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आस पूर्ण करो तुम हमारी

आस पूर्ण करो तुम हमारी

गौ रुद्रदेवों की माता, वासुदेवों की बेटी और आदित्य देवों की बहन तथा द्यृतरुप अमृत्व का केन्द्र है।’’        – महर्षि च्यवन   

गाय (भारतीय नस्ल की देशी) की महिमा का ऐसा बखान करने वाला हिन्दू धर्म अकेला नहीं है। अपनी दिव्य दृष्टि के प्रभाव से महावीर स्वामी ने पाया कि गाय ईश्वर प्रदत्त सर्वोत्तम देनों में से एक है। उन्होंने कहा – ”गाय अहिंसा की प्रतिमूर्ति है एवं संपूर्ण मूक सृष्टि का प्रतिनिधित्व करती है। अत: सभी उपायों से गौ-वंश की रक्षा करना परम धर्म है।’’

यही कारण है कि लोग गाय को पालें  जिससे कि गौधन का संरक्षण हो। जैनों के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव नें बैल से दुनिया को कृषि करना सिखलाया। तभी तो बैल को ऋषभ भी कहा जाता है।

अब एक बात पर ध्यान जाना स्वभाविक है कि यदि दूग्ध, दही, घी मात्र कारण होते तो बस इतने भर से गाय को इतना महत्व शायद न दिया गया होता। जरा देखें – ”गोबर में परम पवित्र सर्वमंगलमयी लक्ष्मीजी नित्य वास करती हैं। इसलिये गोबर से लेपन करना चाहिए।’’ (स्कन्द.,अव.,रेवा.83/108)

गोबर ही क्या, गौमूत्र भी दिव्य गुणों से युक्त है, जिसका वर्णन शास्त्रों में जगह-जगह देखने को मिलता है।

गौमूत्रे त्रिदिनं स्थाप्य विषं तेन विषुद्धयति।’’ – आयुर्वेद।

अर्थात, ”कैसा भी विष क्यों ना हो गौमूत्र में मात्र तीन दिन तक पड़े रहने पर शुद्ध हो जाता है।’’

श्रीमदभागवत में उल्लेख मिलता है -” राम-वनवास के समय भरत 14 वर्षों तक इसी कारण स्वस्थ रह कर अध्यात्मिक उन्नति करते रहे, क्योंकि अन्न के साथ वे गौमूत्र का सेवन करते रहे।’’ (श्रीमद्धा.9/10/34)

भारतीय गाय से मिलने वाली ये पांच वस्तुएं (दूग्ध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र) अपने-अपने स्तर पर और आपस में मिलकर पंचगव्य के रुप में प्राणीमात्र के लिये स्वास्थ्यवर्धक है।

गव्यं पवित्रं च रसयन च

पथ्यं च हृदयं बलबुद्धिदं स्यात ।।

आयु:प्रद रक्त विकार हारि

त्रिदोषहृद्रोग विष हरं स्यात।।’’           – आयुर्वेद

अथार्त, ”पंचगव्य परम पवित्र रसायन है, पथ्य है, हृदय को आन्नद देने वाला है और बल-बुद्धि प्रदान करने वाला है। यह आयु प्रदान करने वाला, रक्त के समस्त विकारों को दूर करने वाला, त्रिदोष, हृदय के रोग और तीक्ष्ण विष के प्रभाव को भी दूर करने वाला है।’’

यही कारण है कि मात्र प्रकृत्ति के द्वारा प्रदत्त घास, पत्ती, चारा पर अपना गुजारा कर लेने वाली, प्राणीमात्र का बहुविध प्रकार से उपकार करने वाली गाय का मुगलों के हाथों निर्मम वध देख गुरु गोविन्द सिंह व्यथित हो पुकार उठे –

यहि देहु आज्ञा तुर्क गाहै खपाऊं।

गौ द्यात का दुख जगत से हटाऊं।।

आसपूर्ण करो तुम हमारी।

मिटे कष्ट गोअन छूटे खेद भारी।।’’

अतैव, आगे चलकर रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिक्खों ने जब अफगानियों को 1820 ईस्वीं में पराजित कर पंजाब में अपना राज्य स्थापित किया तो गोहत्या पर प्रतिबंध लगाया गया।

राजेश पाठक

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