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आप तो ऐसे न थे !

आप तो ऐसे न थे !

दिल्ली विधानसभा में असाधारण विजय के बाद ही आप में महाभारत होने के आसार तेज हो गए थे, क्योंकि पिछले एक साल में उसके लिए जमीन तैयार हो चुकी थी। आप में आंतरिक लोकतंत्र की बातें तो बहुत होती थी, लेकिन आंतरिक लोकतंत्र था नहीं। आप को भले ही आम आदमी की पार्टी कहा जाता हो, लेकिन असल में वह केजरीवाल की जेबी पार्टी है।

स्पाईडरमैन की तर्ज पर केजरीवाल मफलरमैन माने जाते हैं। भारतीय राजनीति के ‘मफलरमैन’ का अर्थ – आम आदमी की आशाओं-आशंकाओं के प्रतीक, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मसीहा, वैकल्पिक राजनीति  का सेनापति, जो कहता था सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए। जो कहता था  कि हम राजनीति करने नहीं राजनीति की सफाई करने आए हैं। दिल्ली की जनता ने तो उन्हें अपना सबसे प्रिय नेता बनाकर सिर आंखों पर बिठा लिया। इतना अभूतपूर्व बहुमत दिया, जिसकी खुद केजरीवाल नें भी कल्पना नहीं की होगी। लेकिन यही जीत अभिशाप बन गई। सिर मुड़ाते ही ओले पड़े। इस जीत के बाद आप के नेता और खासकर अरविंद केजरीवाल विनम्र होने के बजाय अहंकारी हो गए। उन्होंने पार्टी से अपने उन सब विरोधियों के सफाए का अभियान शुरू कर दिया जो कभी उनके अपने थे। जिन्होंने कभी आप की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसकी छवि एक ऐसी पार्टी की बनाई थी, जो दिल्ली के गरीब आदमी की पार्टी है, उसके हितों के लिए वह संघर्ष करने वाली पार्टी है। लेकिन, पार्टी के दिल्ली में सरकार बनाने के बाद से पार्टी में जो कलियुगी महाभारत शुरू हुआ है, उससे दिल्ली और देश की जनता का भारी मनोरंजन हुआ। ऐसा ऐक्शन पैक्ड राजनीतिक सीरियल जनता ने बहुत समय से नहीं देखा होगा। आरोप-जवाबी आरोप, एक दूसरे को बेनकाब करने की होड़, सत्ता लिप्सा का नंगा नाच, स्टिंग, झूठ-फरेब, जासूसी, बेडरूम तक पहुंचने की धमकियां आदि आदि। जिन लोगों को लगता था कि आप नई राजनीतिक पार्टी होने के कारण उसके नेता परंपरागत राजनीतिक दावं-पेंचों से अवगत नहीं होंगे, उन्हें निराश होने के जरूरत नहीं है। आप के नेता की कारगुजारियां देखकर लगता है कि वे  परंपरागत राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को काफी पीछे  छोड़ चुके हैं। केजरीवाल अब तक इतने लोगों को पार्टी से निकाल चुके हैं कि अब एक और आम आदमी पार्टी मैदान में होगी। पिछले एक महीने से आम आदमी पार्टी में जो हो रहा है उससे लोगों को सदमा भी लगा और समाज में बदलाव की उनकी आखिरी उम्मीद भी खत्म हो गई।

18-04-2015

दिल्ली विधानसभा में असाधारण विजय के बाद ही आप में महाभारत होने के आसार तेज हो गए थे, क्योंकि पिछले एक साल में उसके लिए जमीन तैयार हो चुकी थी। आप में आंतरिक लोकतंत्र की बातें तो बहुत होती थी, लेकिन आंतरिक लोकतंत्र था ही नहीं। आप को भले ही आम आदमी की पार्टी कहा जाता हो, लेकिन असल में वह केजरीवाल की जेबी पार्टी है। भारतीय राजनीति की त्रासदी यही रही है कि यहां लोग सिद्धांतों को नहीं व्यक्ति को वोट देते हैं। तब व्यक्ति अपने आपको पार्टी से बड़ा मानने लगता है। आप को जो समर्थन मिला वह असल में केजरीवाल के जुझारू व्यक्तित्व को मिला समर्थन था। बिजली-पानी के दाम कम करने को मिला समर्थन था। इसलिए केजरीवाल को लगा हो तो अचरज कैसा कि वोट तो मुझे मिले हैं फिर मैं पार्टी को क्यों ढोऊं। यह भी कहा जाता है कि केजरीवाल ने कहा भी अपने विरोधियों से आप पार्टी अपने पास रखिए, मैं 67 विधायकों को लेकर अलग हो जाता हूं। इस सोच के कारण ही आप में स्थापना के समय से कई लोग आए और गए, लेकिन केजरीवाल ने कभी किसी की चिंता नहीं की और यह भी सही है कि उनके जाने से पार्टी की सेहत पर कोई असर भी नहीं पड़ा। केजरीवाल की तानाशाही वैसे ही चलती रही। चुनावी नजरिए से देखा जाए तो आप लगातार सफलता के नए शिखर को छूती रही। भूषण परिवार केजरीवाल से बेहद नाराज इसलिए था, क्योंकि वह चाहता था कि पार्टी अपने सिद्धांतों के मुताबिक चले। ऐसा न करने पर उन्होंने चुनाव के दौरान ही केजरीवाल की काफी किरकिरी कराने की कोशिश की। पार्टी के संस्थापक सदस्य और सबसे बड़े फायनेंसर शांति भूषण ने चुनाव के दौरान केजरीवाल की आलोचना की और किरण बेदी का समर्थन कर डाला। हालांकि प्रशांत भूषण चुनाव प्रचार से दूर रहे और अपने तरीके से चुनाव को सबोटेज करते रहे। यद्यपि इसके लिए उन्हें दोष देना ठीक नहीं होगा। केजरीवाल, जो आप के बारे में बड़ी-बड़ी आदर्शों की बातें करते थे, वे आप को मनमाने तरीके से चलाते रहे। उसके सारे आदर्शों को उन्होंने बहुत पहले टाटा-बाय-बाय कह दिया था और किसी भी तरह चुनाव जितना चाहते थे। उन्होंने मनमाने तरीके से पैसे वालों, बाहुबलियों को टिकट दिए। प्रशांत भूषण ने ऐसे 12 लोगों के बारे में लोकपाल से शिकायत की थी, लेकिन केजरीवाल ने केवल दो उम्मीदवारों के टिकट काटे, बाकी लोगों की उम्मीदवारी बरकरार रही। इससे प्रशांत भूषण और शांति भूषण नाराज हुए। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी से मशविरा किए बिना राज्यों में चुनाव न लडऩे का फैसला किया गया, इससे योगेंद्र यादव नाराज हुए। वे यह भी चाहते थे कि केजरीवाल मुख्यमंत्री और पार्टी के संयोजक, दोनों पदों पर न रहें। सत्ता का विकेंद्रीकरण की बात करने वाली पार्टी को एक व्यक्ति, एक पद के सिद्धांत को लागू करना ही चाहिए था, लेकिन केजरीवाल भले ही कितने ही लोकतांत्रिक दिखने की कोशिश करते हों वे चाहते थे कि पार्टी की असल पावर उनके ही हाथ में रहे। इसके लिए दोनों पद पास होना जरूरी है। इसलिए उन्होंने वही किया जो एक व्यावहारिक राजनीतिज्ञ करता है।

प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव दोनों को पार्टी मुख्यधारा से दरकिनार कर दिया गया। अब वे पार्टी के साधारण सदस्य के तौर पर पार्टी की चाहे जितनी सेवा कर सकते हैं। इस तरह यह सीधे-सीधे सत्ता संघर्ष था, लेकिन केजरीवाल के करीबी समझे जाने वाले पार्टी नेता आशुतोष ने एक ट्वीट के जरिए इसे विचारों का संघर्ष कहा था। यानी प्रशांत भूषण और  योगेंद्र यादव के वामपंथ और अरविंद केजरीवाल के जन कल्याणवाद के बीच एक टकराव  है। वैसे सभी जानते हैं कि नेताओं के लिए अपने सत्ता संघर्ष को विचारधारा  का मुखौटा पहनाना हमेशा ही सुविधाजनक होता है। केजरीवाल को ही लीजिए वे स्वराज, विकेंद्रीकरण और पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की बात करते हैं, लेकिन सत्ता हाथ में आते ही सब सिद्धांत ढह गए। आंतरिक लोकतंत्र को बगावत कहा जाने लगा। बाद में इस आधार पर पार्टी ने योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार और अजीत झा को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकाल दिया। इन सभी का आरोप है कि राष्ट्रीय परिषद में उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं दिया गया। केजरीवाल गुट पर विरोधियों को दबाने के लिए मारपीट करने के भी आरोप लगे। इसके दौरान और इसके बाद जो कुछ भी हुआ उसे योगेंद्र यादव ने एक शब्द में समेट दिया – ‘शेमफुल’ यानी ‘शर्मनाक’। इस पूरे राजनीतिक ड्रामे से एक बात साफ है कि  हमाम में सभी नंगे हैं। पार्टी की जगहंसाई कराने और इसके समर्थकों में मायूसी फैलाने में दोनों खेमों का हाथ बराबर का है।

लेकिन, इससे भी चौंकाने वाली बात यह हुई कि जिस लोकपाल बिल लाने के लिए हुए आंदोलन की कोख से आप जन्मी थी, कभी लोकपाल बिल के मुद्दे पर आप ने सरकार छोड़ दी थी, उसी आप ने अपनी पार्टी के आंतरिक लोकपाल रामदास को बगैर कोई वजह बताए बर्खास्त कर दिया। इससे तमाम लोगों को धक्का लगा जो सोच रहे थे कि लोकपाल देश से भ्रष्टाचार का खात्मा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। लेकिन, अब उन्हें लगने लगा कि जब आप का अपना लोकपाल इतना कमजोर है, जिसे पार्टी कभी भी उठाकर फेंक सकती है, तो फिर देश का लोकपाल कैसा होगा। क्या उसे भी सरकार कभी भी हटा सकती है?

इस पूरे विवाद से पार्टी को एक बड़ा झटका जरूर लगा है, लेकिन अब ये साफ हो गया है कि ये विचारों के टकराव से अधिक शायद अहम की लड़ाई है। एक तरफ बुद्धिजीवी हैं जिनका जनता में कोई प्रभाव नहीं हैं। वे अपने बूते नगर निगम तक की एक सीट नहीं जीत सकते, लेकिन सैद्धांतिक बहस करने में उनसे बेहतर कोई नहीं हो सकता। कार्यकर्ता तो उसी को नेता मानता है जो वोट दिलवा सके। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल और प्रशांत भूषण तथा यादव के बीच सुलह कराने की कोशिश नहीं हुई। पार्टी के एक नेता ने कहा कि दोनों खेमों में सुलह सफाई के लिए बैठक हुई। बैठक में यादव और भूषण ने मांग की कि केजरीवाल को संयोजक के पद से हटाया जाए, जबकि केजरीवाल के समर्थकों ने साफ कह दिया कि ये संभव नहीं है। खुद केजरीवाल बाहर से इस्तीफा देने को तैयार नजर आए, लेकिन पार्टी के खास नेताओं को उन्होंने साफ कह दिया है कि उन्हें पार्टी और दिल्ली सरकार के फैसलों को लागू करने के लिए ‘फ्री हैंड’ चाहिए। तो बात यही है कि केजरीवाल को अब आंतरिक लोकतंत्र नहीं फ्री हैंड चाहिए, जैसे सोनिया गांधी को कांग्रेस में मिला हुआ है।

आप के इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई स्टिंग आपरेशनों ने। उससे सबसे ज्यादा असर पड़ा है केजरीवाल की छवि पर। इन तमाम स्टिंग में वे आदर्शवादी और सैंद्धांतिक राजनीतिज्ञ के तौर पर नहीं वरन अवसरवादी और छुटभैये राजनेता के रूप में उभर कर आते हैं, जो चुनाव जीतने के और सत्ता पाने के लिए कोई भी समझौता कर सकता है। एक स्टिंग से पता चला कि सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से किसी तरह मदद न मांगने का दावा करनेवाले केजरीवाल कांग्रेसी विधायकों को तोड़ उनकी मदद से सरकार बनाने की बात करते नजर आए। एक स्टिंग से यह भी पता चला केजरीवाल, जो भाजपा पर विधायक खरीदने का आरोप लगाते थे, वे खुद अपने विधायकों को भाजपा नेता की ओर से फोन करके यह पता लगाने की कोशिश करते थे कि वे कही दल-बदल तो नहीं करने वाले हैं। एक वीडियो में वे अपने विरोधी नेताओं को कमीना कहते नजर आए, तो एक में वे कह रहे थे कि ये लोग अगर किसी और पार्टी में होते तो इन्हें लात मार कर निकाल दिया जाता। इस तरह केजरीवाल एक तिकड़मी नेता की तरह उभर कर सामने आते हैं, जिनमें अपनी पार्टी के सहयोगियों के प्रति कोई आदर नहीं है।

सवाल ये है कि अब इस राजनीतिक नादानी से पार्टी के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा? बहुत सारे लोग मानते हैं कि इससे पढ़े-लिखे लोगों का भले ही आप से मोहभंग हो जाए, मगर आम जनता पर कोई असर नहीं पडऩे वाला। कांग्रेस में 1969 में जब फूट पड़ी तो कहा गया था कि अब कांग्रेस का सफाया हो जाएगा, लेकिन 1971 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पार्टी ने आम चुनाव में भारी विजय हासिल की। राजनीतिक पार्टियों से नेताओं का निकलना या निकाला जाना कोई नई बात नहीं है। आम आदमी पार्टी में भी वही हो रहा है, जो दूसरी पार्टियों में दशकों से होता आया है  या यूं कह लें कि पार्टी अब देश के राजनीतिक माहौल में ढलती जा रही है।

केजरीवाल के खेमे पर की जाने वाली ये आलोचना सही है कि पार्टी अलग पहचान बनाए रखने की अपनी क्षमता भी खोती जा रही है। इस घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति के एक अभिनव प्रयोग को हास्यास्पद बनाकर रख दिया है। लोकतांत्रिक मूल्य-मर्यादाओं की स्थापना का दावा करने वाली पार्टी संकीर्ण मसलों में उलझ गई। उसके नेताओं का आपसी अविश्वास खुलकर सामने आ गया।

‘नई राजनीति’ के ‘प्रवर्तक’ अरविंद केजरीवाल पर उनके ही ‘साथियों’ ने विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया है। यह भी कहा गया है कि विधायकों को अपने पाले में रखने के लिए 23 विधायकों को सचिव नियुक्त किया गया है, जिन पर काफी पैसा खर्च होगा। इस विवाद के बाद पार्टी में केजरीवाल का वर्चस्व जरूर कायम हो जाएगा, पर लोगों में उनकी और पार्टी की छवि जरूर खराब होगी। दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार की संभावनाओं को भी ठेस लगेगी। आप को भी बाकी पार्टियों की तरह संगठन बनाने के लिए ऐढ़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्टी राज्यों में चुनाव ही नहीं लड़ेगी तो लोग उसमें क्यों शामिल होंगे। हाल के विवाद को देखकर यही लगता है कि आप में वर्तमान राजनीति का दीर्घकालीन विकल्प बनने की महत्वाकांक्षा खत्म हो गई है। वह दिल्ली के कुएं की मेंढक ही बनी रहना चाहती है।

सतीश पेडणेकर

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