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‘आप’ का क्या होगा?

‘आप’ का क्या होगा?

आप की सबसे कमजोर कड़ी उसकी संरचना है, जो खुद ही अस्थिर है। आप एक ऐसी पार्टी है जो विचारों के समूह पर आधारित है, लेकिन ‘संरचना या पदानुक्रम की विरासत के बिना उन सिद्धांतों को अपनाना मुश्किल होगा, जिस पर सभी सहमत हों’।

‘आप’ के भविष्य को लेकर नहीं, बल्कि दो साल पुरानी आम आदमी पार्टी के भाग्य को लेकर चिंतित होने की बात है, जो यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से परेशान जनता के बीच भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने और निम्न एवं निम्न-मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के वादे के साथ राजनीति के आकाश में छा गई। कुल 70 में से 67 विधायक होने के बावजूद आंतरिक समस्याओं से घिरी इस पार्टी का राजनीतिक भविष्य के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।

18-04-2015

पिछली बार 49 दिन के बाद ही अरविंद केजरीवाल द्वारा मुख्यमंत्री पद से त्याग-पत्र देने से अब तक दिल्ली की यमुना में बहुत गंदे पानी बह चुके हैं। अलगाव के कारण केजरीवाल की तरफ आकृष्ट मध्यम वर्ग का मोहभंग हो गया। केजरीवाल से लोगों को बहुत उम्मीद थी, लेकिन मिला कुछ नहीं।

भाजपा को 28 सीटों का नुकसान पहुंचाते हुए 3 सीटों पर सिमटाकर और कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर आम आदमी पार्टी ने भारी बहुमत से दिल्ली में वापसी की। दिल्ली की जनता द्वारा न सिर्फ केजरीवाल को माफ कर दिया गया, बल्कि 70 में से 67 सीटें देकर केजरीवाल की विचारधारा – जनता की सरकार जनता की सलाह से चलेगी और भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना, पर विश्वास भी किया। कांग्रेस और भाजपा, दोनों के पास इसका बेहतर विकल्प नहीं है।

18-04-2015

लेकिन, सत्ता में आते ही अपरिहार्य कलह सार्वजनिक हो गया। पार्टी के दो सिद्धांतकार, प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) से हटा दिया गया, जो बंगलुरू में बैठे केजरीवाल द्वारा नियंत्रित थी। इसके बाद उन्हें पार्टी के प्रवक्ता पद से भी बर्खास्त कर दिया गया।

लेकिन साफ-सुथरी सरकार देने के वादे को करारा झटका स्टिंग ऑपरेशन के खुलासे के बाद लगा। केजरीवाल द्वारा कांग्रेस के विधायकों को लुभाने के  प्रयास के अलावा प्रशांत भूषण के परिवार के सदस्यों का पत्र, केजरीवाल के कोर समर्थकों द्वारा सार्वजनिक रूप से आरोप, दो सदस्यों के निष्कासन के निर्णय पर ब्लॉग द्वारा चुनौती, पार्टी में मतभेद के खिलाफ यादव द्वारा लगातार दिए जा रहे साक्षात्कार और पत्र से आप समर्थकों के बीच निराशा फैल गई। इससे सरकार की भारी बहुमत वाली सरकार के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए। यह सब नाटकीय था।

केजरीवाल पर मानहानि के कई आपराधिक मुकदमें भी चल रहे हैं। अगर इनमें से एक भी मामले में उनके लिए समस्या खड़ी होती है तो पार्टी में उनका बने रहना पार्टी को मुश्किल में डालना होगा।

 अच्छी ख्याति और विधानसभा में पूरा नियंत्रण होने के बावजूद पार्टी को इस तरह के झटके क्यों सहने पड़ रहे हैं? संभवत: ऐसा इसलिए है क्योंकि धरना-प्रदर्शन की विशेषज्ञता, झूठे वादे करना, सड़क किनारे भूख हड़ताल करना इन नेताओं के जीन में शामिल है, लेकिन प्रशासन चलाने का दैनिक कार्य और नीतियों का निर्माण उनके लिए मुद्दा नहीं है। 49 दिनों का शासन अपने आप में इस बात का गवाह है। विचारधारा पर एक दूसरे का विरोध करना क्या आम आदमी पार्टी की आंतरिक लोकतंत्र के लक्षण हैं? या फिर आप की अपनी पेटेंट की हुई संस्कृति है, जो सफलता या असफलता दोनों ही समय अस्थिर रहती है और प्रदर्शन के मोड में ही एकजुटता प्रदर्शित करते हैं?

आप की सबसे कमजोर कड़ी उसकी संरचना ही है, जो खुद ही अस्थिर है। आप एक ऐसी पार्टी है जो विचारों के समूह पर आधारित है, लेकिन ‘संरचना या पदानुक्रम की विरासत के बिना उन सिद्धांतों को अपनाना मुश्किल होगा, जिस पर सभी सहमत हों’।

तथ्य यह है कि आप के उम्मीदवारों की जीत केजरीवाल के कारण ही हुई है। इतने भारी अंतर से जीत ने केजरीवाल को बुलंदियों पर पहुंचा दिया, जैसा कि मोदी और इसके पहले इंदिरा गांधी के साथ हुआ था। केजरीवाल के साथ  अभी भी ‘अपने बीच’ के शख्स की तरह व्यवहार किया जा रहा है। सामान्यत: प्रदर्शनकारियों का नेता होता है, लेकिन वह अभेद्य नहीं बन पाता है। केजरीवाल की स्थिति कुछ ऐसी ही है।

18-04-2015

जिसमें आत्मीयता की भावना है या कह लें कि अवसर की तलाश है वह खुद को आप का समर्थक होने का दावा कर सकता है। जब उनका मोहभंग हो जाए या अवसरों की अनदेखी हो तब धूमधाम से सार्वजनिक रूप से अलग हो जाएं। यह आप की सबसे कमजोर कड़ी है। यह प्रतिकूल प्रचार के लिए भी उत्तरदायी है। यही वजह है कि योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को राजनीतिक मामलों की समिति से बर्खास्त किया गया। एक अन्य बिंदू यह है कि अपने शपथ ग्रहण समारोह में अरविंद केजरीवाल ने वादा किया था कि पिछली बार की तरह वे दिल्ली को छोड़कर भागेंगे नहीं, बल्कि राजधानी क्षेत्र में सुशासन और विकास पर ध्यान केंद्रित करेंगे। लेकिन, दिल्ली में सत्ता संभालने के कुछ ही हफ्तों के बाद आप ने राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार करने की कोशिश की। आप के नेता संजय सिंह ने मीडिया से कहा था कि पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति ने अन्य राज्यों में पार्टी का विस्तार करने का निर्णय लिया है। इस मुद्दे पर पार्टी के वरिष्ठ नेता योगेन्द्र यादव द्वारा समर्थन किए जाने के कारण उन पर चौतरफा शाब्दिक हमले हुए।

एक राज्यस्तरीय पार्टी को अपनी राजनीतिक क्षमता को देखते हुए चुनाव लडऩे चाहिए। यह एक मुद्दा, जिस पर दरार पैदा हुई थी, वह अब खत्म हो चुकी है। मतभेद के अन्य बिंदुओं को भी सुलझाकर आप को एकजुट करने की कोशिश की गई। सिंह ने अपने बयान में कहा था कि पार्टी का संकट जल्दी ही खत्म हो जाएगा और पार्टी के नेता प्रशांत भूषण से जल्दी ही मिलेंगे, जिन्हें योगेन्द्र यादव के साथ पार्टी की पीएसी से अपदस्थ किया गया था। उन्होंने कहा था – ‘‘पार्टी में स्थिति को सामान्य बनाने के लिए हमलोग काम कर रहे हैं। यादव से मिलकर हमने एक कदम आगे बढ़ाया है।’’

लेकिन, लगता है कि राजनीतिक स्वार्थ के कारण पूरे ढीठपन से योगेन्द्र यादव शह और मात का खेल खेल रहे हैं। पीएसी से निष्कासन के बाद योगेन्द्र यादव ने पार्टी में बने रहने के बारे में कहा था – ‘‘न तोड़ेंगे, न छोड़ेंगे। सुधरेंगे और सुधारेंगे।’’ लेकिन, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को पकड़े रहना केजरीवाल के लिए खतरनाक हो सकता था। इन दो वरिष्ठ नेताओं को कई वॉलेंटियरर्स, नेताओं और राज्य ईकाई का समर्थन हासिल है। केजरीवाल यह अच्छी तरह जानते हैं कि पीएसी में अपने वफादारों को शामिल किए बिना एजेंडे को नियंत्रित करना और तानाशाही करना मुश्किल है। इसलिए उन्होंने जल्दबाजी में इस खेल को समाप्त किया। लेकिन सब कुछ केजरीवाल की स्क्रिप्ट के अनुसार नहीं हुआ। यादव और भूषण का केजरीवाल के खिलाफ आरोप का अपना तथ्य है। आप के पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने गडकरी और जेटली के नाम से आप के विधायकों को फर्जी फोन करने का अरोप लगाया, वहीं हरीश खन्ना ने केजरीवाल पर बंधक बनाने का आरोप लगाया।18-04-2015

इसलिए दिल्ली के अच्छे दिन की संभावना न ही जनता और न ही पार्टी नेतृत्व के लिए दिखाई दे रही है, बल्कि एक तरफ योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और दूसरी तरफ केजरीवाल एवं कंपनी के बुरे दिन चल रहे हैं। यहां तक कि राजनैतिक और बौद्धिक नेतृत्व के रास्ते भी अलग-अलग हैं। केजरीवाल अविवादित राजनीतिक चेहरा और आक्रामक हैं, जबकि यादव पार्टी के बौद्धिक बैकबोन के रूप में जाने जाते हैं और बेहद मृदु हैं। हालांकि आप ने दावा किया था कि वह राजनीति की नई परिभाषा लिखेगी, लेकिन भारी बहुमत मिलने के बाद केजरीवाल ने इस पर गंभीरता से अमल नहीं किया।

दिल्ली के बाहर जब योगेन्द्र यादव ने बौद्धिक नेतृत्व देने का प्रयास किया, तब अन्य नेताओं ने केजरीवाल को एहसास दिलाया कि उनका वास्तविक इरादा प्रशासन के मामलों में भी नेतृत्व देने का है। यह एक तरह का हस्तक्षेप था। हालांकि केजरीवाल ने दावा किया था कि वह बिना ‘औकात’ के ‘छोटा आदमी’ हैं, लेकिन बेहतर बौद्धिक कद और राजनीतिक कौशल वाले अन्य किसी व्यक्ति को जगह देने में नाकाम रहे। आप की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें शीर्ष स्तर के सभी नेता विचारक रहे हैं और उनके बीच टकराव होना लाजिमी है। आप के संकटग्रस्त होने का यह भी एक प्रमुख कारण था।

स्टिंग के खुलासे से जाहिर हो गया है कि केजरीवाल कितने महत्वकांक्षी हो सकते हैं और जिस तरह के शब्दों का प्रयोग वो दूसरों के लिए कर रहे हैं, उससे उनकी छवि खराब ही हो रही है। यह भी तथ्य है कि आप विभिन्न विचारों पर खड़ी ऐसी पार्टी है जो भरभरा कर गिर रही है।

विजय दत्त

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