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नागा ‘लैंड’ क्यों, नागा प्रदेश क्यों नहीं?

नागा ‘लैंड’ क्यों, नागा प्रदेश क्यों नहीं?

प्रख्यात सांस्कृतिक इतिहासकार डॉ. बलराम चक्रवर्ती ने चौंकाने वाला सच पेश किया है। उन्होंने कहा है कि  उत्तर-पूर्व के नागा मूलरूप से कश्मीर से संबंधित हैं। प्राचीन नीलमत पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। नीलमत पुराण मुख्य रुप से मुनि नील द्वारा लिखा गया है। मुनि नील ने कहा था कि प्राचीन काल से कश्मीर नागाओंं की मातृभूमि रही है और इस बात को भूवैज्ञानिकों द्वारा भी स्वीकारा गया है।

लगभग 200 साल पहले, वर्ष 1835 में, मैकाले ने ब्रिटिश संसद में एक भाषण दिया था। उसमें उन्होंने भरतीय लोगों की प्रशंसा करते हुए उन्हें बेहद सभ्य, सुसंस्कृत और नैतिकतावादी कहा था। उन्होंने ये भी कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि इस देश को हम तब तक जीत सकते हैं जब तक कि इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत रूपी रीढ़ की हड्डी को न तोड़ दें। इसलिए मैं इस देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति, उसकी संस्कृति को बदलने का प्रस्ताव रखता हूं। अगर ऐसा हुआ तो भारतीयों को लगेगा कि ये विदेशी संस्कृति और अंग्रेजी भाषा उनकी अपनी संस्कृति और भाषा से श्रेष्ठ है। इससे वो अपना आत्म-सम्मान और  संस्कृति को खो देंगे और वो वैसे हो जाएंगे जैसा हम चाहते हैं। तब वह सही मायने में हमारा अधीन राष्ट्र बन जाएगा।’’

मैकाले के इस नुस्खे ने उसकी कल्पना से कहीं बहुत अधिक काम किया। यहां तक कि राजनैतिक आजादी कीअर्धशताब्दी के बाद भी अंग्रेजी भारतीय मानसिकता पर हावी है। इस मानसिक गुलामी का स्पष्ट उदाहरण कुछ साल पहले एक समाचार पत्र मे ‘इंटेलेक्चुअल’ शीर्षक से छपे लेख में देखने का मिला, जिसमें मैकाले की प्रशंसा की हद को पार करते हुए लेखक ने यहां तक कह दिया कि जो भारतीय अंग्रेजी नहीं जानते, वे निम्न भारतीय हैं। वहीं एक और विचित्र लेकिन ‘आधिकारिक’ उदाहरण ये है कि भारत, जिसे ‘इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है, उसके एक उत्तर-पूर्वी राज्य ‘नागा-लैंड’ का आधा नाम अंग्रेजी में है।

18-04-2015

नागा-लैंड क्यों, नागा प्रदेश क्यों नहीं? क्योंकि हम या तो सामूहिक स्मृतिलोप के शिकार हैं या से या नागा समुदाय के उल्लेखनीय भूमिका को भूल गए हैं, जो भारत की संस्कृतिक इतिहास में ही नहीं बल्कि सुदूर पूर्व में जापान से लेकर सुदूर पश्चिम में मैक्सिको तक के देशों में वैश्विक स्तर पर निभाई है।

मूल घर कश्मीर

नीलमत पुराण संस्कृत भाषा में 6वीं शताब्दी में लिखा गया था, जिसमें कश्मीर के इतिहास से लेकर भूगोल तक की जानकारी दी गई है। विद्वानों की राय में दो पुराणों का अध्ययन किए बिना कश्मीर के इतिहास को नहीं समझा जा सकता है। इसमें एक ‘नीलमत पुराण’ है और दूसरा ‘कल्हण की राजतरंगिणी’ है, जो कि 12वीं शताब्दी में लिखा गया था। कल्हण कश्मीर के महान इतिहासकारों में से एक थे, जिन्होंने खुद कहा था कि कश्मीर का इतिहास जानने के लिए उन्होंने नीलमत पुराण से मदद ली थी। नीलमत पुराण या नीला पुराण उप-पुराणों में से एक, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण है। इसे धर्म-शास्त्रों के द्वारा उद्धृत माना जाता है। वृहद भारत के जानकार प्रतिष्ठित जर्मन शोधवेत्ता बुलर ने इसकी प्रशंसा करते हुए इसे ज्ञान का भंडार कहा था।

प्रख्यात सांस्कृतिक इतिहासकार डॉ. बलराम चक्रवर्ती ने चौंकाने वाला सच पेश करते हुए कहा है कि उत्तर-पूर्व के नागा मूलत: कश्मीर से संबंधित हैं। नीलमत पुराण मुख्य रुप से मुनि नील द्वारा लिखा गया है। मुनि नील ने कहा था कि प्राचीन काल से कश्मीर नागाओं की मातृभूमि रही है और इस बात को भूवैज्ञानिकों द्वारा भी स्वीकारा गया है। कश्मीर पूरी तरह से झीलों के शहर के तौर पर जाना जाता है और इन झीलों के तटों पर ही नागाओं का वास होता था, जिसके चलते वहां पर जलीय संस्कृति का विकास हुआ। झीलों के तटों पर रहने के चलते उन्होंने अपने घरों का निर्माण लकड़ी के लट्ठे जमीन में गाड़कर उसके ऊपर अपने घरों का निर्माण किया, ताकि वो पानी से अपने घरों को सुरक्षित रख सकें। जैसा कि अब नागा पहाडिय़ों पर बस चुके हैं, बावजूद इसके वो आज भी अपने घर लकड़ी के लट्ठों पर ही बनाते हैं। उसकी वजह ये है कि शायद वो आज भी अपनी पैतृक जीवन-शैली में रहना पसंद करते हैं। नागाओं के पूर्वज कश्मीर में झीलों के किनारे मछलियों को पकडऩे के लिए प्रकाश डोंगियों का प्रयोग करते थे। नागाओं ने भले ही जलशयों के किनारे रहना छोड़कर जमीन पर बसेरा बना लिया हो, लेकिन वो आज भी प्रकाश जलाते हैं और नगाड़े बजाते हैं। इसका प्रयोग वे नाचने-गाने के अलावा इसके जरिए दूर के अपने दूसरे समूहों को संदेश देने के लिए भी करते हैं। नागा के नगाड़ों की आकृति अभी भी डोंगियों के आकार की ही होती है।

18-04-2015

वर्तमान समय में नागा भले ही पहाड़ों पर बस गए हों, लेकिन अभी भी वो सीपियों से गहनों का निर्माण करते हैं। ये गहने नागाओं की बहुमूल्य संपत्तियों में से एक हैं। नागाओं ने अरूणाचल प्रदेश की जाइरो घाटी में खेती की भी शुरूआत की, जबकि वह इस कार्य से पूरी तरह से अनजान थे। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि आर्य का मूल अर्थ ‘कृषक या हल चलाने वाला’ होता है।

आद्य-ऐतिहासिक प्रवास

डॉ. बलराम चक्रवर्ती के मुताबिक नीलमत पुराण में उन कारणों का वर्णन किया गया है, जिनकी वजह से नागाओं ने अलग-अलग समय अवधि में अलग-अलग स्थानों पर प्रवास किया। उनके मुताबिक प्रवास की कोई निर्धारित समय सीमा उपलब्ध नहीं है, लेकिन उत्तर-पूर्व में नागाओं का प्रवास महाभारत काल (भारत युद्ध, आज से 5100 साल पहले) से बहुत समय पहले ही हो गया था। आद्य-ऐतिहासिक काल में नागा न केवल उत्तर-पूर्व में बसे, बल्कि उन्होंने अपने पड़ोसी कबीलों – असुर, दानव, किरात की तरह अपना साम्राज्य भी स्थापित किया। इनमें से ज्यादातर राजाओं ने भारत युद्ध में हिस्सा लिया। इनमें प्रमुख नाम किरात राजा भागदत्त का नाम है, जिसने कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ा था, क्योंकि उसकी बेटी भानूमती का विवाह दुर्योधन के  साथ हुआ था। भारत युद्ध से पहले अर्जुन ने भागदत्त के राज्य पर आक्रमण कर उसे हराया था। उसके बाद  वह नागा साम्राज्य की ओर बढ़ा और उसने नागा राजकुमारी उलूपी से शादी की।

कंबोडिया में साम्राज्य

नागाओं के प्रवास के धागे उत्तर-पूर्व से लेकर कंबोडिया तक जुड़े हैं, जिसका 2000 साल पुराना हिंदू इतिहास रहा है। दक्षिण भारत का एक कौण्डिन्य नाम का एक साहसिक युवा ब्राह्मण पहली शताब्दी में कंबोडिया के  सिरका तट पर पहुंचा। जिस जगह वह युवा पहुंचा वहां बहुत सारे छोटे-छोटे राज्य स्थापित थे, जिसे चीनी लोगों द्वारा फुनन कहा जाता था। इस पर सोमा नाम की एक युवा राजकुमारी राज करती थी। सैनिकों से युक्त भारतीय समुद्री जहाज में अनजान व्यक्ति को देखकर राजकुमारी ने आक्रमण कर दिया, लेकिन अंतत: वह हार गई। बाद में कौण्डिन्य ने इस राजकुमारी के साथ विवाह कर लिया और वो फुनन के राजा और रानी बन गए। फुनन की राजकुमारी एक नागा की बेटी थी। इस नागा साम्राज्य की स्थापना ईसा के जन्म के एक शताब्दी पूर्व हुई थी। रानी सोमा और राजा कौण्डिन्य के वंशजों ने समृद्ध मेकांग नदी क्षेत्र में 550 सालों तक राज्य किया। उन्होंने अपने शासन को गर्व से संस्कृत में ‘कौण्डिन्य-सोमादोहित्रा-प्रभा’ के रूप में उल्लेखित किया गया है, जिसका अर्थ है ‘कौण्डिन्य और चंद्र-पुत्री सोमा का वंशज’। इस तरह, यह एक नागा पुत्री ही थी, जिसने भारत के बाहर सबसे अधिक हिंदू विस्तार वाले स्थान दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू इतिहास का एक अध्याय लिखा।

18-04-2015

जापान के नागा ऐनू

तो क्या नागाओं का प्रवास भारत के बाहर  कंबोडिया तक ही सीमित रहा? स्पष्ट रूप से नहीं। डॉ. चक्रवर्ती के अनुसार, नहीं! ऐसा नहीं है। चक्रवर्ती इस बात पर जोर देते हैं कि  जो नागा 2000 साल पहले कंबोडिया में पहुंच गए, वे संभवत: इसके बहुत पहले जापान भी पहुंचे होंगे। आद्य ऐतिहासिक काल से प्राचीन ऐतिहासिक काल तक, संभवत: इतने लंबे समय के दौरान पश्चिम से हुए आव्रजन को ही जापान का मूल निवास ऐनू के रूप में जाना जाता है। अब इस बात को एक ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकारा गया है। डॉ. चक्रवर्ती के अनुसार, नागा जापान पहुंच कर तटवर्ती क्षेत्रों में बस गए और अपनी प्राचीन परंपराओं को निभाते रहे, जो ऐनू को नागाओं, जो जलीय संस्कृति के वाहक हैं, के रूप में जोड़ता है। ‘जापान: एक संक्षिप्त सांस्कृतिक इतिहास’ में लिखते हैं, तटीय मैदानी क्षेत्रों में ऐनू अपने मकान लट्ठे गाड़कर बनाते हैं, जो संभवत: जापान के इन प्राचीन मूल निवासियों द्वारा अपने पैतृक स्थान कश्मीर से लाया गया है। इनके बारे में कहा जाता है कि वे कश्मीर से आकर ही जापान में बसे हैं।

डॉ. चक्रवर्ती एक अन्य संपर्क, जो और भी गहरा है, नागा-ऐनू और भारतीय लोगों की बीच संकेत करते हैं। उनका कहना है कि जापान ऐनू समुदाय जीववादी धर्म को मानते हैं, जिसकी उत्पत्ति तिब्बत के माफम (मानसरोवर) झील के तट पर हुई थी। यह स्पष्ट रूप से एक हिंदू कड़ी है। लेखक ने ‘तिब्बत: शांति से उथल-पुथल तक’ में वर्णन किया है कि जीववादी या शमन धर्म वास्तव में हिंदू धर्म ही है। ‘शमन’ शब्द को संस्कृत के ‘श्रमणा’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है संन्यासी (सिर्फ  बौद्ध भिक्षु नहीं)। चक्रवर्ती आगे कहते हैं कि ‘जीववादी’ का विकास ‘शिन्तों मत’ में हुआ। कई आदिवासी समुदाय जापान की नदी घाटियों में रहने वाले शिन्तों या नागा अपनी जलीय संस्कृति में 7वीं शताब्दी से लेकर अभी तक विश्वास करते हैं।

सुदूर पश्चिम क्षेत्रों में नागा

अगर नागा सुदूर पूर्व में पहुंच सकते हैं तो सुदूर पश्चिम में पहुंच सकते हैं। विभिन्न देशों में नागाओं की सांस्कृतिक इतिहास की  श्रंृखला में डॉ. चक्रवर्ती ने इस पर गहन ध्यान केन्द्रित किया कि नागा दक्षिण अमेरिका कैसे पहुंचे, जहां पश्चिमी गोलाद्र्ध के भारतीय पूर्वजों वाली मानव सभ्यता में महत्वपूर्ण योगदान दिया। चक्रवर्ती बताते हैं कि विभिन्न प्राचीन संस्कृत ग्रंथ बताते हैं कि कैसे प्राचीन आदिवासी नागा, असुर, दानव लोग ‘अमरेंडियन’ में तब्दील हो गए। सदियों पुराने इस प्रवास के भौगोलिक संदर्भ के बारे में चक्रवर्ती अनुमान लगाते हैं कि नागा कश्मीर से नौका द्वारा अटलांटिक को पार करते हुए पहुंचे होंगे। दानव प्रशांत महासागर के रास्ते गए होंगे, जबकि असुर अंतिम हिम युग के अंत में साइबेरिया और अलास्का की संकरी बर्फीले जलडमरू के मध्य से पहुंचे होंगे। उन्होंने एक प्रवासी समूह, जो ‘‘इंद्र पूजक’’ थे, का भी उल्लेख किया है, जिन्हें अरिआर्य कहा जाता था। यहां ये कहना प्रासंगिक होगा कि इंद्र वैदिक आर्यों के सबसे प्रमुख देवता थे।

पश्चिमी स्तुति

अमेरिकी, मैक्सिकन, स्पेनिश और ब्रिटिश इतिहासकारों और पुरातत्वविदों सहित कई आधुनिक पश्चिमी विद्वानों ने हिंदू अमेरिका के तथ्य को स्वीकार किया गया है। उनमें से एक मैकेंजी ‘मिथ्स ऑफ प्री-कोलंबियन अमेरिका’ में लिखते हैं, ‘‘… एक रोचक तथ्य उभर कर आया कि भारत में ‘नागा’ लोगों की तरह अमेरिका में ‘स्नेक’ (सांप) लोग भी थे।’’ अमेरिकी शोधकर्ता जीन मैटलॉक ने बॅबीक्वीवेरी की अपनी प्रबंधकीय लेख में  अमरेंडियन सभ्यता में सभ्य नागाओं के योगदान के बारे में लिखते हैं, ‘‘नागा एक सभ्य सत्तारूढ़, समुद्री एवं व्यापारिक कबीला था, जो कभी भारत के उत्तर-पश्चिम और समीपस्थ क्षेत्रों में रहते थे।’’ आगे ‘द इनसर्किल्ड सरपेंट’ में जोड़ते हैं, ‘‘वास्तव में नागा न सिर्फ सभ्य लोग थे, बल्कि समुद्री ताकत भी थे। महाभारत में समुद्र को उनके निवास के रूप में वर्णन किया गया है। नागा  विशेषज्ञ नाविक थे और उन्होंने सुदूर तटों तक अपनी कॉलोनी की स्थापना की थी।’’

एरिजोना की सभ्यता के विकासकत्र्ता

अपने अमेरिकी उपनिवेश में उच्च विकसित नागाओं ने एरिजोना के मूलनिवासी ओधम (अब अमेरिका में) को सिखाया कि मकानों का निर्माण कैसे किया जाता है। उन्होंने सृष्टिकत्र्ता परमेश्वर डायस और जेउस के बारे में भी उन्हें सिखाया। यहां तक कि  भी  ओधम उन्हें जेउस या जॉस पुकारते हैं। नागाओं ने पानी के लिए रेगिस्तानी इलाकों में गहरे कुंए भी खोदे, जिसे मोटे नलियों (इसका बाहरी सिरा मानव के मुंह की तरह दिखता था) से बाहर निकालते थे और जब पानी उस नलिका से होकर निकलता तो वह कुंड मारकर बैठे नाग की तरह दिखता था। प्राचीन एरिजोन के लोग इसे असली नाग की तरह मानते थे और पानी के इस नलिका को ‘नाह-बिग’ कहते थे, जो सांपों के देवता के रूप में माने जाते थे। दक्षिणी एरिजोना के कुछ ओधम और मूल जनजातियों के लोग पौराणिक नाग करूआ कहते थे। चक्रवर्ती के अनुसार, करूआ की उत्पत्ति कदरूजा (हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता कद्रू का बेटा) से हुई है। भारतीय नागा शक्ति के प्रतीक के रूप में समारोह के अवसरों पर भैंस के सिर वाली पोशाक पहनते हैं। उसी तरह होपी, सियु रेड इंडियन, मनडनउ जैसी अमेरिका की विभिन्न मूल निवासी जनजातियां भी अपने पारंपरिक नृत्यों में ऐसी ही पोशाक पहनते हैं। होपी शब्द ग्रीक भाषा के ओपी से लिया गया है जिसका अर्थ है नाग। और, ओपी को संस्कृत के शब्द अही से लिया गया है जिसका अर्थ भी नाग है।

नागा मंदिर

मैक्सिको में ऐसे कई नागा मंदिर हैं, जिनके गुंबद और खंभों पर नागों की आकृतियां उकेरी हुई हैं। डॉ. चक्रवर्ती बताते हैं कि प्राचीन मैक्सिकन हिंदुओं के नागपंचमी की तरह ही  त्यौहार भी मनाया करते थे। उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि आज भी पेरू के वस्त्रों की डिजाइन हर तरह से नागाओं बुनकरों द्वारा संरक्षित डिजाइनों से मेल खाता है। चक्रवर्ती के अनुसार, ब्राजील के अमेजन घाटी से नागा पेरू आए, जहां से एक समयांतर पर चिली की ओर बढ़ गए। वहां वे चिली के तानी (तानी या तानव या दानव) लोगों से जुड़ गए, जो प्रशांत महासागर से होकर यहां तक पहुंचे थे। डॉ. चक्रवर्ती का दावा है कि इन्होंने यहां पहुंच कर नागा-दानव की एक मिश्रित संस्कृति का निर्माण किया, जो चिली संस्कृति का आधार है। इन नागाओं के वंशज ही मूल चिली हैं, जो मपूचे या अयमर या अरौकेनियंस के नाम से जाने जाते हैं। चक्रवर्ती मानते हैं कि अयमर को नागा और मपूचे को दानव वंशज के रूप में पहचाना जा सकता है। अंतत: वल्र्ड बुक एन्साइक्लोपेडिया कहता है कि जो आज पनामा कहलाता है उसके पहले निवासी भारतीय थे, लेकिन उनके आगमन का समय अज्ञात है।  दूसरी तरफ  चक्रवर्ती मानते हैं कि समुद्री रास्तों से पनामा पहुंचने के बाद भारत के प्रवासी नागा जंगली क्षेत्रों में बस गए होंगे, जिसे वे वनम (जंगल) कहते थे और समयांतर में वह पनामा कहलाने लगा।

सुदूर-पूर्व जापान से लेकर सुदूर पश्चिम मैक्सिको तक, इतने लंबे-चौड़े इलाकों में भारतीय संस्कृति के फैलाव में नागाओं के योगदान की संक्षिप्त सिंहावलोकन हमें यह समझाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए कि उनका गुण और सम्मानीय पहचान अभी बाकी है।  इसे पूरा करने का छोटा, सांकेतिक लेकिन एक महत्वपूर्ण रास्ता यह है कि इसके आधा देशी और आधा विदेशी नाम को समाप्त करते हुए ‘नागालैंड’ को ‘नागा प्रदेश’ की मान्यता दी जाए।

सुधाकर राजे

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