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मंगलमय मंगलयान

मंगलमय  मंगलयान

By नीलाभ कृष्ण

24 सितंबर की सुबह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए कौतूहल के पल थे। यान के इंजन को चालू कर उसकी गति को धीमा किया जाना था, ताकि मंगल का गुरुत्वाकर्षण बल उसे अपनी कक्षा में खींच सके। कामयाबी का वह पल आते ही इसरो में मानो जैसे जश्न का माहौल हो गया।

दुनिया भर से भारत को मिल रही बधाइयों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘यह असंभव जैसा था।’ उन्होंने इसरो के वैज्ञानिकों समेत पूरे देश को इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा की ‘साधन बहुत कम, अनेक मर्यादाएं और उसके बावजूद भी इतनी बड़ी सिद्धि प्राप्त होती है, वो वैज्ञानिकों के विश्वास के कारण, उनके पुरूषार्थ के कारण, उनकी प्रतिबद्धता के कारण होती है। और इसलिए, हमारे देश के वैज्ञानिक अनके-अनेक अभिनंदन के अधिकारी हैं’। साथ ही यह भी कहा कि, ‘आज इतिहास रचा गया है।’ मोदी पहले भी भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को बढ़ावा देने की बात कहते आए हैं।

भारत को अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा ने भी ट्वीट कर बधाई दी है। मंगलयान के सफलतापूर्वक कक्षा में प्रवेश करने के कुछ देर बाद ही मंगलयान के नाम से इसरो द्वारा ट्विटर पर अकाउंट भी चालू कर दिया गया जिसपर अंतरिक्ष में मंगल के अनुभवों से संबंधित ट्वीट भी किए जा रहे हैं।

विभिन्न देशों की ओर से मंगल (या उसके उपग्रह फोबोस और डेमोस) पर भेजे गये तकरीबन 50 मिशनों में से आधे मिशन भले ही सफल रहे हों, लेकिन पहले प्रयास में कोई भी देश अब तक वहां पहुंचने में कामयाब नहीं रहा है। इस कामयाबी के साथ ही भारत (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) रूस, अमेरिका की नासा (नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) और यूरोपियन स्पेस एजेंसी के बाद यह कारनामा करने वाला चौथा देश हो गया। पृथ्वी से इस यान की सफल लॉन्चिंग और उसके मंगल ग्रह की कक्षा में निर्धारित समय पर पहुंचने की प्रक्रिया ने भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया है, जो ग्रहों की यात्रा  के संदर्भ में अपनी क्षमता को साबित कर चुके हैं।

11-10-2014

पिछले वर्ष पांच नवंबर को पीएसएलवी सी 25 से मंगलयान का सफल प्रक्षेपण किया गया था। मंगल ग्रह की खोज का ऐसा अवसर प्रत्येक 26 महीने में एक बार आता है। दरअसल, त्रिकोणमिति के हिसाब से सूर्य, मंगल और पृथ्वी के एक खास कक्षा में आने का यह श्रेष्ठ दिन था। इसलिए हमने देश में मौजूद श्रेष्ठ संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए इस कार्य को आगे बढ़ाने में पूरी ताकत लगा दी थी। पृथ्वी से इसके उड़ान भरने के बाद से बेंगलुरु स्थित इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (आइएसटीआरएसी) से इस यान को नियंत्रित किया जा रहा है। अप्रैल तक इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क (आइडीएसएन) के 18 मीटर डिश एंटीना को इस यान के संचार के लिए इस्तेमाल में लाया जा रहा था। उसके बाद से 32 मीटर के एंटीना से इससे संचार कायम किया जा रहा है। इस दौरान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने इस कार्य के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’  के डीप स्पेस नेटवर्क से भी मदद ली है।

मार्स ऑर्बिटर के नाम से जाना जाने वाला मंगलयान एक मिशन है। हालांकि, यह नासा द्वारा भेजा गया ‘रोवर’ नहीं है, जो मंगल की सतह पर जाकर वहां से हमें जानकारी देगा। हमारा मंगलयान मंगल ग्रह पर उतरेगा नहीं, बल्कि उसकी कक्षा में घूमते हुए ही उसका अध्ययन करेगा। इसकी कक्षा 375 किमी गुणा 80,000 किमी की होगी। यानी जब यह यान मंगल के सबसे नजदीक होगा, तो उस ग्रह से इस यान की दूरी तकरीबन 375 किमी होगी। ‘मंगलयान’ इसी कक्षा में से तमाम वैज्ञानिक जानकारियों की जांच-पड़ताल करेगा।

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यह यान मंगल के अपने रास्ते में चांद के ऊपर से गुजरते हुए पृथ्वी व चंद्रमा और फिर मंगल की सतह की तस्वीरें खींचेगा। इसरो के इस मिशन की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मंगल पर मीथेन गैस की मौजूदगी के संकेतों के बारे में पता लगाना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी ग्रह पर जीवन के पनपने के लिए मीथेन एक बुनियादी आधार है। मीथेन के संकेत मिलने पर यह पड़ताल की जा सकती है कि क्या मंगल पर कभी जीवन था या कभी भविष्य में पनप सकता है।

मंगलयान के पांच प्राथमिक पेलोड्स
मंगलयान में पांच प्राथमिक पेलोड्स (अंतरिक्ष उपकरण) लगे हुए हैं। यह यान इन पेलोड्स  को अपने साथ लेकर जा रहा है। इन सभी पेलोड्स का वजन करीब 15 किलोग्राम है। जानते हैं इन पांचों पेलोड्स बारे में :

मार्स कलर कैमरा
यह ट्राइ-कलर मार्स कैमरा मंगल की सतह की खासियतों और उसके मिश्रण के बारे में तसवीरें और सूचना मुहैया करायेगा। मंगल ग्रह के मौसम के बारे में जानकारी देने के अलावा वहां की तमाम गतिविधियों की निगरानी के लिए इसका इस्तेमाल किया जायेगा। मंगल के दो उपग्रहों- फोबोस और डेमोस के बारे में भी जानकारी देने में यह कैमरा सक्षम साबित हो सकता है। अन्य साइंस पेलोड्स के लिए भी यह उनके संदर्भ में सूचना देने का काम करेगा। इस पेलोड का वजन 1.27 किलोग्राम है।

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थर्मल इफ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर
यह पेलोड थर्मल उत्सजर्न को मापने का काम करेगा और इसे दिन और रात, दोनों समय संचालित किया जा सकता है। तापमान और उत्सजर्कता, ये दो ऐसे भौतिक  मानदंड हैं, जिनका थर्मल उत्सजर्न की माप से अनुमान लगाया जा सकता है। इस खास पेलोड से खास इलाकों में खनिजों और मिट्टी के प्रकारों की खासियतों के बारे में जाना जा सकता है। इसके अलावा, यह उपकरण मंगल के सतह की संरचना और मिनरोलॉजी का नक्शा भी बना सकता है। इस पेलोड का वजन 3.2 किलोग्राम है।

मिथेन सेंसर्स फॉर मार्स
इसका इस्तेमाल मंगल के वायुमंडल में मिथेन (सीएच4) की मौजूदगी और उसकी मात्र को मापने के लिए किया जायेगा। यह पेलोड सोलर रेडिएशन को रिफ्लेक्ट करते हुए सेंसर से आंकड़ों को मापेगा। माना जाता है कि मंगल के वायुमंडल में मिथेन पाया जाता है और इसके अलावा इसमें अनेक अस्थायी विविधताएं मौजूद हैं। इस पेलोड का वजन 2.94 किलोग्राम है।

मार्स इनोस्फेरिक न्यूट्रल कंपोजिशन एनालाइजर
यह एक प्रकार का क्वाड्रपल मास स्पेक्ट्रोमीटर है, जो 1 से 300 तक की एएमयू के साथ मास रिजोलुशन की रेंज में न्यूट्रल कंपोजिशन के विश्लेषण में सक्षम है। इस पेलोड की ज्यादातर तकनीक ‘चंद्र एटीट्यूडिनल कंपोजिशन एक्सप्लोरर’ से ली गयी है। क्वाड्रपल मास स्पेक्ट्रोमीटर आधारित यह साइंटिफिक पेलोड यूनिट दरअसल मास रिजोलुशन के साथ एक निर्धारित रेंज में वहां मौजूद निरपेक्ष तत्वों की आधिक्यता को मापने में भी सक्षम है। इस पेलोड का वजन 3.56 किलोग्राम है।

मंगलयान का सफरनामा

पिछले 300 दिनों में मंगल का सफर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों के लिए उत्साह और चुनौतियों से भरा रहा। मिशन की शुरुआत हुई 5 नवंबर 2013 को जब श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रॉकेट ने उड़ान भरी और 44 मिनट बाद रॉकेट से अलग होकर उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में आ गया।

पिछले 300 दिनों में मंगल का सफर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों के लिए उत्साह और चुनौतियों से भरा रहा। मिशन की शुरुआत हुई 5 नवंबर 2013 को जब श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से रॉकेट ने उड़ान भरी और 44 मिनट बाद रॉकेट से अलग होकर उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में आ गया।

  • 7 नवंबर 2013 को मंगलयान की कक्षा बढ़ाने की पहली कोशिश सफल रही।
  • 8 नवंबर को मंगलयान की कक्षा बढ़ाने की दूसरी कोशिश सफल रही।
  • 9 नवंबर को मंगलयान की एक और कक्षा सफलतापूर्वक बढ़ाई गई।
  • 11 नवंबर को मंगलयान की कक्षा बढ़ाने की चौथी कोशिश सफल रही।
  • 12 नवंबर को मंगलयान की कक्षा बढ़ाने की पांचवीं कोशिश सफल रही।
  • 16 नवंबर को मंगलयान की आखिरी बार कक्षा बढ़ाई गई।
  • 1 दिसंबर को मंगलयान ने सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा छोड़ दी और मंगल की तरफ बढ़ चला।
  • 4 दिसंबर को मंगलयान पृथ्वी के 9.25 लाख किलोमीटर घेरे के प्रभाव क्षेत्र से बाहर निकल गया।
  • 11 दिसंबर को अंतरिक्षयान में पहले सुधार किए गए।
  • 22 सितंबर को मंगलयान अपने अंतिम चरण में पहुंच गया। मंगलयान ने मंगल के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश कर गया।
  • 24 सितंबर को मंगल की कक्षा में प्रवेश करने के साथ ही मंगलयान भारत के लिए ऐतिहासिक पल लेकर आया। इसके साथ ही भारत पहली ही बार में मंगल मिशन में सफलता हासिल करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया।

 

लीमेन- अल्फा फोटोमीटर
यह पेलोड एक प्रकार का ‘एब्जोप्र्शन सेल फोटोमीटर’ है। मंगल के ऊपरी वायुमंडल में लीमेन- अल्फा के उत्सजर्न से हाइड्रोजन और ड्यूटेरियम की अधिकता को सापेक्ष तौर पर मापने का काम करेगा। दरअसल, डी/एच (ड्यूटेरियम से हाइड्रोजन की आधिक्यता का अनुपात) को मापने से इस तथ्य को जाना जा सकेगा कि किस तरह से इस ग्रह से पानी का विनाश हुआ था। इस मायने में यह पेलोड बेहद अहम है, जो यहां पूर्व में पानी के मौजूदगी के बारे में बता सकता है। इस पेलोड का वजन 1.97 किलोग्राम है।

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मार्स ऑर्बिटर मिशन के साथ जुड़े वैज्ञानिक

के राधाकृष्णन : इसरो के चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव। मंगलयान और सभी कार्यों के कर्ता-धर्ता।

एम अन्नादुराई : ‘मार्स ऑर्बिटर मिशन’ के प्रोग्राम डायरेक्टर।

एस रामकृष्णन : मंगलयान को अंतरिक्ष में भेजने के लिए जिस पोलर सॅटॅलाइट लांच व्हीकल का प्रयोग किया गया, उसकी पूरी जिम्मेदारी।

एस के शिवकुमार : भारत के पहले स्वदेशी ‘डीप स्पेस नेटवर्क ऐन्टेना’ के प्रोजेक्ट डायरेक्टर।

पी कुन्हीकृष्णन : पीएसएलवी – सी 25/मार्स ऑर्बिटर मिशन के मिशन डायरेक्टर।

चन्द्रदाथन : लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम के डायरेक्टर।

ए एस किरण कुमार : इनकी जिम्मेदारी इस मिशन पर जाने वाले पेलोड्स ‘मार्स कलर कैमरा, मीथेन सेंसर, और थर्मल इंफ्रारेड इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर’ का डिजाइन तैयार करना और बनाना था।

एस अरुणान : मार्स ऑर्बिटर मिशन के प्रोजेक्ट डायरेक्टर होने के साथ साथ इस अंतरिक्ष यान को बनाने की जिम्मेदारी।

भारतीय मंगलयान की यात्रा कई वजहों से लगातार सुर्खियों में रही है। इसका सबसे बड़ा आलोचनात्मक मुद्दा यह रहा है कि क्या भारत जैसे गरीब देश को इस मिशन पर इतनी भारी रकम खर्च करनी चाहिए। आलोचकों का यह भी कहना है कि ज्यादातर मार्स ऑर्बिटर मिशनों के मकसद उनसे पहले भेजे गये इस तरह के मिशनों से ही हासिल किये जा चुके हैं और इतनी भारी मात्रा में रकम खर्च करने का कोई खास फायदा नहीं दिख रहा है। हालांकि, देश में बढ़ रही वैज्ञानिक जागरूकता और राष्ट्रीय गर्व को बढ़ाने में इस मिशन का व्यापक योगदान कहा जा सकता है। इसके सफल होते ही पूरी दुनिया के उपग्रह प्रक्षेपण और अंतरिक्ष विज्ञान में बढ़ रहे कारोबार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। परिणामस्वरूप, निजी उद्योगों पर इसका सकारात्मक प्रभाव देखा जा सकेगा। इसलिए तमाम आलोचनाओं के बावजूद, यह कहा जा सकता है कि मार्स ऑर्बिटर मिशन ने भारत को अच्छे दिनों की ओर ले जाने का संकेत दिया है।

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