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भारतीयता पर डटी रहे भाजपा

भारतीयता पर डटी रहे भाजपा

सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी ने बंगलुरू में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी के मंथन सत्र में सरकार और पार्टी के बीच समन्वय को लेकर सुझावों को आमंत्रित किया। केन्द्र में मोदी सरकार के गठन के बाद अमित शाह की कार्यशैली से पार्टी के कार्यकत्र्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। भाजपा का तथाकथित ‘मार्गदर्शक मंडल’, जिसमें पार्टी के पुराने योद्धा शामिल हैं, भी भाजपा की नव-संगठनात्मक शैली से चिंतित हैं। कांग्रेस का पूरी तरह सुसुप्तावस्था में होने के कारण सत्ताधारी पार्टी से एक सकारात्मक बदलाव की उम्मीद है, कम से कम देश के विकास के मामले में। बदलाव का हमेशा स्वागत है, लेकिन पार्टी की वैचारिक प्रतिबद्धता, समृद्ध संस्कृति और समर्पित कार्यकत्र्ताओं की कीमत पर नहीं। भाजपा दुविधाओं के भंवरजाल में फंस गई है। हिंदुत्व समर्थक दक्षिण पंथी दल भाजपा को, जिसे हिंदुत्व के बुनियादी सिद्धांतों में से एक अपने राष्ट्रवाद की अंतर्निहित विचारधारा पर गर्व है, अपने वैचारिक सिद्धांतों पर अडिग रहना कठिन लग रहा है। ‘राजधर्म’ की अवधारणा, जैसा कि अटलजी ने कहा था, प्रधानमंत्री मोदी के लिए आज भी गले की हड्डी बनी हुई है।

कुछ केन्द्रिय मंत्रियों, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और यहां तक कि राज्य के मुख्यमंत्रियों के अनचाहे बोल प्रधानमंत्री मोदी और उनके सहयोगियों के लिए विवाद के रूप में अभिशाप बन चुका है। जब मोदी स्वयं की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत नेता की छवि बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे होते हैं, उसी समय उनके सहयोगियों द्वारा इस तरह के छिटपुट बयान दे दिए जाते हैं और परिणामस्वरूप चारों तरफ हो-हल्ला मच जाता है और पार्टी बचाव की मुद्रा में आ जाती है। ऐसे विवादों की तलवार मोदी के सिर पर लटकी रहती है।

पार्टी चुनावों से पहले किए गए ‘रामराज्य’ लाने के वादों पर सुस्त दिखाई दे रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता संयम से काम लेते हुए भड़काउ बोलने से बच रहे हैं। लेकिन, पुराने आदतें मुश्किल से ही छुटती हैं। वर्तमान नेताओं में बहुत से लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रशिक्षित हैं, लेकिन अपनी बार-बार के विवादास्पद बयानों से मोदी और सरकार को शर्मिंदा कर रहे हैं। हालांकि पार्टी उनके बयानों को अस्वीकार और उसकी निंदा करती रहती है, लेकिन तब तक पार्टी को नुकसान हो चुका होता है। इससे मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ का समावेशी नारा खंडित हो जाता है।

पार्टी में बहुत सारे जोकर हैं। उसमें से अधिकांश जनता का सिर्फ मनोरंजन करते हैं, लेकिन उनमें से कुछ अपने बयानों से हमें भयभीत कर देते हैं। उनमें से कुछ विचित्र प्रकार के दावे करते हैं और दूसरे लोग उसे दुहराने के अपराधी हैं। इसलिए पार्टी को सुब्रह्मण्यम स्वामी, गिरीराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, महंत आदित्यनाथ और कभी-कभी पार्टी के सात मुख्यमंत्रियों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है।

इसे माने या न माने, स्वामी अब भाजपा के हिस्सा हैं। उनकी ‘वनमैन आर्मी’ की छवि है, जो इधर-उधर शाब्दिक बमवर्षा करते रहते हैं। उनकी एक मनमौजी शैली है और व्यवहारिक राजनीति की पतली सीमा को पार कर जाते हैं। गिरीराज सिंह अगले बड़बोले हैं। उनका गैर-भाजपा समर्थकों को पाकिस्तानी समर्थक बताना भूला नहीं जा सकता। सत्ता में आने के बाद भाजपा के सबसे अधिक नकारात्मक प्रचार के वे कारण हैं। उनकी नवीनतम बयानबाजी से संकीर्णता और अज्ञानता की बू आती है। सोनिया गांधी के खिलाफ उनका गंदा आक्षेप नस्लवादी, सेक्सिस्ट और अश्लील था। यहां तक कि नाइजीरियन हाई कमीश्नर ने इस टिप्पणी पर रोष जाहिर करते हुए शिकायत दर्ज कराई है। इससे भारत को वैश्विक पटल पर स्थापित करने के लिए मोदी के विदेशी दौरों के प्रयास को नुकसान पहुंचा है।

गैर-भाजपाई मतदाताओं की आकांक्षाओं पर साध्वी निरंजन ज्योति खरी उतरी हैं। उन्होंने सार्वजनिक सभा में गलत शब्दों का प्रयोग किया था। ‘रामजादा बनाम हरामजादा’ शब्द भारतीय राजनीति में नीचे गिरने के एक बेंचमार्क के रूप में याद किया जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चुप रहने का आदेश काम नहीं कर रहा है। कुछ मंत्रियों, जिनमें से अधिकांश पर कई-कई मंत्रालयों का भार है, वाले छोटे प्रशासन में भी लगता है कि उल्टा-पुल्टा हो रहा है। 24×7 समाचार चैनलों और ऑनलाईन मीडिया के युग में प्रेस मंत्रियों के मुंह से कुछ सनसनीखेज सुनने के इंतजार में रहता है।

जिसके सिर पर ताज होता है, उसे ही सबसे अधिक भार का अनुभव होता है। अब समय आ गया है कि आदत से मजबूर इन बयानवीरों पर मोदी प्रहार करें। ये ऐसे सीरियल किलर्स हैं, जो एनडीए के महत्वकांक्षी योजनाओं को पटरी से उतार सकते हैं। ऐसे तत्वों को रोका जाना चाहिए। उनमें से कुछ लोगों को हटाना एक मजबूत और साफ संदेश देगा। ऐसे हिस्ट्रीशीटर्स के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाने से यही धारणा बनेगी कि उन्हें मोदी का मौन समर्थन हासिल है। यह मोदी और देश की छवि के लिए सही नहीं है।

दीपक कुमार रथ

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