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व्यंग्य का पैना बाण

व्यंग्य का पैना बाण

पैसे कमाने की अंधी दौड़ में लड़कियों ने लड़कों से भी जल्दी समझ लिया कि मेहनत से पैसे कमाना कठिन है। उन्होंने सूंघ लिया कि भूमंडलीकरण के इस दौर में सारी सुख-सुविधाओं का केंद्र है – देह। आत्मा-परमात्मा, जीवन मूल्य, साहित्य कला सब देह तले दब गए हैं। इसी देह के महत्त्व को पहचानकर लड़कियों ने देह-दर्शन पर ध्यान केंद्रित किया। सब ओर है मादक उन्माद देह, जिसे कभी ‘कांटा लगता है’, तो कभी ‘मिस कॉल से पटाया’ जाता है और जिसके ‘जिगर मा बड़ी आग है’।

व्यंग्कार रवि शर्मा ‘मधुप’ ने ‘बाप बड़ा न भैया…’ शीर्षक की कहानी में आज की युवा पीढ़ी पर तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। आज की युवा पीढ़ी पैसे कमाकर रातों-रात करोड़पति बनने के लिए हर ‘शॉटकर्ट’ अपनाने के लिए तैयार है। उसके लिए सामाजिक मूल्य आदर्श रूढि़वाद के अलावा कुछ नहीं है। पश्चिम की भोगवादी संस्कृति में डूबा आज का युवा वर्ग पैसे के लिए अपनी संस्कृति, नाम, गांव, रिश्ते-नाते सबकुछ गंवाने को तैयार है।

अपनी व्यंग्य रचना ‘अंगूठा छाप हस्ताक्षर’ में विभिन्न विषयों पर कुल 38 कहानियों के माध्यम से लेखक ने व्यंग्य के जरिए करारा प्रहार करने की कोशिश की है। मधुप ने कटाक्ष के लिए विभिन्न उक्तियों का प्रयोग किया है। जैसे – ‘भारतीय राजनीति का अनिवार्य अंग है –  नाटकबाजी’, ‘रूपए का मूल्य दया, परोपकार आदि की तरह गिर रहा है’, सरकारी नौकर वह है जो जिसका खाए उसी पर गुर्राए’, ‘आत्मा, परमात्मा, जीवन मूल्य, साहित्य, कलाप सब देह तले दब गए हैं’, ‘सीनियर और सत्ता का वही संबंध है जो सूर्य और रोशनी का’, ‘बुद्धिजीवी चूहे प्रधानमंत्री निवास की निमंत्रण रूपी बांसुरी से मुग्ध होते हैं’। ‘प्रधानमंत्री निवास में बुद्धिजीवी ऐसे शोभित हो रहे थे जैसे मुगल गार्डन में फूल’ जैसे उपमा के जरिए मधुप ने बुद्धिजीवी वर्गों के नियत और रहमत पर कटाक्ष किया है।

लेखक एवं व्यंग्कार रवि शर्मा ‘मधुप’ ने ‘देशहित में’ शीर्षक वाली पहली कहानी में राजनीति और राजनेताओं पर करारा तंज कसा है, जो कुर्सी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं और उसे देशहित का नाम देते हैं। वहीं ‘जय जुगाड़’ में बताया है कि वाक्पटुता के जरिए एक साधारण आदमी जुगाड़ लगाकर कैसे प्रतिभावान व्यक्ति से आगे निकल जाता है। सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली पर कटाक्ष करते हुए लेखक ने ‘सरकारी दामाद’ शीर्षक कहानी में उन्हें सरकारी सांड़ की संज्ञा दी है, जो अपने उच्चाधिकारियों को खुश करने के लिए मक्खनबाजी, चापलूसी और रिश्वतखोरी में डूब जाता है। जो इन अवगुणों से दूर रहने की कोशिश करते हैं उन्हें ‘मिस फिट’ की उपमा से नवाज दिया जाता है। ’खादी के मजे’, ‘हैप्पी बर्ड डे गांधीजी’ सहित कहानियों में लेखक ने व्यंग्य के जरिए कटाक्ष किया है।

1962 में दिल्ली में जन्मे लेखक डॉ. रवि शर्मा ‘मधुप’ ने एम.ए., एम.एड., एम. फिल., पीएच. डी. (हिन्दी) की शिक्षा प्राप्त की है। वत्र्तमान में दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में हिंदी विभाग के अध्यक्ष और एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने सहलेखन के साथ-साथ कई काव्य संग्रह लिखे हैं। इनमें संघर्ष मीमांसा, बकरी कल्चर, बूंद-बूंद बनती सरिता प्रमुख काव्य संग्रह हैं। इसके अतिरिक्त रेडियो धारावाहिक ‘विरासत’, युवाओं के लिए प्रेरक लेख संग्रह ‘एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों’ भी लिखा है। उन्हें लेखन के लिए कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

‘अंगूठा छाप हस्ताक्षर’ में जुगाड़, तिकड़म, लोकतंत्र, तानाशाही, सामजवादी अभिलाषा, नेता, नई पीढ़ी, बुद्धिजीवी तबकों पर जमकर व्यंग्य-बाण चलाए गए हैं। यह पुस्तक करारे व्यंग्य वाली लघु कहानियों का एक संग्रह है जो पाठकों को अपनी ओर खींचने में सफल होती है।

18-04-2015

सुधीर गहलोत

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