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क्या सेकुलरिज्म का बोझ सिर्फ हिन्दु ढोएगा?

क्या सेकुलरिज्म का बोझ सिर्फ हिन्दु ढोएगा?

ऐतिहासिक अन्याय निवारण के मान्य तरीके सच्चाई और समाधान आयोग, सुधार और कम से कम एक विनम्र माफी हैं। ऐसा कुछ नहीं हुआ जब मुगलों ने अपना साम्राज्य खो दिया। यह हिंदू-मुस्लिम संबंधों में एक नई शुरुआत का क्षण था। लेकिन मुसलमानों ने उस पल को गंवा दिया। लंबे मुस्लिम शासन के दौरान हिंदुओं के साथ किए गए ऐतिहासिक अन्याय पर बात नहीं की गई। इसके विपरीत, हिंदुओं पर अपने शासन के अंत से क्षुब्ध मुसलमानों ने पहले जैसा अपनी विशेषता और वर्चस्ववादी नजरिये को ही बनाए रखा, मोटे तौर पर इसलिए क्योंकि यही नजरिया भारत में मुस्लिम पहचान निर्माण के मूल में थे। जेया अल-दीन बरानी के शब्दों में, ” ‘मुसलमान राजा’ सिर्फ जजिया और कहाराज लगाने तक सीमित न रहें। उन्हें कुफ्र को खत्म करके इस्लाम की सर्वोच्चता स्थापित करनी चाहिए और उनके इमामों का सफाया कर देना चाहिए, जो भारत में ब्राह्मण हैं।’’ फतवा-ए-जहानदारी, पेज 46., जिसका अंग्रेजी अनुवाद ‘दिगी सल्तनत के राजनीतिक सिद्धांत’ के रूप में इलाहाबाद के किताब महल से 1972 में छपा। सल्तनत के दौर की मुस्लिम मन की यादें और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रधानता ही बाद के दौर में हिंदू-मुस्लिम संबंधों में छाई रही। प्रसिद्ध इतिहासकार, प्रोफेसर मुशीरुल हसन ने हाल में लिखा, ”अतीत की विरासत प्रतिष्ठा और सामुदायिक गौरव के प्रतीक बन गई; दरअसल हर जगह मुसलमानों को गौरवशाली इस्लामिक अतीत की याद दिलाई गई, ताकि वह उनकी एकता की प्रेरणा और पहचान बन सके।’’ उसी लेख में वे आगे कहते हैं, ”मजहबी प्रतीकों की एकीकृत शक्तियों- मस्जिद, हज, सूफी तीर्थ- ने इस्लाम की सामान्य बिरादरी में अपनेपन की भावना को बढ़ावा दिया और इस तरह से समूची दुनिया में मुस्लिम चेतना को बढ़ावा देना आसान बना।’’ [सर्व इस्लामवाद बनाम भारतीय राष्ट्रवाद: एक नजरिया, ईपीडब्ल्यू, 14 जून, 1986, पेज 1074-1079]।

ऐसे राजनीतिक विमर्श का नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम नेता, सर सैयद अहमद खान, अगामा इकबाल और कायदे-ए-आजम जिन्ना, आखिरकार मुस्लिम राष्ट्रवाद की ओर बढ़ गए और यह सब 1880 से 1930 के 50 साल के दौरान हुआ। [शरीफ उल मुजाहिद, सर सैय्यद अहमद खान और भारत में मुस्लिम राष्ट्रवाद, इस्लामिक स्टडीज, 30, 1999, पृष्ठ 88]। मुगल साम्राज्य के अंत के दो सौ से अधिक वर्षों के बाद भी उस अहंकार की सार्वजनिक अभिव्यक्ति अभी भी जारी है। हाल ही में फरवरी 2020 के तीसरे सप्ताह में, बेंगलूरू में एआइएमआइएम के  सम्मेलन में एक नेता वारिस पठान ने उसी अहंकार का प्रदर्शन किया और कहा, ”15 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिंदुओं पर भारी पड़ सकते हैं।’’ मुस्लिम शासन के दौरान, न केवल सुल्तानों-नवाबों, बल्कि आम मुसलमानों का भी हिंदू प्रजा के साथ रवैया मनमाना हुआ करता था। हालांकि अल्पसंख्यक होने के नाते उन्हें अपने वर्चस्व और इकबाल के लिए हिंदुओं के समर्थन की आवश्यकता थी। सो, उन्होंने रणनीति के तहत उदारता का ढोंग रचकर युद्ध तथा शांति दोनों वक्त में हिंदू प्रतिभाओं को फायदा उठाया। साम्राज्य के मामलों में उन्होंने न केवल उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी के जरिए, बल्कि प्रतिभाशाली हिंदुओं को उनकी वफादारी के लिए पुरस्कृत करके हिंदू सहयोग हासिल किया। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम मेलजोल को प्रोत्साहित किया। इसी कारण से, उन्होंने चुनिंदा हिंदू रीति-रिवाजों को भी अमल में लाया। यह राजनीतिक चतुराई या सिर्फ नकल थी। इसका मकसद धार्मिक समन्वयवाद को आगे बढ़ाना नहीं था। यह राजनीतिक समर्थन हासिल करने की एक प्रक्रिया थी। इसलिए यह एक शासक से दूसरे शासक के बीच भिन्न था। इस प्रकार हिंदू-मुस्लिम संबंध हिंसा, अधीनता और छल के जरिए बढ़े। यह वह तरीका था, जिससे भारतीय मुसलमान अपने अंतिम मकसद की ओर बढ़े, गजवा-ए-हिंद  [यानी भारत विजय की आखिरी लड़ाई, जैसा हदीस 3177 का फरमान है]।

भारत का इतिहास बोध प्राचीन काल से आधुनिक समय तक समूचे देश में सफल विदेशी चुनौतियों से मुकाबिल रहा है। विदेशियों के हाथों भारत की बार-बार हार की क्या वजहें रहीं? यह मुख्य रूप से तो अकादमिक विषय रहा। विद्वानों ने इसकी व्याख्या में संभव ऐतिहासिक संदर्भों को नजरअंदाज कर दिया। इसका फोकस ‘ऐतिहासिक समाजशास्त्र’ पर नहीं था, न ही इस पर कि मुस्लिम शासकों ने कैसे हिंदुओं को पराए नस्ल और समाज का मानकर छिन्न-भिन्न कर दिया, जिन्होंने एक हजार से अधिक वर्षों तक उन पर भारी हिंसा की। क्या भारत की कमजोरी के मद्देनजर इसके प्रभावों पर विचार करना अनिवार्य नहीं था? इसके विपरीत, विद्वानों ने इसे विचार के दायरे से बाहर धकेल दिया। उन्होंने मुगल औपनिवेशिक संदर्भ को ‘प्राज्यवाद’ के ढांचे में देखा, जिसमें पूर्व को अलग और पश्चिम से कमजोर दिखाया गया। भारत की हार के लिए हिंदू सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को दोषी बताया गया। यानी हिंदू विचारों और संस्थानों ने भारत की सैन्य कमजोरी पैदा करने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस प्राज्यवादी निष्कर्ष को बिना किसी दूसरे पुख्ता निष्कर्ष के स्वीकार कर लिया गया। यह हिंदुओं पर ‘अकादमिक युद्ध’ जैसा है। [क्लॉजविट्ज ने युद्ध को मुख्य रूप से एक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया बताया। क्लॉजविट्ज मुताबिक ‘राजनीतिक युद्ध’ वह है, जिसमें हथियारों के उपयोग के बिना लक्षित आबादी पर नियंत्रण अभिनव उपायों के माध्यम से किया जाता है]। आखिरकार, युद्ध-मोर्चे पर भारत के अपमान का यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत को विदेशियों से सीखना चाहिए और खुद को मजबूत बनाने के लिए अपनी  ‘तर्कसंगत श्रेष्ठता’ का एहसास करना चाहिए।

इतिहास लेखन इस प्रकार राजनीतिक नजरिए से हुआ, न कि लोगों के जीवंत नजरिए से। उच्च शिक्षा के विषयों विशेष रूप से मानविकी और सामाजिक विज्ञान और सार्वजनिक नीति पर उनके असर पर गौर करके सामाजिक परिवर्तन की परिकल्पना संभव थी। यह इस स्वायत्तता के बिना संभव नहीं था कि क्या लेना है और क्या छोडऩा है। उदाहरण के लिए, यह निर्णय लिया गया कि हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिम शासकों के अत्याचारों की कहानी, जो विल डुरांट के शब्दों में ‘इतिहास में सबसे खूनी दास्तान’ है, को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह सामुदायिक संबंधों में खटास पैदा कर देगी और  राष्ट्र-निर्माण के प्रयासों को नुकसान पहुंचेगा। जबकि नरसंहार और हरम में डालने के लिए अपहरण और गुलाम भी बनाए गए। ब्रिटिश इतिहासकार सर हेनरी इलियट ने अपने आठ खंडों वाले भारत के इतिहास में इन अत्याचारों का वर्णन किया है [1867]। कुछ भारतीय लेखकों ने भी इसके ब्यौरे जुटाए हैं। हालांकि ये आख्यान भी अत्याचारों की सही तस्वीर पेश करने में नाकाम रहे क्योंकि इनमें सिर्फ राज्य की हिंसा का ही जिक्र हैं, उसके ऐतिहासिक संदर्भों पर गौर नहीं किया गया है।

क्या ‘ब्लैक आउट’ करने का यह रवैया लंबे समय में घातक सिद्ध होता? क्या इस रवैए का कोई विकल्प था? शायद एक बेहतर विकल्प यह था कि गलतियों को स्वीकार किया जाए और उसमें सुधार लाया जाए। मतभेदों को दूर करने का कुछ अधिक विचारशील उपाय हो सकता था। उससे राष्ट्र को शक्ति मिलती। इस विकल्प पर कभी विचार नहीं किया गया, इसलिए हिंदू-मुस्लिम एकता की बातें तो की जाती रहीं, मगर कभी भी वह गंभीर राजनैतिक सवाल नहीं बन पाया।

भारत को शक्तिशाली बनाने की अवधारणा भविष्य की दो द्वंद्वात्मक समझ के आधार पर बनाई गई। चाहे आक्रांता का मॉडल लिया जाए और उसकी श्रेष्ठता के दावे तथा राजनैतिक संस्कृति को स्वीकार करके हिंदू पहचान को नया स्वरूप दिया जाए या फिर बहुसंख्यक हिंदू राष्ट्रवाद का वैकल्पिक इतिहास बोध तैया किया जाए, जो स्वायत्त ऐतिहासिक रुझान के नाते हिंदू राजनीति और शक्ति के रूप में स्वत:स्फूर्त उभरने की क्षमता रखता हो जबकि सभी स्रोतों से सीखने के लिए खुला हो मगर दूसरे सभी मानव रुझानों से बराबरी का रिश्ता रखता हो।

उच्च शिक्षा में भी ‘विदेशी पहले’ का जोर था। संस्कृति, मानविकी, समाज विज्ञान और इतिहास लेखन में बदलते विचारों और सामाजिक प्रथाओं का उपयोग किया जाता था। भारत के हालात का समझने के लिए अमेरिकी उगा शिक्षा हल्का संदर्भ मददगार है। इसमें पहला संदर्भ एलान ब्लूम की 1987 में सिमन ऐंड शूस्टर से छपी किताब द क्लोजिंग ऑफ अमेरिकन माइंड: हाउ हायर एजुकेशन फेल्ड डेमोक्रेसी ऐंड इम्प्रोवाइज्उ द सोल्स ऑफ टुडेज स्टुडेंट्स हो सकती है। लेखक की मुख्य चिंता अमेरिकी विश्वविद्यालयों में सुकरात के तर्कसिद्धांत से आधुनिक तर्कसिद्धांत की ओर बढऩे की प्रवृत्ति है। विश्वविद्यालय अपनी भूमिका उभरती विश्व व्यवस्था के अनुसार तय करने लगीं और अध्ययन में अमेरिका के विरोधियों के बरक्स राष्ट्रीय हित का जोर बढ़ गया।

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भारत के विश्वविद्यालयों में भी यह अवधारणा और रणनीति आयात की गई, ताकि भारत को ताकतवर बनाने के लिए ‘विदेशी पहले’ के रवैए को तर्कसंगत बताया जा सके। आखिरकार यह रवैया हिंदुओं को यह संदेश देने में काम आया कि मुस्लिम राज से वे बहुत कुछ सीख सकते हैं। विद्वानों ने यह उम्मीद भी की कि ‘विदेशी’ को ऐसा विकल्पहीन मॉडल बताया जाए कि स्थानीय लोग उसका नकल करने लगें। इतिहास लेखन इस रणनीति का एक स्तंभ था इसलिए वह उसकी जरूरतों के अनुसार ढल गया और मुस्लिम शासन के ‘ब्लैक बॉक्स’ को ‘ब्लैक आउट’ करने में जुट गया। उन्होंने यह भी तय कि अनास्था रखने वालों को नीचा दिखाने वाले हर मजहबी फरमान या उन्हें इस्लाम में दीक्षित करने के प्रोत्साहन को भी ‘ब्लैक आउट’ किया जाए। आक्रांताओं के पास अपनी जरूरतों, सेक्स और संपत्ति की बेहिसाब वासना की पूर्ति के लिए अपनी श्रेष्ठता के दंभ के अलावा और कुछ नहीं था। समृद्ध हिंदू मंदिरों की लूट काफिरों से दुश्मनी का इजहार नहीं था। उनकी जगह कोई दूसरा भी होता तो शायद वही करता। वह हिंदुओं से ‘सभ्यतागत संघर्ष’ का प्रतीक नहीं था। हिंदुओं को यह समझना चाहिए कि निस्संदेह मुसलमान ‘विदेशी मूल’ के हैं मगर पश्चिमी विरोधी भाईचारे का हिस्सा हैं। उनसे धार्मिक मतभेद ‘विरोधी’ जैसा नहीं है। इंडो-इस्लामिक एकता की सीमा में दोनों समुदायों के बीच मतभेदों के बावजूद विचारों और संस्कृतियों का आदान-प्रदान होता रहा है। लेकिन पश्चिम से भारत के रिश्ते का धरातल एकदम अलग है। यह ‘विरोधियों’  जैसा है। इसलिए भारत के विश्वविद्यालयों में पश्चिमी समाज विज्ञान को नहीं पढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि वह पश्चिम की औपनिवेशिक जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। भारत की जरूरतें अलग तरह की हैं। आखिर भारतीय छात्रों को उसे पढऩे में अपनी ऊर्जा क्यों खर्च करना चाहिए? उन्हें तो भारत की समस्याओं के समाधान के लिए अंतर-विषयक अध्ययन पर फोकस करना चाहिए। आर्थिक पिछड़ेपन की समस्या को विदेश नीति के जरिए हल करना चाहिए। सांप्रदायिक समस्या का समाधान बांटो और राज करो की औपनिवेशिक नीति पर हमला करके निकालना चाहिए। ऐतिहासिक मुस्लिम अत्याचारों का हल हिंदू समाज के लोकतांत्रीकरण में खोजा जाना चाहिए।

मुस्लिम शासन के दौरान शासक बिरादरी के व्यवहार को नजरअंदाज करने और हिंदू समाज को भारत की एकता के लिए उन्हें महत्वपूर्ण बताने के मकसद से लिखा गया इतिहास लेखन समाजशास्त्रीय विश£ेषण से जायज नहीं ठहरता। मुस्लिम हमलावरों के लिए मजहबी प्रेरणा अहम न होने की मान्यता को चुनौती सिंध पर हमले के उदाहरण से दी जाती है जिसकी मंजूरी इस्लामी दुनिया के मजहबी नेता खलीफा उमय्याद ने दी थी। सामनथा मंदिर को बार-बार सिर्फ लूट के लिए ही नहीं तोड़ा गया। सबसे बढ़कर दिगी में सल्तनत की स्थापना और बाद में मुगल राज में मजहबी प्रभुत्व की जरूरत बढ़ती गई थी।

एक प्रासंगिक संदर्भ कैथरीन एशर के शोध-पत्र में मिलता है। एआरएस ओरियंटालिस (मिशिगन यूनिवर्सिटी के आर्ट हिस्ट्री विभाग और स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट से प्रकाशित ) के 1993 के अंक 23 में छपे इस शोध-पत्र का शीर्षक है ‘प्री-मॉडर्न इस्लामिक पैलेसेज।’  लेखिका ने बताया है कि पैगंबर का संदेश पहुंचाने की प्रेरणा ने ही मुगलों को भारत में महल और स्मारकों के निर्माण में अहम भूमिका निभाई, ताकि स्थानीय लोगों में उनकी ताकत का एहसास हो और वे समर्पण कर दें।

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वे कहती हैं, ”मुगलों के महल ताकत और अपना नियंत्रण जाहिर करने के लिए बनाए गए थे. सो, आश्चर्य नहीं कि  एक, दिगी के आखिरी स्वतंत्र सुल्तान पर विजय की जगह (लोधी गार्डेन) बनाया गया। तीसरे मुगल अकबर का किला आगरा में बना, जिसे सल्तनत के रिकॉर्ड में हिंदुस्तान का केंद्र बताया गया। इसमें अब्बैद खलीफा मानुरे की बगदाद की अवधारणा को याद किया गया। अकबर ने इलाहाबाद किले का निर्माण अपने पूर्वी सल्तनत की हिफाजत के लिए बनवाया। वह ऐसी जगह बनाया गया, ताकि भारत के सबसे पवित्र स्थल त्रिवेणी के पास हो। यह किला पहले की परंपराओं पर मुगल दबदबे का प्रतीक था और अतीत से जुड़ाव का भी द्योतक था। (पृष्ठ 281)

वे आगे लिखती हैं, ”ये महल सल्तनत और उसके हिस्से पर नियंत्रण का प्रतीक होने के अलावा मुगलों की ताकत और न्याया पर अमल का भी केंद्र थे। दिल्ली में हुमायूं का दीन पनाह निजाम अल-दीन औलिया के चिस्ती तीर्थ के पास थाञ इसके अलावा वह महाकाव्य महाभारत के स्थल इंद्रप्रस्थ से भी जुड़ा था। इस तरह वह मुगलों को मजहबी केंद्र और इस्लाम पूर्व प्राचीन भारत से भी जोड़ता था। (पृष्ठ 281)

मुसलमान शासकों ने दीन-दुनिया की भव्यता पर फोकस किया। यह समूची दुनिया को दार-उल-इस्लाम की ओर मोडऩे का मिशन था, ऐसी दुनिया जो इस्लाम के तौर-तरीकों और उसकी सामाजिक व्यवस्था के दंड विधान पर आधारित हो। भारत में मुस्लिम आक्रमण इसी अभियान का इजहार था। लेकिन इस अभियान का सीधा असर हिंदुओं के आत्मविश्वास पर सामूहिक चोट की तरह आया। इसका संकेत सांस्कृतिक प्रथाओं और पहचान के संकेतकों से मिलता है। ऐसे सांस्कृतिक हस्तक्षेप धार्मिक लोकाचार में भी अनुभव किए गए। मसलन, हिंदुओं की कमजोरी शाकाहार और ब्रह्मचर्य के रूप में पहचानी गई जबकि मुस्लिम सत्ता मांसाहार और मर्दानगी के प्रदर्शन में गौरवान्वित महसूस करती थी। हाल ईपीडब्लू में छपे शाकाहार के अनुभव पर आधारित कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि इस तरह के धार्मिक ध्रुवीकरण से सटीक तर्कशीलता और दूसरे का फर्क मिटता गया, जो लोकाचार में ‘मुसलमान’ और ‘हिंदू’ होने की धारणा के रूप में दिखा। इसलिए इससे किसी को हैरान नहीं होना चाहिए कि पब्लिक स्कूल के एक स्मार्ट छात्र ने कहा कि ‘हिंदू’ होना एक अपमानजनक प्रस्तुति है। शायद वह अपनी पहचान मुस्लिम सांस्कृतिक संकेतकों से जोड़ रहा था (अमूमन ‘चिकन और लड़कियों’ को पसंद करने और अपने अभिभावकों से झूठ बोलने की फितरत से)। धार्मिक फर्क और पराएपन का यह एहसास ‘जीवन की अच्छी चीजों’ और ‘अच्दे जीवन  के फर्क के रूप में प्रदर्शित होता है।

व्यवहारगत संकेतों की विश्वसनीयता अब संदिग्ध हो गई। वह व्यावहरारिक नजरिए से एक से दूसरे में बदल गई। जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, वहां वे पूरी तरह नागरिकता की उदार अवधारणा के साथ हो गए, लेकिन जहां वे बहुसंख्यक थे, वहां उन्होंने उदार कायदों की अवहेलना की। जैसा सलमान रुश्दी के सैटेनिक वर्सेस को सामूहिक रूप से जलाने में दिखा। बाल्टीमोर के जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी प्रेस से 1993 में छपी तलत असद की जेनियोलॉजी ऑफ रिलिजन: उिसिप्लिन ऐंड रिजन्स ऑफ पॉवर इन क्रिश्चियानटी  ऐंड इस्लाम व्यवहार में इस बदलाव को समझने में मदद करती है। जैसे, आजादी की रात नेहरू हिंदु परंपरा के आगे झुके, ‘नेहरू और उनके सहयोगी दिगी में एक हवन में पालथी मारकर बैठे और हड़बड़ में तंजौर से बुलाए गए हिंदू पुरोहित श्लोक पढ़ रहे थे और उन पर पवित्र जल छिड़क रहे थे जबकि महिलाएं उनके माथे पर टीका लगा रही थीं।’ (पेरी एडरसन, द इंडियन आइडियालॉजी, गुडुगांव, थ्री एसेज कलेक्टिव, पृष्ठ 103)।

अंग्रेजी राज के बाद मुसलमानों में हिंदू बहुसंख्यकों के आगे दोयम दर्जे का हो जाने का डर बैठा और बहुसंख्यकवाद विरोध एक राजनैतिक मंच में बदल गया। फिर, उन्होंने भारत और दुनिया में मुस्लिम हित को बढ़ावा देने के लिए नई संस्थाओं की स्थापना की। ये संस्थाएं देवबंद मदरसा, तबलीगी जमात, अहले हदीस और जमात-ए-इस्लामी थीं। इन सबने भारतीय मुसलमानों की पहुंच पूरे इस्लामी जगत में संभव बनाई। मसलन, एक देवबंदी उलेमा महमूद-अल-हसन ने दूसरे मुस्लिम देशों के समर्थन जुटाने की कोशिश की, ताकि दक्षिण एशिया में भी खिलाफत की स्थापना की जा सके। लेकिन सैयद अबुल अला महदूदी को भारतीय मुसलमानों राष्ट्रवादी अलगाव में रखने का विचार पसंद नहीं आया और उन्होंने इसकी मुखालफत की। उन्होंने जमात-ए-इस्लामी का गठन दूसरे देशों के इस्लामी गुटों से करीबी रिश्ते बनाने के लिए किया। इरफान अहमद इसका विस्तृत व्यौरा अपने शोध-पत्र ‘बिटविन माडरेशन ऐंड रेडिकलाइजेशन: ट्रांसनेशनल इंटरेक्शंस ऑफ जमात-ए-इस्लामी इन इंडिया’ में देते हैं। (ग्लोबल नेटवक्र्स: ए जनरल ऑफ ट्रांसनेशनल अफेयर्स, 5 (3), 2005, पृष्ठ 279-299)। इसी तरह तबलीगी जमात (देवबंदी सुन्नी मुसलमानों का धर्म-प्रचारक समूह) ने एक सौ से ज्यादा मुस्लिम देशों के उम्मा का नेटवर्क बनाया और खिलाफत को जिंदा करने की मुहिम चलाई। भारत स्थित इन संस्थाओं ने यह उम्मीद जाहिर की कि वे विश्व व्यवस्था में भारत की सहिष्णु और सेकुलर स्थिति को मजबूत करने की कोशिश करेंगे और ऐसी भूमिका निभाने के लिए हिंदू बहुसंख्यकों का अपने प्रति विश्वास के लिए एहसान माना। फिर भी, उन्होंने दुनिया में सामाजिक-धार्मिक बंटवारे को शह दिया और खुद को पश्चिम विरोधी एजेंडे में आत्मसात कर लिया। इस तरह उन्होंने पश्चिमी देशों के साथ भारत के मित्रवत और सहयोगी रिश्ते में समस्या खड़ी करने की कोशिश की। उन्होंने जेहादी संगठनों के लिए उग्रवादियों की भर्ती में कथित भूमिका निभाकर भारत के लिए परेशानी पैदा की। देखें, शीरीन खान बुखारी की ‘द तबलीगी जमात: धर्म प्रचारक मिशरीज ऑर टॉर्जन हॉर्स?’ (जनरल ऑफ एप्लाइड सेक्यूरिटी रिसर्च, 2013)। ऐसी अंतर-देशीय नेटवर्किंंग से मुस्लिम राजनीति का विस्तार हुआ और पश्चिम विरोधी एजेंडा आगे बढ़ा। इसलिए जमात को पश्चिमी देशों में जेहादी हिंसा में संदेह की नजर से देखा जाता है। 2001 में इस सिलसिले में न्यूयॉर्क टाइम्स में कई लेख छपे। सैयद कुतुब और वील हलाक जैसे इस्लामी विद्वान पुनर्जागरण काल के बाद पश्चिमी आधुनिकता पर जेहादी हिंसा को जायज भी ठहरा चुके हैं।

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तो, भारत को क्या उन्हें श्रेष्ठ तर्कशीलता और संस्कृति के पैरोकार मानना चाहिए, जैसा कि उत्तर भारत के सभी बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालयों के सभी धर्मों के छात्र कहते हैं, और उनसे सीखना चाहिए कि भारत इतना मजबूत बन जाएगा कि गजवा-ए-हिंद सहित तमाम आक्रमणों को झेलने में कामयाब होगा?

मौलाना आजाद का सर्व-इस्लामी रुझान एकदम अलग था। उन्होंने उस्मानिया साम्राज्य के बिखराव का विरोध किया था। उन्होंने खिलाफत का समर्थन किया था और खिलाफत आंदोलन चलाकर उसको खत्म करने का विरोध करने के लिए लोगों को एकजुट किया था। उन्होंने भारत में मुसलमानों के भविष्य पर सर सैयद का विरोध किया था। मौलाना सर्व-इस्लामी एकता और राष्ट्रवाद तथा सेकुलरवाद को खारिज करने के जमलुदीन अल-अफगानी के विचारों से सहमत थे। उन्होंने मुसलमानों को पश्चिम के खिलाफ गोलंद करने के लिए अल-अफगानी के धार्मिक सिद्धांत को सही माना। (हिंदुओं की गोलबंदी धर्म सिद्धांत के आधार पर करने को सांप्रदायिक कहकर निंदा की जाती है, लेकिन वह तब नहीं कहा जाता जब मौलाना साहब इसी आधार पर मुसलमानों की गोलबंदी की बात कहते हैं)। कट्टर इस्लामी इसे ‘पैगंबर की सैन्य और इस्लामी संदेश का मिथकीय पाठ’ के प्रति अपना समर्थन बताते हैं। पाकिस्तानी हॉरिजन (1981) में छपे ‘सैयद जमालुदीन अफगानीज आइडियाज ब्लेज ट्रेल’ शीर्षक शोध-पत्र में कह गया, ‘इस्लामी एकेश्वरवाद की श्रेष्ठता स्थापित की (हिंदू बहुदेववाद पर खुद पैगंबर ने राज्य-प्रमुख हाने के नाते और मुसलमानों को देश-काल के मुताबिक कुछ कौशल अपनाने (कहें, हिंदुओं के संदर्भ में) की पैरवी की)।’ सर सैयद और मौलाना ने मुस्लिम राष्ट्रवाद (सर सैयद की राय में) और सर्व-इस्लामी गोलबंदी (मौलाना की राय में) को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा किया। दरअसल पश्चिम और आधुनिकता के प्रति दोनों के विचारों में फर्क से ही यह हुआ। सर सैयद अंग्रेजी राज के खिलाफ नहीं थे (उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया)। वे भारतीय मुसलमानों का शैक्षणिक और आर्थिक विकास चाहते थे। इसके विपरीत मौलाना ने भारत से अंग्रेजों को भगाने और ब्रिटिश युद्ध को कमजोर करने के लिए एक राष्ट्र के झंडे तले हिंदू और मुसलमान एकता के पैरोकार थे। उन्होंने गदर पार्टी तक का समर्थन किया था। मुस्लिम आधुनिकता और हिंदू-मुसलमान एकता का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत उत्साहवद्र्धक नहीं रहा। अलबत्ता मौलाना की हिंदू-मुसलमान एकता की कोशिशों के लिए उन्हें भारत रत्न की उपाधि से नवाजा जाना चाहिए।

मौजूदा परिदृश्य मं लौटे तो क्या श्रेष्ठता के दावे पर हो-हगा मचाने के कोई संकेत हैं या इसका कि जैसा न्यूयॉर्क टाइम्स में 17 अगस्त 2017 को मुहम्मद अली जिन्ना पर एजाज अशरफ के लेख में कहा गया है कि जिन्ना की ‘अंधी फंतासियां’ सच होने लगीं। न ही (मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक) सर्व-इस्लामी नेअवर्किंग में कहीं भारत विरोध दिखता है। इस्लामिक एनजीओ जरूर फोकस में हैं, खासकर इस्तांबुल के साइटिफिंग स्टडीज एसोसिएशन के साथ। एसोसिएशन का गठन 2002 में हुआ था, जिसका तुर्की  में नाम इल्मी एतुदलर दरनेगी (आइएलईएम) है। यह संगठन उन मुद्दों पर आइआइएसएस सेमिनार का आयोजन करता है जो मुस्लिम समुदायों के नवजागरण पर जोर देते हैं। जैसे आइआइएसएस सेमिनार 2019 का विषय ‘अंतर-देशीय इस्लाम और मुस्लिम उम्मा की चुनौतियां’ था। सर्व-इस्लामी कट्टरतावादियों ने इसे राज्य आधारित पहचान को चुनौती देने के लिए उम्मा की अविभाजित एकता की तरह देखा। यही रणनीतिक रुझान शायद भारत में कट्टर तत्वों को हाल में राजनैतिक हलचल पैदा करने की ओर ले गया। इन हलचलों में सार्वजनिक बहस, छात्रों और सिविल सोसायटी की सक्रियता दिखी। इसका नेतृत्व अमूमन ऊर्जावान और उत्साहित व्यक्तियों ने किया, जो किसी जनहित के मुद्दे पर खास लोगों को गोलबंद कर सकते थे और जो खुद को लोगों के सामने ‘सर्वहारा’ के पैरोकार के नाते पेश कर रहे थे। उन्होंने खुद को ‘नव-उम्मा’ जैसा ख्वाब पाल लिया, यानी स्वंभू कट्टरतावादियों का समूह। उनकी सोच और बनावट स्थानीय थी, उनका जुड़ाव सलफीवाद, वहाबीवाद, कुब्तवाद, जेहादवाद या इस्लामवाद जैसे ज्ञात कट्टर विचारधाराओं से नहीं था, न ही वे वील हलाक या सैयद कुत्ब के लेखन से प्रभावित लगे। एक बात तय है कि यह हलचल राष्ट्र निर्माण के तर्कसंगत विमर्श का हिस्सा नहीं थी।

जो अतीत के प्रति अपनी आंखें बंद कर लेते हैं, वे वर्तमान में भी अंधे होते हैं। मुसलमानों ने हिंदुओं के प्रति हुए अन्याय का शमन न करके अतीत के प्रति अपनी आंखें बंद कर लीं। तनावपूर्ण रिश्ते वाले  समुदायों के बीच सामाजिक मरहम और नैतिक आग्रह की कोई जगह अनुषांगिक तर्कों और तर्कसंगत सत्ता-मिमांसा में नहीं थी, जो विभाजन की बहसों में छाई रही। इसलिए मुसलमान जब हिंदुओं से यह कहते हैं कि हमने ‘तुम्हें ताजमहल दिया’ तो वे मुद्दे को मोड़ रहे होते हैं और यह भुला देते हैं कि ताजमहल बनाने वाले कारिगरों के हाथ शाही फरमान से काट दिए गए, ताकि उसकी भव्यता अकेली बनी रहे और दूसरों सेे ऊंचा होने की उनकी ख्वाहिश छुपी रहे। मुसलमानों में यह श्रेष्ठता ग्रंथि हिंदुओं से उनके समस्याग्रस्त रियते की वजह से थी। भारत में अपने लंबे शासन में राजनैतिक और नैतिक अराजक तत्वों की तरह व्यवहार करते रहे, जो इस्लाम में तर्कसंगत विश्व व्यवस्था की कल्पना से बिलकुल अलग था। सल्तनत खत्म होने के बाद भी वे अपने पुराने आचार-व्यवहार को अपनाए रहे। वे खुले मन से यह एहसास नहीं स्वीकार कर पाए कि लोकतांत्रिक और तार्किक राजनैतिक व्यवस्था हिंदू बहुसंख्यकों के हाथ सत्ता स्वाभाविक तौर से जाएगी।

शेक्सपियर के यहां मैकबेथ की तरह उन्होंने सोचा कि उनकी मर्जी पर हिंदु मातहत हैं इसलिए वे ‘किंग की चेयर’ पर ‘बांको के भूत’ को बैठा हुआ नहीं देखेंगे। वे हिंदुओं के साथ हुए अन्याय से उनका विवेक क्षत-विक्षत था और राजनैतिक व्यवस्था को न्यायिक संदर्भ देने में उनकी अक्षमता बनी रहा। उन्होंने राजनैतिक उद्देश्यों के लिए तर्कों का सहारा लिया और उसका कारगर इस्तेमाल किया लेकिन दूसरे धार्मिक समूहों या राजनैतिक विरोधियों के संदर्भ में उदार मानवीय उद्देश्यों पर आगे बढऩे की उनकी समझ पर तर्कसंगत विचारों के प्रति उनकी अनास्था हावी हो गई, जो उनके धर्म-सिद्धांतों और संदेशों के असर से पैदा हुई थी। वे अपने भीतर सुधार कर सकते थे, बनिस्बत दूसरों की प्रजा होने के भाव से पीडि़त होने के। क्रांतिकारी मुसलमान शायद उन्हें आगे का रास्ता दिखाएं।

इरशद मंजी ऐसी ही मुसलमान हैं। वे चर्चा में अपनी किताब ‘ट्रबल विथ इस्लाम: ए मुस्लिम्स कॉल फॉर रिफॉर्म इन हर फेथ (2004) आईं। कुछ वर्षों बाद उन्होंने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में व्याख्यान दिया और 2011 में उनकी एक और किताब ‘अगाह, लिबर्टी ऐंड लव’ छपी। उन्होंने एक फिल्म ‘फेथ विदआउट फियर’ भी प्रोड्यूस की और यंग ग्लोबल लीडर चुनी गईं। इस युवा महिला का उत्साह निस्संदेह काबिले तारीफ है, हालांकि, जैसा कि दिल्ली के सीएसडीएस के स्कॉलर हिलाल अहमद का सोचना है, उनका काम आजादी के बाद अच्छे-बुरे मुसलमान की बहस से गहरे प्रभावित है। यह बहस खुद नेहरू ने शुरू की थी और भारत में मुस्लिम सवाल से लगातार जुड़ी रही है। अच्छे मुसलमान की परिभाषा सरकारी आदमी की तरह गढ़ी गई, जो मुख्यधारा की राजनीति में हो और सार्वजनिक व्यवहार के आधिकारिक कायदों का हिमायती हो। क्या यह व्यवहार राजनैति जरूरत से निकला था? मोहम्मद मदानी का अपनी किताब ‘गुड मुस्लिम, बैड मुस्लिम’ (न्यूयॉर्क, हॉर्मनी बुक्स, 2005) में ऐसा ही सोचना है। सच्चे मुसलमान के लिए इस्लाम और राजनीति जुड़ी हुई है और दोनों मिलाकर ‘राजनीतिक इस्लाम’ बनता है। इस्लाम हमेशा ही राजनैतिक इस्लाम रहा है। ‘सेकुलर मुस्लिम’ एक विरोधाभास है। इसलिए हिंदू-मुस्लिम संबंधों में धर्मनिरपेक्षता का बोझ अकेले हिंदुओं पर आ जाता है। सांप्रदायिक और सेकुलर राजनीति के ढांचे ने हिंदू-मुसलमान रिश्ते पर ऐसा असर डाला कि अंतर-धार्मिक संबंध हिंद-इस्लामी सांस्कृतिक विकास के ऐतिहासिक स्थल की तरह उभरे जिसमें कुछ इस्लामी मूल्यों को हिंदू मान्यताओं में शामिल करने की जरूरत बन आई और मुसलमानों ने अपने तईं माथे पर बिंदी या दीवाली मनाने जैसे चुनींदा हिंदू सांस्कृतिक प्रथाओं की नकल की। इस्लाम के साथ आंतरिक संबंध वाले ‘साझा संस्कृति’ की यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। देवबंदी इस्लामी मौलाना सैयद हुसैन अहमद मसानी ने ‘मुताहिदा कौमियत और इस्लाम’ (समावेशी राष्ट्रवाद और इस्लाम, दिल्ली, 1938) नामक पुस्तक लिखी है। हिंदुओं का ‘समावेशी संस्कृति’ का ऐतिहासिक सार उसके ऐतिहासिक अर्थ से अलग है। उन्हें यह यह विश्लेषणात्मक अवधारणा की तरह प्रस्तुत किया गया। साझा संस्कृति की  ऐतिहासिक अवधारणा में प्रभुत्वशाली मुसलमानों और मातहत हिंदुओं के बीच संबंधों की पुनर्रचना का कोई विचार नहीं है। इस संबंध को एकाधिकारवादी मुद्दों  की बहस में ढाला गया, जैसे, ‘मैं क्यों हिंदू हूं’ या ‘मैं क्यों हिंदू नहीं हूं।’ उन्नीसवीं सदी में ‘साझा संस्कृति की इस्लामी अवधारणा’ की बुनियाद नौवीं और दसवीं सदी में तलाशी जा सकती है, जब खलीफा ने भारत के साथ एकाधिकारवादी संबंधों की मंशा जाहिर की और भारत में पुनर्जागरण के लिए इस्लामी असर व्यापक करने की मुहिम शुरू की। इसके परिणामस्वरूप सूफी और हिंदू संत उभरे और धार्मिक परिदृश्य को बदल डालने का संकल्प लिया। उनके सुंदर, सुरीले गीत आज भी दिल को छू लेते हैं लेकिन समकालीन हिंदू समाज को हिंसक मुस्लिम आक्रांताओं और शासकों के हत्यारे मंसूबों से कोई राहत नहीं मिली थी। उनकी नई रचनाएं अपनी बुनियाद के ऐतिहासिक संदर्भ (इस्लामी असर) से बड़ी खूबसूरती से एकदम अलग थीं और उन्हें ऐसे पेश किया गया, मानो सर्वव्यापी एकेश्वर की आस्था हिंदू नवोन्मेष ही है। लेकिन वे दो आस्थाओं और उनके आपसी संबंध को नहीं बदल पाए। दोनों समुदायों की समाज व्यवस्था नहीं बदली, जो शुरू में मुस्लिम फौजी ताकत के निर्मम इस्तेमाल से तैयार हुई थी। यह नजरिया फिर कायम हुआ जब नई रानी विक्टोरिया ने मुगल समाज व्यवस्था को हटाने के बदले उसे ही चालू रखा। मुगल दरबार की धार्मिक समुदायों के बीच सामज व्यवस्था कुछ तरमीम के साथ अंग्रेजी राज के सार्वजनिक आयोजनों में कायम रही। शायद अनजाने में कमोबेश यही व्यवस्था आजादी के बाद भी चलने दी गई। यह भी एक वजह हो सकती है कि बंटवारे के बाद बड़ी संख्या में मुसलमानों के टिके रहने की प्रेरणा मिली और चुपचाप उनसे मदद की आस बनाए रखी जो चले गए, अगर कभी हिंदू इधर आने की सोचें। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि भारत की समाज व्यवस्था आज तक वही चली आ रही है जब मुसलमानों ने अपना राज स्थापित किया।

नसरुद्दीन शाह शायद इस सच्चाई को नाट्य कलाकार के नजरिए से देखने का फैसला करें। वे शायद मुस्लिम शासन की खूनी राह के पतन पर कुछ कहने और मध्यकाल मुसलमानों के वंसज होने के नाते अपनी हथेली खोलकर उस पर ‘खूनी धब्बे’ को देखने का फैसला करें। वे शायद खीझ से चिगा उठें, ‘दूर हो, नामुराद धब्बे!’ वे शायद अपने हाथ मलें लेकिन वह दूर नहीं होगा। और फिर हताश होकर बुदाबुदा उठें, ‘ऐ समंदरों! क्या तुम मेरे हाथ का यह खूनी धब्बा धो दोगे?’’ ऐसा नहीं हो पाएगा और वे बिस्तर पर लेट जाएंगे और ‘आंखें खुली की खुली’ रह जाएंगी, ‘अरब के सभी इत्र भी इस हाथ में खुशबू नहीं बिखेर पाएंगे।’ (मुस्लिम विवेक लेडी मैकबेथ की तरह जार-जार रोएगा)। ऐसा ही चेतना हिंदू-मुसलमान एकता की कोशिशें की प्रस्थान विंदु होनी चाहिए थी।

इस्लामी धर्मपरायणता को केंद्र में लाकर अगर अतीत में हुए खून-खराबे के लिए हिंदुओं से माफी मांगने की पहल होती है तो हिंदू-मुसलमान रिश्ते में बुनियादी बदलाव आ जाएगा। पश्चाताप से ही वह दाग धुलेगा। एक पल के लिए नसीरुद्दीन साहब कृपया छोटे बच्चों की भूमिका में आ जाएं जब सरकारी मुसलमान (उनके बड़े भाई ने अपनी आत्मकथा खुद को इसी नाम से पुकारा है) साइकिल चला रहा हो और आप, उनके छोटे भाई, पिछली सीट पर सवार हों। उनसे छोटा होना आपने नहीं चुना था, लेकिन पिछली सीट पर सवारी लिहाजदारी का मामला था। इसी तरह अल्पसंख्यक समुदाय का सदस्य होना आपने नहीं चुना था। जैसे छोटा भाई होना जन्म का कमाल था और आप पिछली सीट पर थे। आप क्यों नहीं वही तरीका अब भी बनाए रखते हैं? अपनी सुरक्षा के खातिर, आपको ध्यान रखना चाहिए कि पिछली सीट के नीचे पहिया कहीं आपके भारी वजन से फट न जाए। अहंकारी छोटा भाई अहंकार बड़े भाई से ज्यादा असहिष्णु था क्योंकि बड़े भाई का अहंकारी होना वांछित था। थिएटर हर किसी को सीखाता है कि प्रतिभा के साथ विनम्रता बेहतर संस्कृति होती है और इस मामले आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता। राष्ट्र निर्माण संभव नहीं था, अगर सभी सामाजिक मतभेदों को लगातार हवा देते रहते, खासकर आप जैसे लोग जिनकी तारीफ की जाती है और प्यार किया जाता है।

ऐतिहासिक अन्यायों का समाधान राजनैतिक अध्ययन का अहम पहलू है। ऊंची जातियों के द्वारा निचली जाती के हिंदुओं के साथ हुए अन्याय के सुधार की व्यवस्था अध्येताओं के लिए एक अहम विषय रहा है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कभी औपनिवेशिक रिश्तों की सीमा नहीं लांघी गई। हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों के अन्याय को सुरक्षा और राष्ट्रीय शक्ति की मृगमरीचिका जैसी तलाश में भुला दिया गया। गोल्डिंग के फ्री फाल से शब्द उधार लेकर कहा जा सकता है, ‘आपका अतीत आपके साथ चलता है। वह कदम मिलाता चलता है। उसका बूढ़ा चेहरा आपके कंधे से झांकता रहता है।’ मुसलमानों ने जालियांवाला बाग हत्याकांड पर क्षमायाचना की मांग की (और जायज मांग की) लेकिन उसके पहले अपने हत्याकांडों पर जबान पर ताले जड़ लिये। हिंदू-मुसलमानों की नैतिक बराबरी क्षुब्ध हिंदू अतीत की बातें करने वाले मन से सोचे तथ्य से परे विचारों को दूर करने के लिए अनिवार्य शर्त है। मुसलमानों को मौलाना आजाद की सलाह पर गौर करने की दरकार है, जो इस्लामी अध्ययन के महान विद्वान थे, कि हिंदुओं के साथ नैतिक बराबरी के लिए अपने में सुधार लाओ, जरूरत हो तो अपनी मान्यताओं में सुधार लाओ। उन्हें राष्ट्रीय वफादारी को प्राथमिकता देनी चाहिए, न कि मजहबी पहचान को। उन्हें ‘राष्ट्रीयता के समावेशी और एकजुट मॉडल’ पर जोर देना चाहिए। इसके लिए उन्हें हिंदुओं के प्रति किए गए अन्याय के लिए सामूहिक माफी की पेशकश करनी चाहिए और पीडि़तों की याद में स्मारक बनाने चाहिए। यही बात भारत की समस्याओं के समाधान की तलाश में विद्वतापूर्ण अध्ययनों में भी होनी चाहिए कि तथ्य से परे विचारों के बदले अनुशासित जांच-पड़ताल की जाए।

 

सुशील कुमार

 

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