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नए अवतार में नीतीश

नए अवतार में नीतीश

ऐसा लगता है अफसरों को सिर चढ़ाने और अफसरशाही को बढ़ावा देने के लिए बदनाम रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब अपनी भूल सुधार ली है। अब वे अफसरों के कामकाज और उपलब्धि को लेकर पहले से ज्यादा सख्त नजर आ रहे हैं। 24 फरवरी को विभिन्न विभागों की समीक्षा बैठक में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। आबकारी और पंजीकरण विभाग के सचिव पंकज कुमार से नीतीश ने पूछा, ‘‘क्या बिहार में शराब पीने वालों की संख्या कम हो गई है? अगर नहीं तो फिर इससे कमाई लक्ष्य के बराबर क्यों नही है?’’

विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ‘सुशासन बाबू’ की अपनी छवि पुन: स्थापित करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कमर कस ली है। नीतीश के समक्ष चुनौतियां कम नहीं हैं, क्योंकि बहुत कम समय में सब कुछ करना है, बिगड़ी हुई चीजों को पटरी पर लाना है। अपने भरोसेमन्द अफसरों को प्रोजेक्ट पूरे करने और नतीजे देने के लिए नितीश ने 15 जून तक का समय दिया है।  ऐसा लगता है कि अफसरों को सिर चढ़ाने और अफसरशाही को बढ़ावा देने के लिए बदनाम रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अब अपनी भुल सुधार ली है। अब वे अफसरों के कामकाज और उपलब्धियों को लेकर पहले से ज्यादा सख्त नजर आ रहे हैं। 24 फरवरी को विभिन्न विभागों की समीक्षा बैठक में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। आबकारी और पंजीकरण विभाग के सचिव पंकज कुमार से नीतीश ने पूछा, ‘‘क्या बिहार में शराब पीने वालों की संख्या कम हो गई है? अगर नहीं तो फिर इससे कमाई लक्ष्य के बराबर क्यों नहीं है? हम शराब की बिक्री को बढ़ावा देना नहीं चाहते, इसलिए हमने उस पर ड्यूटी बढ़ाकर शराब महंगी कर दी है, लेकिन विभाग टैक्स वसूली का लक्ष्य पूरा क्यों नहीं करता? मुझे बताइए कि मुश्किल क्या है।’’ 1997 बैच के आईएएस अधिकारी पंकज कुमार अकेले नहीं हैं जिनके विभाग का काम 9 महीने बाद सरकार के कामकाज का हिसाब लेने बैठे नीतीश कुमार को कमजोर लगा। इसके बाद नीतीश वाणिज्यिक कर सचिव ई.एल.एस.एन. बाला प्रसाद से मुखातिब हुए। उनसे नीतीश ने सवाल किया कि राजस्व इतना कम क्यों जमा हुआ? 1986 बैच के आईएएस अधिकारी बाला प्रसाद ने दलील दी कि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन से 950 करोड़ रु. की जो अप्रत्याशित आमदनी होने वाली थी, वह कानूनी पचड़ों की वजह से राज्य के खजाने में नहीं पहुंची। इस तरह की दलील औरों को चुप करा सकती थी, पर नीतीश कुमार को नहीं। उन्होंने इस दलील को खारिज करते हुए पूछा, ‘‘क्या हमने लक्ष्य तय करते समय इंडियन ऑयल से आने वाले 950 करोड़ रु. भी हिसाब में रखे थे? अगर नहीं तो फिर लक्ष्य में कमी की बात करते समय इसका जिक्र क्यों आया? अचानक होने वाले विंडफॉल (अप्रत्याशित लाभ) को पहले से तो योजना में नहीं जोड़ा जाता न।’’ नीतीश की आवाज तेज नहीं थी, लेकिन तर्क अकाट्य था और इसलिए बोर्डरुम मे सबने इसे आत्मसात किया।

सरकार की प्राथमिकताएं

12 मार्च को नीतीश सरकार के वित्त मंत्री विजेन्द्र प्रसाद यादव ने 1,20,685 करोड़ रूपए का बजट पेश किया, जिसमें बुनियादी सुविधाएं, सड़क बिजली, ग्रामीण सुधार आदि पर जोर दिया गया है। इसमें 8,436 करोड़ रूपए बिजली सुधार के लिए, 6,179 करोड़ रूपए विधि व्यवस्था के लिए, 4,974 करोड़ रूपए स्वास्थ्य चिकित्सा के लिए, 22 हजार 27 करोड़ रूपए शिक्षा के लिए,15 हजार 901 करोड़ रूपए कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए और 12 हजार 616 करोड़ रूपए सड़क पुलों के निर्माण पर खर्च करने की योजना है।

18-04-2015

मई, 2014 में लोकसभा चुनावों में पार्टी की खस्ता हालत के बाद नीतीश कुमार ने जब बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तब से वे भले ही सत्ता से बाहर रहे, लेकिन सारे विभागों का चिठ्ठे अधिकतर सचिवों से बेहतर उन्हें अपनी हथेली की रेखाओं की तरह याद है और वे सारे बहानों का सच पढ़ सकते हैं। उस बैठक के कुछ घंटे बाद ही मुख्यमंत्री के सीधे नियंत्रण में बिहार के सामान्य प्रशासन विभाग ने जब 24 फरवरी को 22 सरकारी अफसरों के तबादले के आदेश जारी किए तो उनमें पंकज कुमार और बाला प्रसाद दोनों के नाम शामिल थे।

22 फरवरी को चौथी बार मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद नीतीश कुमार बहुत जल्दी में हैं। तकरीबन दस माह पहले उन्होंने पुराने सचिवालय भवन में मुख्यमंत्री का जो कार्यालय छोड़ा था, 23 फरवरी को वहां पहुंचते ही वह काम में जुट गए। उन्होंने फाइलें निबटाईं, सरकारी अफसरों से मिले और देर शाम तक बिस्किट चबाते हुए काम में जुटे रहे। उस दिन उन्हें दोपहर के भोजन की भी फुर्सत नहीं मिली।

नई पारी शुरु करने के एक ही दिन बाद नीतीश ने प्रशासन में बड़ा फेरबदल कर दिया। उन्होंने प्रधान सचिवों और सचिवों सहित 22 आईएएस अधिकारियों का तबादला कर दिया और अपने करीबी माने जाने वाले अफसरों को जरुरी काम सौंप दिए। उसके बाद उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों से बात की और चेतावनी दी कि अगर कानून और व्यवस्था के मामले में जरा-सी भी ढीलाई बरती गई तो उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। इससे पहले अक्सर नीतीश पर अफसरों का पक्ष लेने की तोहमत लगती रही है। इस साल अक्टूबर-नवंबर में निर्धारित अगले विधानसभा चुनावों तक अभी नीतीश के पास तकरीबन छ: महीने का समय है, लेकिन उन्होंने अपने भरोसेमंद अफसरों को प्रोजेक्ट पूरे करने और ठोस नतीजे देने के लिए 15 जून तक का वक्त दिया है। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने बताया, ‘‘उनके पास नतीजे देने के लिए सिर्फ  साढ़े चार महीने बचे हैं, क्योंकि 15 जून के बाद मॉनसून आ जाएगा और फिर चुनाव अचार संहिता लागू हो जाएगी।’’ एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी का कहना था, ‘‘नीतीश सरकार के कामकाज को पूरी तरह समझते हैं। वे तुरंत भांप जाते हैं कि कौन सचिव काम करने की कोशिश कर रहा है या कौन बहाने बना रहा है। उनकी समझ बहुत तेज है, आप उन्हें मूर्ख नहीं बना सकते।’’ वर्ष 2006 में जब नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में पहले कार्यकाल की शुरुआत की थी, तभी उन्होंने अपराध और अपराधियों पर लगाम कसनी शुरू कर दी थी। यह व्यवस्था कामयाब भी रही। 2006 से 2011 तक 56,000 से अधिक अपराधियों को सजा हुई थी। हालांकि शुरु में अपराध दर कम करने वाली यह व्यवस्था बाद में ढ़ीली पड़ती गई। सरकारी पक्ष की नाकामी की वजह से बहुत-से अपराधियों को जमानत मिल गई या वे बरी कर दिए गए। इस बार नीतीश कुमार 2006-2007 के धुनी अवतार में अधिक लगते हैं। वे 2013-2014 की उस छवि से काफी अलग है, जब मुख्यमंत्री के कंधों पर सोशल इंजीनियरिंग की चिंताओं का बोझ जरुरत से ज्यादा आता था। वे जानते हैं कि सोशल इंजीनियरिंग के मुकाबले सुशासन उन्हें कहीं ज्यादा वोट दिला सकता है। कम-से-कम उनके मामले में तो यह बात सच है। नीतीश ने वफादार से दुशमन बने जीतनराम मांझी को सत्ता से हटाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पाई है। पहले ताल ठोक रहे मांझी ने अचानक पलटी खाई और सदन में बहुमत आजमाने से पहले ही 20 फरवरी को इस्तीफा दे दिया था।

नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि कुछ करके दिखाने के लिए उनके पास बहुत कम समय है। 2005 से 2010 के कार्यकाल में सुशासन देने के लिए मशहूर नीतीश कुमार को यह अच्छी तरह मालूम है कि नवंबर, 2010 से मई, 2014 के बीच उनके वादों और उन्हें लागू करने में कितना अंतर रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनकी नापसंदगी गायब होने का संकेत तब मिला जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही नीतीश ने कहा, ‘‘हमारी राजनीतिक गतिविधियां जारी रहेंगी। राजनीतिक मुद्दे राजनीतिक मंच से उठेंगे, उनका असर प्रशासन पर नहीं पड़ेगा। बिहार के हित में मैं प्रधानमंत्री के साथ मिलकर काम करूंगा।’’ नीतीश 2009 से मोदी से मिलने से बचते रहे हैं। भाजपा के साथ गठबंधन के वर्षों में उन्होंने ही भाजपा को इस बात के लिए राजी किया था कि मोदी को बिहार से दूर रखा जाए। जून 2013 में मोदी को भाजपा प्रचार समिति के प्रमुख की कमान सौंपे जाने पर नीतीश ने इसी बिहार में भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया था। तब से वे मोदी के सबसे कटु आलचकों में से एक रहे हैं। उन्हें ‘बांटने वाला और साम्प्रदायिक’ कहते रहे हैं। ऐसे कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के प्रति नीतीश के रुख में कुछ नरमी आई है, लेकिन वे अच्छी तरह जानते हैं कि मुख्यमंत्री होने के नाते प्रधानमंत्री के साथ काम करना ही होगा। इससे पहले राष्ट्रीय विकास परिषद् की बैठकों या ऐसे कई मौकों पर जब मोदी और नीतीश दोनों मुख्यमंत्री के नाते मौजूद रहते थे, तब भी नीतीश कुमार उनसे औपचारिक सम्पर्क से किनारा करते दिखाई देते थे। मोदी के प्रति उनका पुराना रवैया कुछ बदला है। लगता है कि बिहार में जमीन पर काम करते समय उन्हें यह एहसास हो गया है कि भाजपा के प्रधानमंत्री के साथ ऐसा बैर उनके अपने आधार को कमजोर कर सकता है। जेडी (यू) के एक वरिष्ठ नेता ने माना, ‘‘अब नई राजनैतिक परिपक्वता दिखाई देती है। लगता है, नीतीश अच्छी तरह समझ गए हैं कि नरेंद्र मोदी के विरुद्ध सिर्फ  नफरत उगलने से मोदी को ही लाभ होगा। मोदी की जितनी ज्यादा आलोचना की जाएगी और धर्मनिरपेक्षता का जितना बखान किया जाएगा, उतना ही ज्यादा भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा।’’ मोदी ने बधाई का जो ट्वीट किया था, उस पर नीतीश कुमार ने जिस तरह धन्यवाद दिया, वह मुख्यमंत्री पद पर उनकी वापसी से पहले के दिनों में आरोप-प्रत्यारेप  के दौर से बिल्कुल अलग था, जब वे जीतनराम मांझी की नाफरमानी के लिए प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराया करते थे।

18-04-2015

लगता है नीतीश कुमार ने भी मांझी से भी टकराव मोल न लेने का निश्चय कर लिया है। मांझी के कुछ फैसले राजनीति से सराबोर रहे फिर भी उन्हें साफ-साफ नकारने के बजाए नीतीश ने कहा कि उनकी समीक्षा करेंगे। हालांकि 4 मार्च को उन्होंने मांझी द्वारा लिये गए 34 फैसले निरस्त कर दिए, लेकिन फिर नीतीश मांझी की आलोचना या उन पर दोषारोपण करने से बच रहे हैं। नीतीश कुमार को बिहार में सड़क, शिक्षा, बिजली और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधरी हालत का श्रेय काफी हद तक दिया जाता है। इनकी वजह से उनका कद भी बढ़ा है।

प्रशासन की चाल में सुधार करने की कोशिश का राजनीतिक नतीजा क्या होगा, कहना मुश्किल है, खासकर जब भाजपा मांझी को साथ लेकर सवर्णों का सतरंगी गठजोड़ करने के लिए पसीना बहा रही है। नीतीश जब सचिवालय में अपने कमरे में फाइलें निबटाने में व्यस्त हैं तभी मांझी अपने संरक्षक जगन्नाथ मिश्र के साथ भविष्य की रणनीति बना रहे हैं। दोनों इस जुगत में हैं कि नीतीश कुमार को रोकने के लिए ब्राह्मणों और दलितों को मिलाकर ऐसा नया जातिगत गठजोड़ कैसे कायम किया जाए, जैसा मायावती ने उत्तर प्रदेश में किया था। जीतनराम मांझी ने अपनी पार्टी ‘हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा (हम)’ भी बना ली है। इसका राज्य भर में विस्तार करने में वे अपने समर्थकों के साथ लगे हैं। हालांकि मांझी को उस समय तगड़ा झटका लगा जब 11 मार्च को विश्वासमत के दौरान उनके समर्थक दस विधायकों वृषिण पटेल, नीतीश मिश्र, शाहिद अली खान, सुनील कुमार, दिनेश कुशवाहा, राजीव रंजन, अनिल कुमार, राजेश्वर राज एवं अजय प्रताप ने नीतीश के पक्ष में मतदान कर दिया।

आज नीतीश भी बदल गए हैं। जून, 2014 में मुख्यमंत्री का पद छोडऩे के बाद से वे बराबर पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में रहे हैं और जान गए हैं कि उनसे विनम्रता की अपेक्षा की जा रही है, ताकि वे दिलों को जीत सकें। इसकी शुरुआत उन्होंने 22 फरवरी को ही कर दी थी, जब उन्होंने बिहार के 34वें मुख्यमंत्री के रुप में शपथ ली। नीतीश ने अपनी पार्टी के 22 नेताओं को फोन करके कहा था कि वे मंत्री पद की शपथ लेने को तैयार हो जाएं। आमतौर पर राजभवन से सूचित किए जाने की परंपरा रही है। जाहिर है, नीतीश नए जज्बे और ठोस नजरिए से लैस हैं।

नीतीश कुमार की नीति

  • जमीनी स्तर पर नतीजे देना, क्योंकि सुशासन से वोट मिलते हैं।
  • बातें वे भले ही सोशल इंजिनियरिंग की करें, पर इस कार्यकाल में नीतीश की नजर जातीय समूहों के बजाए पूरे समाज का भरोसा जीतने पर रहेगी।
  • कानून और व्यवस्था की स्थिति में पूरा बदलाव। ब्लॉक स्तर पर सुशासन देना।
  • अध्यक्षीय तरीके से सरकार चलाना और बिहार के मुख्यमंत्री के लिए सबसे स्वीकार्य चेहरे के रुप में उभरना।
  • भाजपा के मॉडल से एक सबक लेना: पार्टी कार्यकर्ताओं को साथ लेना और प्रेरित करना तथा उनसे जुड़े रहना।
  • राज्य में भाजपा विरोधी नेता के तौर पर सबसे विश्वसनीय पहचान बनाना।नीतीश की मुश्किलें
  • नीतीश के लिए जद(यू) को एकजुट रखना और अपनी पार्टी एवं सरकार को किसी भी असंतोष या टूट से बचाना बड़ी चुनौती है।
  • जीतनराम मांझी खुद को पीडि़त की तरह पेश कर रहे हैं। उनमें नीतीश कुमार के महादलित वोट बैंक को अपने साथ ले जाने की क्षमता है।
  • नीतीश सरकार में शामिल न होकर लालू की आरजेडी चुनौतीपूर्ण सहयोगी के तौर पर उभर सकती है।
  • नीतीश कुमार ने अपनी सरकार में उन्हीं मंत्रियों को जगह दी है, जो मांझी सरकार में भी थे। उनमें से कुछ स्पष्ट तौर पर नॉन-परफॉर्मर हैं।
  • भाजपा नीतीश के खिलाफ सवर्ण जातियों, अति पिछड़ा वर्ग और दलितों की धुरी बनाने की काशिश कर रही है।

सीटों के बंटवारे में सहमति नहीं बनने की स्थिति में लालू यादव 23 प्रतिशत महादलित वोटों के लिए जीतनराम मांझी को साथ ले सकते हैं और यह कोशिश कर सकते हैं कि लड़ाई सीधे भाजपा बनाम राजद हो जाये।

पटना से कफील एकबाल

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