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मेक इन ओडिशा

मेक इन ओडिशा

ओडिशा के पास अपने बहुमूल्य स्रोत हैं  इसके बावजूद सबसे गरीब राज्यों में आता है जो कि बहुत बड़ा विरोधाभास है। इस घटना कि व्याख्या कैसे की जाए ? दुर्भाग्य से संगोष्ठी में इस पहलू पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन इस सवाल का जवाब देने का कुछ लोग प्रयास कर रहे हैं। मेरे नजरिए से ओडिशा के पिछड़पन का सबसे महत्वपूर्ण कारण राज्य में घटिया राजनीतिक नेतृत्व, केन्द्रीय सरकार के साथ राज्य के उदासीन, पक्षपातपूर्ण संबंध हैं। पिछले एक दशक में वास्तव में होनहार और बेहद प्रतिभाशाली ओडिशा के लोग भारतीय संसद में आ गए हैं।

पिछले सप्ताह मैंने ‘ओडिशा फोरम’ के द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में भाग लिया। संगोष्टी मे शामिल  होने वाले ज्यादातर दिल्ली में रहने वाले ओडिशा के पेशेवर लोग थे। इस संगोष्ठी में चर्चा का विषय ‘मेक इन ओडिशा’ रहा। ‘मेक इन ओडिशा’ का विचार स्पष्ट तौर पर प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ योजना से ही पे्ररित है। संगोष्ठी को संबोधित करने वालों में मुख्य रूप से टाटा समूह के वरिष्ठ अधिकारी, और मेरे मित्र अमिताभ कांत जो कि भारत सरकार के औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग के सचिव हैं उपस्थित रहे। ओडिशा के खनन क्षेत्र में सहयोग देने के बाद, अब टाटा समूह ने ओडिशा के औद्योगीकरण के लिए बड़ी योजना की पेशकश की जिसमें एक इस्पात संयंत्र और औद्योगिक पार्क शामिल है, लेकिन इसकी शुरूआत करने के लिए भूमि मुहैया करना काफी संघर्षपूर्ण कार्य है।

टाटा समूह के अधिकारियों को इस योजना को सफल बनाने और ओडिशा के तीव्र औद्योगीकरण को सुविधाजनक बनाने के लिए केन्द्र में मौजूद मोदी सरकार और राज्य की नवीन पटनायक सरकार से खासी उम्मीदें है।

असल में अमिताभ ने दो बिंदुओं पर काफी जोर दिया, पहला ओडिशा में वो सभी क्षमताएं मौजूद हैं जिससे वो दूसरे मलेश्यिा और सिंगापुर जैसा बन सकता है,दूसरा अगर उद्मियों को अनुकूल माहौल दिया जाए तो, भारत के सभी राज्यों में ओडिशा मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ योजना में सबसे अग्रणी राज्य होगा। इस नजरिए से उनकी सोच बिल्कुल जायज है क्योंकि ओडिसा समृद्ध खनिज संसाधनों का स्रोत है (बॉक्साइट के बड़े भंडार, क्रोमाइट,चीनी मिट्टी, कोयला, डोलोमाइट, ग्रेफाइट, रत्न, फायरक्ले, लौह अयस्क, चूना पत्थर, मैंगनीज अयस्क, खनिज रेत,निकल अयस्क,क्वार्ट्ज), तीन बंदरगाहों समेत लंबा समुद्र तट स्थित है (जिनमें से एक पाराद्वीप बंदरगाह है, जो कि देश के सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक है), घने जंगल,कृषि भूमि, प्रचुर मात्रा में पानी, अधिशेष बिजली, विशाल जनशक्ति, समुद्री व्यापारियों की सदियों पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की छटा यहां देखने को मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ओडिशा देश के अन्य हिस्सों से रेल मार्गों और राष्ट्रीय राजमार्गों के द्वारा जुड़ा हुआ है। ओडिशा बंगाल की खाड़ी में उस स्थान पर स्थित है जहां से दक्षिण पूर्व और पूर्व एशिया के साथ संबंधों के माध्यम से ओडिशा को वैश्विक वाणिज्यिक और औद्योगिक केंद्र बनाया जा सकता है। ओडिशा अभी तक पिछड़ा हुआ है और पर्याप्त विदेशी निवेशकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाता है जिससे निवेश के लिए प्रतिबद्ध विदेशी निवेशक भी आगे नहीं बढ़ सके जैसा कि दक्षिण कोरिया के पोस्को (इसने जून 2005 में ओडिशा सरकार के साथ 12 अरब डॉलर इस्पात संयंत्र के निर्माण के लिए एक करार पर हस्ताक्षर किया था लेकिन ये योजना विवादों के कारण आगे नहीं बढ़ सकी,अगर ये योजना कार्यान्वित हो जाए, तो ये भारत में सर्वाधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होगा)और लंदन के वेदांता समूह के साथ हुआ। अमिताभ खेद व्यक्त करते इसका कारण ओडिशा एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ होना बताते हैं।

18-04-2015

हालंकि वहां उपस्थित लोगों ने ओडिसा के सॉफ्ट स्टेट कहे जाने का विरोध भी किया लेकिन मुझे लगता है कि अमिताभ काफी कड़वा सच कह रहे थे जो लोगों के लिए स्वीकारना आसान नहीं था। क्षमताओं पर कब्जा होने मात्र से ओडिसा समृद्ध या विकसित नहीं हो सकता। विकास की ओर ले जाने वाली सभी क्षमताएं और स्रोत होने के बाद भी सच ये है कि ओडिसा भारत का एक पिछड़ा राज्य है। वर्तमान में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गर्वनर रघुराम राजन ने 2013 में अपनी अध्यक्षता वाले एक पैनल में पिछड़ेपन का एक नया सूचकांक तैयार किया (समान रूप से 10 भारित संकेतकों पर आधारित है प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी दर, घरेलू सुविधाएं, महिला साक्षरता, अनुसूचित जाति-जनजाती की आबादी का प्रतिशत, शहरीकरण की दर,वित्तीय समावेशन और शारीरिक कनेक्टिविटी) जिसके अनुसार ओडिशा सबसे ज्यादा पिछड़े राज्यों की श्रेणी में खड़ा नजर आता है (बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, अरूणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, उत्तर प्रदेश और राजस्थान उसके बाद आते हैं)और गोवा सबसे विकसित राज्यों में  पहले स्थान पर (केरल, तमिलनाडु, पंजाब, महाराष्ट्र , उत्तराखंड और हरियाणा उसके बाद) ।

इस प्रकार ये कहना गलत नहीं होगा कि ओडिशा के पास अपने बहुमूल्य स्रोत होने के बावजूद इसके ओडिशा सबसे गरीब राज्यों में आता है जो कि बहुत बड़ा विरोधाभास है। इस घटना कि व्याख्या कैसे की जाए ? दुर्भाग्य से संगोष्ठी में इस पहलू पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन इस सवाल का जवाब देने का कुछ लोग प्रयास कर रहे हैं। मेरे नजरिए से ओडिशा के पिछड़पन का सबसे महत्वपूर्ण कारण राज्य में घटिया राजनीतिक नेतृत्व, केन्द्र सरकार के साथ राज्य के उदासीन, पक्षपातपूर्ण संबंध हैं। पिछले एक दशक में वास्तव में होनहार और बेहद प्रतिभाशाली ओडिशा के लोग भारतीय संसद में आ गए हैं। ये बात पूरी तरह से स्वीकार करने योग्य है की पिछले साढ़े 6 दशकों के दौरान ओडिशा के हितों को साधने की सांसदों की कोशिश केन्द्र सरकार के साथ नाकाम साबित हुई है। भारत के इतिहास में ये देखने को मिलता है कि आजादी के बाद से कंाग्रेस सरकार सत्ता में सबसे अधिक समय तक रही है लेकिन कांग्रेस ने शायद ही किसी ओडिशा के सांसद को कैबिनेट मंत्री बनाने के विषय में सोचा होगा।

ओडिशा के हितों के लिए उदासीनता की प्रवृत्ति मोदी शासन में भी जारी है। हालंकि प्रधानमंत्री अपने इरादे को उजागर करने का कोई मौका नहीं छोड़ते और उन्होंने कहा कि भारत के पूर्वी भाग को भी पश्चिमी भाग की तरह ही विकसित और समृद्ध बनाना है। शायद यही कारण है कि इस वर्ष के बजटीय आवंटन में मोदी सरकार बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के लिए काफी संवेदनशील रही और उन्हे विशेष पैकेज उपलब्ध कराए गए। लेकिन ओडिशा के विषय में क्या? मुझे लगता है यहां पर ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने ठीक ही कहा कि मोदी सरकार ओडिशा के साथ ‘‘एक सौतेले बच्चे ‘‘ की तरह बर्ताव कर रही है।

पिछले 15 साल से ज्यादा से ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे पटनायक को यह श्रय जाता है कि अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में राज्य के हितों की रक्षा और राज्य को आगे बढ़ाने में उनकी सरकार अधिक मुखर रही है। लेकिन आवश्यक बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने के लिए ये काफी नहीं है। ओडिशा में उद्मियों को बढ़ावा देने के लिए जरूरी यह है कि मजबूत राजनीतिक निर्णय लिए जाएं। पटनायाक अपनी साफ-सुथरी छवि के कारण राजनीति में लंबी पारी के योद्ध रहे हैं (भारत में समय-समय पर स्कैंडल होते रहे हैं। जिसकी वजह से राजनीति काफी भ्रष्ट हो गई है) वास्तव में सभी राजनीतिक पार्टीयां, बुद्धीजीवी, मीडिया और बहुत से गैर सरकारी संगठन (एनजीओ)गरीबी के मत को बढ़ावा देने में अति सक्रिय हैं। ओडिशा में पिछले कुछ वर्षों में हर औद्योगिक  परियोजना या प्रस्ताव गरीब विरोधी और जन विरोधी के रूप में पेश किए गए जो कि ओडिशा की एक अलग ही पहचान बया करता है। यहां भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ कई बार हिंसक अंदोलन हो चुके हैं। जिसका लाभ पक्षपातपूर्ण केन्द्र सरकार ने भी लिया हैं। कुछ प्रतिद्वंदी कॉपरेट घराने भी अंदोलनकारियों को उत्तेजित करते हैं। यही कारण है कि पोस्कों की निवेश योजना के शुरू ना होने के कारण अक्सर राज्य में आने से पहल अन्य संभावित निवेशक कई बार सोचते हैं। इसके अलावा राज्य में बुनियादी सुविधाओं को सुधारने के लिए शासन व्यवस्था से चर्चा करना जरूरी है, साथ ही उद्योगों की स्थापना की सुविधा के लिए आसान प्रणाली और अधिकारी तंत्र होना चाहिए जैसा कि गुजरात में देखने को मिलता है, जो कि देश का सबसे ज्यादा व्यापार अनुकूल राज्य है। ओडिशा सरकार एक बड़ा भूमि बैंक तैयार करके ही राज्य के लिए बहुत कुछ कर सकती है। जो कि उद्योगो के लिए आसानी से आवश्यक भूमि को मुहैया करवा सके। इस तरह के बैंक का निर्माण करना काफी मुश्किल काम है क्योंकि राज्य का अंातरिक राजनीतिक वर्ग ही इसका विरोध करेगा।

18-04-2015

यहां पर एक तथ्य और है जिसे मैं ‘क्रैब मेंटालिटी’ कहता हूं क्योंकि जो न तो खुद आगे बढ़ते हैं और न ही दूसरों को आगे बढ़ते देख सकते हैं। पूरे भारत में ये मानसिकता देखने को मिलती है लेकिन ये मानसिकता ओडिशा में ज्यादा देखने को मिलती है। इस मानसिकता को एक कहानी के जरिए समझाया जा सकता है।  एक माल वाहक समुद्री जाहाज जिस पर अलग-अलग देशों के केकडों को अलग-अलग बक्सों में रखा जा रहा था। जहाज पर नव नियुक्त कप्तान ने देखा कि हर बक्सों के ढक्कन को अच्छे से बंद किया गया है लेकिन एक बक्से के ढक्कन को ठीक से बंद नहीं किया गया था जब नव-नियुक्त कप्तान ने अपने सहयोगी से पूछा कि इस बक्से का ढक्कन क्यों खुला हुआ है तो उसने जवाब दिया कि इस खुले हुए बक्से में भारतीये नस्ल के केंकडे हैं इन्हें किसी भी तरह के ढक्कन की जरूरत नहीं है क्योंकि भारतीय केंकड़ों में एकता का आभाव है अगर एक केंकड़ा बक्से से बाहर जाने की कोशिश करेगा तो बाकी के सारे ईष्र्या के चलते उसे नीचे खींच लेंगे। लेकिन दूसरे देशों के केंकड़ों में ऐसी प्रवृति देखने को नहीं मिलेगी क्योंकि अगर उनमें से कोई केंकड़ा बाहर जाने की कोशिश करेगा तो बाकी के केंकड़े उसे बाहर निकलने में मदद करेंगे।

इस कहानी के जरिए भी एक प्रभावशाली संदेश दिया जा सकता है। और ये सच है कि एक भारतीय दूसरे भारतीय की सफलता और प्रशंसा को बर्दाश्त नहीं कर सकता। भारतीयों में एकता के इसी आभाव के कारण भारतीय हजारों सालों तक विदेशी शसकों की अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर रहे। भारतीयों की इस प्रवृति के कारण ही हमारे नेताओं को गरीबी का बखान करने का मौका मिल जाता है और इस बहाने अपनी राजनीति को जिंदा रखने का भी। जैसा कि सामाजिक न्याय के नाम पर  हमारे राजनेता अक्सर ये कहते सुने जाते हैं कि वो गरीबों के लिए सब्सिडी दे रहे हैं। पर सवाल ये उठता है कि अगर वो वाकई गरीबों के शुभचिंतक हैं तो उन्हें देश के युवाओं और गरीबों को सशक्त बनाना चाहिए ताकि वो अपनी रोजी-रोटी कमा सकें और गरीबी को दूर कर सकें। दूसरे शब्दों में कहें तो लोगों कि सामान्य मानसिकता ऐसी है कि अगर हम सफल नहीं है तो दूसरे को भी सफल नहीं होने देंगे। हम खुद तो कुछ करेंगे नहीं और दूसरे को भी नहीं करने देंगे

मुझे लगाता है कि लोगों की ये मानसिकता ही है जो ओडिशा के औद्योगिकरण के  विकास के रास्ते में अवरोध उत्पन्न कर रही है। और मैं व्यक्तिगत रूप से इस वजह से काफी दुखी हूं, क्योंकि मैंने अपनी जिंदगी का दो-तिहाई हिस्सा दिल्ली में गुजारा है,जबकि मेरी जड़े ओडिशा से जुड़ी हुई हैं। वास्तव मैं एक और कारण है जिसकी वजह से मैं इस संगोष्ठी का हिस्सा बना मैं इस संगोष्ठी से कुछ सिखना चाहता था क्योंकि मैं चाहूंगा कि मेरा बेटा,जिसने अपनी बी-टेक पूरी कर ली है और अब वो विदेश जाने का तीव्र इच्छुक है अपनी शुरूआत एक छोटे से व्यवसायी के रूप में मेरे गृह राज्य से करेगा। मैं दृढ़ विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भारत एक विकसित देश नहीं हो सकता, जब तक कि यहां के युवा छोटे-बड़े व्यवसाय की ओर अपना रूख नहीं करेंगे। लेकिन भारतीय नेताओं और बुद्धिजीवियों की मानसिकता को देखते हुए ये कहना भी गलत नहीं होगा कि ये युवाओ के लिए बड़ी चुनौती है। लेकिन भारतीय राजनेताओं  की  मानसिकता ऐसी हो चुकी है कि किसी भी वृध्दि और विकास के विचार को गति मिलने से पहले ही गरीबों को बचाने के नाम पर उसका विरोध हो जाता है।

प्रकाश नंदा

Ингейт Компанияконсилеры

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