हैं। प्रधानमंत्री ने यह भी याद दिलाया कि भारत का मंगलयान देश में निर्मित है और यह बंगलुरु से लेकर भुवनेश्वर और फरीदाबाद से राजकोट तक का योगदान है। यान का दो-तिहाई हिस्सा लार्सन ऐंड टुब्रो और गोदरेज ऐंड ब्यॉस जैसी कंपनियों ने बनाए हैं।

फिलहाल पृथ्वी की कक्षा में भारत के करीब 35 सैटेलाइट संचार, टीवी प्रसारण और रिमोट सेंसिंग के लिए हैं। पिछले साल देश ने नौसैनिक खुफिया सूचनाएं जुटाने के लिए पहला सैन्य सैटेलाइट लांच किया था। जून में इसरो ने इकलौते कार्यक्रम में पांच विदेशी सैटेलाइट लांच किए। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए रास्ता अभी लंबा है, हम निश्चित रूप से अंतरिक्ष विज्ञान में अग्रणी बन कर उभरेंगे।

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