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राहुल गांधी और अमत्र्य सेन में क्या समानता है ?

राहुल गांधी और अमत्र्य सेन में क्या समानता है ?

राहुल गांधी राजवंश से हैं । यह ठीक है कि नेहरु वंश परम्परा से राजवंश परिवार नहीं कहा जा सकता, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से जब कोई परिवार राजवंश का रुतबा हासिल कर लेता है तो वह नेहरु परिवार बन जाता है। ऐसे परिवारों में जब कोई जन्म लेता है तो उसे राजवंशों के सभी गुण-अवगुण प्राप्त हो जाते हैं। जिन उपलब्धियों या प्राप्तियों के लिये सामान्य जन को कठिन संघर्ष करना पड़ता है, राजवंश में जन्म लेने वाले बच्चे को वह स्वत: ही प्राप्त हो जाती हैं।

इस आलेख का नाम ही भ्रम पैदा करने वाला है। शायद उत्सुकता जगाने वाला भी। कई बार आलेख का नाम इस प्रकार का रखना पड़ता है कि पाठक उत्सुक होकर उसे पढ़ ले, लेकिन मैंने यह शीर्षक केवल उत्सुकता जगाने के लिये नहीं लिखा है। पिछले दिनों ये दोनों महानुभाव अलग-अलग कारणों से चर्चा में आए। पहले बात डॉ. अमत्र्य सेन की। सेन को कुछ साल पहले अर्थशास्त्र में नाबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। वे दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्रियों में गिने जाते हैं। भारत सरकार ने उन्हें बिहार स्थित नालन्दा विश्वविद्यालय का कुलाधिपति नियुक्त किया था। वे आम तौर पर देश से बाहर ही रहते हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के काम में बराबर रुचि लेते रहे हैं। आमतौर पर जब सरकार बदलती है तो इस प्रकार के पदों पर बैठे लोग त्यागपत्र दे देते हैं, लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों में हस्तक्षेप न करते हुए कुलाधिपति की मर्यादा का ध्यान रखते हुये उनकी कार्य-अवधि में दखलंदाजी नहीं की।

समय पाकर अमत्र्य सेन का नालन्दा विश्वविद्यालय का कार्यकाल पूरा हो गया। उन्हें आशा रही होगा कि सरकार मेरा कार्यकाल बढ़ा देगी या फिर दूसरी अवधि के लिये भी मुझे ही कुलाधिपति नियुक्त कर देगी, परन्तु उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई। तब अमत्र्य सेन को गुस्सा आया। उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा संस्थानों में दखलन्दाजी कर रही है। इन संस्थानों में राजनीति को नहीं आना चाहिए। सेन के हिमायती हुंकारने लगे कि यह एक विद्वान का अपमान है। सेन का यह ग़ुस्सा उनके किस मनोविज्ञान का प्रतीक है? यह अहंकार है कि मुझसे विद्वान कोई और हो ही नहीं सकता। यदि सेन को पद नहीं दिया जाता तो उनकी दृष्टि में यह विद्वानों का अपमान है। उनको लगता है कि उनसे बड़ा विद्वान कोई और हो ही नहीं सकता। गुरु नानक देवजी ने इसे ही हऊमै कहा है। विद्या ददाति विनयम्, उक्ति प्रसिद्ध है। लेकिन दुर्भाग्य से विद्या अहंकार भी पैदा करती है। यह ज्ञान का अहंकार है। यह अन्य सभी अहंकारों से खतरनाक होता है। यह अहंकार नालन्दा की प्राचीन परम्परा के भी अनुकूल नहीं है, जिसके कुलाधिपति सेन रहे हैं। इसमें अमत्र्य सेन का दोष नहीं है। ऐसा बहुत से मामलों में हो ही जाता है। अहंकार का शमन इतना आसान नहीं है जितना आम तौर पर समझा जाता है। जब सरकार सेन को पद देती है तो उनकी दृष्टि में यह राजनीति नहीं बल्कि उनकी विद्वता का सम्मान है, जब उनको पद नहीं देती तो यह राजनीति हो जाती है। यदि कुलाधिपति का पद सेन की दृष्टि में राजनीति है तो उनको समझ लेना चाहिए था कि उनको यह पद राजनीति के कारण ही मिला था और राजनीति के कारण ही जा रहा है। यदि उनको लगता है कि उन्हें यह पद विद्वत्ता के कारण मिला था तो उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि भारत में केवल वही विद्वान नहीं हैं, दूसरे भी विद्वान हो सकते हैं। मुझे लगता था कि अमत्र्य सेन अपने अहंकार को मारकर आचार्यों की उस श्रेणी में पहुंच चुके हैं, जिसका जिक्र पुराने ग्रन्थों में आता है। लेकिन सेन ज्ञानाभिमान से फूले सामान्य व्यक्ति ही सिद्ध हुए।

18-04-2015

अब दूसरा किस्सा राहुल गांधी का है। राहुल गांधी राजवंश से हैं। यह ठीक है कि नेहरु वंश परम्परा से राजवंश परिवार नहीं कहा सकता, लेकिन लोकतांत्रिक तरीके से जब कोई परिवार राजवंश का रुतबा हासिल कर लेता है तो वह नेहरु परिवार बन जाता है। ऐसे परिवारों में जब कोई जन्म लेता है तो उसे राजवंशों के सभी गुण-अवगुण प्राप्त हो जाते हैं। जिन उपलब्धियों या प्राप्तियों के लिए सामान्य जन को कठिन संघर्ष करना पड़ता है, राजवंश के बच्चों को वे, राजवंश में जन्म लेने के कारण ही प्राप्त हो जाती हैं। राजवंशों के बच्चों का मूल्यांकन उनके गुण-अवगुण या फिर उनकी योग्यता-अयोग्यता के आधार पर नहीं होता। मूल्यांकन के ये पैमाने तो साधारण जन पर लागू होते हैं। वे राजकुल में होने के कारण शासन करने के लिये ही पैदा होते हैं। वास्तविक सत्ता न भी हो, राजकुल अपने आप में ही सत्ता का केन्द्र है। राजवंश में रहस्यमय वातावरण बरकरार रहना चाहिए, उस रहस्य के कारण ही आम आदमी राजवंश के प्रति श्रद्धा पाल सकता है या फिर उससे भयभीत हो सकता है।

‘लाल साड़ी’ के लेखक का यही कहना है कि उनके उपन्यास पर राजवंश को यही ऐतराज था कि सोनिया गांधी के जीवन के इटली वाले हिस्से में सोनिया को एक सामान्य मानव प्राणी के नाते चित्रित किया गया है, जबकि यह चित्रण रहस्य के कोहरे में लिपटा होना चाहिए था। अब उस राजवंश के राहुल गांधी के पास या उनके स्टाफ के पास पुलिस का एक अदना सिपाही एक मुड़ा-तुड़ा फॉर्म लेकर पहुंच जाता है और अपना घटिया-सा पेन निकालकर पूछना शुरु कर देता है कि साहिब आपका कद कितना है, बालों का रंग कैसा है, आंखों का रंग कैसा है, बूट कौन-से पहने हुए हैं? हिमाकत की भी हद होती है। राजवंश के बच्चों से ऐसे बेहूदा प्रश्न?

पुलिस का कहना है कि उन्हें तो हर एक के विवरण इकट्ठे करने पड़ते हैं, जिन्हें सुरक्षा प्रदान की जाती है। यह फॉर्म तो हर एक के बारे में भरा जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि यह फॉर्म भरवाना, आज के युग में कितना प्रासांगिक है और कितना नहीं, इस पर बहस हो सकती है और होनी भी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से बहस इस बात को लेकर नहीं हो रही कि फॉर्म कितना जरुरी है और कितना नहीं। बहस तो इस बात को लेकर हो रही है कि राहुल गांधी से यह फॉर्म भरवाने की आपकी हिम्मत कैसे हो गई? आप बाकी लोगों से भरवाते हों तो शौक से भरवाते रहो। आपको कौन मना कर रहा है। आज तक किसी ने किया भी नहीं। लेकिन अब तो आपने हद ही कर दी। वह फॉर्म लेकर राहुल गांधी के दरवाजे तक पहुंच गए। दिल्ली पुलिस ने स्पष्टीकरण दिया कि यह विवरण तो हर साल एकत्रित किया जाता है। तब राजदरबार के एक ऐलची ने ख़ुलासा किया कि आज तक तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी से यह फॉर्म भरवाने की किसी ने हिम्मत नहीं की।  दरअसल राजवंश का यही कष्ट है। आज तक राजवंश सामान्य प्रक्रिया से अलग था। राजवंश आखिर राजवंश होता है। अब उसके बच्चों को भी साधारण आदमी की श्रेणी में रखने की कोशिश हो रही है।

शास्त्रों में जिसे राजमद कहा गया है, वह यही मद है जो राहुल गांधी के सिर चढ़कर बोल रहा है। गोसाईं जी कहते थे, प्रभुता पाहि काही मद नाहीं। राजवंश ही तो प्रभुता है। उसके मिलने पर मद या नशा क्यों नहीं आयेगा? राजवंश का नशा या अहंकार तो ज्ञान के अहंकार से खतरनाक होता है। अमत्र्य सेन पहले के शिकार हैं और राहुल गांधी दूसरे के, लेकिन अहंकार दोनों का एक जैसा ही बढ़ा-चढ़ा है। किसी मध्यकालीन कवि ने कहा था कि सोने में धतूरे से सौ गुना ज्यादा नशा है। धतूरे को तो खाने पर आदमी बौरा जाता है, लेकिन सोना तो केवल प्राप्त हो जाने से ही आदमी बौरा जाता है। यदि इस दोहे में सोने की जगह प्रभुता लिख दिया जाये तो अर्थ में बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।

राहुल को राजवंश की प्रभुता हासिल है और अमत्र्य सेन को ज्ञान की। इसलिए दोनों का व्यवहार लगभग एक जैसा ही है। लोकतंत्र ने कुछ हद तक इस राजवंश के भीतर छिपा अहंकार का मद निकाल दिया था, लेकिन अभी भी कुछ बचा हुआ है। रही बात अमत्र्य सेन की! यहां चुप रहना ही श्रेयस्कर है। विद्या का अहंकार बड़ों-बड़ों को निगल गया।

कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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