ब्रेकिंग न्यूज़ 

लाल चंदन खून के छींटे

लाल चंदन खून के छींटे

तपिश जारी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्पेशल टास्क फोर्स द्वारा 20 कथित चंदन तस्करों की हत्या पर आंध्र प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया  है। स्वत: संज्ञान लेते हुए आयोग ने इस मामले में पाया कि इस घटना में मानवाधिकारों का गंभीर रूप से उल्लंघन किया गया है। आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक, दोनों को दो सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया है। हर तरफ यही बात कही जा रही है कि एनकांउटर का नाटक किया गया है। पुलिस का दावा है कि उन पर पत्थर, चाकू और कुल्हाडिय़ों से हमला किया, जिसके कारण बाध्य होकर पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं।

कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनके कारण पुलिस के दावे संदेह के घेरे में आते हैं। प्रथम दृष्टतया, नौ में से सात मृतकों के चेहरे या सिर के पिछले हिस्से में गोली लगी है। कई मृतकों के पेट, कंधे और हाथों पर जलने के निशान हैं। शवों के चमड़े छिले हुए थे। कुछ मृतकों की कलाईयों पर निशान थे, जिससे जाहिर होता है कि उन्हें बांधा गया था।

अधिकांश मृतकों के गर्दन के पिछले हिस्से पर गोलियों के निशान हैं। या तो सारे एसटीएफ कर्मी ओलंपिक स्तर के निशानेबाज हैं या फिर हत्यारे, जिन्होंने मृतकों को बिना निशाना लगाए मार गिराया। पुलिस का बयान कि जलने का निशान गर्मी की वजह से हुआ है, हास्यास्पद है।  इस कहानी में और भी कई झोल हैं। शवों के पास जो लट्ठे दिखाए गए हैं, वह ताजे नहीं हैं। उनमें से अधिकांश के ऊपर बहुत सफाई से नंबर डाले गए हैं। इस तरह के नंबर वन अधिकारी जब्ती के बाद डालते हैं। जो तथ्य अधिक आश्चर्यचकित करने वाला था, वह यह है कि जहां एनकाऊंटर हुआ है, उसके आसपास चंदन के पेड़ नहीं हैं। कथित तस्करों के पास से जब्ती में दिखाए गए कुल्हाडिय़ों एवं चाकूओं की  धार कुंद और उन पर जंग लगी हुई है।

सवाल करने पर टास्क फोर्स के डीआईजी कांता राव ने कहा कि सौ से ‘यादा तस्करों ने उनकी टीम पर हंसिया, रॉड और कुल्हाडिय़ों से हमला बोला था। उन्होंने कहा कि तस्करों को कई चेतावनी दी गई, लेकिन उन्होंने हमले बंद नहीं किए। यह पूछने पर कि कितने लोग गंभीर रूप से घायल हुए, उन्होंने कहा, ”हमारी तरफ से कोई भी व्यक्ति गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें उच्च श्रेणी का प्रशिक्षण दिया गया था।’’

मृतकों में अधिकांश ‘वन्नियार’ हैं, जो समाज के सबसे नीचले पायदान पर खड़े जंगलों में रहने वाली अनुसूचित जनजाति है। राजनैतिक रूप से शक्तिशाली गैंग, जो चंदन की लकडिय़ों की तस्करी करते हैं, इन वनवासियों की भर्ती करते हैं। चंदन की लकडिय़ों की तस्करी के चार चरण हैं। ये वनवासी लकड़हारे इसके पहले पायदान पर आते हैं। दूसरे पायदान पर ट्रांसपोर्टर्स आते हैं, जो वन अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के साथ मिलकर इन लकडिय़ों को जंगल से बाहर निकालते हैं। तीसरे पायदान पर निर्यातक होते हैं, जो इन्हें देश के बाहर भेजते हैं। चंदन को खाद्य उत्पाद, ‘यूलरी, दवाईयों आदि के रूप में इन्हें कंटेनरों में भरकर निर्यात किया जाता है। शीर्ष पर बैठा हुआ गैंग ही इसका मास्टरमाइंड होता है जो भर्ती से लेकर, बातचीत और राजनीतिक संरक्षण, सब कुछ देखता है। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में लोगों की आम जानकारी में है कि कई राजनेता चंदन की तस्करी में संलिप्त हैं।

जान हथेली पर रखकर यह काम करने वाले गरीब लकड़हारों को एक पेड़ काटने के लिए मुश्किल से 5 हजार रूपए मिलते हैं, जबकि चंदन की लकड़ी को 60 से 80 लाख रूपए प्रति टन के हिसाब से विदेशों में बेचा जाता है। पिछले नवंबर में रा’य सरकार ने जब्त किए गए चंदन की लकड़ी की नीलामी से 1,000 करोड़ रूपए कमाए।

रा’य में तस्करों और पुलिस के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। आंध्र प्रदेश में 2500 से ‘यादा लोग तस्करी के आरोप में जेलों में बंद हैं, जिसमें से अधिकांश तमिलनाडु के रहने वाले हैं। तस्कर &00 से 500 की संख्या वाले मजबूत समूह में आते हैं। एक घटना में तस्करी के आरोप में पुलिस ने 400 लोगों को पकड़ा था और उन्हें कोर्ट में पेश करने के लिए पुलिस को बसों को किराए पर मंगाना पड़ा था। छोटे से न्यायालय में जगह नहीं थी, इसलिए मजिस्ट्रेट को उन्हें खुले मैदान में सुनना पड़ा था। लकडिय़ों को ढ़ोने के लिए तस्करों की पसंदीदा एसयूवी 2200 इनोवा गाडिय़ां पुलिस थानों और वन विभाग की हिरासत में हैं।

गरीब आदिवासियों की हत्या से साफ है कि ऐंटी-स्मगलिंग टास्क फोर्स ने संयम से काम नहीं लिया। यह मुठभेड़ देश की आपराधिक न्याय प्रणाली पर एक और धब्बा है, साथ ही मानवाधिकार का घोर उल्लंघन भी। यह गैर-संचालित आपराधिक न्याय प्रणाली है जो पुलिस को कानून अपने हाथ में लेने के लिए बाध्य करती है। सिर्फ एक विश्वसनीय जांच ही इस घटना की हकीकत को सामने ला सकती है।

दीपक कुमार रथ

где можноcopywriter advertising

Leave a Reply

Your email address will not be published.