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सेवा परम धर्म

सेवा परम धर्म

पूरे देश में सेवा के क्षेत्र में काम करने वाली कई प्रकार की संस्थाएं हैं। व्यक्तिगत रूप से भी हमारे कई बंधु सेवा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। समाज में जो लोग कष्ट में हैं और गरीब हैं उनकी भिन्न-भिन्न समस्याएं हैं। उनकी समस्याओं को दूर करना किसी एक संस्था या व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। इसलिए सभी लोगों को मिलकर गरीबों की समस्याओं को दूर करना होगा। सेवा भारती ने इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सेवासंगम की शुरूआत हुई। हर प्रांत में हर साल इस सेवा संस्था के प्रमुख कार्यकर्ता एकत्रित होते हैं, जिसे हम प्रांत सेवासंगम कहते हैं। 2010 में पहली बार राष्ट्रीय सेवासंगम कार्यक्रम का आयोजन दिल्ली में हुआ था। 5 साल के बाद, यह कार्यक्रम 4-6 अप्रैल आयोजित हुआ। जी.टी. करनाल रोड, ब्लू सैफायर, प्राथमिक विद्यालय, सूरज वाटिका ऐसे चार स्थानों को जोड़ते हुए स्वामी विवेकानन्द नगर, स्वामी आखंडनन्द नगर, भगिनी निवेदिता नगर बनाकर यहां आये लोगों को ठहरने की व्यवस्था बनाई गई। राष्ट्रीय सेवा भारती से संबद्ध 836 सेवा संस्थाएं देश भर में हैं, जिसने इस कार्यक्रम में भाग लिया।

इन सेवा संस्थाओं में काम करने वाले जो बंधु हैं, उनके अध्यक्ष, महामंत्री, मंत्री, संगठन मंत्री को यहां पर बुलाया गया। लगभग साढ़े तीन हजार की संख्या में लोग इस कार्यक्रम में शामिल हुए। एक हजार के आस-पास माता-भगिनि भी, जो कि सेवा क्षेत्र में काम करती हैं, इस कार्यक्रम में आए। शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वालंबन, महिला सशक्तिकरण या महिला विकास से संबंधित कार्य, बाल विकास, किसानों के लिए, पर्यावरण क्षेत्र में कार्य करने वाली ये संस्थाएं हैं। ये संस्थाएंं भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयोग अपने-अपने स्थानों पर करती रहती हैं। अपने प्रयोगों को अपने बंधुओं को सुनना और सुनाना, आपस में अपने भाव को आदान-प्रदान करना, भिन्न-भिन्न प्रयोग को अपनाना और समाज के भीतर काम करना ही इन संस्थाओं का उद्देश्य है। सभी लोगों ने मिलकर, जो वनंचल में रहते हैं, गांव में रहते हैं, झोपडिय़ों में रहते हैं उनके कष्टों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं। इनका उद्देश्य है समाज के समर्थ लोगों के साथ संपर्क करके उनके मन के अंदर संवेदना के भाव को जागरूक करना और गरीब लोगों के मन में स्वाभिमान जागृत करकेउन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना, ताकि उनकी आने वाली पीढिय़ां भी समर्थ बनकर अपने पैरों पर खड़ा हो सके। इस भावना से समाज के दुर्बल और सबल वर्ग के बीच अच्छे संबंध बनाने का कार्य राष्ट्रीय सेवा संस्थाएं कर रही है। 1989 के पहले से ये कार्य चल रहा था, लेकिन व्यवस्थित स्वरूप, अखिल भारतीय स्वरूप सेवा विभाग ने दिया है। तब से लेकर अब तक देश भर में 1 लाख 52 हजार स्थानीय सेवा संस्थाएं चल रही हैं। इन सभी सेवा संस्थाओं का महामिलन को हम लोग राष्ट्रीय सेवा संगम कहते हैं। इसके माध्यम से भारत को समर्थ भारत बनाने का उद्देश्य है।

जब हम सभी के अंदर एक समर्थ भाव रहेगा तो स्वाभाविक रूप से हमारा देश समर्थ देश बनेगा। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा था कि दुखी, दरिद्र, हरिजन, गिरिजन इस तरह का भाव न रखते हुए इन्हें नारायण  स्वरूप समझ कर इनकी सेवा करनी चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि इनकी सिर्फ सेवा नहीं करनी, बल्कि उनके अंदर स्वाभिमान को जागृत करके उन्हें स्वावलंबी बनाना के लिए भाव जागृत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक झोपड़ी में रहने वाला इंसान की जो हिम्मत है वही हमारी हिम्मत है। उसी से देश की ताकत बढ़ेगी, समर्थ का भाव सभी के अंदर बढ़ेगा। भारत समर्थ बनेगा, इसी सोच को बढ़ाते हुए सेवासंगम का आयोजन हुआ। सौभाग्य से 4 तारीख 2015 को सुबह 7 बजे अमृतानंदमयी माताजी के कर-कमलों द्वारा इस कार्यक्रम का उद्घाटन हुआ। आयोजन के बाद जाकर अपने-अपने स्थानों पर किस प्रकार का काम करना है, सामाज को जोड़कर अपने समाज को समर्थ बनाना है, इन विषयों पर सभी प्रतिनिधियों का पथ-प्रदर्शन किया गया। ये सारी संस्थाएं भिन्न-भिन्न प्रकल्प चला रहीं हैं। समर्थ भारत बनाने के लिए जो प्रयास सेवा संस्थान ने किए हैं, वह सफल होने जा रहा है।

 अजीत महापात्रा

(लेखक अखिल भारतीय सह सेवा प्रमुख, आरएसएस, हैं)

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